आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 37 – Shlok 52 to 61
श्लोक ( Shlok ) 52
भ्रूक्षेपयन्त्रपाषाणैः दृक्क्षेपक्षेपणीकृतैः । ‘बहुदुर्गरणस्तासां स्मरोऽभूत् सकचग्रहः ॥ ५२ ।।
भौहों के चलानेरूप यन्त्रोंसे फेंके हुए पत्थरोंके द्वारा तथा दृष्टियों के फेंकनेरूपी यन्त्र विशेषों (गुथनों) के द्वारा उन स्त्रियोंका बहुत प्रकारका किलेबन्दीका युद्ध होता था ओर कामदेव उसमें सबकी चोटी पकड़नेवाला था। भावार्थ कामदेव उन स्त्रियों-से अनेक प्रकारकी चेष्टा कराता था ।। ५२ ।।
With the weapons of glances—like stones hurled by the motion of their brows—and the special darts fashioned from their piercing stares, these women waged a myriad of siege-like battles, over which Kāma held sovereign sway, compelling them to manifold playful pursuits.52
श्लोक ( Shlok ) 53 –56
खरः प्रणयगर्भेषु कोरेष्वनुनये मृदुः । स्तब्धो व्यलीकमानेषु मुग्धः प्रणयकैतवे ॥ ५३ ॥ निर्दयः परिरम्भेषु सानुज्ञानो मुखार्पणे । प्रतिपत्तिषु सम्मूढः पटुः करणचेष्टिते ।। ५४ ॥संकल्पेष्वाहितोत्कर्षो मन्दः प्रत्यग्रसङ्गमे । प्रारम्भे रसिको दीप्तः प्रान्ते करुणकातरः ।। ५५ llइयुच्चावचतां भेजे तासां दीप्तः स मन्मथः । प्रायो भिन्नरसः कामः कामिनां हृदयङ्गमः ॥ ५६ ॥
कामदेव इनके प्रेमपूर्ण क्रोधके समय कठोर हो जाता था, अनुनय करने अर्थात् पतिके द्वारा मनाये जानेपर कोमल हो जाता था, भूठा अभि-मान करनेपर उद्दण्ड हो जाता था, प्रेमपूर्ण कपट करते समय भोला या अनजान हो जाता था, आलिंगनके समय निर्दय हो जाता था, चुम्बनके लिये मुख प्रदान करते समय आज्ञा देनेवाला हो जाता है, स्वीकार करते समय विचार मूढ़ हो जाता है, हाव-भाव आदि चेष्टाओंके समय अत्यन्त चतुर हो जाता है, संकल्प करते समय उत्कर्षको धारण करनेवाला हो जाता है, नवीन समागमके समय लज्जासे कुछ मन्द हो जाता है, संभोग प्रारम्भ करते समय अत्यन्त रसिक हो जाता था और संभोगके अन्त में करुणासे कातर हो जाता था। इस प्रकार उन रानियोंका अत्यन्त प्रज्वलित हुआ कामदेव ऊंची-नीची अवस्थाको प्राप्त होता था अर्थात् घटता-बढ़ता रहता था सो ठीक ही है जो काम प्रायः भिन्न भिन्न रसोंसे भरा रहता है वही कामी पुरुषोंको सुन्दर मालूम होता है ॥ ५३-५६।।
Kāma, in the throes of their loving wrath, grew stern;At their tender entreaties, softened with gentle grace.When met with feigned displeasure, he became defiant;Yet in artful deceit, assumed innocence and guileless face.In embraces, he showed no mercy,While offering lips for kisses, he commanded with authority.Upon acceptance, his thoughts grew bewildered,And in gestures and play, displayed cunning dexterity.When resolve was made, he bore the height of passion,Yet in new union, a modest blush would veil his face.At the outset of union, he became most ardent,But at its close, was touched by sorrow’s tender embrace.Thus, in those queens’ fiery passion, Kāma’s power waxed and waned—Rising and falling, ebbing and flowing with varying moods;Truly, it is the flame, rich with manifold savor and hue,That captivates the hearts of lovers and makes desire fair.53 –56
श्लोक ( Shlok ) 57
प्रकाममधुरानित्थं कामान् कामातिरेकिणः । स ताभिर्निर्विशन् रेमे वपुष्मानिव मन्मथः ॥ ५७ ॥
इस प्रकार वह चक्रवर्ती उन रानियोंके साथ अत्यन्त मधुर तथा इच्छाओंसे भी अधिक भोगोंको भोगता हुआ शरीरधारी कामदेवके समान क्रीड़ा करता था ।।५७।।
Thus did the Chakravartin, in the company of those queens, partake of pleasures sweeter than desire itself—reveling in delights beyond imagination, like embodied Kāma in his divine play.57
श्लोक ( Shlok ) 58
ताश्च तच्चित्तहारिण्यस्तरुण्यः प्रणयोद्धुराः । बभूवुः प्राप्तसाम्राज्या इव रत्युत्सवश्रियः ॥ ५८ ॥
भरतके चित्तको हरण करनेवाली और प्रेमसे भरी हुई वे तरुण स्त्रियां ऐसी जान पड़ती थीं मानो साम्राज्यको प्राप्त हुई रत्युत्सवरूपी लक्ष्मी ही हों ।॥५८।।
Those youthful women, brimming with love and captors of Bharata’s heart, appeared as though they were the very Goddess of Pleasure—Lakṣmī herself—graced with the glory of empire and adorned for the grand festival of love.58
श्लोक ( Shlok ) 59
नाटकानां सहस्राणि द्वात्रिंशत्प्रमितानि वै । सातोद्यानि सगेयानि यानि रम्याणि भूमिभिः ॥ ५ ९ ll
उनकी विभूतिमें बत्तीस हजार नाटक थे जो कि भूमियोंसे मनोहर थे और अच्छे अच्छे बाजों तथा गानोंसे सहित थे ।। ५९।।
Among his many glories were thirty-two thousand dramatic performances—each more enchanting than the last—adorned with melodious music, graceful instruments, and captivating song.59
श्लोक ( Shlok ) 60
द्वासप्ततिः सहस्राणि पुरामिन्द्र पुरश्रियम् । स्वर्गलोक इवाभाति नृलोको यैरलङ्कृतः ।। ६० ।।
इन्द्रके नगर समान शोभा धारण करनेवाले ऐसे बहत्तर हजार नगर थे जिनसे अलंकृत हुआ यह नरलोक स्वर्गलोकके समान जान पड़ता था ।।६०।।
Adorned with seventy-two thousand splendid cities, each radiant as the city of Indra, this mortal realm appeared no less than heaven itself.60
श्लोक ( Shlok ) 61
ग्रामकोट्यश्च विज्ञेया विभोः षण्णवतिप्रमाः । नन्दनोद्देशजित्वर्यो यासामा रामभूमयः ॥ ६१ ॥
उस चक्रवर्ती के ऐसे छियानवे करोड़ गांव थे कि जिनके बगीचोंकी शोभा नन्दन वनको भी जीत रही थी ।।६१।।
That Chakravartin possessed ninety-six crores of villages, whose gardens bore such surpassing beauty that even the celestial Nandana Grove seemed outshone by their splendor.61
श्लोक 62 से 71
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
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