आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61
श्लोक 62 से 71 साम्राज्य की समृद्धि
भरत के साम्राज्य में 99 हजार द्रोणामुख (बंदरगाह), 48 हजार पत्तन, 16 हजार खेट, 56 अन्तरद्वीप, और 14 हजार संवाह हैं। उनके पास 1 करोड़ हंडे, 1 लाख करोड़ हल, 3 करोड़ गौशालाएं, 700 कुक्षिवास, और 28 हजार सघन वन हैं। ये समृद्धियां उनके साम्राज्य को धन-धान्य और व्यवस्था से परिपूर्ण बनाती हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 37 – Shlok 62 to 71
श्लोक ( Shlok ) 62
द्रोणामुखसहस्राणि “नवतिर्नव चैव हि। धनधान्यसमृद्धीनामधिष्ठानानि यानि वै ।। ६२ ।।
जो धन-धान्यकी समृद्धियोंके स्थान थे ऐसे निन्यानवे हजार द्रोणामुख अर्थात् बन्दरगाह, थे ।।६२।।
He possessed ninety-nine thousand Dronamukhas—prosperous ports and harbors—that stood as great centers of wealth and abundance, overflowing with riches and grain.62
श्लोक ( Shlok ) 63
पत्तनानां सहस्राणि चत्वारिंशत्तथाऽष्ट च । रत्नाकरा इवाभान्ति येषामुद्धा वणिक्पथाः ॥ ६३॥
जिनके प्रशंसनीय बाजार रत्नाकर अर्थात् समुद्रोंके समान सुशोभित हो रहे थे ऐसे अड़तालीस हजार पत्तन थे ।। ६३।।
He had forty-eight thousand pattanas—flourishing trade centers—whose splendid marketplaces gleamed like oceans, resplendent with treasures beyond measure.63
श्लोक ( Shlok ) 64
पोडशैव सहस्राणि खेटानां पुरिमा मता । प्राकारगोपुराट्टाल खातवप्राविशोभिनाम् ॥ ६४ ॥
जो कोट, कोटके प्रमुख दरवाजे, अटारियां, परिखाएं और परकोटा आदिसे शोभायमान हैं ऐसे सोलह हजार खेट थे ।।६४।।
There were sixteen thousand kṣetras—fortified settlements—adorned with majestic forts, grand gateways, lofty balconies, deep moats, and splendid ramparts, each resplendent in its architectural glory.64
श्लोक ( Shlok ) 65
भवेयुरन्तरद्वीपाः षट्पञ्चाशत्प्रमामिताः । कुमानुषजनाकीर्णा येऽर्णवस्य खिलायिताः ।। ६५ ॥
जो कुभोगभूमि या मनुष्योंसे व्याप्त थे तथा समुद्रके सारभूत पदार्थके समान जान पड़ते थे ऐसे छप्पन अन्तरद्वीप थे ॥ ६५।।
There were fifty-six Antardvīpas—lands teeming with human life and enjoyment—each appearing as though formed from the very essence of the ocean’s treasures.) 65
श्लोक ( Shlok ) 66
संवाहानां सहस्राणि संख्यातानि चतुर्दश । वहन्ति यानि लोकस्य योगक्षेमविधाविधिम् ।। ६६ ।।
जो लोगोंके योग अर्थात् नवीन वस्तुओंकी प्राप्ति और क्षेम अर्थात् प्राप्त हुई वस्तुओंकी रक्षा करना आदिकी समस्त व्यवस्थाओंको धारण करते थे तथा जिनके चारों ओर परिखा थी ऐसे चौदह हजार संवाह थे ।। ६६ ।।
There were fourteen thousand saṁvāhas—well-organized administrative centers—encircled by moats, upholding all arrangements for prosperity and security, ensuring the acquisition of new wealth and the preservation of what had been attained.66
श्लोक ( Shlok ) 67
स्थालीनां कोटिरे कोक्ता रन्धने या नियोजिता । “पक्त्री स्थालीबिलीयानां तण्डुलानां महानसे ।। ६७ ।।
पकाने के काम आनेवाले एक करोड़ हंडे थे जो कि पाकशाला में अपने भीतर डाले हुए बहुतसे चावलोंको पकानेवाले थे ।। ६७ ।।
There were one crore cooking pots within the royal kitchens, each ever engaged in preparing vast quantities of rice, ever filled and ever steaming with abundance.67
श्लोक ( Shlok ) 68
कोटीशतसहस्रं स्याद्धलानां कुटिबैः समम् । कर्मान्तकर्षणे यस्य विनियोगो निरन्तरः ॥ ६८ ॥
फसल आने के बाद जो निरन्तर खेतोंको जोतने में लगाये जाते हैं और जिनके साथ बीज बोनेकी नाली लगी हुई है ऐसे एक लाख करोड़ हल थे ॥६८॥
There were one lakh crores of ploughs, each fitted with seed-funnels, ever employed in tilling the fields after the harvest—unceasing instruments of abundance and sustenance.68
श्लोक ( Shlok ) 69
तिस्रोऽस्य वज्रकोट्यः स्युर्गोकुलै शश्वदाकुलाः। यत्र मन्थरवाकृष्टास्तिष्ठन्ति स्माध्वगाः क्षणम् । ६९ ॥
दही मथने के शब्दोंसे आकर्षित हुए पथिक लोग जहां क्षणभरके लिये ठहर जाते हैं और जो निरन्तर गायों के समूहसे भरी रहती हैं ऐसी तीन करोड़ व्रज अर्थात् गौशालाएँ थीं ।। ६९।।
There were three crores of vrajas—vast cow-shelters—ever filled with herds of cattle, where even weary travelers, drawn by the sweet churning sound of curd, would pause for a moment, captivated by their charm.69
श्लोक ( Shlok ) 70
“कुक्षिवासशतान्यस्य सप्तैवोक्तानि कोविदैः । “प्रत्यन्तवासिनो यत्र न्यवात्सुः कृतसंश्रयाः ॥ ७० ॥
जहां आश्रय पाकर समीपवर्ती लोग आकर ठहरते थे ऐसे कुक्षिवासों की संख्या पण्डित लोगोंने सातसौ बतलाई है ॥७०।।
The sages have declared that there were seven hundred kukṣivāsas—sheltering hamlets—where nearby folk would gather and dwell, finding refuge and rest in their welcoming embrace.
श्लोक ( Shlok ) 71
दुर्गाटवी ‘सहस्राणि तस्याष्टाविंशतिर्मता । वनधन्वाननिम्नादिविभागैर्या विभागिताः ॥७१॥
अट्ठाईस हजार ऐसे सघन वन थे जो कि निर्जल प्रदेश और ऊंचे ऊंचे पहाड़ी विभागों में विभक्त थे ।।७१॥
There were twenty-eight thousand dense forests, spread across arid lands and lofty mountainous regions, each one a realm of wild seclusion and natural majesty.71
श्लोक 72 से 81
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61
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