आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 191 | श्लोक 192 से 201
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 47- Shlok 202 to 211
श्लोक ( Shlok ) 202
विलोक्य तं वणिक्पुत्राः सर्वेऽपि धनमार्जितुम् । ग्रामे पुरोपकण्ठस्थे सम्भूय विनिवेशिरे ॥२०२॥
यह देखकर सब वैश्यपुत्र धन कमानेके लिये बाहिर निकले और सब मिलकर नगरके समीप ही एक गांवमें जाकर ठहर गये ॥ २०२॥
Witnessing this exchange, all the young sons of the merchants were inspired to seek their own fortunes. United in purpose, they departed together and settled for a time in a village near the city.॥202॥
श्लोक ( Shlok ) 203 – 205
‘तन्निवेशादथाऽन्येद्युः स “समुद्रादिदत्तकः । रात्रौ स्वगृहमागत्य भार्यासम्पर्कपूर्वकम् ॥२०३॥केनाप्यविदितो रात्रावेव ‘सार्थमुपागतः । काले गर्भ विदित्वाऽस्याः पापो दुश्चरितोऽभवत् ॥ २०४॥ इति सागरदत्ताख्यस्तया भर्तृ समागमम् । “बोधितोऽप्पपरीक्ष्यासौ स्वगेहा त्तामपाकरोत् ॥ २०५।।
दूसरे दिन समुद्र-दत्त रात्रिमें उन डेरोंसे अपने घर आया और अपनी स्त्रीसे संभोग कर किसीके जाने बिना ही रात्रिमें ही अपने झुण्डमें जा मिला । इधर समयानुसार उसका गर्भ बढ़ने लगा । जब इस बात का पता समुद्रदत्तके बड़े भाई सागरदत्तको चला तब उसने समझा कि यह अवश्य ही इसका पापरूप दुराचरण है। समुद्रदत्तकी स्त्री सर्वदयिताने पतिके साथ समागम होनेका सब समा-चार यद्यपि बतलाया तथापि उसने परीक्षा किये बिना ही उसे घरसे निकाल दिया ॥२०३-२०५।।
The next night, Samudradatta secretly slipped away from their encampment and returned home, where he lay with his wife. Before anyone could notice, he quietly rejoined his group before dawn. In time, his wife conceived and her pregnancy began to show.When Samudradatta’s elder brother, Sagardatta, learned of her condition, he immediately assumed it was the result of immoral conduct. Although Samudradatta’s wife, Sarvadayita, explained everything truthfully—detailing how her husband had come to her—Sagardatta, without making any inquiry or investigation, cast her out of their home.॥203–205॥
श्लोक ( Shlok ) 206
ततः श्रेष्ठिगृहं याता तेनापि वं दुरांचरा” । “नास्मद्नेहं समागच्छेत्यज्ञानात् सा निवारिता ॥२०६।।
तब सर्वदयिता अपने भाई सेठ सर्वदयितके घर गई परन्तु उसने भी अज्ञानतासे यही कहकर उसे भीतर जानेसे रोक दिया कि ‘तू दुराचारिणी है, मेरे घरमें मत आ’ ॥२०६॥
Then Sarvadayita went to the house of her brother, the merchant Sarvadayita, seeking refuge. But he too, blinded by ignorance, rebuked her harshly, saying, “You are a woman of ill conduct; do not enter my home.”॥206॥
श्लोक ( Shlok ) 207
समीपर्वातन्येकस्मिन् केतने विहितस्थितिः । नवमासावधौ पुत्रम् लब्धानल्पपुण्यकम् ॥२०७॥
तदनन्तर वह पासके ही एक दूसरे घरमें रहने लगी, नौ महीनेकी अवधि पूर्ण होनेपर उसने एक अतिशय पुण्यवान् पुत्र प्राप्त किया ।। २०७।।
Thereafter, she took up residence in a nearby house. When the full term of nine months was complete, she gave birth to a son endowed with extraordinary merit and auspiciousness.॥207॥
श्लोक ( Shlok ) 208 – 211
तद्विदित्वा कुलस्यैष समुत्पन्नः पराभवः । यत्र क्वचन नीत्वैनं निक्षिपेत्यनुजीविकः ॥२०८॥ प्रत्येयः श्रेष्ठिना प्रोक्तः श्रेष्ठिमित्रस्य बुद्धिमान् । स्मशाने साधितुं विद्यामा गतस्य खयायिनः ।।२०९॥ बालं समर्पयामास विचित्रो दुरितोदयः । खगोऽसौ जयधामाख्यो जयभामास्य वल्लभा ॥२१०।। तौ भोगपुरवास्तव्यौ जितशत्रुसमा ह्वयम् । कृत्वा वर्धयतां पुत्रमिव मत्वौरयं मुदा ॥२११॥
जब सेठ सर्वदयितको यह खबर लगी तो उसने समझा यह पुत्र क्या ? हमारे कुलका कलंक उत्पन्न हुआ है, इसलिये उसने एक नौकर-को यह कहकर भेजा कि ‘इसे ले जाकर किसी दूसरी जगह रख आ’ । वह सेवक बुद्धिमान् था और सेठका विश्वासपात्र भी था, वह बालकको ले गया और सेठके एक विद्याधर मित्रको ‘जो कि विद्या सिद्ध करनेके लिये श्मशानमें आया था, सौंप आया सो ठीक ही है क्योंकि पापका उदय बड़ा विचित्र होता है। सेठके उस मित्रका नाम जयधाम था और उसकी स्त्रीका नाम जयभामा था । वे दोनों भोगपुरके रहनेवाले थे उन्होंने उस पुत्रका नाम जितशत्रु रक्खा और उसे औरस पुत्रके समान मानकर वे बड़ी प्रसन्नतासे उसका पालन-पोषण करने लगे ।।२०८- २११।।
When the merchant Sarvadayita heard of the birth, he thought, What is this child but a stain upon our family’s honor? So he sent a servant with instructions: “Take him far away and leave him elsewhere.”The servant, who was wise and faithful to his master, carried the child off and delivered him to one of the merchant’s Vidyadhara friends who happened to be in the cremation ground practicing his occult arts. Truly, the manifestations of karma are strange indeed.That friend’s name was Jayadhama, and his wife was Jayabhama. They were residents of Bhogapura. They named the boy Jitashatru and, accepting him as their own son, they raised him with great joy and affection.॥208–211॥
श्लोक 212 से 223
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367 | जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 219
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 100 | श्लोक 101 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 170 | श्लोक 171 से 181 | श्लोक 182 से 194 | श्लोक 195 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 255 | श्लोक 256 से 271 | श्लोक 272 से 286 | श्लोक 287 से 296 | श्लोक 297 से 313 | श्लोक 314 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 361 | श्लोक 362 से 369
आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 30 | श्लोक 31 से 45 | श्लोक 46 से 64 | श्लोक 65 से 108 | श्लोक 109 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 191 | श्लोक 192 से 201