आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71
श्लोक 72 से 81 विषयों की नश्वरता और हानि
बाहुबली विषयों की क्षणभंगुरता और निंदनीयता पर विचार करते हैं। वे कहते हैं कि विषय प्राणियों को अनंत दुख देते हैं, जैसे विष बार-बार मारता है। विषय प्रारंभ में सुखद, पर अंत में दुखदायी होते हैं, जैसे विषम फल। ये शत्रु-से उद्वेग उत्पन्न करते हैं, जो शस्त्र या सर्प भी नहीं कर सकते। मूर्ख पुरुष भोगों की लालसा में समुद्र, युद्ध, वन, नदी, और पर्वतों में प्रवेश करते हैं, बिना यह जाने कि ये भयंकर और हानिकारक हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 36 – Shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
अहो विषयसौख्यानां वैरूप्यम “पकारिता । भङ्गु रत्वमरुच्यत्वं सक्तैर्नान्विष्यते जनैः ॥७२॥
अहा, विषयों-में आसक्त हुए पुरुष, इन विषयजनित सुखोंका निन्द्यपना, अपकार, क्षणभंगुरता और नीरस-पनेको कभी नहीं सोचते हैं ।॥ ७२॥
Ah, men ensnared by worldly pleasures never contemplate the ignobility, the harm, the fleeting nature, and the emptiness of these sensual joys. ||72||
श्लोक ( Shlok ) 73
को नाम मतिमानीप्सेद् विषयान् वेषदारुणान् । येषां वशगतो जन्तु र्यात्यनर्थपरम्पराम् ॥७३॥
जिनके वशमें पड़े हुए प्राणी अनेक दुःखोंकी परम्पराको प्राप्त होते हैं ऐसे विषके समान भयंकर विषयोंको कौन बुद्धिमान् पुरुष प्राप्त करना चाहेगा ? ।।७३।।
To whom would a wise man desire to attain such dreadful worldly attachments—like a potent poison—by which beings ensnared endure a succession of countless sufferings? ||73||
श्लोक ( Shlok ) 74
वरं विषं यदेकस्मिन् भवे हन्ति न हन्ति वा । विषयास्तु पुनर्घ्नन्ति हन्त जन्तूननन्तशः ॥७४॥
विष खा लेना कहीं अच्छा है क्योंकि वह एक ही भवमें प्राणीको मारता है अथवा नहीं भी मारता है परन्तु विषय सेवन करना अच्छा नहीं है क्योंकि ये विषय प्राणियोंको अनन्तबार फिर फिरसे मारते हैं ।। ७४।।
Better is the swallowing of poison, for it ends the life of the creature in a single existence—or perhaps spares it—but indulgence in worldly pleasures is far worse, for these passions slay beings again and again through countless rebirths. ||74||
श्लोक ( Shlok ) 75
आपातमात्र रम्याणां विपाककटुकात्मनाम् । विषयाणां कृते नाज्ञो यात्यनर्थानपार्थकम् ।।७५।।
जो प्रारम्भ कालमें तो मनोहर मालूम होते हैं परन्तु फलकाल- में कड़वे (दुःख देनेवाले) जान पड़ते हैं ऐसे विषयोंके लिये यह अज्ञ प्राणी क्या व्यर्थ ही अनेक दुःखोंको प्राप्त नहीं होता है ? ॥७५॥
Those which at the outset appear delightful, yet in the end reveal themselves as bitter and sorrowful—does not the ignorant soul suffer countless needless torments for such fleeting pleasures? ||75||
श्लोक ( Shlok ) 76
अत्यन्तरसिकानादौ पर्यन्ते प्राणहारिणः । ‘किंम्पाकपाकविषमान् विषयान् कः कृती भजेत् ॥७६॥
जो प्रारम्भ कालमें तो अत्यन्त आनन्द देनेवाले हैं और अन्तमे प्राणोंका अपहरण करते हैं ऐसे किपाक फल (विषफल) के समान विषम इन विषयों को कौन बुद्धिमान् पुरुष सेवन करेगा ? ॥७६॥
Those which at the outset bestow great joy, yet ultimately seize the very breath of life—who, then, would a wise man be to partake of such pernicious pleasures, akin to the bitter fruit of poison? ||76||
श्लोक ( Shlok ) 77
शस्त्रप्रहारदीप्ताग्निवज्राशनिमहोरगाः। न तथोद्वेजकाः पुंसां यथाऽमी विषयद्विषः ॥७७॥
ये विषयरूपी शत्रु प्राणियोंको जैसा उद्वेग करते हैं वैसा उद्वेग शस्त्रोंका प्रहार, प्रज्वलित अग्नि, वज्र, बिजली और बड़े बड़े सर्प भी नहीं कर सकते हैं ।।७७।।
These enemies in the guise of desires disturb living beings with a turmoil unmatched by the strike of weapons, raging fire, thunderbolt, lightning, or the mightiest serpents. ||77||
श्लोक ( Shlok ) 78
महाब्धिरौद्रसङ्ग्रामभीमारण्यसरिद् गिरीन् । भोगार्थिनो भजन्त्यज्ञा धनलाभधनायया ॥७८।।
भोगोंकी इच्छा करनेवाले मूर्ख पुरुष धन पानेकी इच्छासे बड़े बड़े समुद्र, प्रचण्ड युद्ध, भयंकर वन, नदी और पर्वतोंमें प्रवेश करते हैं ।॥७८।।
Fools longing for pleasures, driven by desire for wealth, venture boldly into vast oceans, fierce battles, dreadsome forests, rivers, and towering mountains. ||78||
श्लोक ( Shlok ) 79
दीर्घदोर्घातनिर्घात निर्घोषविषमीकृते । यादसां यादसांपत्यौ चरन्ति विषयार्थिनः ॥७९॥
विषयोंकी चाह रखनेवाले पुरुष जलचर जीवोंकी लम्बी लम्बी भुजाओंके आघातसे उत्पन्न हुए वज्रपात जैसे कठोर शब्दों-से क्षुब्ध हुए समुद्रमें भी जाकर संचार करते हैं ।॥ ७९ ॥
Men enamored of pleasures traverse even the tempestuous seas, roused to fury by the thunderous roars akin to the mighty strikes of aquatic creatures with their long, sweeping limbs. ||79||
श्लोक ( Shlok ) 80
समापतच्छरव्रातनिरुद्धगगनाङ्गणम् । रणाङ्गणं विशन्त्यस्तभियो भोगर्विलोभिताः ॥८०॥
भोगोंसे लुभाये हुए पुरुष, चारों ओरसे पड़ते हुए वाणों के समूहसे जहां आकाशरूपी आंगन भर गया है ऐसे युद्धके मैदानमें भी निर्भय होकर प्रवेश कर जाते हैं ।॥८०॥
Entranced by pleasures, men fearlessly enter the battlefield—where the vast sky-like arena is filled with volleys of arrows raining from every direction. ||80||
श्लोक ( Shlok ) 81
चरन्ति वनमानुष्या यत्र सत्रासलोचनाः । ताः पर्यटन्त्यरण्यानीः भोगाशोपहता जडाः ॥८१॥
जिनमें वनचर लोग भी भय सहित नेत्रोंसे संचार करते हैं ऐसे भयंकर बड़े-बड़े वनोंमें भी भोगोंकी आशासे पीड़ित हुए मूर्ख मनुष्य घूमा करते हैं ।॥८१॥
In those dreadsome forests, where even the wild creatures gaze with fearful eyes, the foolish man, tormented by hope for pleasures, wanders restless and unafraid. ||81||
श्लोक 82 से 91
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71
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