आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61
श्लोक 62 से 71 दूत का संदेश
दूत बाहुबली से कहता है कि उनके वचनों में भरत का उद्देश्य स्पष्ट है। वह स्वयं को केवल संदेशवाहक बताते हुए कहता है कि भरत की आज्ञा, चाहे अच्छी हो या बुरी, स्वीकार करनी चाहिए। वह भरत के इक्ष्वाकु वंश, दिग्विजय, और गंगा-समुद्र तक की विजय का वर्णन करता है। दूत बताता है कि भरत ने देवों, म्लेच्छों, और विद्याधरों को वश में किया, और उनकी सेना ने समस्त दिशाओं पर अधिकार किया।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 35 – Shlok 62 to 71
श्लोक ( Shlok ) 62
अथोपाचक्रमे वक्तुं वचो हारि” वचोहरः । वागर्थाविव सम्पिण्ड्य दर्शयन् दशनांशुभिः ॥६२॥
तदनन्तर दाँतोंकी किरणोंसे शब्द और अर्थ दोनोंको मिलाकर दिखलाता हुआ दूत मनोहर वचन कहने के लिये तैयार हुआ ।। ६२ ।।
Thereafter, the messenger—his speech illumined by the gleam of his teeth,uniting both word and meaning in perfect harmony—prepared to speak in pleasing tones.62
श्लोक ( Shlok ) 63
त्वद्वचः सम्मुखीनेऽस्मिन् कार्य सुव्यक्तमीक्ष्यते । असंस्कृतोऽपि यत्रार्थ प्रत्यक्षयति मादृशः ॥६३॥
वह कहने लगा कि हे प्रभो, आपके इस बचन-रूपी दर्पणमें आगेका कार्य स्पष्ट रूपसे दिखाई देता है क्योंकि उसका अर्थ मुझ जैसा मूर्ख भी प्रत्यक्ष जान लेता है ।॥६३॥
He began to speak: “O Lord, in this mirror-like speech of yours,
the path ahead is revealed with perfect clarity—for even one as unlearned as I can perceive its meaning plainly.”63
श्लोक ( Shlok ) 64
वयं वचोहरा नाम प्रभोः शासनहारिणः । गुणदोषविचारेषु मन्दास्तच्छन्द वर्तिनः ॥६४॥
हे नाथ, हम लोग तो दूत हैं केवल स्वामीका समाचार ले जाने-वाले हैं हम लोग सदा स्वामीके अभिप्रायके अनुसार चलते हैं तथा गुण और दोषोंका विचार करने में भी असमर्थ हैं ।॥ ६४।।
“O Master, we are but humble messengers—bearers of our lord’s word alone.We ever act in accordance with his intent,and are not ourselves fit to weigh the merits or the faults of matters.”64
श्लोक ( Shlok ) 65
ततश्चक्रधरेणायं यदादिष्टं प्रियोचितम् । प्रयोक्तृगौरवादेव तद्ग्राह्यं साध्वसाधु वा ॥६५॥
इसलिये हे आर्य, चक्रवर्तीने जो प्रिय और उचित आज्ञा दी है वह अच्छी हो या बुरी, केवल कहनेवालेके गौरवसे ही स्वीकार करने योग्य है ।॥६५॥
Therefore, O noble one, the command of the Emperor—be it pleasing or harsh—is to be accepted solely on account of the dignity of the one who utters it.65
श्लोक ( Shlok ) 66
गुरोर्वचनमादेयमविकल्प्येति या श्रुतिः । तत्प्रामाण्यादमुष्याज्ञा संविधेया त्वयाधुना ॥६६॥
गुरुके वचन बिना किसी तर्क-वितर्कके मान लेना चाहिये यह जो शास्त्रका वचन है उसे प्रमाण मानकर इस समय आपको चक्रवर्तीकी आज्ञा स्वीकार कर लेनी चाहिये ।। ६६ ।।
The scriptures declare that the word of the Guru must be accepted without argument or doubt; thus, taking that as sacred authority, you ought now to receive the Emperor’s command with reverence.66
श्लोक ( Shlok ) 67
ऐक्ष्वाकः प्रथमो राज्ञां भरतो भवदग्रजः । परिक्रान्ता मही कृत्स्ना येन नामयताऽमरान् ॥६७।।
वह भरत इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न हुआ है अथवा इक्ष्वाकु अर्थात् भगवान् वृषभदेवका पुत्र है, राजाओंमें प्रथम है, आपका बड़ा भाई है और इसके सिवाय देवोंसे भी नमस्कार कराते हुए उसने समस्त पृथिवी अपने वश कर ली है ॥ ६७॥
That Bharata—born of the illustrious Ikshvaku lineage, nay, the very son of Ikshvaku himself, Lord Rishabha—is foremost among kings, your elder brother,and moreover, having compelled even the gods to bow before him,he has brought the entire earth under his dominion.67
श्लोक ( Shlok ) 68
गङ्गाद्वारं समुल्लङ्घय यो रथेनाप्रतिष्कशः । चलदाविद्धकल्लोल मकरोन्मकरालयम् ॥६८॥
उसने गंगाद्वारको उल्लंघन कर अकेले ही रथपर बैठकर समुद्रको जिसकी चञ्चल लहरें एक दूसरेसे टकरा रही हैं ऐसा कर दिया ॥६८॥
Alone upon his chariot, he crossed even the sacred threshold of Gangadwara,and stilled the restless ocean—whose waves clashed furiously with one another—as if it, too, must yield to his command.68
श्लोक ( Shlok ) 69
शरव्याजः प्रतापाग्निर्ज्वलत्यस्य जलेऽम्बुधे । पपौ न केवलं वाद्धि मानं च त्रिदिवौकसाम् ॥६९॥
बाणके बहाने से इसकी प्रतापरूपी अग्नि समुद्रके जलमें भी प्रज्वलित रहती है, उस अग्निने केवल समुद्र को ही नहीं पिया है किन्तु देवोंका मान भी पी डाला है ॥६९॥
Through the pretext of his arrows, the fire of his majesty burns even within the waters of the sea;and that very flame has not only consumed the ocean’s might,but has drunk deep the pride of the gods as well.69
श्लोक ( Shlok ) 70
मा नाम प्रणति यस्य ‘व्राजिषुर्द्युसदः कथम् । आकृष्टाः शरपाशेन प्राध्वंकृत्य गले बलात् ॥७०॥ ‘
भला, देव लोग उसे कैसे न नमस्कार करेंगे ? क्योंकि उसने बाणरूपी जालसे गलेमें बांधकर उन्हें जबर्दरती अपनी ओर खोंच लिया था ।।७०।।
Indeed, how could the gods not bow before him,when with a net of arrows he had bound them by the neck and drawn them forth with irresistible force unto himself?70
श्लोक ( Shlok ) 71
शरव्यमकरोद्यस्य शरपातो महाम्बुधौ । प्रसभं मगधावासं क्रान्तद्वादशयोजनः ॥७१।।
बारह योजन दूरतक जानेवाले उसके बाणने महासागरमें रहनेवाले मागधदेवके निवासस्थानको भी जबर्दस्ती अपना निशाना बनाया था ।।७१।।
His arrow, which could travel twelve yojanas afar,struck with unerring force even the abode of Magadhadeva, who dwells deep within the vast ocean—compelling it to become the mark of his might.71
श्लोक 72 से 81
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61
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