आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 123 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 170
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 46- Shlok 171 to 181
श्लोक ( Shlok )171 – 176
भर्तृ भार्यामिसम्बन्धं सम्प्राप्यारिभयाद् गतौ । कृत्वाऽनुमोदनं शक्तिषेणदाने सपुण्यकौ ॥१७१॥पारावतभवे चाप्य’ धर्म जातौ युवामिति । विधाय पितरौ वैश्यजन्मनोर्याविहापि तौ ॥१७२॥तृतीयजन्मनो युष्मद्गुरवोऽहं च सङ्गताः । रतिषेणगुरोः पार्श्वे गृहीतप्रोषधाश्चिरम् ॥१७३।।जिनेन्द्रभवने भक्त्या नानोपकरणैः सदा । विधाय पूजां समजायामहीह खगाधिपाः ॥१७४॥पिताऽहं भवदेवस्य रतिवर्माभिधस्तदा । भूत्वा ‘श्रीधर्मनामाऽतः संयमं प्राप्य शुद्धधीः ॥१७५॥चारणत्वं तृतीयं च ज्ञानं प्रापमिहेत्यदः । श्रुत्वा मुनिवचः प्रीतिमापद्येतान्तरां च तौ ॥१७६॥
स्त्री पुरुषका सम्बन्ध पाकर तुम दोनों शत्रुके भयसे भागकर शक्तिषेणकी शरण गये थे। वहां शक्तिषेणने मुनिराजके लिये जो आहार दान दिया था उसकी अनुमोदना कर तुम दोनोंने पुण्यबंध किया था, उसके बाद कबूतर-कबूतरी के भवमें धर्म लाभकर यहां विद्याधर-विद्याधरी हुए हो । तुम दोनोंके वैश्य जन्मके जो माता पिता थे वे ही इस जन्मके भी तुम्हारे माता पिता हुए हैं। तीसरे जन्मके तुम्हारे माता पिता तथा मैंने मिलकर एक साथ रतिषेण गुरुके समीप प्रोषध व्रत लिया था, और उसका चिरकाल तक पालन करते हुए श्रीजिनेन्द्रदेवके मन्दिरमें भक्तिपूर्वक अनेक उपकरणोंसे सदा पूजा की थी उसीके फलस्वरूप हम लोग यहां विद्याधर हुए हैं। मैं पूर्वभवमें रतिवर्म नामका भवदेवका पिता था, अब श्रीधर्म नामका विद्याधर हुआ हूँ, मैंने शुद्ध हृदयमेंसे संयम धारणकर चारण-ऋद्धि और तीसरा अवधि ज्ञान प्राप्त किया है इस प्रकार मुनिराजके बचन सुनकर हिरण्य-वर्मा और प्रभावती दोनों ही बहुत प्रसन्न हुए ॥ १७१-१७६।।
“You two, having come together as man and wife, once fled in fear of an enemy and sought refuge with Shaktisheṇa. There, when Shaktisheṇa offered alms to wandering monks, you both rejoiced in that meritorious act and thus bound great virtue. Thereafter, upon being reborn as a pair of doves, you again gained spiritual benefit, and now, through that accumulated merit, you have taken birth here as a Vidyādhara and a Vidyādharī.Your parents from that birth as merchants are the very same who have become your parents in this life as well. Together with your parents from that third birth and myself, we once undertook the Prouṣadha vow in the presence of the preceptor Ratiṣeṇa and upheld it steadfastly for a long time, devoutly worshipping Lord Jina in his temple with many offerings. As a result of that pious conduct, we have all been reborn as Vidyādharas here.I, who in that past life was Rativarma, the father of Bhavadeva, am now reborn as the Vidyādhara named Shrīdharma. By embracing self-restraint with a pure heart, I have attained the powers of the ascetic—Carana ṛddhi—and the third stage of knowledge, Avadhi-jñāna.”Hearing these words of the venerable monk, Hiraṇyavarmā and Prabhāvatī were both filled with great joy.॥171–176॥
श्लोक ( Shlok )177 – 179
एवं सुखेन यात्येषां काले वायुरथः पृथुम् । विशरारुं समालोक्य स्तनयित्नुं प्रतिक्षणम् ॥१७७।।”विश्वं विनश्वरं पश्यन् शश्वच्छाश्वतिकीं मतिम् । जनः करोति सर्वत्र दुस्तरं किमिदं तमः ॥१७८॥ इति याथात्म्यमासाद्य दत्वा राज्यं विरज्य सः । मनोरथाय नैस्सङ्ग्यं “प्रपित्सुरभवत्तदा ॥१७९॥
इस तरह इन सबका समय सुखसे व्यतीत हो रहा था कि किसी एक समय प्रभावती के पिता वायुरथ विद्याधरने प्रत्येक क्षण नष्ट होनेवाला मेघ देखकर ऐसा विचार किया कि यह समस्त संसार इसी प्रकार नष्ट हो जानेवाला हे, फिर भी लोग इसे स्थिर रहनेवाला समझत हैं, यह अज्ञानरूपी घोर अंधकार सब जगह क्यों छाया हुआ है ? इस प्रकार यथार्थ स्वरूपका विचारकर विरक्त हो मनोरथ नामक पुत्रके लिये राज्य दे दिया और स्वयं निर्ग्रन्थ अवस्था धारण करनेकी इच्छा करने लगे ।। १७७-१७९।।
Thus did their days pass in happiness, until one day, Prabhāvatī’s father, the Vidyādhara king Vāyuratha, saw clouds drifting by—ever-changing and vanishing with each passing moment. Reflecting upon them, he thought: “Just like these clouds, this entire world too is destined to perish, yet people foolishly believe it to be eternal. Why has this dense darkness of ignorance enveloped every corner of existence?”Contemplating the true nature of reality, he became detached from worldly life, entrusted his kingdom to his son named Manoratha, and resolved to embrace the state of Nirgrantha renunciation.॥177–179॥
श्लोक ( Shlok ) 180 – 181
आदित्यगतिमभ्येत्य प्रीत्या सर्वेऽपि बान्धवाः । प्रभावतीसुता देया भवतेयं रतिप्रभा ॥१८०॥ मनोरथस्य पुत्राय कन्या चित्ररथाय सा । इत्याहुः सोऽप्यनुज्ञाय कृत्वा बन्धुविसर्जनम् ॥१८१॥
उसी समय वायुरथके सभी भाई-बन्धुओंने बड़े प्रेमसे आदित्यगतिके समीप जाकर प्रार्थना की ‘कि यह प्रभावतीकी पुत्री रतिप्रभा कन्या आप मेरे मनोरथके पुत्र चित्ररथके लिये दे दीजिये ।’ आदित्यगतिने भी स्वीकार कर समागत बन्धुओंको बिदा किया ॥ १८०-१८१।।
At that very time, all of Vāyuratha’s brothers and relatives, filled with affection, approached Ādityagati and earnestly entreated him: “Please give Ratiśrī’s daughter, the maiden Ratiprabhā, in marriage to my son Manoratha’s boy, Citraratha.”Ādityagati graciously agreed to their request and, having accepted their proposal, bid farewell to the assembled kinsmen.॥180–181॥
श्लोक 182 से 194
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 219
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 100 | श्लोक 101 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 170