आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 255 | श्लोक 256 से 271 | श्लोक 272 से 286 | श्लोक 287 से 296
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 46- Shlok 297 to 313
श्लोक ( Shlok ) 297
त्वयाऽहं हेतुना केन हतो नेत्यनुयुक्तवान् । प्रतुष्ट्यारक्षकं चोरः सोऽप्येवं प्रत्यपादयत् ॥ २९७॥
चोरने संतुष्ट होकर चाण्डालसे पूछा कि तूने किस कारणसे मुझे नहीं मारा तब चाण्डाल इस प्रकार कहने लगा कि ॥ २९७॥
The thief, moved with gratitude, asked the executioner, “For what reason did you choose not to kill me?” Then the executioner began to speak in this manner: ॥297॥
श्लोक ( Shlok ) 298
एतत्पुरममुप्यैव राज्ञः पितरि रक्षति । गुणपाले महाश्रेष्ठी कुबेर प्रियसंज्ञया ॥२९ ८॥
पहले इस नगरकी रक्षा इसी राजाके पिता गुणपाल करते थे और उनके पास कुबेरप्रिय नामका एक बड़ा सेठ रहता था ।।२९८।।
In earlier times, the defense of this city was entrusted to King Gunapala, the father of the present ruler, and in his court resided a wealthy and eminent merchant named Kuberapriya. ॥298॥
श्लोक ( Shlok ) 299
अत्रैव नाटकाचार्यतनूजा नाट्यमालिका । आस्थायिकायां भावेन स्थायिनानृत्यदुद्रसम् ॥२९९ ॥
इसी नगरीमें नाट्यमालिका नामकी नाटकाचार्यकी एक पुत्री थी एक दिन उसने राजसभामें रति आदि स्थायी भावों द्वारा शृङ्गारादि रस प्रकट करते हुए नृत्य किया ॥२९९।।
In this very city dwelt Nattyamalika, the daughter of a master dramatist. One day, she performed a dance in the royal court, artfully evoking the sentiments of love and other emotions through permanent states like passion and delight, thereby bringing forth the rasa of romance and more. ॥299॥
श्लोक ( Shlok ) 300 – 308
तदालोक्य महीपालो बहुविस्मयमागमत् । गणिकोत्पलमालाख्यत् किमत्राश्चर्यमीश्वर ॥३००॥श्रेष्ठिनोऽस्य “मिथोऽन्येद्युः प्रतिमायोगधारिणः । सोपवासस्य पूज्यस्य गत्वा चालयितुं भनः ॥३०१॥नाशकं तदिहाश्चर्यमित्याख्यद् भूभुजापि सा । गुणप्रिये वृणीष्वति” प्रोक्ता शीलाभिभरक्षणम् ॥३०२॥ अभीष्टं मम देहीति तद्दत्तं व्रतमग्रहीत् । अन्यदा तद्गृहं सर्वरक्षिताख्यः समागमत् ॥३०३॥रात्रौ तलवरो दृष्ट्वा तं बाहह्याऽद्येति तेन’ तत् । ‘प्रतिपादनवेलायामेवायान्मन्त्रिणः सुतः ॥३०४॥नृपतेर्मेथुनो नाम्ना पृथुधीस्तं निरीक्ष्य सा । मज्जूषायां विनिक्षिप्य गणिका सर्वरक्षितम् ॥३०५॥ त्वया मदीयाभरणं सत्यवत्यै समर्पितम् । त्वद्भगिन्यै तदानेयमित्याह नृपमैथुनम् ॥३०६॥ सोऽपि प्राक् प्रतिपाद्येतद् व्रतग्रहणसंश्रुतेः । प्रातिकूल्यमगादीर्प्यावान् द्वितीयदिने पुनः ॥३०७॥साक्षिणं परिकल्प्यैनं मञ्जूषास्थं महीपतेः । सन्निधौ याचितो वित्तम सावुत्पलमालया ॥३०८॥
वह नृत्य देखकर राजाको बड़ा आश्चर्य हुआ तब उत्पलमाला नामकी वेश्या बोली कि हे देव, इसमें क्या आश्चर्य है ? एक दिन अत्यन्त शान्त और पूज्य कुबेरप्रिय सेठने उपवासके दिन प्रतिमा योग धारण किया था, उस दिन मैं उनका मन विचलित करनेके लिये गई थी परन्तु उसमें समर्थ नहीं हो सकी। इस संसारमें यही बड़े आश्चर्यकी बात है। यह सुनकर राजाने कहा कि “हे गुणप्रिये ! तुझे गुण बहुत प्यारे लगते हैं इसलिये जो इच्छा हो सो मांग।” तब उसने कहा कि मुझे शीलव्रतकी रक्षा करना इष्ट है यही वर दीजिए राजाने वह वर उसेदिया और उस दिनसे उसने शील व्रत ग्रहण कर लिया। किसी दूसरे दिन सर्वरक्षित नामका कोतवाल रातके समय उसके घर गया, उसे देखकर उत्पलमालाने उससे कहा कि आज में बाहिर की हूं-रजस्वला हूं। इधर इन दोनोंकी यह बात चल रही थी कि इतनेमें ही मंत्रीका पुत्र और पृथुधी नामका राजाका साला आया, उसे देखकर उत्पलमालाने सर्वरक्षितको एक संदूकमें छिपा दिया और राजाके सालेसे कहा कि आपने जो मेरे आभूषण अपनी बहिन सत्यवती के लिये दिये थे वे लाइये। उसने पहले तो कह दिया कि हां अभी लाता हूं परन्तु बादमें जब उसने सुना कि उसने शील व्रत ले लिया है तब वह ईर्ष्या करता हुआ प्रतिकूल हो गया । दूसरे दिन वह वेश्या सन्दूकमें बैठे हुए कोतवालको गवाह बनाकर राजाके पास गई और वहां जाकर पृथुधीसे अपना धन मांगने लगी ॥ ३००-३०८।।
Seeing that dance, the king was filled with great wonder. Then Utpalamala, a courtesan, spoke: “O Lord, what is there to marvel at in this? Once, on a day of fasting, the supremely tranquil and venerable merchant Kuberapriya engaged in pratima yoga. I went to him then, intending to disturb his mind with my charms, but I could not succeed. In this world, that alone is truly astonishing.”Hearing this, the king said, “O lover of virtue, since you so cherish noble qualities, ask for whatever boon you desire.” She replied, “It is my wish to protect my vow of chastity; grant me this boon.” The king bestowed it upon her, and from that day she embraced the vow of moral conduct (shila vrata).On another day, a constable named Sarvarakshita came to her house at night. Seeing him, Utpalamala said, “Today I am impure—menstruating—so I am outside the bounds of propriety.” As they were conversing, the minister’s son and the king’s brother-in-law, Prithudhi, arrived. Spotting him, Utpalamala quickly hid Sarvarakshita inside a chest. Then she said to Prithudhi, “Bring the ornaments you once promised me for your sister Satyavati.”At first, he replied, “Yes, I shall bring them at once.” But later, learning that she had taken the vow of chastity, envy arose in him and he turned against her. The next day, Utpalamala, with Sarvarakshita as her witness hidden in the chest, went before the king and there began demanding her promised jewels from Prithudhi. ॥300–308॥
श्लोक ( Shlok ) 309
न गृहीतं मयेत्यस्मिन्मिथ्यावादिनि भूभुजा । पृष्टा सत्यवती तस्य पुरस्तान्न्यक्षिपद्धनम् ॥३०९ ॥
पृथुधीने राजाके सामने भी झूठ कह दिया कि मैंने इसका धन नहीं लिया है। जब राजाने सत्यवतीसे पूछा तो उसने सब धन लाकर राजाके सामने रख दिया ॥३०९॥
Prithudhi brazenly lied before the king, declaring, “I have not taken her wealth.” But when the king questioned Satyavati, she brought forth all the ornaments and laid them before the king. ॥309॥
श्लोक ( Shlok ) 310
मैथुनाय नृपः क्रुध्वा खलोऽयं हन्यतामिति । आज्ञापयत्पदातीन् स्वान् युक्तं तन्न्यायवर्तिनः ॥३१०॥
यह देखकर राजा अपने सालेपर बहुत क्रोधित हुआ, उसने अपने नौकरोंको आज्ञा दी कि यह दुष्ट शीघ्र ही मार डाला जाय। सो ठीक ही है क्योंकि न्याय-मार्गमें चलनेवालेको यह उचित ही है ॥ ३१०॥
Beholding this, the king was seized with great fury against his brother-in-law. He ordered his attendants, “This wretch must be slain at once!”—and rightly so, for such is the duty of one who walks the path of justice. ॥310॥
श्लोक ( Shlok ) 311 – 313
*पठन्मुनीन्द्रसद्धर्मशास्त्रसंश्रवणाद् द्रुतम् । अन्येद्युः प्राक्तनं जन्म विदित्वा शममागते ॥३११॥यागहस्तिनि मांसस्य पिण्डदानमनिच्छति । तद्वीक्ष्योपायविच्छ्रेष्ठी विबुद्धचानेकपेङ्गितम् ॥३१२॥सर्पिर्गुडपयोमिश्रशाल्योदनसर्पितम् । पिण्डं प्रायोजयत्सोऽपि द्विरदस्तमुपाहरत् ॥३१३॥
किसी एक दिन पाठ करते हुए मुनिराजसे धर्मशास्त्र सुनकर राजाके मुख्य हाथीको अपने पूर्व भवका स्मरण हो आया, वह अत्यन्त शान्त हो गया और उसने मांसका पिण्ड लेना भी छोड़ दिया, यह देख उपायोंके जानने-वाले सेठने हाथीकी सब चेष्टाएं समझकर घी, गुड़ और दूध मिला हुआ शालि चावलोंका भात उसे खानेके लिये दिया और हाथीने भी वह शुद्ध भोजन खा लिया ॥३११-३१३।।
One day, as a sage was reciting the scriptures, the king’s chief elephant heard the discourse on Dharma and suddenly recalled the memories of its previous birth. At once it became utterly serene and ceased to accept lumps of meat. Observing the elephant’s every gesture with keen discernment, a wise merchant understood the cause of its change. He prepared a pure meal of cooked rice made from fine shali grains mixed with ghee, jaggery, and milk, and offered it to the elephant, who gratefully partook of the wholesome food. ॥311–313॥
श्लोक 314 से 322
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 219
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 100 | श्लोक 101 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 170 | श्लोक 171 से 181 | श्लोक 182 से 194 | श्लोक 195 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 255 | श्लोक 256 से 271 | श्लोक 272 से 286 | श्लोक 287 से 296