आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 34 – Shlok 172 to 182
श्लोक ( Shlok ) 172
सर्वोपविधिनिर्मुक्ता युक्ता धर्म जिनोदिते । नैच्छन् बालाग्रमात्रं च द्विधाम्नातं परिग्रहम् ॥१७२॥
सब प्रकार के परिग्रहसे रहित होकर जिनेन्द्रदेवके द्वारा कहे हुए धर्मका आचरण करते हुए वे राजकुमार बाह्यऔर आभ्यन्तर के भेदसे दो प्रकारके कहे हुए परिग्रहोंमेंसे बालकी नोकके बराबर भी किसी परिग्रहकी चाह नहीं करते थे ॥ १७२ ।।
Free from all forms of possession, they followed the teachings of Lord Jina, practicing the Dharma with unwavering devotion. The royal princes, discerning the distinction between external and internal possessions, desired not even the slightest attachment—no more than the tip of a hair—toward any form of material acquisition.172
श्लोक ( Shlok ) 173
निर्मूर्च्छास्ते स्वदेहेऽपि धर्मवर्त्मनि सुस्थिताः । सन्तोषभावनापास्ततृष्णाः सन्तो विर्जा हरे ॥१७३॥
जिन्हें अपने शरीरमें भी ममत्व नहीं है, जो धर्मके मार्ग में स्थित हैं और संतोषकी भावनासे जिन्होंने तृष्णाको दूर कर दिया है ऐसे वे उत्तम मुनिराज सब जगह विहार करते थे ।। १७३।।
Those supreme sages, devoid of attachment even to their own bodies, firmly established upon the path of Dharma, had dispelled all desires with the sense of contentment; thus, they wandered freely in all places, serene and unburdened. 173
श्लोक ( Shlok ) 174
वसन्ति स्मानिकेतास्ते’ यत्रास्तं ‘भानुमानितः । तत्रैकत्र क्वचिद्देशे नैस्सङग्यं परमास्थिताः ॥१७४।॥
परिग्रह त्याग व्रतको उत्कृष्ट रूपसे पालन करने-वाले वे गृहरहित मुनिराज जहाँ सूर्य डूब जाता था वहीं किसी एक स्थानमें ठहर जाते थे ॥१७४।।
Those householder-renouncing sages, who upheld the vow of renunciation of possessions with the utmost sincerity, would halt at a single spot wherever the sun set, steadfast in their resolve.174
श्लोक ( Shlok ) 175
विविक्तैकान्त सेवित्वाद् ग्रामेष्वे काहवासिनः। पुरेष्वपि न पञ्चाहात्परं तस्थुनूं पर्षयः ॥१७५॥
वे राजर्षि एकान्त और पवित्र स्थानमें रहना पसन्द करते थे इसलिये गाँवोंमें एक दिन रहते थे और नगरोंमें पाँच दिनसे अधिक नहीं रहते थे ॥ १७५।।
Preferring solitude and sacred places, those royal sages dwelt in seclusion; thus, they stayed but a single day in villages and no more than five days in cities.175
श्लोक ( Shlok ) 176
शून्यागारस्मशानादिविविक्तालयगोचराः । ते वीरवसतीर्भेजुः उज्झिताः सप्तभिर्भयैः ॥१७६॥
वे मुनि सात भयोंसे रहित होकर शुन्यगृह अथवा श्मशान आदि एकान्त स्थानों में वीरताके साथ निवास करते थे ॥१७६॥
Free from the seven fears, those sages resided with valor in solitary places such as empty homes or cremation grounds, embodying unshakable courage.176
श्लोक ( Shlok ) 177
तेऽभ्यनन्दन्महासत्त्वाः पाकसत्त्वैरधिष्ठिताः । गिर्थग्रकन्दरारण्यवसतीः प्रतिवासरम् ।।१७७।।
वे महाबलवान् राजकुमार सिंह आदि दुष्ट जीवोंसे भरी हुई पर्वतोंकी गुफाओं और जंगलों में ही प्रतिदिन निवास करना अच्छा समझते थे ।।१७७॥
Those mighty royal sages found contentment in dwelling daily within the caves of mountains and forests, places inhabited by fierce creatures such as lions and other wicked beings, embracing the solitude with unwavering resolve. 177
श्लोक ( Shlok ) 178
सिंहर्स वृकशार्दूलनरक्ष्वादि “निषेविते । वनान्ते ते वसन्ति स्म तदारसितभीषणे ॥१७८॥
सिंह, रीछ, भेड़िया, व्याघ्र, चीता आदिसे भरे हुए और उन्हीं के शब्दोंसे भयंकर वनके बीचमें वे मुनिराज निवास करते थे ।।१७८।।
In the midst of fearsome forests, teeming with lions, bears, wolves, tigers, leopards, and their terrifying roars, those noble sages dwelt undaunted, resolute in their tranquility.178
श्लोक ( Shlok ) 179
स्फुरत्त्पुरुषशार्दूलर्गाजतप्रतिनिःस्वनैः । आगुञ्जत्पर्वतप्रान्ते ते स्म तिष्ठन्त्यसाध्वसाः ।।१७९।।
चारों ओर फैलते हुए व्याघ्र की गर्जनाकी प्रतिध्वनियोंसे गूंजते हुए पर्वतके किनारों-पर वे मुनि निर्भय होकर निवास करते थे ॥ १७९॥
Amidst the echoing roars of tigers reverberating across the mountain’s edges, those fearless sages resided unshaken, their hearts steadfast in the face of the wild’s unrelenting sounds.179
श्लोक ( Shlok ) 180
कण्ठीरवकिशोराणां कठोरैः कण्ठनिस्वनैः । प्रोझादिनि वने ते स्म निवसन्त्यस्तभीतयः ॥१८०॥
सिंहों के बच्चोंकी कठोर कंठ गर्जना से शब्दायमान वनमें मुनिराज भयरहित होकर निवास करते थे ॥१८०॥
In forests resounding with the harsh-throated roars of lion cubs, the sages dwelt without fear, unwavering amidst the wild tumult.180
श्लोक ( Shlok ) 181 – 182
नृत्यत्कबन्धपर्यन्त सञ्चरव्डाकिनीगणाः । प्रबद्धकौशिक ध्वाननिरुद्धोपान्तकाननाः ॥ १८१।।शिवानाम “शिवैर्ध्वानः आरुद्धाखिलदिङमुखाः । महापितृवनोद्देशा निशास्वेभिः सिषेविरे ॥१८२॥
जहाँ नाचते हुए शिर रहित धड़ोंके समीप डाकिनियों के समूह फिर रहे हैं, जिनके समीप के वन उल्लुओंके प्रचण्ड शब्दोंसे भर रहे हैं और जहां शृगालोंके अमङ्गलरूप शब्दोंसे सब दिशाएं व्याप्त हो रही हैं ऐसी बड़ी बड़ी श्मशानभूमियों में रात्रिके समय वे मुनिराज निवास करते थे ।।१८१-१८२॥
In vast cremation grounds, where headless corpses danced and bands of witches wandered nearby, where forests echoed with the fierce cries of owls, and all directions resounded with the ominous howls of jackals—there, in the dead of night, those sages dwelt, fearless and serene.181 – 182
श्लोक 183 से 191
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
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