आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 46- Shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
तन्त्रावाय महाभारं ततः प्रभृति भूपतिः । तस्मिन्नारोप्य निर्व्यग्रः सधर्म काममन्वभूत् ॥७२॥
उस दिनसे राजाने तन्त्र अर्थात् अपने राष्ट्रकी रक्षा करना और अवाय अर्थात् परराष्टोंसे अपने सम्वन्धका विचार करना इन दोनोंका बड़ा भारी भार सेठको सौंप दिया और आप निर्द्वन्द्व होकर धर्म तथा काम पुरुषार्थका अनुभव करने लगा ॥७२॥
From that day forward, the king entrusted the weighty responsibilities of tantra—the protection of his own realm—and avaya—the management of relations with foreign kingdoms—to the merchant. Freed from all worldly anxieties, he then devoted himself wholly to the pursuit of righteousness and the fulfillment of love.” ॥72॥
श्लोक ( Shlok ) 73 – 75
कदाचित् कान्तया दृष्टपलितो निजमूर्द्धनि । श्रेष्ठी तां सत्यमद्यत्वं धर्मपत्नीत्यभिष्टुवन् ॥७३॥ दृष्ट्वा विमोच्य’ राजानं वरधर्मगुरोस्तपः । सार्ध समुद्रदत्ताद्यैरादाय सुरभूधरे ॥७४।।तावुभौ ब्रह्मलोका न्तेऽभूतां लौकान्तिकौ सुरौ । किन्न साध्यं यथाकालपरिस्थित्या मनीषिभिः ॥७५॥
किसी समय सेठकी स्त्रीने सेठके शिरमें बाल देखकर सेठसे कहा । सेठने यह कहते हुए उसकी बड़ी प्रशंसा की कि तू आज सचमुच धर्मपत्नी हुई है। उस सेठने बड़ी प्रसन्नता के साथ राजाको छोड़कर समुद्रदत्त आदि अन्य सेठोंके साथ साथ देवगिरि नामक पर्वतपर वरधर्मगुरुके समीप तप धारण किया और दोनों ही तपकर ब्रह्मलोकके अन्तमें लौका न्तिक देव हुए सो ठीक ही है क्योंकि समयके अनुकूल होनेवाली परिस्थितिसे बुद्धिमानोंको क्या क्या सिद्ध नहीं होता ? ॥७३-७५।।
“One day, Kubera-mitra’s wife noticed a grey hair upon his head and remarked upon it to him. Pleased, the merchant praised her greatly, saying, ‘Today, you have truly become a righteous wife.’ Filled with joy, he renounced his royal duties and, accompanied by Samudra-datta and other merchants, journeyed to Mount Devagiri, where they undertook ascetic practices under the guidance of the venerable spiritual master Varadharma. There, through their penance, both attained the status of celestial beings in the Lokantik realm at the end of their earthly existence. Truly, it is so—for what can the wise not accomplish when circumstances arise in harmony with time?” ॥73–75॥
श्लोक ( Shlok ) 76 – 77
अन्येद्युः प्रियदत्ताऽसौ दत्वा दानं मुनीशिने । भक्त्या विपुलमत्याख्यचारणाय यथोचितम् ॥७६॥सम्प्राप्य नवधा पुण्यं तपसः सन्निधिर्मम । किमस्तीत्यब्रवीद् व्यक्तविनया मुनिपुङ्गवम् ॥७७॥
किसी दूसरे दिन प्रियदत्ता (समुद्रदत्तकी पुत्री और कुबेरकान्तकी स्त्री) ने विपुलमति नामके चारण ऋद्धिधारी महामुनिको नवधा भक्तिपूर्वक दान देकर पुण्य संपादन किया और फिर विनय प्रकटकर उन्हीं मुनिराजसे पूछा कि मेरे तपका समय समीप है या नहीं ! ॥७६-७७।।
“On another day, Priyadatta—the daughter of Samudra-datta and wife of Kubera-kanta—having earned great merit, offered alms with ninefold devotion to the illustrious and spiritually accomplished bard-saint, the eminent ascetic Vipulamati. Then, with humble reverence, she inquired of the venerable monk, ‘Is the time near for me to undertake my own austerities?’” ॥76–77॥
श्लोक ( Shlok ) 78 – 79
पुत्रलाभार्थि तच्चित्तं विदित्वाऽवधिलोचनः । वामेतरकर धीमान् स्पष्टमङ्गुलिपञ्चकम् ॥७८॥ कनिष्ठामङ्गलि वामहस्तेऽसौ समदर्शयत् । पुत्रान्कालान्तरे पञ्च साऽऽचैकामात्मजामपि० ॥७९॥
अवधिज्ञान ही हैं नेत्र जिनके ऐसे बुद्धिमान् मुनिराजने यह जानकर कि इसका चित्त संतानको चाह रहा है अपने दाहिने हाथकी पांच अंगुली और बायें हाथकी छोटी अंगुली दिखाई और उससे सूचित किया कि पांच पुत्र और एक पुत्री होगी। तथा कालान्तरमें उस प्रियदत्ता-ने भी पांच पुत्र और एक पुत्री दिखलाई अर्थात् उत्पन्न की ॥ ७८-७९॥
“The wise ascetic, possessed of omniscient vision that served as his eyes, perceiving that her heart still yearned for offspring, extended the five fingers of his right hand and the little finger of his left, thereby indicating that she would bear five sons and one daughter. And in due course, Priyadatta indeed gave birth to five sons and one daughter, just as foretold.” ॥78–79॥
श्लोक ( Shlok ) 80 – 81
ते” कदाचिज्जगत्यालचक्रेशस्य सुते समम् । अमितानन्तमत्याख्ये गुणज्ञे गुणभूषणे ॥८०॥प्रजापालतनूजाभ्यां यशस्वत्या तपोभृता । गुणवत्या च सम्प्राप्ते पुरं ‘तत्परमर्द्धिकम् ॥८१॥
किसी समय गुणरूप आभूषणोंको धारण करनेवाली, जगत्पाल चक्रवर्तीकी पुत्री, अमितमति और अनन्तमति नाम की गणिणी (आयिकाओंकी स्वामिनी), तप धारण करनेवाली, प्रजापालकी पुत्री यशस्वती और गुणवती के साथ साथ उत्कृष्ट विभूतिसे सुशोभित उस पुण्डरीकिणी नगरीमें पधारीं ।।८०-८१।।
“At a certain time, the illustrious Ganinis—Amitamati and Anantamati—who were adorned with the ornament of virtues and daughters of the Universal Monarch Jagatpala, arrived in the splendid city of Pundarīkinī. They were accompanied by the ascetic princesses Yashasvatī and Gunavatī, daughters of King Prajāpāla, and together they shone with the radiance of supreme spiritual glory.” ॥80–81॥
श्लोक 82 से 92
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 219
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71