आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 45- Shlok 192 to 201
श्लोक ( Shlok ) 192
साऽऽशाखनिः किलात्रैव यत्र “विश्वमणूपमम् । तां पुपूर्षुः किलाद्याहं धनैः सङ्ख्यातिबन्धनैः ॥ १९२॥
जिसमें यह सारा संसार एक परमाणुके समान है ऐसा वह प्रसिद्ध आशारूपी गढ़ा इसी शरीरमें है, इसी आशारूपी गढ़ेको मैं आज थोडेसे धनसे पूरा करना चाहता हूं ॥ १९२॥
“Within this very body lies that infamous pit of craving—the insatiable abyss of desire—in which the entire world appears as insignificant as a mere atom. And yet, I, in my folly, wish to fill this bottomless chasm of longing with but a trifling sum of wealth.”192
श्लोक ( Shlok ) 193
यदादाय भवेज्जन्मी यन्मुक्त्वा मुक्तिभागयम् । तद्याथात्म्यमिति ज्ञात्वा कथं पुष्णाति धीधनः ॥ १९३॥
जिस शरीरको लेकर यह जीव जन्म धारण करता है-संसारी बन जाता है और जिसे छोड़कर यह जीव मुक्त हो जाता है इस प्रकार शरीरकी वास्तविकता जानकर भी बुद्धिमान् लोग न जाने क्यों उसका भरण-पोषण करते हैं ॥ १९३॥
“With this very body does the soul take birth, entering the cycle of worldly existence; and by casting it off does the soul attain liberation. Yet, though the true nature of the body is thus known, it is a wonder that even the wise persist in nourishing and cherishing it.” 193
श्लोक ( Shlok ) 194
हा हतोऽसि चिरं जन्तो मोहेनाद्यापि ते यतः । नास्ति कायाशुचिज्ञानं तत्त्यागः” क्वाति दुर्लभः ॥१९४॥
हे जीव, खेद है कि तू मोहकर्म के द्वारा चिरकालसे ठगा गया है, क्योंकि तुझे आजतक भी अपने शरीरकी अपवित्रताका ज्ञान नहीं हो रहा है, जब यह बात है तब अत्यन्त दुर्लभ उसका त्याग भला कहाँ मिल सकता है ॥१९४।॥
“O soul, alas! How grievous it is that you have been long deceived by the workings of delusion, for to this very day you remain ignorant of the impurity of your own body. And if this is so, how then can you ever hope to attain that exceedingly rare renunciation of the body?”194
श्लोक ( Shlok ) 195 –196
दुःखी सुखी सुखी दुःखी दुःखो दुःख्येव केवलम् । धन्यधन्योऽधनो धन्यो निर्धनो निर्धनः सदा ॥१९५llएवंविधैस्त्रिभिर्जन्तुरीप्सितानीप्सितैश्चिरम् । चतुर्थ भंगमप्राप्य बम्भ्भ्रमीति भवार्णवे ॥१९६।।
इस संसारमें जो दुःखी हैं वे सुखी हो जाते हैं, जो सुखी हैं वे दुखी हो जाते हैं और कितने ही दुखी दुखी ही बने रहते हैं इसी प्रकार धनी निर्धन हो जाते हैं, निर्धन धनी हो जाते हैं और कितने ही निर्धन सदा निर्धन ही बने रहते हैं। इस तरह यह जीव जो सुखी है वह सुखी ही रहे और जो धनी है वह धनी ही बना रहे यह चौथा भंग नहीं पाकर केवल ऊपर कहे हुए तीन तरहके भंगोंसे ही संसाररूपी समुद्रमें चिरकाल तक भ्रमण करता रहता है । ॥१९५-१९६।।
“In this world, the sorrowful at times become happy, the happy fall into sorrow, and yet some who are afflicted remain ever steeped in suffering. Likewise, the wealthy may become poor, the poor may gain riches, and yet many among the destitute persist in their poverty unchanging.
Thus, unable to attain that rare fourth possibility—where the happy remain always happy and the prosperous ever prosperous—the soul continues endlessly to wander in the ocean of worldly existence, subject only to these three shifting states.”195 –196
श्लोक ( Shlok ) 197
“यां वष्ट्ययमसौ वष्टि पर वष्टि स चापराम् । साऽपि वष्ट्यपरं कष्टमनिष्टेष्टपरम्परा ॥१९७।।
यह पुरुष जिस स्त्रीको चाहता है वह स्त्री किसी दूसरे पुरुषको चाहती है, जिसको वह चाहती है वह भी किसी अन्य स्त्रीको चाहता है इस प्रकार यह इष्ट अनिष्टकी परंपरा बहुत ही दुःख देनेवाली है ।। १९७।।
“This man desires a woman, yet that woman sets her heart upon another man; and the one she yearns for himself covets yet another woman. Thus does this endless chain of longing and aversion weave a tapestry of profound sorrow.” 197
श्लोक ( Shlok ) 198
यदिष्टं सदनिष्टं स्याव् यदनिष्टं तदिष्यते’ । इहेष्टानिष्टयोरिष्टा नियमेन न हि स्थितिः ॥१९८॥
जो इष्ट है वह अनिष्ट हो जाता है और जो अनिष्ट है वह इष्ट हो जाता है, इस प्रकार संसारमें इष्ट अनिष्टकी स्थिति किसी एक स्थानपर नियमित नहीं रहती ? ॥१९८॥
That which is cherished turns into what is detested, and what is despised becomes the object of desire. Thus, in this world, the states of favor and disfavor are never fixed in one place, nor do they remain constant.”198
श्लोक ( Shlok ) 199
स सासा ‘तत्तदेवैषा “सा स स्यात् सोऽपि’तत्पुनः । तत्स स्यात्तत्तदेवात्र” चक्रके’ वक्रसंक्रमः ॥१९९॥
आजका पुरुष अगले जन्ममें स्त्री हो जाता है, स्त्री नपुंसक हो जाती है, नपुंसक स्त्री हो जाता है, वही स्त्री फिर पुरुष हो जाता है, वह पुरुष भी नपुंसक हो जाता है, वह नपुंसक फिर पुरुष हो जाता है अथवा नपुंसक नपुंसक ही बना रहता है, इस प्रकार इस चक्रों बड़ा टेढ़ा संक्रमण करना पड़ता है ।॥ १९९॥
“The man of today may be born as a woman in his next life; the woman may become a eunuch; the eunuch may return as a woman, that same woman may again take birth as a man, and that man may become a eunuch once more—or the eunuch may remain so, unchanged. Thus, through these convoluted cycles, the soul must undergo a most tortuous and bewildering transmigration.” 199
श्लोक ( Shlok ) 200
अन्तमस्य’ विधास्यामि चिन्तयित्वा जिनोदितम् । सन्ततं जन्मकान्तारभ्रान्तौ भीतोऽहमन्तकात् ॥२००॥
इसलिये श्रीजिनेन्द्रदेवके कहे हुए वचनोंका चिन्तवन कर में अवश्य ही इस संसारका अन्त करूंगा क्योंकि निरन्तर संसाररूपी वनके भीतर परिभ्रमण करनेमें मैं अब यमराजसे डर गया हूं ॥ २००॥
“Therefore, reflecting upon the words spoken by the venerable Lord Jina, I shall most certainly bring an end to this worldly existence. For now, wandering ceaselessly within the dense forest of samsara, I have come to dread the approach of Yama, the Lord of Death.”
श्लोक ( Shlok ) 201
भोगोऽयं भोगिनो भोगो भोगिनो “भोगिनामकृत् । तावन्मात्रोऽपि नास्माकं भोगो भोगेष्विति ध्रुवम् ॥२०१॥
भोग करनेवाले मनुष्यों के ये भोग ठीक सर्प के फणाके समान हैं और भोगनेवाले जीवको भोगी” नाम देनेवाले हैं । तथा इतना सब होनेपर भी उन भोगों में से एक भोग भी हमारा नहीं है यह निश्चय है ।॥२०१॥
“These pleasures, enjoyed by worldly men, are verily like the hoods of serpents—beautiful yet perilous—and those who indulge in them earn the title of ‘pleasure-seekers.’ Yet despite all this, it is certain that not even a single one of these pleasures truly belongs to us.”201
श्लोक 202 से 211
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 203 | श्लोक 204 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 352 | श्लोक 353 से 361 | श्लोक 362 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191