आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81
श्लोक 82 से 91 दूतों का संदेश और भाइयों की प्रतिक्रिया
पुरोहित कहते हैं कि भाइयों के बिना भरत का राज्य संतोषजनक नहीं, क्योंकि साम्राज्य भाइयों के साथ ही आनंददायक होता है। दूतों को भाइयों को विश्वास दिलाने और पत्र के माध्यम से संदेश देने को कहा जाता है। यदि शांतिपूर्ण प्रयास विफल हों, तो आगे की कार्रवाई पर विचार करना चाहिए। पुरोहित लोकापवाद से बचने और यश की रक्षा की सलाह देते हैं। भरत उनकी बात मानकर क्रोध छोड़ देते हैं और दूतों को भाइयों के पास भेजते हैं। दूत संदेश सुनाते हैं, जिसे सुनकर भाई कहते हैं कि बड़ा भाई पूज्य है, परंतु वे केवल अपने पिता आदिनाथ की आज्ञा मानते हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 34 – Shlok 82 to 91
श्लोक ( Shlok ) 82
विदूरस्थैर्न युष्माभिरैश्वर्यं तस्य राजते । तारागणैरनासन्नैरिव बिम्ब निशां पतेः ॥८२॥
जिस प्रकार दूर रहने वाले तारागणोंसे चन्द्रमाका बिम्ब सुशोभित नहीं होता है उसी प्रकार दूर रहनेवाले आप लोगोंसे उनका ऐश्वर्य सुशोभित नहीं होता है ॥८२॥
Just as the moon’s radiance is dimmed by the distant stars,
So too is their glory obscured in your absence.Verse 82
श्लोक ( Shlok ) 83
साम्ग्राज्यं नास्य तोषाय यद्भवद्भिभिर्विना भवेत् । सहभोग्यं हि बन्धूनाम् अधिराज्यं सतां मुदे ॥ ८३॥
आप लोगोंके बिना यह राज्य उनके लिये संतोष देनेवाला नहीं हो सकता क्योंकि जिसका उपभोग भाइयोंके साथ साथ किया जाता है वही साम्राज्य सज्जन पुरुषोंको आनन्द देनेवाला होता है ॥८३॥
Without your presence, this kingdom cannot bring them true contentment,For it is only when shared with brothers that an empire becomes a source of joy for noble souls.Verse 83
श्लोक ( Shlok ) 84
इदं “वाचिकमन्यत्तु लेखार्थादवधार्यताम् । इति सोपायनैर्लेंखै प्रत्याय्यास्ते मनस्विनः ।।८४।।
‘यह मौखिक संदेश है, बाकी समाचार पत्रसे मालूम कीजिये’ इस प्रकार भेंटसहित पत्रोंके द्वारा उन प्रतापी भाइयोंको विश्वास दिलाना चाहिये ॥८४॥
“This is a verbal message; for further details, inquire through the written word.”Thus, through letters accompanied by gifts,
You should assure those valiant brothers of your intent.Verse 84
श्लोक ( Shlok ) 85
यशस्य मिदमेवार्य कार्य श्रेयस्यमेव च । चिन्त्यमुत्तरकार्य च साम्ना तेष्ववशेषु वै ॥८५॥
हे आर्य, आपके लिये यही कार्य यश देनेवाला है और यही कल्याण करनेवाला है यदि वे इस तरह शान्तिसे वश न हों तो फिर आगे के कार्य का विचार करना चाहिये ।।८५।।
O noble one, this course of action will bring you honor and prosperity.Should they not yield to peace and submission in this manner,Then you must contemplate the next steps with wisdom.Verse 85
श्लोक ( Shlok ) 86
बिभ्यता जन निर्वादादनुष्ठेयमिदं त्वया। स्थायुकं हि यशो लोके गत्वर्यो ननु संपदः ॥८६॥
आपको लोकापवाद से डरते हुए यही कार्य करना चाहिये क्योंकि लोक में यश ही स्थिर रहनेवाला है, सम्पत्तियाँ तो नष्ट हो जानेवाली हैं ।।८६।।
You must act thus, mindful of the fear of public reproach,
For it is only reputation that endures, while wealth is ever fleeting.Verse 86
श्लोक ( Shlok ) 87
इति तद्वचनाच्चक्री वृत्तिमारभटीं जहौ। अनुवर्तनसाध्या हि महतां चित्तवृत्तयः ॥८७॥
इस प्रकार पुरोहितके वचनोंसे चक्रवर्तीने अपनी क्रोधपूर्ण वृत्ति छोड़ दी सो ठीक ही है क्योंकि महापुरुषों की चित्तकी वृत्ति अनुकूल वचन कहनेसे ही ठीक हो जाती है ।।८७।।
Thus, through the words of the priest, the Emperor relinquished his wrathful disposition—And rightly so, for the minds of great souls are soothed by words that align with their highest purpose.Verse 87
श्लोक ( Shlok ) 88 – 89
आस्तां भुजबली तावद् यत्नसाध्यो महाबलः । शेषैरेव परीक्षिष्ये भ्रातृभिस्तद् द्विजि ह्वताम् ॥८८॥इति निर्धार्य कार्यज्ञान् कार्ययुक्तौ विविक्तधीः । प्राहिणोत्स निसृष्टार्थान्’ दूताननु जसन्निधिम् ॥८९॥
इस समय जो प्रयत्नसे वश नहीं किया जा सकता ऐसा महाबलवान् बाहुबली दूर रहे पहले शेष भाइयोंके द्वारा ही उनकी कुटिलताकी परीक्षा करूँगा। इस प्रकार निश्चय कर कार्य करनेंमें जिसकी वृद्धि कभी भी मोहित नहीं होती ऐसे चक्रवर्तीने कार्यके जाननेवाले निःसृष्टार्थ दूतोंको अपने भाइयों के समीप भेजा ।।८८-८९।।
“At this time, the mighty Bahubali, who cannot be subdued by effort, shall remain at a distance—First, I shall test the crookedness of the remaining brothers.”Thus resolved, the Emperor—whose discernment in action is never clouded,Even amid unfolding tasks—dispatched wise and purposeful envoys to his brothers, well-versed in the art of diplomacy.Verses 88–89
श्लोक ( Shlok ) 90
गत्वा च ते यथोद्देशं दृष्ट्वा तांस्तान्यथोचितम् । जगुः सन्देशमीशस्य तेभ्यो दूता यथास्थितम् ॥९०॥
उन दूतोंने भरतके आज्ञानुसार जाकर उनके योग्यरीतिसे दर्शन किये और उनके लिये चक्रवर्तीका संदेश सुनाया ।। ९० ।।
Those envoys, acting in accordance with Bharata’s command,
approached with due decorum and reverence,and conveyed the sovereign’s message to his brothers.Verse 90
श्लोक ( Shlok ) 91
अथ ते सह सम्भूय कृतकार्य निवेदनात् । दूतानित्यूचुरारुढप्रभुत्वमदकर्कशाः ॥९१॥
तदनन्तर-प्राप्त हुए ऐश्वर्यके मद से जो कठोर हो रहे हैं ऐसे वे सब भाई दूतोंके द्वारा कार्यका निवेदन हो चुकनेपर परस्परमें मिलकर उनसे इस प्रकार वचन कहने लगे ॥९१॥
Thereafter, those brothers—grown proud and unyielding through the intoxication of newly gained power—Having heard the envoys’ message, gathered together and spoke among themselves in this manner.Verse 91
श्लोक 92 से 101
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81
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