आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 352
श्लोक 353 से 361 जिनेन्द्र की स्तुति
जयकुमार ने भक्ति के साथ जिनेन्द्र की स्तुति की, जिसमें उनके चरणों में भय का नाश और कर्मों का क्षय होने की बात कही गई। जिनेन्द्र की शरण लेने से सारी आपत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं और मोक्ष प्राप्त होता है। अर्ककीर्ति ने पराजय के कारण वीरलक्ष्मी के वियोग में शोक प्रकट किया।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 353 to 361
श्लोक ( Shlok ) 353 – 354
अकम्पनोऽप्यनुप्राप्य वृतैरन्तः समाकुलः । राजकण्ठीरवै “र्वामा राजपुत्रशतैः पुरम् ॥३५३॥ सरक्षान् धृतभूपालान् कुमारं च नियोगिभिः । आश्वास्याश्वासकुशलैर्यथा स्थानमवापयत् ॥३५४॥
महाराज अकंपनने भी सैकड़ों राजपुत्रों तथा सिंहके समान तेजस्वी राजाओंके साथ साथ नगरमें पहुंचकर रक्षा करनेवाले जिनके साथ हैं ऐसे बंधे हुए अनेक राजाओं तथा अर्ककीतिको समझाने में कुशल नियुक्त किये हुए पुरुषों द्वारा समझा-बुझाकर उन्हें उनके योग्य स्थानपर पहुंचाया ॥ ३५३-३५४।।
The great King Akampana too entered the city, accompanied by hundreds of royal princes and lion-like, radiant kings. The captive rulers—now bound—along with Arkakīrti, were entrusted to wise and capable envoys, skilled in counsel and conciliation. These men, with due understanding and diplomacy, pacified them and guided each to a station befitting their rank and condition.353 – 354
श्लोक ( Shlok ) 355
विचिन्त्य विश्वविघ्नानां विनाशोऽर्हत्प्रसादतः । इति वन्दितुमाजग्मुः सर्वे नित्य मनोहरम् ॥३५५॥
अरहन्तदेवके प्रसादसे ही सब विघ्नोंका नाश होता है ऐसा विचारकर सब लोग वन्दना करने के लिये नित्यमनोहर नामके चैत्यालयमें आये ॥३५५॥
Reflecting that by the grace of the Blessed Arhat all obstacles are destroyed, all the people came to offer their reverent salutations at the Caitya shrine named Nityamanohara, ever delightful and sacred. 355
श्लोक ( Shlok ) 356
दूरादेवावरुह्यात्मवा हेभ्यः शान्तचेतसः । परीत्यार्थाभिरागत्य “तुष्टुवुः स्तुतिभिर्जि नान् ॥३५६॥
उन सभीने दूरसे ही अपनी अपनी सवारियोंसे उतरकर शान्तचित्त हो मन्दिर में प्रवेश किया और प्रदक्षिणाएँ देकर अर्थसे भरी हुई स्तुतियोंसे जिनेन्द्रदेवकी स्तुति की ॥३५६।।
All of them, dismounting from their steeds at a respectful distance, entered the temple with serene hearts. Circumambulating the shrine, they offered hymns rich in meaning, and with deep devotion, praised the Lord Jina.356
श्लोक ( Shlok ) 357
जयोऽपि जगदीशानमित्याप्त’ विजयोदयः ।अस्तावीदस्तकर्माणं भक्तिनिर्भरचेतसा ॥३५७।।
जिसे विजयका ऐश्वर्य प्राप्त हुआ है ऐसा जयकुमार भी भक्तिसे भरे हुए हृदयसे समस्त कर्मों को नष्ट करनेवाले जगत्पति-जिनेन्द्रदेवकी इस प्रकार स्तुति करने लगा ॥ ३५७॥
Jayakumāra, now adorned with the splendour of victory, with a heart overflowing with devotion, began to offer praise to the Lord of the universe—the Jina—who destroys all karmic bonds, in words such as these.357
श्लोक ( Shlok ) 358
शमिताखिलविघ्नसंस्तवस्त्वयि तुच्छोऽप्युपयात्यतुच्छताम् ।शुचिशुक्तिपुटेम्बुसन्धृतं ननु मुक्ताफलतां प्रपद्यते ।।३५८।।
हे समस्त विघ्नों को नष्ट करनेवाले जिनेन्द्रदेव, आपके विषयमें किया हुआ स्तवन थोड़ा होकर भी बड़े महत्त्वको प्राप्त हो जाता है सो ठीक ही है क्योंकि पवित्र सीपके संपुटमें पड़ी हुई पानी की एक बूंद भी मोतीपनेको प्राप्त हो जाती है-मोतीका रूप धारण कर लेती है ॥३५८॥
O Lord Jina, Destroyer of all obstacles—Even a small hymn offered unto You attains immense worth.And rightly so—for just as a single drop of water, falling into the sanctified shell of a pure oyster, is transformed into a pearl,so too does even the humblest praise of You become radiant with divine merit.358
श्लोक ( Shlok ) 359
घटयन्ति न विघ्नकोट्यो निकटे त्वत्क्रमयोर्निवासिनाम् ।पटवोऽपि फलं दवाग्निभि-र्भयमस्त्य म्बुधिमध्यवर्तिनाम् ॥३५९ ॥
हे देव, फल देनेमें चतुर करोड़ों विघ्न भी आपके चरणोंके समीप निवास करनेवाले पुरुषों को कुछ फल नहीं दे सकते सो ठीक ही है क्योंकि क्या समुद्रके बीचमें रहनेवाले लोगोंको दावा-नलसे कभी भय होता है ? ॥३५९॥
O Lord, even crores of obstacles—though skilled in bestowing their bitter fruits—can yield nothing to those who dwell near Your holy feet.And rightly so—for do those who reside in the midst of the ocean ever fear a forest fire?359
श्लोक ( Shlok ) 360
हृदये त्वयि सन्निधापिते रिपवः केऽपि भयं विधित्सवः ।अमृताशिषु सत्सु सन्ततं विषमोदार्पितविप्लवः कुतः ॥३६०॥
हे प्रभो, आपको हृदयमें धारण करनेपर फिर ऐसे कौन शत्रु रह जाते हैं जो भय देनेकी इच्छा कर सकें, निरन्तर अमृतभक्षण करनेवाले पुरुषोंमें किसी विषसे उत्पन्न हुआ उपद्रव कैसे हो सकता है ? ॥ ३६०।।
O Lord, when one holds You steadfast in the heart, what enemy remains who could even desire to instill fear?Just as those who continually partake of nectar cannot be afflicted by any poison,
so too are Your devotees untouched by the harms of the world.360
श्लोक ( Shlok ) 361
उपयान्ति समस्तसम्पदो विपदो विच्युतिमाप्नुवन्त्यलम् ।वृषभं ‘वृषमार्गदेशिनं झषकेतुद्विषमाप्नुषां सताम् ॥३६१॥
धर्मके मार्गका उपदेश देने-वाले और कामदेवके शत्रु श्रीवृषभदेवकी शरण लेनेवाले सज्जन पुरुषोंको सब सम्पदाएँ अपने आप मिल जाती हैं और उनकी सब आपत्तियां अच्छी तरह नष्ट हो जाती हैं । ३६१।।
To the noble souls who take refuge in the illustrious Vṛṣabhadeva—the foe of Kāma and the great teacher of the path of righteousness—all prosperity comes of its own accord, and every affliction is wholly dispelled.361
श्लोक 362 से 367
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 332 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 203 | श्लोक 204 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 352