आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91
श्लोक 92 से 101 समवसरण की संरचना
ध्वजाभूमि में दस प्रकार की ध्वजाएँ थीं। भरत ने चांदी के कोट, नाट्यशालाएँ, और कल्पवृक्षों के वन देखे। सिद्धार्थ वृक्षों की पूजा की और रत्नमयी स्तूपों का दर्शन किया। ये सब तीनों लोकों की शोभा का प्रतीक थे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 33 – Shlok 92 to 101
श्लोक ( Shlok ) 92
तद्गोपुरावर्नि क्रान्त्वा ध्वजरुद्धावर्निसुरान् । आजुहू षुमिवाऽपश्यन्मरुद्धूतैर्ध्वजांशुकैः ॥९२॥
वनवेदी के मुख्य द्वारको भूमि को उल्लंघन कर चक्रवर्ती भरतने ध्वजाओंसे रुकी हुई पृथिवी देखी, वह पृथिवी उस समय ऐसी मालूम हो रही थी मानो वायुसे हिलते हुए ध्वजाओंके वस्त्रोंके द्वाराउन्हें बुला ही रही हो ।। ९२ ।।
At the main entrance of the forest altar, crossing the earth itself, Emperor Bharata beheld the land adorned with fluttering flags. The earth, at that moment, seemed to call to him, as if beckoning through the sway of the flag’s cloths, stirred by the gentle breeze.92
श्लोक ( Shlok ) 93
सावनिः ‘सावनीवोद्यद् ध्वजमालातताम्बरा । सचक्रा सगजा रेजे जिनराजजयोर्जिता ॥९३॥
वह ध्वजाभूमि यज्ञभूमिके समान सुशोभित हो रही थी क्योंकि जिस प्रकार यज्ञभूमिका आकाश अनेक फहराती हुई ध्वजाओंके समूहसे व्याप्त होता है उसी प्रकार उस ध्वजाभूमिका आकाश भी अनेक फहराती हुई ध्वजाओंके समूहसे व्याप्त हो रहा था, जिस प्रकार यज्ञभूमि धर्मचक्र तथा हाथी आदिके मांगलिक चिह्नोंसे सहित होती है उसी प्रकार वह ध्वजाभूमि भी चक्र और हाथीके चिह्नोंसे सहित थी, तथा जिस प्रकार यज्ञभूमि जिनेन्द्रदेवके जय अर्थात् जयजयकार शब्दोंसे व्याप्त होती है उसी प्रकार वह ध्वजाभूमि भी जिनेन्द्रदेवके जयजयकार शब्दोंसे व्याप्त थी अथवा कर्मरूपी शत्रुओंको जीत लेनेसे प्रकट हुई थी ॥९३॥
That land of flags was resplendent like a sacred sacrificial ground, for just as the sacrificial site is filled with the fluttering of many banners, so too was the sky above that flag-bearing land suffused with the movement of flags. As the sacrificial site is marked with auspicious symbols—such as the Dharma wheel and the elephants—so too was the flag-bedecked land adorned with the symbols of the wheel and the elephant. And just as the sacrificial ground is filled with the victorious exclamations of Jai Jai Kar in praise of Lord Jina, so too was the land of flags filled with the triumphant declarations of the Jina’s victory over the enemies of karma.93
श्लोक ( Shlok ) 94
केतवो हरिवस्त्राब्जबर्हिणेभगरुत्मनाम् । स्रगुक्षहंसचक्राणां दशधोक्ता जिनेशिनः ॥९४॥
जिनराज की वे ध्वजाएं सिंह, वस्त्र, कमल, मयूर, हाथी, गरुड़, माला, बैल, हंस और चक्र इन चिह्नोंके भेदसे दश प्रकारकी थीं ।॥९४।।
The flags of the Lord Jina were of ten distinct types, each bearing a symbol: the lion, the garment, the lotus, the peacock, the elephant, the Garuda, the garland, the bull, the swan, and the wheel. Each of these symbols signified a unique aspect of his divine sovereignty.94
श्लोक ( Shlok ) 95
तानेकशः शतं चाष्टौ ध्वजान् प्रतिदिशं स्थितान् । वरीवश्यन्न ‘गाच्चक्री स तद्रुद्धावनेः परम् ॥९५॥
वे ध्वजाएँ प्रत्येक दिशामें एक-एक प्रकारकी एक सौ आठ स्थित थीं, उन सबकी पूजा करते हुए चक्रवर्ती महाराज उस ध्वजाभूमिसे आगे गये ॥ ९५।।
In each of the directions, there stood one hundred and eight flags of each kind—arrayed with perfect order and sanctity. Worshipping them all with deep reverence, Emperor Bharata proceeded onward, beyond the sacred land of flags.95
श्लोक ( Shlok ) 96
द्वितीयमार्जुनं सालं सगोपुरचतुष्टयम् । व्यतीत्य परतोऽपश्यन्नाट्यशालाविपूर्ववत् ॥९६॥
आगे चलकर उन्होंने चार गोपुर दरवाजों सहित चांदीका बना हुआ दूसरा कोट देखा और उसे उल्लंघन कर उसके आगे पहिलेके समान ही नाट्यशाला आदि देखीं ।।९६।।
Proceeding further, he beheld the second enclosure—crafted of gleaming silver and adorned with four grand Gopura gateways. Crossing beyond it, he encountered once more, as before, majestic theatres and other divine structures. 96
श्लोक ( Shlok ) 97
तत्र पश्यन्सुरस्त्रीणां नृत्यं गीतं निशामयन् । धूपामोदं च सञ्जिघ्रन् सुप्रीताक्षो ऽभवद् विभुः ॥९७॥
वहां देवाङ्गनाओंके नृत्य देखते हुए, उनके गीत सुनते हुए और धूपकी सुगन्ध सूंघते हुए महाराज भरतकी इन्द्रियां बहुत ही संतुष्ट हुई थीं ।। ९७।।
There, as he beheld the dances of the celestial maidens, listened to their melodious songs, and breathed in the fragrance of the sacred incense, King Bharata’s senses were deeply gratified and filled with bliss. 97
श्लोक ( Shlok ) 98
कक्षान्तरे ततस्तस्मिन् कल्पवृक्षवनावलिम् । स्रग्वस्त्राभरणादीष्टफलदां स निरूपयन् ॥९८॥
आगे चलकर उन्होंने उसी कक्षाके मध्यमें माला, वस्त्र और आभूषण आदि अभीष्ट फल देनेवाली कल्प वृक्षोंके वनकी भूमि देखी ॥९८॥
Advancing further, he beheld at the center of that very chamber the sacred ground of a grove of Kalpa trees—wish-fulfilling trees that bore garlands, garments, ornaments, and other cherished treasures as their divine fruits. 98
श्लोक ( Shlok ) 99
सिद्धार्थ पादपांस्तत्र सिद्धबिम्बैरधिष्ठितान् । परीत्य प्रणमन् प्रार्चीद र्चितान्नाकिनायकैः ॥९९॥
उसी वनभूमिमें उन्होंने सिद्धोंकी प्रतिमाओंसे अधिष्ठित और इन्द्रोंके द्वारा पूजित सिद्धार्थ वृक्षोंकी प्रदक्षिणा दी, उन्हें प्रणाम किया और उनकी पूजा की ।।९९।।
Within that sanctified grove, he performed pradakṣiṇā—circumambulation—of the Siddhārtha trees, which were consecrated with the images of the Siddhas and worshipped by the celestial Indras; he bowed before them with reverence and offered his devout worship.99
श्लोक ( Shlok ) 100
वनवेदी ततोऽतीत्य चतुर्गोपुरमण्डनाम् । प्रासादरुद्धामवनी स्तूपांश्च प्रभुरैक्षत ॥१००॥
तदनन्तर चार गोपुर दरवाजोंसे सुशोभित वनकी वेदीको उल्लंघन कर चक्रवर्ती ने अनेक महलोंसे भरी हुई पृथिवी और स्तूप देखे ॥१००॥
Thereafter, crossing beyond the forest altar adorned with four splendid Gopura gateways, the Emperor beheld a vast expanse of earth adorned with numerous palaces and crowned by sacred stūpas, radiating majesty and sanctity.100
श्लोक ( Shlok ) 101
प्रासादा विविधास्तत्र सुरावासाय कल्पिताः । त्रिचतुष्पञ्चभूम्याद्याः “नानाच्छन्दैरलंकृताः ॥१०१॥
वहां देवोंके रहनेके लिये जो महल बने हुए थे वे तीन खण्ड, चार खण्ड, पांच खण्ड आदि अनेक प्रकारके थे तथा नाना प्रकारके उपकरणोंसे सजे हुए थे ।। १०१ ।।
There, the palaces built for the abode of the gods rose in varied forms—some with three tiers, others with four, five, and more—each adorned with a multitude of exquisite ornaments and celestial furnishings, resplendent in their divine opulence.101
श्लोक 102 से 111
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 154 | श्लोक 155 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91
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