आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 45- Shlok 82 to 91
श्लोक ( Shlok ) 82
“सखीमुखानि संवीक्ष्य जञ्जपित्वा दिशामसौ । स्वैरं हसितुमारब्ध’ गृहीतमदनग्रहा ॥८२॥
कामरूपी पिशाचको ग्रहण करनेवाली सुलोचना सखियोंके मुख देखकर दिशाओंसे बातचीत कर अर्थात् निरर्थक वचन बोलकर इच्छानुसार हंसने लगी ॥८२॥
Sulochana, possessed by the fiend of desire, looked upon the faces of her companions and, as though conversing with the directions themselves, began to utter aimless words and laugh at her own whim.82
श्लोक ( Shlok ) 83
सितासितासितालोल कटाक्षेक्षणतोमरैः । जयं तदा जितानङ्गं कृत्वानङ्गप्रतिष्कशम् ॥८३॥
उस समय भय और लज्जा सहित सुलोचना कामदेवको जीतनेवाले जयकुमारको न देखने योग्य समयमें मानो ठगनेकी इच्छासे ही कामदेवको अपना सहायक बनाकर सफेद काले इन दोनों रंगोंसे मिले हुए चंचल कटाक्षोंसे भरी हुई दृष्टिरूपी अनेक तोमर नामके हथियारोंसे धीरे धीरे मार रही थी ।।८३।।
At that moment, Sulochana—suffused with both fear and modesty—seemed intent on deceiving even the unconquerable Cupid by making him her ally. Wielding the many javelins of her roving glances—glances imbued with restless sidelong looks, woven of white and black hues—she slowly struck, as if to slay, Jayakumara, the vanquisher of Kama, at a moment when he was least prepared to behold her.83
श्लोक ( Shlok ) 84
ससाध्वसा सलज्जा सा विव्याध विविधैर्मनाक् । अनालोकनवेलायामति सन्धित्सयेव तम् ॥८४॥
जब जयकुमार उसकी ओर नहीं देखता था उस समय भी वह सफेद, काले और चंचल कटाक्षोंसे भरी दृष्टिसे उसे देखती रहती थी और उससे ऐसा मालूम होता था मानो यह उसे ठगना ही चाहती है ॥८४॥
Even when Jayakumara cast not his gaze upon her, she continued to regard him with eyes brimming with swift, darting glances—glances alive with shifting whites and blacks—and in so doing, she appeared as though intent on beguiling him.84
श्लोक ( Shlok ) 85
न भुजङ्गेन सन्दष्टा नापि संसेवितासवा । न श्रमेण समाक्रान्ता तथापि स्विद्यति स्म सा ॥८५॥
उस समय उसे न तो सर्पने काटा था, न उसने मद्य ही पिया था, और न परिश्रमसे ही वह आक्रान्त थी तथापि वह पसीनेसे तर हो रही थी ॥८५॥
At that moment, though no serpent had bitten her, nor had she drunk any intoxicant, nor was she wearied by exertion, yet she was drenched in perspiration.85
श्लोक ( Shlok ) 86
स्खलन्ति स्म “कलालापाश्चकम्पे हृदयं भृशम् । चलान्यालोकितान्यासन्नवशे वात्मनश्च सा ॥८६॥
उसके मधुर भाषण स्खलित हो रहे थे, हृदय अत्यन्त कँप रहा था, दृष्टि चंचल हो रही थी और वह ऐसी जान पड़ती थी मानो अपने वशमें ही न हो ।। ८६ ।।
Her sweet words faltered upon her lips, her heart trembled exceedingly, her gaze grew restless, and she appeared as though no longer in command of herself.86
श्लोक ( Shlok ) 87
प्रक्षालितेव लज्जाऽगात् सुदत्याः स्वेदवारिभिः । वागिन्धनैर्व्यदीपिष्ट विचित्रश्चित्तजोऽनलः ॥८७॥
सुन्दर दांतोंवाली सुलोचनाकी लज्जा इस प्रकार नष्ट हो गई थी मानो उसके पसीनारूपी जलसे धुल ही गई हो और कामदेवरूपी विचित्र अग्नि वचनरूपी ईंधनसे ही मानो खूब प्रज्वलित हो रही थी ॥८७॥
The modesty of fair-toothed Sulochana seemed utterly effaced, as though washed away by the streams of her perspiration; and the wondrous fire of desire blazed forth ever more fiercely, kindled by the fuel of her words.87
श्लोक ( Shlok ) 88
तावत्त्रपा भयं तावत्तावत्कृत्यविचारणा । तावदेव धृतिर्यावज्जृम्भते न स्मरज्वरः ॥ ८८॥
जबतक कामदेवरूपी ज्वर नहीं बढ़ता है तबतक ही लज्जा रहती है तबतक ही भय रहता है, तब तक ही करने योग्य कार्यका विचार रहता है और तब तक ही धैर्य रहता है ।॥८८॥
Modesty endures only until the fever of desire intensifies; only until then do fear, prudent deliberation, and steadfast composure remain.88
श्लोक ( Shlok ) 89
विषयीकृत्य सर्वेषामिन्द्रियाणां परस्परम् । परामवापतुः प्रीति दम्पती तौ पृथक् पृथक् ॥८९॥
वे दोनों दम्पती परस्पर पृथक् पृथक् सब इन्द्रियोंक विषयोंका सेवनकर परम आनन्दको प्राप्त हो रहे थे ।।८९।।
Though dwelling apart, the two lovers each savored the delights of the senses in their own way, and thus attained supreme bliss.89
श्लोक ( Shlok ) 90
अत्यासङ्गात् क्रमग्रा हिकरणैस्तावतर्पितौ । अनिन्दतामशेषैककरणाकारिणं विधिम् ।।९०।
अत्यन्त आसक्तिके कारण, क्रम क्रमसे एक एक विषयको ग्रहण करनेवाली इन्द्रियोंसे वे संतुष्ट नहीं होते थे इसलिये सब इन्द्रियोंको एक इन्द्रियरूप न करनेवाले विधाता-की वे निन्दा करते रहते थे । भावार्थ-उन दोनोंकी विषयासक्ति इतनी बढ़ी हुई थी कि वे एक साथ ही सब इन्द्रियोंके विषय ग्रहण करना चाहते थे परन्तु इन्द्रियां अपने प्राकृतिक नियम के अनुसार एक समयमें एक ही विषयको ग्रहण कर पाती थीं अतः वे असंतुष्ट होकर सब इन्द्रियों को एक इन्द्रियरूप न बनानेवाले नामकर्मरूपौ ब्रह्माकी सदा निन्दा करते रहते थे ॥९०॥
Owing to their intense attachment, they found no satisfaction in indulging their senses one by one; and thus, ever discontented, they continually censured the Creator Himself for not fashioning all the senses into a single, all-consuming organ—so that they might revel in every delight simultaneously.
(Meaning: So overwhelming was their passion that they longed to experience all sensual pleasures at once, but since each sense could only engage with its own object in turn, they grew frustrated and blamed Brahma, who, in his divine design, had not merged the senses into one.)90
श्लोक ( Shlok ) 91
अन्योन्यविषयं सौख्यं त्वक्त्वाऽशेषान्यगोचरम् । स्तोकेन सुखमप्राप्तं प्रापतुः ‘परमात्मनः ॥९१॥
उन दोनोंने सब साधारण लोगों को मिलनेवाला परस्परका सुख छोड़कर आत्माका वह उत्कृष्ट सुख प्राप्त किया था जो कि अन्य छोटे-छोटे लोगोंको दुष्प्राप्य था ।।९१॥
Renouncing the ordinary pleasures that common folk find in one another, the two attained that supreme bliss of the soul—a joy so rare that it remains beyond the reach of lesser beings.91
श्लोक 92 से 103
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339
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आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81