आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191
श्लोक 192 से 202 अयोध्या की वापसी
भरत ने चक्रवर्ती विभूति और भगवान की सेवा दोनों प्राप्त की। उनकी स्तुति से अर्जित पुण्य से वे चरणों में भक्ति की कामना करते हैं। आनंद के आँसुओं के साथ उन्होंने भगवान को नमस्कार किया। वृषभदेव से धर्म स्वरूप सुनकर वे प्रसन्न हुए। मुनियों को नमस्कार कर, समवसरण की विभूति से नेत्रों को तृप्त कर, वे अयोध्या लौटे। साठ हजार वर्षों के दिग्विजय और पुण्य से प्रेरित होकर उन्होंने जिनेन्द्र की भक्ति में आनंद प्राप्त किया।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 33 – Shlok 192 to 202
श्लोक ( Shlok ) 192
त्वत्पादनखभाजालसलिलैरस्तकल्मषैः ।अधिमस्तकमालग्नैरभिषिक्त इवास्म्यहम् ॥१९२।।
हे प्रभो, जिसने समस्त पाप नष्ट कर दिये हैं ऐसा जो यह आपके चरणोंके नखोंकी कान्तिका समूहरूप जल मेरे मस्तकपर लग रहा है उससे में ऐसा मालूम होता हूं मानो मेरा अभिषेक ही किया गया हो ॥ १९२॥
O Lord, this radiant stream of light, like sacred water, flowing from the lustrous tips of Your toenails and now touching my head—feels to me as though I am being consecrated in a divine anointing, for it has the power to destroy all sin. ॥192॥
श्लोक ( Shlok ) 193
एकतः सार्वभौमश्रीरियमप्रतिशासना । एकतश्च भवत्पादसेवालोकैकपादनी ॥१९३॥
हे विभो, एक ओर तो मुझे दूसरेके शासनसे रहित यह चक्रवर्तीकी विभूति प्राप्त हुई है और एक ओर समस्त लोकको पवित्र करनेवाली आपके चरणोंकी सेवा प्राप्त हुई है ॥ १९३।।
O Sovereign Lord, on one hand, I have attained the glory of a universal emperor, free from subjugation to any other; and on the other, I have been blessed with the supreme honor of serving Your feet—those sanctifying feet that purify all the worlds. ॥193॥
श्लोक ( Shlok ) 194
यद्दिग्भ्रान्तिविमूढेन’ महदेनो मयाऽर्जितम् । तत्त्वत्सन्दर्शनाल्लीनं तमो नैशं रवेर्यथा ॥१९४।।
हे भगवन्, दिशाभ्रम होनेसे विमूढ होकर अथवा दिग्विजयके लिये अनेक दिशाओंमें भ्रमण करनेके लिये मुग्ध होकर मैंने जो कुछ पाप उपार्जन किया था वह आपके दर्शन मात्रसे उस प्रकार विलीन हो गया है जिस प्रकार कि सूर्यके दर्शनसे रात्रिका अन्धकार विलीन हो जाता है ।।१९४।।
O Lord, whatever sins I had accrued—whether through delusion, having lost my sense of direction, or through prideful wandering in pursuit of worldly conquest—have all been dispelled at the very sight of You, just as the darkness of night vanishes before the rising sun. ॥194॥
श्लोक ( Shlok ) 195
त्वत्पदस्मृतिमात्रेण पुमानेति पवित्रताम् । किमुत त्वद्गुणस्तुत्या भक्त्यैवं सुप्रयुक्तया ।।१९५।।
हे देव, आपके चरणोंके स्मरणमात्रसे ही जब मनुष्य पवित्रताको प्राप्त हो जाता है तब फिर इस प्रकार भक्तिसे की हुई आपके गुणोंकी स्तुतिसे क्यों नहीं पवित्रताको प्राप्त होगा ? अर्थात् अवश्य ही होगा ।।१९५॥
O Divine Lord, when even the mere remembrance of Your sacred feet purifies a soul, then how much more sanctifying must be the devoted praise of Your boundless virtues? Surely, such heartfelt worship must lead to supreme purity. ॥195॥
श्लोक ( Shlok ) 196
भगवंस्त्वद् गुणस्तोत्राद्यन्मया पुण्यमार्जितम् । तेनास्तु त्वत्पदाम्भोजे परा भक्तिः सदापि मे ॥१९६॥
हे भगवन्, आपके गुणोंकी स्तुति करनेसे जो मैंने पुण्य उपार्जन किया है उससे यही चाहता हूं कि आपके चरणकमलोंमें मेरी भक्ति सदा बनी रहे ।।१९६।।
O Lord, whatever merit I have gained through the praise of Your divine virtues, may it bear but one fruit—that unwavering devotion to Your lotus feet may ever abide within me. ॥196॥
श्लोक ( Shlok ) 197
इत्थं चरावरगुरुं परमादिदेव स्तुत्वाऽधिराट् धरणिपैः सममिद्धबोधः । आनन्दबाष्पलवसिक्तपुरः प्रदेशो भक्त्या ननाम करकुड्मललग्नमौलिः ॥१९७।।
इस प्रकार चर अचर जीवोंके गुरु सर्वोत्कृष्ट भगवान् वृषभदेवको नमस्कार कर जिसने आनन्द के आँसुओंकी बूंदोंसे सामनेका प्रदेश सींच दिया है, जिसका ज्ञान प्रकाशमान हो रहा है, और जिसने दोनों हाथ जोड़कर अपने मस्तकसे लगा रखे हैं ऐसे चक्रवर्ती भरतने भक्तिपूर्वक भगवान् को नमस्कार किया ॥१९७॥
Thus did Emperor Bharata, with hands humbly folded and pressed to his brow, offer reverent salutations to the Supreme Lord Ṛṣabhadeva—preceptor of all beings, both moving and still, and sovereign among the exalted. His eyes brimmed with tears of bliss, watering the ground before him, while the radiance of his inner wisdom shone forth like a luminous flame. ॥197॥
श्लोक ( Shlok ) 198
श्रुत्वा पुराणपुरुषाच्च पुराणधर्म कर्मारिचक्रजयलब्ध विशुद्धबोधात् । सम्प्रीतिमाप परमां भरताधिराजः प्रायो धृतिः कृतधियां स्वहितप्रवृत्तौ ॥१९८॥
कर्मरूपी शत्रुओंके समूहको जीतनेसे जिन्हें विशुद्ध ज्ञान प्राप्त हुआ है ऐसे पुराण पुरुष भगवान् वृषभदेवसे पुरातन धर्मका स्वरूप सुनकर भरताधिपति महाराज भरत बड़ी प्रसन्नताको प्राप्त हुए सो ठीक ही है क्योंकि बुद्धिमान् पुरुषोंको प्रायः अपना हित करनेमें ही सन्तोष होता है ॥१९८॥
It is but fitting that Emperor Bharata, lord of the earth, was filled with profound joy upon hearing from the ancient Lord Ṛṣabhadeva—the primordial Being who, having conquered the host of karmic foes, had attained pure and perfect knowledge—the true form of the eternal Dharma. For indeed, the wise find their deepest satisfaction in what truly brings them well-being. ॥198॥
श्लोक ( Shlok ) 199
आमृच्छ्च च स्वगुरुमादिगुरुं निधीशो व्यालोलमौलितटताडितपादपीठः । भूयोऽनुगम्य च मुनीन् प्रणतेन मूर्ध्वा स्वावासभूमिमभिगन्तुमना बभूव ॥१९९॥
तदनन्तर अपने चञ्चल मुकुटके किनारेसे जिन्होंने भगवान के पाद पीठका स्पर्श किया है ऐसे निधियोंके स्वामी भरत महाराज अपने पिता आदिनाथ भगवान से पूछकर तथा वहाँ विराजमान अन्य मुनियोंको नम्र हुए मस्तक से नमस्कार कर अपनी निवासभूमि अयोध्याको जानेके लिये तत्पर हुए ॥ १९९॥
Thereafter, Emperor Bharata—the lord of boundless wealth—whose jeweled, gently swaying crown had touched the footstool of the Blessed Lord, humbly bowed his head to the assembled sages and, having taken leave of his father, the revered Ādinātha Bhagavān, prepared to return to his royal abode in Ayodhyā. ॥199॥
श्लोक ( Shlok ) 200
भक्त्यापितां स्रजमिवाधिपदं जिनस्य स्वां दृष्टिमन्वितलसत्सुमनोविकासाम् । शेषास्थयैव च पुनर्विनिवर्त्य कृच्छ्रात् चक्राधिपो जिनसभाभवनात्प्रतस्थे ॥२००॥
चक्राधिपति भरतने जिसमें अनुक्रमसे खिले हुए सुन्दर फूल गुँधे हुए हैं और जो श्री जिनेन्द्रदेवके चरणोंमें भक्तिपूर्वक अर्पित की गई है ऐसी मालाके समान, सुन्दर मनकी प्रसन्नतासे युक्त अपनी दृष्टिको शेषाक्षत समझ बड़ी कठिनाईसे हटाकर भगवान् के सभाभवन अर्थात् समवसरणसे प्रस्थान किया ।।२००।।
Emperor Bharata, like a garland—lovingly woven with blossoms blooming in perfect sequence and offered with devotion at the feet of Lord Jina—departed from the divine assembly hall, the samavasaraṇa, with great difficulty withdrawing his gaze, which he considered his last unspent offering, so deeply was it filled with serene joy and reverence. ॥200॥
श्लोक ( Shlok ) 201
आलोकयन् जिनसभावनिभूतिमिद्धां विस्फारितेक्षणयुगो युगदीर्घबाहुः । पृथ्वीश्वरैरनुगतः प्रणतोत्तमाङ्गैः प्रत्यावृतत्स्वसदनं मनुवंशकेतुः ॥
भगवान के समवसरण की प्रकाशमान विभूतिको देखनेसे जिनके दोनों नेत्र खुल रहे हैं, जिनकी भुजायें युग (जुवाँरी) के समान लम्बी हैं, मस्तक झुकाये हुए अनेक राजा लोग जिनके पीछे पीछे चल रहे हैं और जो कुलकरोंके वंशकी पताकाके समान जान पड़ते हैं ऐसे भरत महाराज अपने घरकी ओर लौटे ॥२०१।।
With eyes wide in wonder at the radiant splendor of the Lord’s samavasaraṇa, with arms long and graceful like tender creepers, and with many kings following humbly behind, heads bowed in reverence—Emperor Bharata, seeming like the banner of the noble Kulakara lineage, turned homeward on his royal return. ॥201॥
श्लोक ( Shlok ) 202
पुण्योदयान्निधिपतिविजिताखिलाशस्तन्निर्जितौ’ गमितषष्ठिसमा सहस्रः । प्रीत्याऽभिवन्द्य जिनमाप परं प्रमोदं तत्पुण्यसङ्ग्रहविधौ सुधियो यतध्वम् ॥ २०२॥
चूंकि पुण्यके उदयसे ही चक्रवर्तीने समस्त दिशाएं जीतीं, तथा उनके जीतनेमें साठ हजार वर्ष लगाये और फिर प्रीतिपूर्वक जिनेन्द्रदेवको नमस्कार कर उत्कृष्ट आनन्द प्राप्त किया। इसलिये हे वृद्धिमान् जन, पुण्यके संग्रह करनेमें प्रयत्न करो॥ २०२॥
For it was through the rise of merit alone that the Chakravartin conquered all directions, spending sixty thousand years in his victorious campaign, and at last, bowing with deep devotion to Lord Jina, attained supreme bliss. Therefore, O wise and discerning ones, strive earnestly to accumulate merit. ॥202॥
इत्यार्षे भगवज्जिनसेनाचार्य प्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराण-सङ्ग्रहे भरतराजकैलासाभिगमनवर्णनं नाम त्रयस्त्रिशत्तमं पर्व ॥ ३३ ॥
इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टि लक्षण महापुराण संग्रहके भाषानुवादमें भरतराजका कैलाश पर्वतपर जानेका वर्णन करनेवाला तैंतीसवां पर्व समाप्त हुआ ।
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन
पर्व 34 – श्लोक 1 से 11
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 154 | श्लोक 155 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191
Download PDF