आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 203 | श्लोक 204 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261
श्लोक 262 से 271 सूर्यास्त और अर्ककीर्ति की पराजय
सूर्य का अस्त होना अर्ककीर्ति की पराजय का संकेत था। सूर्य की तुलना एक दोषयुक्त राजा से की गई, जो क्रूर, असहनशील, और अन्यायी है। उसकी किरणें संताप देती हैं, और वह सहायकों के बिना नष्ट हो जाता है। विद्वानों ने कहा कि जब सूर्य जैसा उपमान नष्ट हो गया, तो अर्ककीर्ति की हार निश्चित थी। युद्धक्षेत्र में जयकुमार की विजयलक्ष्मी स्थापित हुई।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 262 to 271
श्लोक ( Shlok ) 262
स्फुटालोकोऽपि “सद्वृत्तोऽप्यगादस्तमहर्पतिः । आश्रित्य वारुणीं रक्तः को न गच्छत्यधोगतिम् ।।
जिसका आलोक प्रकाश (ज्ञान) स्पष्ट है और जो सवृत्त-गोल (सदाचारी) है ऐसे सूर्यको भी अस्त होना पड़ा सो ठीक ही है क्योंकि वारुणी अर्थात् पश्चिम दिशा अथवा मद्यका सेवन करनेवाला ऐसा कौन है जो नीचेको न जाता हो-अस्त न होता हो-नरक न जाता हो। भावार्थ-जिस प्रकार मद्य पीनेवाला ज्ञानी और सदाचारी होकर भी नीच गतिको जाता है उसी प्रकार सूर्य भी प्रकाशमान और गोल होकर भी पश्चिम दिशामें जाकर अस्त हो जाता है ।। २६२।।
Even the sun—whose radiance is the embodiment of illumination and who follows the noble circular path—was compelled to set. And rightly so, for who, upon turning toward the west—Vāruṇī, the realm of intoxication or decline—does not descend?
Interpretive Meaning:
Just as one who partakes of wine, though wise and virtuous, falls into degradation, even so does the sun—resplendent and righteous—sink into the western sky and vanish from view.262
श्लोक ( Shlok ) 263
उदये वर्धितच्छायो व्याप्य विश्वं प्रतापवान् । “दिनेनेनोऽप्यनश्यत् कस्तिष्ठेत्तीव्रकरः परः ॥२६३॥
उदय कालसे लेकर निरन्तर जिसकी कान्ति बढती रहती है और जो संसारमें व्याप्त होकर तपता रहता है ऐसा तीव्रकर अर्थात् तीव्र किरणोंवाला सूर्य भी जब एक ही दिनमें नष्ट हो गया तब फिर भला तीव्रकर अर्थात् अधिक टैक्स लगानेवाला और संताप देनेवाला अन्य कौन है जो संसारमें ठहर सके ॥ २६३॥
He whose radiance ever increases from the moment of dawn, who scorches the world with his all-pervading brilliance—that sun of fierce rays himself perished within a single day. Then tell me, what other tīvra-kara—be it one who levies harsh taxes or inflicts torment—can ever hope to endure in this world?
Interpretive Meaning:
If even the sun, ever-rising in brilliance and power, cannot remain, how then can those who oppress others with severity—through taxes or tyranny—expect to last? 263
श्लोक ( Shlok ) 264
इनं स्वच्छानि विच्छायं” तापहारीणि वा भृशम् । द्रष्टुं सरांस्य निच्छन्ति कञ्जाक्षीणि शुचा व्यधुः ।।२६४।।
संतापको दूर करनेवाले स्वच्छ सरोवर अतिशय कान्तिरहित सूर्यको देखना नहीं चाहते थे इसलिये ही मानो उन्होंने शोकसे अपने कमलरूपी नेत्र बन्द कर लिये थे ।।२६४।।
The clear, cooling lakes—guardians against heat and distress—seemed unwilling to behold the now lustreless, tormented sun; and so, as if in sorrow, they closed their lotus-like eyes in mourning.264
श्लोक ( Shlok ) 265
जयनिस्त्रिंशनिस्त्रिंशनिपातपतितान् खगान् । “प्राविशन्निजनीडानि” वीक्षितुं विक्षमाः खगाः ll२६५ll
सब पक्षी अपने-अपने घोंसलोंमें इस प्रकार चले गये थे मानो वे जयकुमार की तीक्ष्ण तलवारकी चोटसे गिरे हुए विद्याधरोंको देखनेके लिये समर्थ नहीं हो सके हों ।॥ २६५॥
All the birds withdrew into their nests, as though unable to bear the sight of the fallen Vidyādharas—struck down by the keen edge of Jayakumar’s sword.265
श्लोक ( Shlok ) 266
स प्रतापः प्रभा साऽस्य सा हि सर्वेकपूज्यता । पातः प्रत्यहमर्कस्याप्यतयः कर्कशो विधिः॥२६६॥
सूर्यका असाधारण प्रताप है, असाधारण कान्ति है और असाधारण रूपसे ही सब उसकी पूजा करते हैं फिर भी प्रतिदिन उसका पतन हो जाता है इससे जान पड़ता है कि निष्ठुर दैव तर्कका विषय नहीं है। भावार्थ ऐसा क्यों करता है इस प्रकारका प्रश्न दैवके विषयमें नहीं हो सकता है ।।२६६।।
The sun possesses an extraordinary radiance, an unmatched brilliance, and is worshipped by all in a manner beyond compare—yet still, he must face his fall each day. From this, it becomes clear: the workings of cruel fate lie beyond the realm of reason.
Interpretive Meaning:
Destiny defies logic—no matter how great or revered one may be, the question “Why does this happen?” finds no place before the unyielding will of fate. 266
श्लोक ( Shlok ) 267
कीर्योपमानतां यातो यातोऽर्कश्चेददृश्यताम्। उपमेयस्य का वार्तेत्यवादीद्विदुषां गणः ॥२६७॥
उस समय विद्वानोंका समूह ऐसा कह रहा था कि जब अर्ककीतिके साथ उपमानता-को प्राप्त हुआ सूर्य भी अदृश्य हो गया तब उपमेयकी क्या बात है ? भावार्थ-अर्ककीर्ति के लिये सूर्यकी उपमा दी जाती है परन्तु जब सूर्य ही अस्त हो गया तब अर्ककीर्तिकी तो बात ही क्या है ? ॥२६७।।॥
At that moment, the assembly of wise men spoke thus: “When even the upamāna—the very standard of comparison—like the sun, vanished along with Arkaikīti, what then remains to be said of the upameya, the one likened to it?”
Interpretive Meaning:
If the sun itself—often held as the measure of Arkaikīti’s glory—has set and disappeared, then Arkaikīti’s fall is but inevitable and beyond question.267
श्लोक ( Shlok ) 268 – 271
दुर्निरीक्ष्यः ‘करैस्तीक्ष्णैः सन्तप्तनिजमण्डलः । अलं कुवलयध्वंसी दुस्सुतो दुर्मतिस्तुतः ॥२६८॥ निस्सहायो निरालम्बोऽप्यसोढा परतेजसाम्” । “सिंहराशिश्चलः क्रूरः सहसोच्छित्य मूर्द्धगः ॥२६९॥ पापरोगी परप्रेर्यो रविर्विषममार्गगः । रक्तरुक् सकलद्वेषी वर्धिताशोऽक्रमाग्रगः ॥२७०।।”सता बुधेन मित्रेण गुरुणा ऽप्यस्तमाश्रयत् । बहुदोषो भिषग्वयैर्दुश्चिकित्स्य इवातुरः ॥२७१॥
जो बड़ी कठिनतासे देखा जाता है, अपनी किरणोंसे तीक्ष्ण-ऊष्ण है, जिसने अपना मण्डल भी संतप्त कर लिया है, जो कुवलय अर्थात् कुमुदोंका ध्वंस करनेवाला है, बड़े कष्टसे जिसका उदय होता है अथवा जिसका पुत्र-शनि दुष्ट है, दुर्बुद्धि लोग ही जिसकी स्तुति करते हैं, जो सहायरहित है, आधाररहित है, जो चन्द्र आदि ज्योतिषियोंका तेज सह नहीं सकता, सिंह राशिपर है, चंचल है, क्रूर है, सहसा उछलकर मस्तकपर चलता है, पाप रोगी है, दूसरेके सहारेसे चलता है, विषममार्ग-आकाशमें चलता है, रक्तरुक्-लाल किरणोंवाला है, सकल-कलासहित-चन्द्रमाके साथ दोष करनेवाला है, दिशाओंको बढ़ानेवाला है और पैररहित-अरुण नामका सारथि जिसके आगे चलता है, ऐसा सूर्य, बुधग्रह और गुरु (बृहस्पति ग्रह) नामके सज्जन मित्रोंके साथ होनेपर भी अच्छे अच्छे वैद्य भी जिसका इलाज नहीं कर सकते ऐसे बहुदोषी-अनेक दोषवाले (पक्षमें रात्रिवाले) रोगीके समान अस्त हो गया सो ठीक ही है क्योंकि दुष्ट होने के कारण जिसकी ओर कोई देख भी नहीं सकता है, जो अधिक टैक्स वसूल करनेके कारण तीक्ष्ण है, जो अपने परिवारके लोगोंको भी संताप देनेवाला है। कुवलय अर्थात् पृथित्रीमण्डलका खूब नाश करनेवाला है, जिसका पुत्र खराब है, मूर्ख ही जिसकी स्तुति करते हैं, जो सहायक मित्रोंसे रहित है, दुर्ग आदि आधारोंसे रहित है, अन्य प्रतापी राजाओंके प्रतापको सहन नहीं करता है, सिंह राशिमें जिसका जन्म हुआ है, चञ्चल है, निर्दय है, जरा-जरा सी बातोंमें उछलकर शिरपर सवार होता है-असहनशील है, बुरे रोगोंसे घिरा हुआ है, दूसरेके कहे अनुसार चलता है, विषम मार्ग अन्याय मार्गमें चलता है, रक्तरुक्-जिसे खूनकी बीमारी है, जो सबके साथ द्वेष करता है, जिसकी तृष्णा बढ़ी हुई है और बिना क्रमके प्रत्येक कार्य में आगे आगे आता है, ऐसे अनेक दोषवाले राजाका लाइलाज रोगीकी तरह बुद्धिमान् मित्र और सज्जन गुरुके साथ होनेपर भी नाश होना ही है ॥ २६८-२७१॥
He, who is seen only with great difficulty, who scorches with his piercing rays, who has even set his own orb ablaze, who is the destroyer of the night-blooming lilies, whose rise brings suffering—or who bears a wicked son like Śani (Saturn), whom only the foolish praise, who is devoid of support and friendship, who cannot endure the brilliance of other celestial beings like the moon, who dwells in the fierce sign of Leo, who is restless, cruel, prone to leap rashly upon the head, who is diseased, dependent upon others, who moves upon a crooked, uneven path—the sky—
who emits blood-red rays, who brings blemish even when accompanied by the full moon and other celestial arts, who distorts the directions, and who is led not by feet but by the charioteer Aruṇa—
such a sun, despite being in the company of noble companions like Mercury (Budha) and Jupiter (Guru), perished like an incurable patient afflicted with countless ailments.
And rightly so—for who can even bear to look upon one so wicked? One who is harsh like an oppressive tax-collector, who torments even his own kin, who destroys the very globe of the earth like a consuming flame, who has an unworthy son, who is praised only by fools, who lacks loyal allies and firm foundation, who cannot tolerate the glory of other mighty rulers, who is fickle, merciless, quick to rage, who carries within himself dreadful maladies, who follows not his own will but the command of others, who walks the unjust and crooked path, whose hue is like diseased blood, who bears hostility toward all, whose desires are insatiable, and who thrusts himself forward in every matter without order.
Such a king—laden with innumerable faults—even when surrounded by wise counselors and virtuous guides, must inevitably fall, just as the sun sets, helpless in the face of his own defects.268 – 271
श्लोक 272 से 281
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 332 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 203 | श्लोक 204 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261

