आदिपुराण 31 पर्व सारांश
Summary of Ādi purāṇa Parv 31 by Acharya Jinasena
संक्षिप्त सारांश: आदिपुराण पर्व 31 (श्लोक 1 से 159)
चक्रवर्ती भरत उत्तर दिशा विजय के लिए विशाल घुड़सवार सेना के साथ निकले, जिनके अठारह करोड़ घोड़े सिन्धु नदी को प्रभावित करते हुए विजयार्थ पर्वत की ओर बढ़े। घोड़ों की गति, पराक्रम और शिक्षा की प्रशंसा हुई। सेना के शोर से वन के पशु भयभीत हो गुफाओं में छिपे। विजयार्थ पर्वत पर सेना ने पड़ाव डाला, जहाँ वन और लतागृहों ने आश्रय दिया। विजयार्थ देव ने भरत का अभिषेक किया, रत्न और आभूषण भेंट किए। कृतमाल देव ने भी सत्कार कर चौदह आभूषण दिए और गुफा द्वार खोलने का उपाय बताया। सेनापति ने दंडरत्न से गुफा द्वार खोला, म्लेच्छ खंड में प्रवेश कर राजाओं को वश किया, और रत्न व कन्याएँ भेंट में लीं। म्लेच्छ राजाओं ने भय सहित भरत को नमस्कार किया। भरत ने विजयार्थ पर्वत से छत्र, चमर, सिंहासन और अनुपम आभूषण प्राप्त किए, जो मेरु पर्वत के कल्पवृक्ष सा शोभित थे। पुण्य और दंडरत्न के बल पर समीपवर्ती राजाओं को जीता गया, और सेनापति को पुनः प्रधान सेनापति नियुक्त किया गया। यह खंड भरत के दिग्विजय, सेना की रणनीति, और प्रकृति के साथ सामंजस्य को दर्शाता है।
हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 31
श्लोक 1 से 11 : चक्रवर्ती भरत का उत्तर दिशा विजय अभियान
चक्रवर्ती भरत उत्तर दिशा को जीतने के लिए विशाल घुड़सवार सेना के साथ निकले। उनकी सेना के घोड़ों की गति, पराक्रम, शिक्षा और जाति को विशेषज्ञों ने पहचाना। घोड़े तेजी से मार्ग तय करते हुए धूल उड़ाते और छाया को तोड़ते प्रतीत होते थे। उनकी चंचलता केवल गति में थी, स्वभाव में स्थिरता थी। अठारह करोड़ उत्तम घोड़ों की सेना सिन्धु नदी को हानि पहुँचाती हुई आगे बढ़ी, जो मानो भरत के आगमन से संतुष्ट होकर उनकी सेवा कर रही थी।
श्लोक 12 से 21 : सिन्धु नदी और विजयार्थ पर्वत की ओर प्रस्थान
भरत ने सिन्धु नदी के किनारे-किनारे उत्तर दिशा के राजाओं को वश में करते हुए विजयार्थ पर्वत की ओर प्रस्थान किया। यह पर्वत मणियों के नौ शिखरों, हिलते वृक्षों, झरनों और वनों से सुशोभित था, मानो भरत का स्वागत करने को आतुर हो। पर्वत के वन फूलों की पराग और कोकिलों के शब्द से सजा था, जो भरत के सम्मान में प्रस्तुत प्रतीत होता था। सेना के आगमन से वन की भूमि दब गई, और पशु भयभीत हो गए।
श्लोक 22 से 31: सेना के प्रभाव से वन का क्षोभ
सेना के शोर से वन के पशु, जैसे श्वेत हाथी, सिंह, भैंसा, और छोटे जीव, भयभीत होकर गुफाओं में छिप गए। हरिण, सूअर और अन्य प्राणी अपने स्थान छोड़कर भागे। सेना के शांत होने पर ही पशु धीरे-धीरे अपने स्थानों पर लौटे। इस प्रकार, भरत की सेना का प्रभाव वन के प्राणियों पर गहरा पड़ा, और प्रकृति भी उनके आगमन से प्रभावित हुई।
श्लोक 32 से 41 : विजयार्थ पर्वत पर सेना का पड़ाव
सेना विजयार्थ पर्वत के पाँचवें कूट पर रुकी, जहाँ सेनापतियों ने वन में डेरे लगवाए। वन के सघन वृक्षों और लतागृहों ने सैनिकों को आश्रय दिया। वन में प्रवेश से सैनिकों का राग बढ़ा, जिससे वैराग्य की धारणा मूर्खतापूर्ण प्रतीत हुई। विजयार्थ पर्वत का स्वामी विजयार्थ देव भरत के दर्शन हेतु आया, जो शिखरों, हारों और कड़ों से सुशोभित था।
श्लोक 42 से 51: विजयार्थ देव द्वारा भरत का अभिषेक
विजयार्थ देव ने स्वयं को पर्वत का रक्षक और भरत का अनुयायी बताते हुए उनकी आज्ञा स्वीकार की। उन्होंने तीर्थजल से भरत का अभिषेक किया, जिसमें देवांगनाओं का नृत्य और किन्नरों के मंगलगीत शामिल थे। देव ने भरत को रत्न, छत्र, चमर और सिंहासन भेंट किए। प्रसन्न भरत ने देव को सम्मानित कर विदा किया।
श्लोक 52 से 61: विजयार्थ पर्वत की विजय और उत्तरार्ध की आकांक्षा
विजयार्थ पर्वत की विजय को दक्षिण भारत की विजय मानकर भरत ने चक्ररत्न की पूजा की। फिर भी, उत्तरार्ध जीतने की उनकी आकांक्षा बनी रही। सेना पर्वत की पश्चिम गुहा के समीप ठहरी, जहाँ भरत ने कई दिन बिताए। गंगा और सिन्धु के बीच के राजा उनके दर्शन को आए और भेंट स्वरूप रत्न आदि अर्पित किए।
श्लोक 62 से 71 : राजाओं का समर्थन और युद्ध की तैयारी
समीपवर्ती राजाओं ने भरत की सेना को भूसा और ईंधन प्रदान किया। कुरु देश के जयकुमार सहित अनेक राजा और योद्धा भरत के समर्थन में आए। म्लेच्छ राजाओं को जीतने के लिए धनुष-बाण और तलवारों से सुसज्जित सेना तैयार हुई। योद्धा शत्रुओं को हराने के लिए उत्साहित थे, और उनके कवच और शस्त्र युद्ध की तैयारी को दर्शाते थे।
श्लोक 72 से 81 : सेना की रचना और योद्धाओं का उत्साह
सेना के रथ शस्त्रों से भरे थे, और रथी योद्धा पैदल सैनिकों से श्रेष्ठ प्रतीत होते थे। राजाओं ने हाथियों और घुड़सवारों की रक्षा के लिए शूरवीर नियुक्त किए। विभिन्न व्यूह रचनाओं (दण्ड, मण्डल, भोग, असंहृत) के साथ सेना तैयार हुई। योद्धा परस्पर प्रेरणादायक बातें करते हुए भरत के कार्यों की महिमा और विजय की आकांक्षा व्यक्त करते थे। कुछ सैनिक पर्वत और नदियों की बाधाओं से चिंतित थे, पर उत्साह के साथ शिविर में पहुँचे।
श्लोक 82 से 91: विजयार्थ पर्वत पर सेना का एकत्रीकरण
चक्रवर्ती भरत के हिमवान् पर्वत तक विजय के उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए राजा लोग सामग्री से भरे कोठों के साथ निकले। अनेक सामंत अपनी सेनाओं के साथ भरत के समीप आए और उनकी जय-जयकार की। सामंतों के समूह से भरत की सेना समुद्र की तरह भर गई। विजयार्थ पर्वत सेनाओं से आच्छादित हो स्वर्ग सा सुशोभित हुआ। सेना के शब्दों से पर्वत शब्दमय हो गया, मानो गुफाओं से प्रतिध्वनि के साथ रो रहा हो।
श्लोक 92 से 101 : कृतमाल देव का आगमन और भरत का सत्कार
भरत ने आकाश में देदीप्यमान मुकुट और आभूषणों से सुशोभित कृतमाल देव को देखा, जो चम्पा की माला पहने कल्पवृक्ष सा प्रतीत होता था। भरत ने देव का सत्कार कर आसन प्रदान किया। कृतमाल देव ने विनयपूर्वक भरत की प्रशंसा की, उन्हें जगत का कल्याणकारी और देवों के प्रिय बताया। उन्होंने भरत के शासन, चक्ररत्न, और दंड नीति की महिमा का वर्णन किया, स्वयं को उनके समक्ष तुच्छ बताया।
श्लोक 102 से 111 : कृतमाल देव की भक्ति और सेवा
कृतमाल देव ने भरत को छह खंडों का शासक और ऐश्वर्यशाली बताया, उनकी कीर्ति और सरस्वती की स्वच्छंदता की प्रशंसा की। उन्होंने सेना के शब्दों से भयभीत होकर भरत की सेवा में आने की बात कही। देव ने स्वयं को विजयार्थ पर्वत का निवासी और मर्मज्ञ बताते हुए भरत के अधीन होने की घोषणा की, कहा कि उनकी जानकारी समस्त द्वीप और समुद्र तक फैली है।
श्लोक 112 से 121 : कृतमाल देव की सहायता और गुफा द्वार का उद्घाटन
कृतमाल देव ने भरत को सर्वत्र भ्रमण करने वाला और पर्वत का मर्मज्ञ बताया, फिर चौदह आभूषण भेंट किए। भरत ने हर्षित होकर सत्कार किया और देव को गुफा द्वार खोलने का उपाय बताने हेतु विदा किया। सेनापति को गुफा शांत होने तक पश्चिम खंड जीतने की आज्ञा दी गई। सेनापति दंडरत्न और अश्वरत्न के साथ गुफा की ओर बढ़ा, सिन्धु नदी की वेदी को पार कर विजयार्थ पर्वत की वेदिका पर पहुँचा।
श्लोक 122 से 131: गुफा द्वार का खुलना और म्लेच्छ खंड में प्रवेश
सेनापति ने दंडरत्न से गुफा द्वार पर प्रहार किया, जिससे द्वार खुला और गर्मी निकली। द्वार के किवाड़ चिल्लाते और पसीने से तर प्रतीत हुए। गुफा से निकला शब्द पर्वत के रोने सा लगा। सेनापति को गर्मी ने स्पर्श नहीं किया, और आकाश से फूल बरसे। वह सिन्धु नदी के पश्चिम तट की वेदिका को पार कर म्लेच्छ खंड में प्रवेश किया, जहाँ प्रजा घबरा गई और कुछ लोग भागने लगे।
श्लोक 132 से 141 : म्लेच्छ राजाओं का वशीकरण
सेनापति ने प्रजा को आश्वस्त किया और म्लेच्छ राजाओं को चक्रवर्ती की आज्ञा स्वीकार करने का आदेश दिया। बुद्धिमान लोगोंने आशीर्वाद के साथ आज्ञा स्वीकारी। सेनापति ने संधि-विग्रह जैसे उपायों से राजाओं को वश किया, कुछ को आवागमन रोककर और कुछ को दुख देकर अधीन किया। म्लेच्छों से कन्या और रत्न भेंट में लिए, जिन्हें धर्मक्रियाओं के अभाव में म्लेच्छ माना गया।
श्लोक 142 से 151 : सेनापति की वापसी और सत्कार
सेनापति म्लेच्छ खंड को वश कर म्लेच्छ राजाओं की सेना के साथ लौटा, मानो मूर्तिमान प्रताप हो। उसने सिन्धु नदी और विजयार्थ पर्वत की वेदिका को पार किया, गुफा की गर्मी शांत कर उसकी रक्षा का उपाय किया। वापसी पर राजाओं ने नगाड़ों के साथ उसका स्वागत किया। वह राजमार्ग से भरत के डेरे में पहुँचा, सभामंडप में नमस्कार कर सत्कार प्राप्त किया।
श्लोक 152 से 159 : म्लेच्छ राजाओं का समर्पण और भरत की महिमा
म्लेच्छ राजाओं ने भय सहित भरत को नमस्कार किया और रत्न भेंट किए। भरत ने उनका सत्कार कर विदा किया। दंडरत्न के बल पर विजयार्थ पर्वत के समीपवर्ती राजाओं को जीता गया। सेनापति को पुनः प्रधान सेनापति नियुक्त किया गया। भरत ने विजयार्थ पर्वत से छत्र, चमर, सिंहासन और अनुपम आभूषण प्राप्त किए, जो मेरु पर्वत के कल्पवृक्ष सा शोभित करते थे।
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आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena
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