आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
श्लोक 122 से 130 : हिमवान् की नदियाँ और दोष
हिमवान् पर्वत पद्म सरोवर से निकलने वाली गंगा, सिन्धु, और रोहितास्या नदियों को धारण करता था, जो उत्साह, मंत्र, और प्रभुत्व का प्रतीक थीं। इसके शिखर आकाश को कीलों से रोकते प्रतीत होते थे। देवों के आवास स्वर्ग सा शोभित थे। पर्वत का दोष यह था कि यह छोटे अगुरु वृक्षों को धारण करता था। यह भगवान् वृषभदेव की महिमा और विश्व-विस्तार से तुलनीय था। भरत ने इसकी प्रशंसा की और वृषभाचल देखने लौटे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 32 – Shlok 122 to 130
श्लोक ( Shlok ) 122
हृदस्यास्य पुरःप्रत्यक्तोरण द्वारनिर्गते । गङ्गासिन्धू महानद्यौ धत्तेऽयं धरणीधरः ॥१२२॥
यह पर्वत क्रमसे इस पद्मसरोवरके पूर्व तथा पश्चिम तोरणसे निकली हुई गङ्गा और सिन्धुनामकी महानदियोंको धारण करता है ।। १२२।।
In succession, this mountain embraces the great rivers, the Ganges and Sindhu, which emerge from the eastern and western gateways of the Padma lake.” (122)
श्लोक ( Shlok ) 123
सरितं रोहितास्यां च दधात्येष शिलोच्चयः । तदुदक्तोरण द्वारान्निः सृत्योदङ्मुखीं गताम् ॥१२३॥
तथा पद्म सरोवरके उत्तर तोरणद्वारसे निकलकर उत्तरकी ओर गई हुई रोहितास्या नदीको भी यह पर्वत धारण करता है ॥ १२३॥
This mountain also supports the Rohitāsyā river, which flows northward, emerging from the northern gateway of the Padma lake.” (123)
श्लोक ( Shlok ) 124
महापगाभिरित्याभिरलङ्घयाभिर्वभात्ययम् । तिसृभिः शक्तिभिः स्वं वा भूभृद्भावं विभावयन् ।।१२४।।
यह पर्वत इन अलंघ्य तीन महानदियोंसे ऐसा सुशोभित होता है मानो उत्साह, मन्त्र और प्रभुत्व इन तीन शक्तियोंसे अपना भूभृद्भाव अर्थात् राजा पना (पक्षमें पर्वतपना) ही प्रकट कर रहा हो ॥ १२४॥
“This mountain, graced by the presence of these three impassable great rivers, shines forth as though manifesting its sovereignty and dominion—its royal nature revealed through the powers of zeal, mantra, and might.” (124)
श्लोक ( Shlok ) 125
शिखरैरेष कृत्कीलः कीलयन्निव खाङ्गणम् । सिद्धाध्वानं रुणद्धीद्धेः पराध्यै रुद्धदिङ्मुखैः ॥१२५॥
देदीप्यमान तथा दिशाओंको व्याप्त करनेवाले अपने अनेक शिखरोंसे यह पर्वत ऐसा जान पड़ता है मानो आकाशरूपी आँगनको कीलोंसे युक्त कर देवोंका मार्ग ही रोक रहा हो ॥ १२५ ॥
“With its many radiant peaks spreading across the directions, this mountain appears as though it were barring the path of the gods, fastening the sky’s vast expanse with nails, as if to restrain their way.” (125)
श्लोक ( Shlok ) 126
‘परश्शतमिहाद्रीन्द्रे सन्त्यावासाः सुधाशिनाम् । येऽनल्पां कल्पजां लक्ष्मीं हसन्तीव स्वसंपदा ॥ १२६॥
इस पर्वतराजपर देवोंके अनेक आवास हैं जो कि अपनी शोभासे स्वर्गकी बहुत भारी शोभा की भी हंसी करते हैं ।॥ १२६॥
“Upon this king of mountains dwell many divine abodes, whose splendor mocks even the vast and resplendent glory of the heavens themselves.” (126)
श्लोक ( Shlok ) 127
इत्यनेकगुणेऽप्यस्मिन् दोषोऽस्त्येको महान्गिरौ। यत् पर्यन्तगतान्धत्ते गुरुरप्यगुरुद्रुमान् ॥१२७॥
इस प्रकार इस पर्वतमें अनेक गुण होनेपर भी एक बड़ा भारी दोष है और वह यह कि यह स्वयं गुरु अर्थात् बड़ा होकर भी अपने चारों ओर लगे हुए अगुरु द्रुम अर्थात् छोटे छोटे वृक्षोंको धारण करता है (परिहार पक्षमें अगुरु द्रुमका अर्थ अगुरु चन्दनके वृक्ष लेना चाहिये) ॥१२७।।
“Thus, though this mountain possesses many virtues, it bears a grave flaw: despite being great in itself, it cradles around it the humble trees of inferior sandalwood, as though it holds within its embrace the lesser, the unworthy.” (127)
श्लोक ( Shlok ) 128
अलंघ्यमहिमोदग्रो गरिमाक्रान्तविष्टयः । जगद्गुरोः पुरोराभामयं धत्ते धराधरः ॥१२८॥
यह पर्वत जगद्गुरु भगवान् वृषभदेवकी सदृशता धारण करता है क्योंकि जिस प्रकार भगवान् वृषभदेव अपनी अलंघ्य महिमासे उदग्र अर्थात् उत्कृष्ट हैं उसी प्रकार यह पर्वत भी अपनी अलंघ्य महिमासे उदग्र अर्थात् ऊँचा है और जिस प्रकार भगवान् वृषभदेवने अपनी गरिमा अर्थात् गुरुपने से समस्त विश्वको व्याप्त कर लिया था उसी प्रकार इस पर्वतने भी अपनी गरिमा अर्थात् भारीपनसे समस्त विश्वको व्याप्त कर लिया है। भावार्थ-जिस प्रकार भगवान् वृषभदेवका गुरुपना समस्त लोकमें प्रसिद्ध है उसी प्रकार इस पर्वतका भारीपना भी लोकमें प्रसिद्ध है, अथवा इस पर्वतने अपने विस्तारसे लोकका बहुत कुछ अंश व्याप्त कर लिया है ।॥ १२८॥
“This mountain bears a likeness to the Supreme Guru, Lord Vṛṣabhadeva, for just as Lord Vṛṣabhadeva, with his immeasurable glory, stands exalted and supreme, so too does this mountain, towering with its unassailable majesty. And just as Lord Vṛṣabhadeva, with his noble stature as the Guru, enveloped the entire world, so has this mountain, with its immense grandeur, permeated the earth. In essence, just as the Guruhood of Lord Vṛṣabhadeva is renowned across the realms, so too is the overwhelming might of this mountain, or rather, by its vastness, it has claimed a substantial part of the world.” (128)
श्लोक ( Shlok ) 129
इत्यस्थाद्रेः परां शोभां शंसत्युच्चैः पुरोधसि । प्रशशंस तमद्रीन्द्र सम्प्रीतो भरताधिपः ॥१२९।
इस प्रकार जब पुरोहित उस पर्वतकी उत्कृष्ट शोभाका वर्णन कर चुका तब भरतेश्वरने भी प्रसन्न होकर उस पर्वतकी प्रशंसा की ।। १२९।।
“Thus, when the priest had finished describing the unparalleled beauty of the mountain, Bharateśvara, in great joy, also praised its grandeur.” (129)
श्लोक ( Shlok ) 130
स्वभुक्तिक्षेत्रसीमानं सोऽभिनन्द्य हिमाचलम् । प्रत्यावृतत् प्रभुर्द्रष्टुं वृषभाद्रि कुतूहलात् ॥१३०॥
अपने उपभोग करने योग्य क्षेत्रकी सीमा स्वरूप हिमवान् पर्वतकी प्रशंसा कर महाराज भरत कुतूहलवश वृषभाचल को देखने को लिये लौटे ।।१३०।।
“After praising the majestic Himavān, the boundary of the realms fit for enjoyment, King Bharat, driven by curiosity, returned to behold the sacred Vṛṣabhācala.” (130)
श्लोक 131 से 141
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
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