आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लो
श्लोक 183 से 191 जयकुमार का युद्ध कौशल
जयकुमार ने वैद्य की तरह शत्रुओं का रक्त निकाला और तलवार से शत्रुरूपी शल्य को हटाया। उसके बाण धूमकेतु की तरह शत्रुओं की ध्वजाओं को नष्ट करते थे। उसने शत्रुओं को वंशहीन और पौरुषहीन कर दिया। शत्रु उसकी अग्नि को सहन न कर पतंगों की तरह उस पर टूट पड़े। हेमांगद जैसे राजकुमारों ने बाणों की वर्षा की, और रथों के घोड़े युद्ध में अग्नि की तरह दौड़े। दोनों सेनाओं के शस्त्र परस्पर टकराए, जिससे कोई भी शस्त्र शत्रु तक नहीं पहुँचा।क 1 से 11 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 183 to 191
श्लोक ( Shlok ) 183
“मण्डलाग्र समुत्सृष्टदुष्टास्त्रः शस्त्रकर्मवित् । जयो भिषजमन्वैर्यः शत्रुशल्यं समुद्धरन् ॥१८३॥
अथवा वह जयकुमार किसी अच्छे वैद्य या डाक्टरका अनुकरण कर रहा था क्योंकि जिस प्रकार वैद्य शस्त्रकी नोंकसे बिगड़ा हुआ खून निकाल देता है उसी प्रकार वह जयकुमार भी तलवारकी नोंकसे दुष्ट-शत्रुओंका खून निकाल रहा था, जिस प्रकार वैद्य शस्त्र चलानेकी क्रियाको जानता है उसी प्रकार वह जयकुमार भी शस्त्र चलानेकी क्रिया जानता था और वैद्य जिस प्रकार शल्यको निकाल देता है उसी प्रकार जयकुमार भी शत्रुरूपी शल्यको निकाल रहा था ॥१८३॥
Nay, Jayakumar seemed to imitate a skilled physician—for just as a healer draws out impure blood with the edge of a blade, so too did he, with the point of his sword, release the lifeblood of wicked foes. As the physician masters the art of wielding surgical instruments, so had Jayakumar mastered the art of arms, and as the surgeon removes a malignant growth, even so did he excise the enemy, that festering wound upon the world. 183
श्लोक ( Shlok ) 184
ध्वजस्योपरि धूमो वा तेनाकृष्टो” नु” सायकः । पपात तापमापाद्य सूचयन्नशुभं द्विषाम् ॥१८४॥
उसके द्वारा चलाये हुए बाण शत्रुओं को संताप उत्पन्नकर अशुभकी सूचना देते हुए धूमकेतुके समान उनकी ध्वजाओंपर पड़ रहे थे ॥ १८४॥
The arrows loosed by him struck the enemies’ banners like ominous comets, bringing affliction and foreboding with their fiery touch — dark heralds of doom blazing across the field of war.184
श्लोक ( Shlok ) 185
ध्वजदण्डान् समाखण्ड्य विद्विषो ऽन्वीत पौरुषान् । कुर्वन् सर्वान् स निर्वंशान् सोमवंशध्वजायते ॥१८५॥
उस समय शत्रुओंकी ध्वजाओंके दंडोंको खंड खंड कर सब शत्रुओं को पौरुत्रहीन तथा वंशरहित करता हुआ जयकुमार सोमवंशकी ध्वजाके समान आचरण कर रहा था ।। १८५॥
At that time, shattering the flagstaffs of the enemy into fragments and rendering his foes bereft of lineage and legacy, Jayakumar conducted himself like the very banner of the lunar race — upholding its glory by humbling all who opposed it.185
श्लोक ( Shlok ) 186
विच्छिन्नकेतवः केचित् क्षणं तस्थुर्मृता इव । प्राणैर्न प्राणिनः किन्नु मानप्राणा हि मानिनः ॥१८६॥
जिनकी पताकाएं छिन्नभिन्न हो गई हैं ऐसे कितने ही शत्रु क्षगभर के लिये मरे हुए के समान खड़े थे सो ठीक ही ह क्योंकि प्राणोंसे हीं प्राणी नहीं गिने जाते किन्तु अभिमानी मनुष्य अभिमानको ही प्राण समझते हैं ।॥१८६।।
Many enemies, their banners torn asunder, stood motionless for a moment—like men already dead. And rightly so, for life is not counted by breath alone; the proud hold their honor dearer than life itself, and to them, the fall of pride is the fall of being. 186
श्लोक ( Shlok ) 187
प्रज्वलन्तं जयन्तं ते जयं तं सोढुमक्षमाः । सह सर्वेऽपि सम्पेतुर भ्यग्नि शलभा यथा ॥१८७॥
अच्छी तरह जलते हुए और सबको जीतते हुए उस जयकुमारको सहन करनेके लिये असमर्थ होकर वे सब शत्रु उसपर इस प्रकार टूट पड़े मानो अग्निपर पतंगे ही पड़ रहे हों ।॥ १८७॥
Unable to endure the blazing brilliance and unconquered might of Jayakumar, all the enemies hurled themselves upon him — as helplessly and fatally as moths drawn to a flame.187
श्लोक ( Shlok ) 188 – 189
सन्नद्धस्यन्दनाश्चण्डास्तदा हेमाङ्गदादयः । कोदण्डास्फालनध्वाननिरुद्धहरितः क्रुधा ॥१८८ ॥ववर्षर्वह्वि वृष्टि वा बाणवृष्टिं प्रति द्विषः । यावते लक्ष्यतां’ ‘नेयुस्तावदाविष्कृतोद्यसाः ॥१८९॥
इतनेमें ही जिनके रथ तैयार हैं, जो बड़े क्रोधी हैं, जिन्होंने क्रोधसे धनुष खींचकर उनके शब्दोंसे सब दिशाएं भर दी हैं और शत्रु जबतक अपने लक्ष्यतक पहुंचने भी न पाये थे कि तबतक ही जिन्होंने अपना सब उद्यम प्रकट कर दिखाया है ऐसे हेमांगद आदि राजकुमार शत्रुओंपर अग्नि वर्षाके समान बाणोंकी वर्षा करने लगे ।।१८८-१८९।।
Just then, the princes—Hemāngad and others—whose chariots stood ready, whose hearts blazed with fury, drew their bows with such wrath that their twanging filled all quarters with thunderous sound. Before the enemies could even reach their mark, the princes had already unleashed the full force of their valor, showering arrows upon them like a rain of fire, scorching all in their path.188 – 189
श्लोक ( Shlok ) 190
निरुध्यानन्तसेनादिशरजालं रणार्णवे । स्यन्दताश्चोदयामासुः पोतान्वा वातरंहसः ॥१९०।।
वे अनन्तसेन आदिके बाणोंका समूह रोककर वायुके समान वेगवाले रथोंको रणरूपी समुद्रमें जहाजोंके समान दौड़ाने लगे ॥१९०॥
Fending off the torrent of arrows from Anantasena and his kin, they drove their swift chariots—fleet as the wind—through the ocean of battle, like mighty ships surging across a tempestuous sea.190
श्लोक ( Shlok ) 191
बलद्वयास्त्र संघट्टसमुत्पन्ना शुशुक्षणिम्’ । “पेतुर्वाहाः परं तेजस्तेजस्वी सहने कथम् ॥१९१॥
वे रथोंके घोड़े दोनों सेनाओं सम्बन्धी शस्त्रोंके संघट्टनसे उत्पन्न हुई अग्निपर पड़ रहे थे सो ठीक ही है क्योंकि तेजस्वी मनुष्य दूसरेका तेज कैसे सह सकता है ? ॥ १९१॥
The chariot-horses leapt into the flames born of the clash of weapons from both armies — and rightly so, for how can the radiant endure the brilliance of another? The proud-hearted will ever rush into fire, but never yield to another’s glory.191
श्लोक 192 से 203
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