Hindi Translation of Adi purana Parv 41
श्लोक 1 से 11 भरत के स्वप्न और विचार
अथानन्तर-कितना ही काल बीत जानेपर एक दिन चक्रवर्ती भरतने अद्भुत फल दिखानेवाले कुछ स्वप्न देखे ।।१।। उन स्वप्नोंके देखनेसे जिन्हें चित्तमें कुछ खेद-सा उत्पन्न हुआ है ऐसे वे भरत अचानक जाग पड़े और उन स्वप्नोंके फलका इस प्रकार विचार करने लगे ॥२॥ कि ये स्वप्न मुझे प्रायः बुरे फल देनेवाले जान पड़ते हैं तथा साथमें यह भी जान पड़ता है कि ये स्वप्न कुछ दूर आगेके पंचम कालमें फल देनेवाले होंगे ॥ ३ ।। क्योंकि इस समय भगवान् वृषभदेवके प्रकाशमान रहते हुए प्रजाको इस प्रकारका उपद्रव होना कैसे संभव हो सकता है? ।४।। इसलिये कदाचित् इस कृतयुग (चतुर्थकाल) के व्यतीत हो जानेपर जब पाप की अधिकता होने लगेगी तब ये स्वप्न अपना फल देंगे ।।५।। युगके अन्तमें विप्लव फैलाना ही जिनका फल है ऐसे ये स्वप्न अनिष्टको सूचित करनेवाले हैं और राजा तथा प्रजा दोनोंको समान फल देनेवाले हैं ।।६।। जिस प्रकार चन्द्रमा और सूर्यके बिम्बसे उत्पन्न होनेवाली विक्रिया से प्रकट हुआ फल जगत्के जीवोंको समानरूपसे उठाने पड़ते हैं उसी प्रकार मेरे द्वारा देखे हुए स्वप्नोंके फल भी समस्त जीवोंको सामान्यरूपसे उठाने पड़ेंगे ।।७।। इस प्रकार हमारा यह अनुमान केवल स्थूल पदार्थका चिन्तवन करनेवाला है, सूक्ष्म तत्त्वकी प्रतीति प्रत्यक्ष ज्ञानसे ही हो सकती है ।।८।। केवलज्ञानरूपी सूर्यको छोड़कर और कोई पदार्थ संशयरूपी अन्धकार को भेदन करनेवाला नहीं है सो ठीक ही है क्योंकि सूर्यको छोड़कर ऐसा कौन है जो रात्रिका अन्धकार नष्ट कर सके ।॥९॥ तत्त्वोंका वास्तविक स्वरूप दिखलानेवाले भगवान् वृषभदेवके रहते हुए मुझे बुद्धिका भ्रम क्यों होना चाहिये, भला दर्पणके रहते हुए ऐसा कौन पुरुष है जो हाथके स्पर्शसे मुखकी सुन्दरता देखे ? ।।१०-११।।
श्लोक 12 से 21 भरत का समवसरण की ओर प्रस्थान
इसलिये इस विषय में भगवान्के मुखरूपी मङ्गल दर्पणको देखकर ही मुझे स्वप्नोंके यथार्थ रहस्यका निर्णय करना उचित है और वहीं खोटे स्वप्नोंका शान्तिकर्म करना भी उचित है ॥१२॥ इसके सिवाय मैंने जो ब्राह्मण लोगोंकी नवीन सृष्टि की है उसे भी भगवान्के चरणोंके समीप जाकर निवेदन करना चाहिये ।।१३।। फिर अच्छे पुरुषोंका यह कर्तव्य भी है कि वे प्रतिदिन गुरुओंके दर्शन करें, उनसे अपना हित अहित पूछा करें और बड़े वैभवसे उनकी पूजा किया करें ।।१४।। इस प्रकार मनमें विचारकर महाराज भरतने बड़े सबेरे बहुमूल्य शय्यासे उठकर प्रातःकालकी समस्त क्रियाएं कीं और फिर थोड़ी देरतक सभा में बैठकर अनेक राजाओंके साथ भगवान्की वन्दना तथा भक्तिके अर्थ जानेके लिये उद्यम किया ।।१५।। जो साथ ही साथ उठकर खड़े हुए कुछ परिमित मुकुटबद्ध राजाओंसे घिरे हुए हैं और उत्कृष्ट विभूतिसे सहित हैं ऐसे महाराज भरतने वन्दनाके लिये प्रस्थान किया ।।१६।। तदनन्तर सेना सहित सम्राट् भरत शीघ्र ही वहां पहुंच गये जहां जगद्-गुरु भगवान् विराजमान थे ।।१७।। दूरसे ही भगवान्के समवसरणकी भूमिको देखते हुए निधियोंके स्वामी भरतने नम्त्रीभूत मस्तकपर कमलकी बौंड़ीके समान जोड़े हुए दोनों हाथ रखकर नमस्कार किया ।।१८।। उन महाराजने पहले उस समवसरण भूमिके बाहरी भागकी प्रदक्षिणा दी और फिर अनेक प्रकारकी कक्षाओंका उल्लंघन कर भीतर प्रवेश किया ।।१९।। मानस्तम्भ, महाचैत्यवृक्ष, सिद्धार्थवृक्ष और पूजाकी सामग्रीसे पूजित स्तूपोंको देखते हुए उन सबको उल्लंघन करते गये ।।२०।। अपने अपने निश्चित स्थानोंपर चारों प्रकारकी वनकी पंक्तियों, ध्वजाओं और हर्म्यावलीको देखते हुए उन्होंने उन कक्षाओंका उल्लंघन किया ॥२१॥
श्लोक 22 से 31 समवसरण में पूजा और भक्ति
समवसरणकी प्रत्येक कक्षामें होनेवाले देवांगनाओंके मनोहर गीत और नृत्योंसे जिनके चित्त-की वृत्ति अनुरक्त हो रही है ऐसे महाराज भरतको बहुत ही संतोष हो रहा था ।। २२ ।। तदनन्तर बहुत ऊंचे गोपुर दरवाजोंके मार्गसे उन्होंने जहां गणधरदेव विराजमान थे और जो श्रीमंडपसे सुशोभित हो रही थी एसी सभाभूमिमें प्रवेश किया ।। २३ ।। वहांपर तीन कटनीवाले पीठकी प्रथम कटनीपर चढ़कर धर्मचक्रकी पूजा करते हुए प्रदक्षिणा दी ।॥ २४॥ तदनन्तर चक्रवर्ती दूसरी कटनीपर महाध्वजाओंकी पूजा कर तीनों जगत्की लक्ष्मीको तिरस्कृत करनेवाली गन्ध-कुटीके पास जा पहुंचे ।। २५ ।। वहांपर भक्तिसे भरे हुए भरतने देव, दानव, गन्धर्व, सिद्ध और विद्याधर आदिके द्वारा पूज्य भगवान् वृषभदेवको देखकर उन्हें नमस्कार किया ।।२६।। महा-राज भरत उन भगवान्की अनेक स्तोत्रोंके द्वारा स्तुति कर और विधिपूर्वक पूजा कर धर्मरूप अमृतके पीनेकी इच्छा करते हुए योग्य स्थानपर जा बैठे ।। २७।। भक्तिपूर्वक भगवान्के चरण-कमलोंको प्रणाम करते हुए भरतके परिणाम इतने अधिक विशुद्ध हो गये थे कि उनके उसी समय अवधिज्ञान उत्पन्न हो गया ।॥२८॥ तदनन्तर धर्मरूपी अमृतका पान कर वे बहुत ही संतुष्ट हुए और उच्च स्वरसे अपने हृदयका अभिप्राय भगवान्से इस प्रकार निवेदन करने लगे ॥२९।। कि हे भगवन्, मैंने आपके द्वारा कहे हुए उपासकाध्याय सूत्रके मार्गपर चलनेवाले तथा श्रावकाचारमें निपुण ब्राह्मण निर्माण किये हैं अर्थात् ब्राह्मण वर्णकी स्थापना की है ।॥३०॥ हे विभो, मैंने इन्हें ग्यारह प्रतिमाओंके विभागसे व्रतोंके चिह्न स्वरूप एकसे लेकर ग्यारह तक यज्ञोपवीत दिये हैं ।॥३१॥
श्लोक 32 से 41 भरत का प्रश्न और स्वप्नों का वर्णन
हे प्रभो, समस्त धर्मरूपी सृष्टिको साक्षात् उत्पन्न करनेवाले आपके विद्यमान रहते हुए भी मैंने अपनी बड़ी मूर्खतासे यह काम किया है ।। ३२ ।। हे देव, इन ब्राह्मणों की रचनामें दोष क्या है? गुण क्या है ? और इनकी यह रचना योग्य हुई अथवा नहीं ? इस प्रकार भूलाके समान भूलते हुए मेरे चित्तको किसी निश्चयमें स्थिर कीजिये अर्थात् गुण, दोष, योग्य अथवा अयोग्यका निश्चयकर मेरा मन स्थिर कीजिये ॥३३॥ इसके सिवाय हे देव, आज मैंने रात्रिके अन्तिमभागमें सोलह स्वप्न देखे हैं और मुझे ऐसा जान पड़ता है कि ये स्वप्न प्रायः अनिष्ट फल देनेवाले हैं ।॥ ३४॥ हे परमेश्वर, वे स्वप्न मैंने जिस प्रकार देखे हैं उसी प्रकार उपस्थित करता हूं। उनका जैसा कुछ फल हो उसे मेरी प्रतीतिका विषय करा दीजिए ॥३५॥ (१) सिंह, (२) सिंहका बच्चा, (३) हाथीके भारको धारण करनेवाला घोड़ा, (४) वृक्ष, लता और झाड़ियोंके सूखे पत्ते खानेवाले बकरे, (५) हाथी के स्कन्धपर बैठे हुए वानर, (६) कौआ आदि पक्षियोंके द्वारा उपद्रव किये हुए उलूक, (७) आनन्द करते हुए – भूत, (८) जिसका मध्यभाग सूखा हुआ है और किनारोंपर खूब पानी भरा हुआ है ऐसा तालाब, (९) धूलिसे धूसरित रत्नोंकी राशि, (१०) जिसकी पूजा की जा रही है ऐसा नैवेद्यको खाने-वाला कुत्ता, (११) जवान बैल, (१२) मण्डलसे युक्त चन्द्रमा, (१३) जो परस्परमें मिल रहे हैं और जिनकी शोभा नष्ट हो रही है ऐसे दो बैल, (१४) जो दिशारूपी स्त्रीरत्नों के से बने हुए आभूषणके समान है तथा जो मेघोंसे आच्छादित हो रहा है ऐसा सूर्य, (१५) छाया-रहित सूखा वृक्ष और (१६) पुराने पत्तोंका समूह। हे ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ, आज मैने रात्रिके समय ये सोलह स्वप्न देखे हैं। हे नाथ, इनके फलके विषयमें जो मुझे संदेह है, उसे दूर कर दीजिये ॥३६-४१।।
श्लोक 42 से 51 वृषभदेव का व्याख्यान और ब्राह्मण सृष्टि का दोष
यद्यपि निधियोंके अधिपति महाराज भरत अपने अवधिज्ञानके द्वारा उन स्वप्नोंका फल जानने में निपुण थे तथापि सभाके लोगोंको समझानेके लिये उन्होंने भगवान् से इस प्रकार पूछा था ।।४२।। भरतका प्रश्न समाप्त होनेपर जगद्गुरु भगवान् वृषभदेव अपने वचनरूपी अमृतके सिंचनसे समस्त सभाको संतुष्ट करते हुए इस प्रकार व्याख्यान करने लगे ॥४३॥ उस समय भगवान्की दिव्य ध्वनिके अर्थको सुननेकी इच्छा से सावधान हुई वह सभा ऐसी जान पड़ती थी मानो ध्यानमें मग्न हो रही हो अथवा चित्रकी बनी हुई हो ॥४४॥ वे कहने लगे कि हे वत्स, तूने जो धर्मात्मा द्विजोंकी पूजा की है सो बहुत अच्छा किया है परन्तु इसमें कुछ दोष है उसे तू सुन ॥ ४५॥ हे आयुष्मन्, तूने जो गृहस्थोंकी रचना की है सो जबतक कृतयुग अर्थात् चतुर्थकालकी स्थिति रहेगी तबतक तो ये उचित आचारका पालन करते रहेंगे परन्तु जब कलियुग निकट आ जायगा तब ये जातिवादके अभिमानसे सदाचारसे भ्रष्ट होकर समीचीन मोक्ष-मार्गके विरोधी बन जावेंगे ।।४६।। पंचम कालमें ये लोग, हम सब लोगोंमें बड़े हैं, इस प्रकार जातिके मदसे युक्त होकर केवल धनकी आशासे खोटे खोटे शास्त्रोंके द्वारा लोगोंको मोहित करते रहेंगे ॥४७॥ सत्कारके लाभसे जिनका गर्व बढ़ रहा है और जो मिथ्या मदसे उद्धत हो रहे हैं ऐसे ये ब्राह्मण लोग स्वयं मिथ्या शास्त्रोंको बना बनाकर लोगोंको ठगा करेंगे ॥४८॥ जिनकी चेतना पापसे दूषित हो रही है ऐसे ये मिथ्यादृष्टि लोग इतने समय तक विकारभावको प्राप्त होकर धर्मके द्रोही बन जायेंगे ।॥५०॥ जो प्राणियोंकी हिंसा करनेमें तत्पर हैं तथा मधु और मांसका भोजन जिन्हें प्रिय है ऐसे ये अधर्मी ब्राह्मण हिंसारूप धर्मकी घोषणा करेंगे ।।५१।।
श्लोक 52 से 61 ब्राह्मण सृष्टि का भविष्य और स्वप्नों का प्रकार
खेद है कि दुष्ट आशयवाले ये ब्राह्मण अहिंसारूप धर्मको दूषित कर वेदमें कहे हुए हिंसारूप धर्मको पुष्ट करेंगे ।। ५२ ।। पापका समर्थन करनेवाले, शास्त्रको जानने वाले अथवा पापके चिह्नस्वरूप यज्ञोपवीतको धारण करनेवाले और प्राणियोंके मारनेमें सदा तत्पर रहनेवाले ये धूर्त ब्राह्मण आगामी युग अर्थात् पंचम कालमें समीचीन मार्गके विरोधी हो जायेंगे ।।५३।। इसलिये यह ब्राह्मणोंकी रचना यद्यपि आज दोष उत्पन्न करनेवाली नहीं है तथापि आगामी कालमें खोटे पाखण्ड मतोंकी प्रवृत्ति करनेसे दोषका बीजरूप है ।।५४।। इस प्रकार यद्यपि यह ब्राह्मगोंकी सृष्टि कालान्तर में दोषका बीजरूप है तथापि धर्म सृष्टिका उल्लंघन न हो इसलिये इस समय इसका परिहार करना भी अच्छा नहीं है ।।५५।। जिस प्रकार खाया हुआ अन्न यद्यपि कहीं किसीको दोष उत्पन्न कर देता है तथापि अनेक गुणोंकी आस्थासे विद्वान् लोग उसे छोड़ नहीं सकते उसी प्रकार यद्यपि ये पुरुषोंके अभिप्रायोंकी विष-मतासे आगामी कालमें दोष उत्पन्न करनेवाले हो जावेंगे तथापि इस समय इन्हें गुणवान् ही मानना चाहिये ।।५६-५७।। इस प्रकार यह तेरी ब्राह्मण रचनाका उत्तर तो हो चुका, अब तूने जो स्वप्न देखे हैं, खेद है, कि वे भी आगामी युग (पंचम काल) में धर्मकी स्थितिके हासको सूचित करनेवाले हैं ॥५८॥ वे स्वप्न दो प्रकारके माने गये हैं एक अपनी स्वस्थ अवस्थामें दिखनेवाले और दूसरे अस्वस्थ अवस्थामें दिखनेवाले । जो धातुओंकी समानता रहते हुए दिखते हैं वे स्वस्थ अवस्थाके कहलाते हैं और जो धातुओंकी विषमता-न्यूनाधिकता रहते हुए दिखते हैं वे अस्वस्थ अवस्थाके कहलाते हैं ।॥ ५९।। स्वस्थ अवस्थामें दिखनेवाले स्वप्त सत्य होते हैं और अस्वस्थ अवस्थामें दिखनेवाले स्वप्न असत्य हुआ करते हैं इस प्रकार स्वप्नों-के फलका विचार करनेमें यह जगत्प्रसिद्ध बात है ऐसा तू समझ ॥६०॥ स्वप्नोंके और भी दो भेद हैं एक दोषसे उत्पन्न होनेवाले और दूसरे दैवसे उत्पन्न होनेवाले । उनमें दोषोंके प्रकोप-से उत्पन्न होनेवाले झूठ होते हैं और दैवसे उत्पन्न होनेवाले सच्चे होते हैं ।। ६१।।
श्लोक 62 से 71 स्वप्नों का फल (भाग 1)
हे कल्याणरूप, चूँकि तू अवश्य ही देवताओंसे अधिष्ठित है इसलिये तेरे ये स्वप्न मिथ्या नहीं हैं। तू इनका फल मुझसे समझ ।। ६२ ।। तूने जो स्वप्नमें इस पृथ्वीपर अकेले विहार कर पर्वतकी शिखरपर चढ़ हुए तेईस सिंह देखे हैं उसका स्पष्ट फल यही समझ कि श्रीमहावीर स्वामीको छोड़कर शेष तेईस तीर्थङ्करोंके समयमें दुष्ट नयोंकी उत्पत्ति नहीं होगी। इस स्वप्नका फल यही बत-लाता है ।॥६३-६४।। तदनन्तर दूसरे स्वप्नमें अकेले सिंहके बच्चे के पीछे चलते हुए हरिणोंका समह देखनेसे यह प्रकट होता है कि श्री महावीर स्वामीके तीर्थमें परिग्रहको धारण करनेवाले बहुतसे कुलिङ्गी हो जावेंगे ॥ ६५॥ बड़े हाथीके उठाने योग्य बोझसे जिसकी पीठ झुक गई है ऐसे घोड़े के देखनेसे यह मालूम होता है कि पंचम कालके साधु तपश्चरणके समस्त गुणोंको धारण करनेमें समर्थ नहीं हो सकेंगे ॥ ६६।। कोई मूलगुण और उत्तरगुणोंके पालन करनेकी प्रतिज्ञा लेकर उनके पालन करनेमें आलसी हो जायेंगे, कोई उन्हें मूलसे ही भंग कर देंगे और कोई उनमें मन्दता या उदासीनताको प्राप्त हो जायेंगे ॥ ६७।। सूखे पत्ते खानेवाले बकरोंका समूह देखनेसे यह मालूम होता है कि आगामी कालमें मनुष्य सदाचारको छोड़कर दुराचारी हो जायेंगे ॥ ६८।। गजेन्द्र के कंधेपर चढ़ हुए वानरोंके देखनेसे जान पड़ता है कि आगे चलकर प्राचीन क्षत्रिय वंश नष्ट हो जायेंगे और नीच कुलवाले पृथ्वीका पालन करेंगे ।।६९।। कौवोंके द्वारा उलूकको त्रास दिया जाना देखनेसे प्रकट होता है कि मनुष्य धर्मकी इच्छासे जैनमुनियों-को छोड़कर अन्य मतके साधुओंके समीप जायेंगे ।।७०।। नाचते हुए बहुतसे भूतोंके देखनेसे मालूम होता है कि प्रजाके लोग नामकर्म आदि कारणोंसे व्यन्तरोंको देव समझकर उनकी उपासना करने लगेंगे ॥७१॥
श्लोक 72 से 81 स्वप्नों का फल (भाग 2)
जिसका मध्यभाग सूखा हुआ है ऐसे तालाबके चारों ओर पानी भरा हुआ देखनेसे प्रकट होता है कि धर्म आर्यखण्डसे हटकर प्रत्यन्तवासी-म्लेच्छ खण्डोंमें ही रह जायगा ।॥७२॥ धूलिसे मलिन हुए रत्नोंकी राशिके देखनेसे यह जान पड़ता है कि पंचमकालमें ऋद्धिधारी उत्तम मुनि नहीं होंगे ।। ७३।। आदर-सत्कारसे जिसकी पूजा कीगई है ऐसे कुत्तेको नैवेद्य खाते हुए देखनेसे मालूम होता है कि व्रतरहित ब्राह्मण गुणी पात्रोंके समान सत्कार पायेंगे ॥ ७४।। ऊंचे स्वरसे शब्द करते हुए तरुण बैलका विहार देखनेसे सूचित होता है कि लोग तरुण अवस्थामें ही मुनिपदमें ठहर सकेंगे, अन्य अवस्थामें नहीं ।॥७५॥ परि-मण्डलसे घिरे हुए चन्द्रमाके देखनेसे यह जान पड़ता है कि पंचमकालके मुनियोंमें अवधिज्ञान और मनःपर्यय ज्ञान नहीं होगा ।। ७६।। परस्पर मिलकर जाते हुए दो बैलोंके देखनेसे यह सूचित होता है कि पंचमकालमें मुनिजन साथ साथ रहेंगे, अकेले विहार करनेवाले नहीं होंगे ॥७७॥ मेवोंके आवरणसे रुके हुए सूर्यके देखनेसे यह मालूम होता है कि पंचमकालमें प्रायः केवल-ज्ञानरूपी सूर्यका उदय नहीं होगा ।। ७८ ।। सूखा वृक्ष देखनेसे सूचित होता है कि स्त्री-पुरुषों-का चारित्र भ्रष्ट हो जायगा और जीर्ण पत्तोंके देखनेसे मालूम होता है कि महाऔषधियोंका रस नष्ट हो जायगा ॥७९॥ ऐसा फल देनेवाले इन स्वप्नोंको तू दूरविपाकी अर्थात् बहुत समय बाद फल देनेवाले समझ इसलिये इनसे इस समय कोई दोष नहीं होगा, इनका फल पञ्चम-कालमें होगा ॥८०॥ हे वत्स, इस प्रकार मुझसे इन स्वप्नोंका यथार्थ फल जानकर तू समस्त विघ्नोंकी शान्तिके लिये धर्ममें अपनी बुद्धि कर ॥८१॥
श्लोक 82 से 91 भरत का शांति कर्म और घंटा स्थापना
वर्णाश्रमकी रक्षा करनेवाले भरतने गुरुदेवके उपर्युक्त वचन सुनकर संदेहरूपी कीचड़के नाश होनेसे अपना चित्त निर्मल किया ॥८२॥ वे भगवान्को बार बार प्रणाम कर तथा बार बार उनसे पूछकर गुरुदेवके अनुग्रहसे प्रसन्न होते हुए बड़ी कठिनाईसे वहाँसे लौटे ॥८३॥ तदनन्तर नगरके लोग आनन्दके साथ जिनका अभिनन्दन कर रहे हैं ऐसे उन महाराज भरतने जिसमें जगह जगह तोरण बाँधे गये हैं और जो पताकाओंकी पंक्तियोंसे भरा हुआ है ऐसे अयोध्या नगरमें प्रवेश कर खोटे स्वप्नोंसे होनेवाले अनिष्टकी शान्तिके लिये जिनेन्द्रदेवका अभिषेक करना, उत्तम पात्रको दान देना आदि पुण्य क्रियाओंसे शान्ति कर्म किया ॥ ८४-८५।। उन्होंने गायके दूधसे पृथिवीका सिंचन किया, मषियोंकी पूजा की, बड़े बड़े दान दिये और प्रेमीजनोंको संतुष्ट किया ॥८६॥ तद-नन्तर उन्होंने बहुमूल्य रत्नोंसे बने हुए, सुवर्णकी रस्सियोंसे बँधे हुए और जिनेन्द्रदेवकी प्रति-माओंसे सजे हुए बहुतसे घंटे बनवाये तथा ऐसे ऐसे चौबीस घंटे बाहरके दरवाजेपर, राजभवन के महाद्वारपर और गोपुर दरवाजोंपर अनुक्रमसे टँगवा दिये ।।८७-८८।। जब वे चक्रवर्ती उन दरवाजोंसे बाहर निकलते अथवा भीतर प्रवेश करते तब मुकुटके अग्रभागपर लगे हुए घंटाओंसे उन्हें चौबीस तीर्थ करोंका स्मरण हो आता था। तदनन्तर स्मरणकर उन अरहन्तदेवकी प्रतिमाओंको वे नमस्कार करते थे इस प्रकार पुण्यरूप बुद्धिको धारण करनेवाले महाराज भरत निकलते और प्रवेश करते समय अरहन्तदेवकी पूजा करते थे ।।८९-९०।। सूत्र अर्थात् रस्सियोंसे सम्बन्ध रखनेवाले वे परमेष्ठियोंके घंटा ऐसे अच्छे जान पड़ते थे मानो उत्तम उत्तम अर्थोसे भरी हुई और सूत्र अर्थात् आगम वाक्योंसे सम्बन्ध रखनेवाली ग्रन्थोंकी सुन्दर टीकाएं ही हों ।।९१।।
श्लोक 92 से 101 वंदनमाला और धर्मप्रिय प्रजा
महाराज भरत स्वयं तीनों लोकों के चूड़ामणि थे उनके मस्तक पर लगे हुए वे लोकत्रिय घंटा ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो जिनेन्द्रदेवके चरणोंकी छाया ही हो ॥९२॥ निधियों के स्वामी भरतने अर्हन्तदेवकी वन्दनाके लिये जो घंटा रत्नोंके तोरणों-की रचनामें स्थापित किये थे उन्हें देखकर अन्य लोग भी उनका आदर करने लगे थे अर्थात् अपने अपने दरवाजेके तोरणोंकी रचनामें घंटा लगवाने लगे थे। उसी समयसे नगरवासी लोगोंने भी अपने अपने घरकी तोरणमालाओं में अपने अपने वैभवके अनुसार जिनप्रतिमा आदि सामग्रीसे युक्त घंटा बाँधे थे ॥९३-९४।। उस समय प्रथमराजा भरतकी बनाई हुई इस सृष्टिको प्रजाके लोगोंने बहुत माना था, यही कारण है कि आज भी प्रत्येक घरपर बन्दन मालाएं दिखाई देती हैं ।॥ ९५।। चूँकि भरतेश्वरने वे मालाएं अरहन्तदेवकी बन्दनाके लिये बनवाई थीं इसलिये ही वे वन्दनमाला नाम पाकर पृथिवीमें प्रसिद्धिको प्राप्त हुई हैं ।।९६।। यदि राजा धर्मात्मा होता है तो प्रजा भी धर्मात्मा होती है और राजा धर्मात्मा नहीं होता है तो प्रजा भी धर्मात्मा नहीं होती है, यह नियम है कि जैसा राजा होता है वैसी ही प्रजा होती है ।।९७।। उस समय कालके प्रभावसे प्रायः सभी लोग धर्मप्रिय थे सो ठीक ही है क्योंकि सदाचारी भरतके राजा रहते हुए सब लोग अपना हित करनेमें लगे हुए थे ॥ ९८।। उस समय अच्छा राजा और अच्छी प्रजा दोनों ही एक साथ मिल गये थे इसलिये राजाके अनुरोधसे प्रजा धर्मत्रिय हो गई थी ।।९९।। यह सम्राट् स्वयं धर्मप्रिय है और धर्मात्मा लोगोंका सन्मान करता है यही मानकर उस समय लोग धर्ममें प्रीति करने लगे थे ॥१००॥ वह चक्रवर्ती धर्मविजयी था, सदाचारी था, पवित्र था और बलिष्ठ था इसलिये ही वह अपनेपर प्रेम रखनेवाली प्रजामें धार्मिक क्रियाओंका आदर करता था अर्थात् प्रजाको धार्मिक क्रियाएं करनेका उपदेश देता था ॥१०१।।
श्लोक 102 से 111 भरत का गृहस्थ धर्म
‘भरत धर्ममें तत्पर है और हम लोग उसके सेवक हैं’ यही समझकर मुकुटबद्ध राजा उनके आचरणका अनुसरण करते थे। भावार्थ अपने राजाको धर्मात्मा जानकर आश्रित राजा भी धर्मात्मा बन गये थे ।। १०२ ।। चक्रके प्रभावसे अर्थ और काम दोनों ही जिनके स्वा-धीन हो रहे हैं ऐसे चक्रवर्ती भरत अर्थ और कामकी सफलता होनेपर केवल धर्ममें ही एकाग्रता को प्राप्त हो रहे थे ॥ १०३॥ दान देना, पूजा करना, शील पालन करना और पर्वके दिन उपवास करना यह गृहस्थोंका चार प्रकारका धर्म माना गया है ।। १०४।। नव प्रकारके पुण्य और सात गुणोंसे सहित भरत उत्तम मुनियोंके लिये बड़े आदरके साथ दान देते थे ।॥१०५।। वे विशुद्ध आहार, योग्यतानुसार औषधि और समस्त प्राणियोंके लिये अभय दान देते थे सो ठीक ही है क्योंकि दानकी यही तीन गति हैं ।॥१०६।। संसारमें पूज्य पुरुषोंकी पूजा करनेसे पूज्यपना स्वयं प्राप्त हो जाता है ऐसा विचार करते हुए महाराज भरत जिनेन्द्रदेवमें अपनी भक्ति बढ़ाते हुए उनकी पूजा करनेमें बहुत ही संतोष धारण करते थे ॥ १०७।। उन्होंने अनेक जिनविम्ब और जिनमन्दिरोंकी रचना कराकर कल्पवृक्ष नामका बहुत बड़ा यज्ञ (पूजन) किया था ।।१०८।। उनके मनमें शीलकी रक्षा करनेका प्रयत्न सदा विद्यमान रहता था सो ठीक ही है क्योंकि प्रयत्नपूर्वक रक्षा किया हुआ शील आत्माकी रक्षा करता है ।।१०९।। व्रतों-का पालन करना शील कहलाता है और स्थूलहिंसाका त्याग करना (अहिंसाणु व्रत) आदि जो गृहस्थोंके व्रत हैं वे लक्षणोंके साथ पहले कहे जा चुके हैं ।। ११०।। उन व्रतोंको भावनाओं सहित यथायोग्य रीतिसे पालन करते हुए प्रजापालक महाराज भरत गृहस्थोंमें मुख्य गिने जाते थे ॥१११।।
श्लोक 112 से 121 भरत की धार्मिक दिनचर्या
वे पर्वके दिन उपवासकी प्रतिज्ञा लेकर चित्तको स्थिर कर सामायिक करते हुए जिनमन्दिरमें ही रहते थे और उस समय ठीक मुनियोंका आचरण धारण करते थे ।।११२।। जिनेन्द्रदेवका स्मरण करने में वे समाधानको प्राप्त हो रहे थे उनका चित्त स्थिर हो रहा था और आश्चर्य है कि शरीरके बन्धन शिथिल होनेसे उनके आभूषण भी निकल पड़े थे ।॥११३॥ यद्यपि उन्हें बहुत पदार्थोंकी चिन्ता करनी पड़ती थी तथापि उनके धर्मकी चिन्ता अत्यन्त दृढ थी सो ठीक ही है क्योंकि धर्मकी चिन्ता करनेपर चिन्ता करने योग्य समस्त पदार्थोंका चिन्तवन अपने आप हो जाता है ।। ११४।। बड़े भारी फल देनेवाले पुण्यकर्म के उदयसे जिन्हें अनेक संपदाएं प्राप्त हुई हैं ऐसे भरतकी समस्त क्रियाओंका प्रारम्भ धर्मके चिन्तवनपूर्वक ही होता था अर्थात् महाराज भरत समस्त कार्योंके प्रारम्भमें धर्मका चिन्तवन करते थे ।।११५।। वे प्रातःकाल आंख खोलकर जब समस्त दिशाओंको सबेरेकी लालिमासे लाल लाल देखते थे तब ऐसा मानते थे मानों ये दिशाएं जिनेन्द्रदेव के चरणकमलोंकी लालिमासे ही लाल लाल हो गई हैं ।। ११६।। जिसने रात्रिका गाढ़ अन्धकार नष्ट कर दिया है ऐसे सूर्यको प्रातःकालके समय उदय होता हुआ देखकर वे ऐसा समझकर उठते थे मानो यह भगवान्के केवलज्ञानका प्रतिविम्ब ही हो ॥११७॥ प्रातःकालकी वायुके चलनेसे खिले हुए कमलोंके समूहको वे अपने हृदयमें जिनेन्द्र भगवान्की दिव्यध्वनिके समूहके समान शीतल समझते थे ।।११८।। वे बहुत ही धर्मात्मा थे, उनके काम और अर्थकी चिन्ता गौण रहती थी तथा उनका मुख्य तात्पर्य सब प्रकारका कल्याण करनेवाले धर्म में हौ रहता था ।। ११९।। वे सबेरे उठकर पहले धर्मात्मा पुरुषोंके साथ धर्मका चिन्तवन करते थे और फिर मंत्रियोंके साथ अर्थ तथा कामरूप संपदाओंका विचार करते थे ॥१२०॥ वे शय्यासे उठते ही देव और गुरुओंकी पूजा करते थे और फिर माङ्गलिक वेष धारणकर धर्मासनपर आरूढ होते थे ।। १२१।।
श्लोक 122 से 131 राजकीय और सामाजिक कर्तव्य
वहां प्रजाके सदाचार और असदाचारका विचार करते हुए वे क्षणभर ठहरते थे तदनन्तर अधिकारियोंको अपने अपने कामपर नियुक्त करते थे अर्थात् अपना अपना कार्य करनेकी आज्ञा देते थे ॥ १२२॥ इसके बाद सभाभवनके बीच में जाकर राजसिंहासनपर विराजमान होते तथा सेवाके लिये अवसर चाहनेवाले राजाओं का सन्मान करते थे ।।१२३।। वे कितने ही राजाओंको दर्शनसे, कितनोंहीको मुसकानसे, कितनोंही को वार्तालापसे, कितनोंहीको सन्मानसे और कितनोंहीको दान आदिसे संतुष्ट करते थे ।।१२४।। वे वहांपर भेंट ले लेकर आये हुए बड़े बड़े पुरुषों तथा दूतोंको सन्मानित कर और उनका कार्य पूराकर उन्हें बिदा करते थे ।।१२५॥ नृत्य आदि दिखानेके लिये आये हुए कलाओं के जाननेवाले पुरुषोंको बड़े बड़े पारितोषिक देकर संतुष्ट करते थे ॥१२६।। तदनन्तर सभा विसर्जन करते और राजसिंहासनसे उठकर कोमल क्रीड़ाओंके साथ साथ अपनी इच्छानुसार विहार करते थे ।। १२७ ।। तत्पश्चात् दोपहरका समय निकट आनेपर स्नान आदि करके भोजन करते और फिर अलंकार धारण करते थे ।। १२८ ।। उस समय परिवारकी स्त्रियां स्वयं आकर चमर ढोलना, पान देना और पैर दाबना आदिके द्वारा उनकी सेवा करती थीं । ।।१२९॥ तदनन्तर भोजन के बाद बैठने योग्य भवनमें कुछ राजाओंके साथ बैठकर चतुर लोगों की मंडलीके साथ साथ विद्याकी चर्चा करते थे ॥ १३०॥ वहां जवानीके मदसे जिन्हें उद्दण्डता प्राप्त हो रही है ऐसी वेश्याएं और प्रियरानियां आकर उन्हें चारों ओरसे घेर लेती थीं ॥१३१॥
श्लोक 132 से 141 रात्रिकाल और शास्त्रज्ञान
उनके आभाषण, परस्परकी बातचीत और हास्यपूर्ण कथा आदि भोगोंके साधनोंसे वे वहाँ कुछ देरतक सुखसे बैठते थे ।। १३२।। इसके बाद जब दिनका चौथाई भाग शेष रह जाता था तब मणियोंसे जड़ी हुई जमीनपर टहलते हुए वे चारों ओर राजमहलकी उत्तम शोभा देखते थे ।।१३३।। कभी वे क्रीड़ासचिव अर्थात् क्रीड़ामें सहायता देने वाले लोगोंके कंधोंपर हाथ रखकर इधर उधर घूमते हुए देवकुमारोंके समान सुशोभित होते थे ॥१३४।। रातमें भी चक्रवर्ती के योग्य जो कार्य थे उन्हें करते हुए वे सुखसे रात्रि व्यतीत करते थे ॥१३५॥ यद्यपि वे चक्रवर्ती कृतकृत्य हो चुके थे अर्थात् विजय आदिका समस्त कार्य पूर्ण कर चुके थे तथापि केवल नियोग समझकर कभी कभी उचित समयपर मंत्रियोंके साथ सलाह करते थे ।।१३६।। जिन्होंने समस्त पृथिवी जीत ली है और जो इस भरतक्षेत्रमें स्वतन्त्र हैं ऐसे उन भरतको अपने तथा परराष्ट्रकी कुछ भी चिन्ता नहीं थी, यदि चिन्ता थी तो केवल तन्त्र अर्थात् स्वराष्ट्र की ही चिन्ता थी ।।१३७।। उन्होंने अपना अज्ञान नष्ट करनेके लिये ही छह गुणोंका अभ्यास किया था क्योंकि जब वे शत्रुरहित पृथिवीका पालन करते थे तब उन्हें सन्धि विग्रह आदिकी चर्चासे क्या प्रयोजन था ।।१३८ ।। अतिशय विद्वान् महाराज भरत केवल प्रसिद्धिके लिये ही कभी कभी बड़े उत्साह के साथ राजपुत्रों के लिये आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता और दण्डनीति इन चार राजविद्याओंका व्याख्यान करते थे ।॥ १३९॥ वे कभी कभी निधियों और रत्नोंका भी निरी-क्षण करते थे। क्योंकि निधियों और रत्नोंमें से कुछ तो उनके भाण्डारमें थे और कुछ उनकी सेनामें थे ॥१४०।। कभी कभी वे सर्वज्ञदेवका मत प्रकट करते हुए धर्मशास्त्रमें जो कुछ विवाद थे उन सबका निराकरण करते थे ॥ १४१।।
श्लोक 142 से 151 शास्त्रों में निपुणता
भगवान् अरहन्तदेवके कहे हुए तत्त्वोंमें जिन किन्हीं को संदेह उत्पन्न होता था उन्हें वे उस संदेहसे हटाकर तत्त्वोंका यथार्थ निर्णय कराते थे ।।१४२।। इसी प्रकार वे अर्थशास्त्र के अर्थ में और कामशास्त्रमें अपना पूर्ण चातुर्य इस तरह प्रकट करते थे कि फिर इस संसारमें उनके समान दूसरा चतुर नहीं रह जाता था ।।१४३।। हस्तितन्त्र और अश्वतन्त्र में महाराज भरतकी स्वतन्त्रता देखकर उन शास्त्रों के जाननेवाले लोगों को यही विश्वास हो जाता था कि इन सबके मूल शास्त्रोंके कर्ता यही हैं ।। १४४।। आयुर्वेद के विषयमें तो सब लोग निधियों के स्वामी भरतकी बिना किसी शंकाके यही प्रशंसा करते थे कि यह दीर्घायु क्या मूर्तिमान् आयुर्वेद ही है अर्थात् आयुर्वेदने ही क्या भरतका शरीर धारण किया है ।।१४५।। इसी प्रकार सज्जन लोग यह भी मानते थे कि वे व्याकरण-विद्यामें कुशल हैं, शब्दालंकारमें निपुण हैं, और छन्दशास्त्र के प्रतिविम्ब हैं ।॥१४६॥ निमित्तशास्त्र सबसे पहले उन्हीं के बनाये हुए हैं, शकुनशास्त्र उन्हीं के कहे हुए हैं और ज्योतिष शास्त्रका ज्ञान उन्हीं-
की सृष्टि है इसलिये उक्त तीनों शास्त्र उन्हींके मत हैं ऐसा समझना चाहिये ।।१४७।। वे निमित्त शास्त्रों के निमित्त हैं, और तन्त्र, मन्त्र, शकुन तथा ज्योतिष शास्त्रमें उत्तम अधिष्ठाता देव हैं इस प्रकार सब लोगोंमें अधिक मान्यताको प्राप्त हुए थे ॥ १४८ ॥ महाराज भरतके उत्पन्न होनेपर पुरुषके सब लक्षण उत्पन्न हुए थे इसलिये दूसरी जगह उनके शरीरके उदाहरण ही देखे जाते थे ॥१४९॥ शास्त्रोंके जाननेवाले पुरुष ऊपर कहे हुए शास्त्रोंके सिवाय अन्य कलाशास्त्रोंके संग्रहमें भी भरतको ही दर्पणके समान देखकर संशयके अंशोंसे विरत होते थे अर्थात् अपने अपने संशय दूर करते थे ॥१५०।। चूंकि उनकी स्वाभाविक बुद्धि पूर्वजन्मसे संपर्क रखनेवाली थी इसलिये ही उनकी समस्त विद्याओंमें उत्तम प्रगति हुई थी ।।१५१।।
श्लोक 152 से 158 भरत की महिमा
इस प्रकार समस्त शास्त्र और समस्त कलाओंमें प्रतिष्ठा पाकर वे भरत उन विद्याओंके जानने-वालों में मान्य हुए थे ॥ १५२॥ इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या लाभ है ? इतना कहना ही पर्याप्त है कि बुद्धिके पारगामी कुलकर भरत समस्त लोकाचारके सूत्रधार हो रहे थे ।॥१५३॥ वे राजशास्त्रके तत्त्वोंको जानते थे, धर्मशास्त्रके तत्त्वोंके जानकार थे, और क्लाओंके ज्ञानमें प्रसिद्ध थे । इस प्रकार उत्तम विद्वानोंके मस्तकपर सुशोभित हो रहे थे अर्थात् सबमें श्रेष्ठ थे ।।१५४।। अहो, इनका प्रथम राज्य कैसा आश्चर्य करनेवाला है, यह सम्म्राट् हैं, राजर्षियों-में मुख्य हैं, इनका सार्वभौम पद भी आश्चर्यजनक है इस प्रकार उनका यश समस्त दिशाओंमें उछल रहा था ।। १५५।। इस प्रकार जो समस्त कलाओंका एकमात्र स्थान है, जो बुद्धिमान् पुरुषोंके साथ अविनाशी मित्रता करना चाहता है और ‘यह विद्वानोंमें चक्रवर्ती है अथवा विद्वान् चक्रवर्ती है’ इस प्रकार जिसकी कीतिरूपी पताका फहरा रही है ऐसा वह चक्रवर्ती भरत विद्वानोंकी सभामें समस्त विद्याओंका उपदेश देता हुआ समस्त विद्याओंका व्याख्यान
करता था ।।१५६।। जिसने समस्त तत्त्वोंको जान लिया है और जिसकी बुद्धि परिपक्व है ऐसा सम्राट् भरत, जिनेन्द्रदेव के कहे हुए न्यूनतारहित धर्ममार्गका स्मरण करता हुआ तथा वही मार्ग अन्य लोगोंको समझाता हुआ और शत्रुरहित सम्पूर्ण पृथिवीका पालन करता हुआं सारपूर्ण भोगोंके द्वारा चिरकालतक क्रीड़ा करता रहा था।। १५७।। जो लक्ष्मी और सरस्वतीके समागमसे उत्पन्न हुए सुखके एक स्वामित्वको धारण कर रहा है, जिसने समस्त दुष्ट नय दूर हटा दिये हैं, जो शान्तियुक्त तेजस्वीपनेको धारण कर रहा है, जिसने न्यायपूर्वक कमाये हुए धनसे काम-का संयोग प्राप्त किया है, जो शस्त्र और शास्त्र दोनोंमें ही निपुण है, राषि है और जिसका अभ्यदय अतिशय उत्कृष्ट है ऐसा वह भरत जिनेन्द्रदेवकी सेवा करनेवालोंमें अग्रेसर अर्थात् सबसे श्रेष्ठ था ।।१५८।।
इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रहके भाषानुवादमें भरतराजके स्वप्न तथा उनके फलका वर्णन करनेवाला इकतालीसवां पर्व समाप्त हुआ ।
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena