आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 |
श्लोक 12 से 21 अर्ककीर्ति का उग्र भाषण
अर्ककीर्ति ने क्रोध में कहा कि अकम्पन ने उसका अपमान कर स्वयं विनाश को आमंत्रित किया है। उसने अपनी शक्ति का बखान करते हुए कहा कि उसकी सेना और तलवार शत्रुओं को नष्ट कर देगी। वह जयकुमार की विजय को चुनौती देने और सुलोचना की माला को हरण करने की बात करता है। दुर्मर्षण के उकसावे और अन्य राजाओं के समर्थन से उसका क्रोध और बढ़ गया, जिससे वह युद्ध की तैयारी में जुट गया।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 12 to 21
श्लोक ( Shlok ) 12
मामधिक्षिप्य कन्येयं येन दत्ता दुरात्मना । तेन प्रागेव मूढेन दत्तः स्वस्मै जलाञ्जलिः ॥१२॥
वह बोला जिस दुष्टने मेरा अपमान कर यह कन्या दी है उस मूर्खने अपने लिये पहले ही जलां-जलि दे रखी है ।।१२।।
He declared, “That wicked man who dared insult me by giving this maiden in marriage has, in truth, already consigned himself to the funeral flames.”12
श्लोक ( Shlok ) 13
अतिक्रान्ते” रये “तस्मिन् प्रोत्थितः क्रोधपावकः । तदैव किन्नु को दाहय इत्यजानन्नहं स्थितः ॥१३॥
उस समय कन्याका रथ आगे निकलते ही मेरी क्रोधरूपी अग्नि भड़क उठी थी परन्तु जलने योग्य कौन है ? यह नहीं जानता हुआ में चुप बैठा रहा था ।।१३।।
At that moment, as the maiden’s chariot passed before me, the fire of wrath blazed forth within my heart; yet, not knowing who was truly worthy of being cast into its flames, I remained silent.13
श्लोक ( Shlok ) 14
‘नाम्नातिसन्धि तो मूढो मन्यते स्वमकम्पनम् । ‘क्रुद्धे मयि न वेत्तीति कम्पते सधरा धरा ॥१४॥
केवल नामसे ठगाया हुआ वह मूर्ख अपने आपको अकम्पन मानता है परन्तु वह यह नहीं जानता कि मेरे कुपित होनेपर पर्वतों सहित पृथिवी भी कँपने लगती है ।।१४।॥
That fool, beguiled by his name alone, deems himself Akampana—the Unshaken. Yet he knows not that when my wrath is roused, even the earth with all her mountains trembles. 14
श्लोक ( Shlok ) 15
मत्खड्गवारिवाराशि ” रास्तां तावदगोचरः । संहरन्त्यखिलान् शत्रून् बलवेलैव हेलया ॥१५॥
मेरी तलवाररूपी जलकी धाराका विषय तो दूर ही रहे मेरी सेनारूपी लहर ही समस्त शत्रुओंको अनायास ही नष्ट कर देती है ।।१५।।
Speak not of the torrent that is my sword—nay, even the surging wave of my army alone sweeps away all foes with effortless might.15
श्लोक ( Shlok ) 16
प्ररूढशुष्कनाथेन्दुदुर्वंशविपुलाटवी । मत्क्रोधप्रस्फुरद्वह्निभस्मिताऽस्मिन्न रोक्ष्यति ॥१६॥
बहुत बढ़े और सूखे हुए नाथवंश तथा चन्द्रवंशरूपी दुष्ट बांसोकी बड़ी भारी अटवी मेरे क्रोधरूपी प्रज्वलित अग्निसे भस्म हो जायगी और फिर इस संसारमें कभी नहीं उग सकेगी ॥१६॥
That vast and withered thicket of wicked bamboos—the haughty lines of the Nātha and the Chandra clans—shall be utterly reduced to ashes by the blazing fire of my wrath, never again to take root upon this earth. 16
श्लोक ( Shlok ) 17
बीरपट्टस्तदा सोढो भुवो भर्तुर्भयान्मया। कथमद्य “सहे मालां सर्वसौभाग्यलोपिनीम् ॥१७॥
उस समय पृथिवीके अधिपति चक्रवर्ती महाराजने जयकुमार को जो वीरपट्ट बांधा था उसे तो मैंने उनके डरसे सह लिया था परन्तु आज अपने सब सौभाग्य-को नष्ट करनेवाली इस वरमालाको कैसे सह सकता हूँ ? ॥१७॥
When the sovereign of the earth, the mighty Chakravartin, adorned Jayakumāra with the sash of valour, I endured it—out of fear for his imperial power. But how shall I now endure this bridal garland, which brings ruin upon all my fortune and honour?17
श्लोक ( Shlok ) 18
“मद्यशः कुसुमाम्लानमालेवास्त्वायुगावधि । जयलक्ष्म्या सहाद्यैतां हरेयं जयवक्षसः ॥१८॥
मेरे यशरूपी फूलोंकी अम्लान माला ही इस युगके अन्ततक विद्यमान रहे। इस मालाको तो मैं जयलक्ष्मीके साथ साथ जयकुमारके वक्षःस्थलसे आज ही हरण किये लेता हूँ ॥१८॥
Let the unfading garland of my glory endure until the very end of this age. As for this bridal wreath — I shall this very day tear it away from the bosom of Jayakumāra, along with the fickle goddess of victory herself. 18
श्लोक ( Shlok ) 19
जलदान् पेलवान् जित्वा मरुन्मात्रविलायिनः। अद्य पश्यामि वृप्तस्य जयस्य जयमाहवे ॥१९॥
केवल वायुमात्रसे विलीन हो जानेवाले कोमल मेघोंको जीतकर अहंकारको प्राप्त हुए जयकुमारकी जीत आज मैं युद्धमें देखूंगा ।।१९।।
Having vanquished but soft clouds that vanish at a breath of wind, Jayakumāra has swelled with pride—let me behold today, upon the battlefield, the true measure of his vaunted victory.19
श्लोक ( Shlok ) 20 – 21
इति निर्भिन्नमर्यादः कार्याकार्यविमूढधीः । अनिवार्यो विनिजित्य कालान्तजलधिध्वनिम् ॥२०॥अनलस्यानिलो वाऽस्य साहाय्यमगमॅस्तदा । केऽपि पापक्रियारम्भे सुलभाः सामवायिकाः ॥२१॥
इस प्रकार जिसने मर्यादा तोड़ दी है, कार्य अकार्यके करनेमें जिसकी बुद्धि विचाररहित हो रही है और जो किसीसे निवारण नहीं किया जा सकता ऐसे अर्ककीर्तिने उस समय अपने शब्दोंसे प्रलयकालके समुद्रकी गर्जनाको भी जीत लिया था और जिस प्रकार अग्नि को भड़काने के लिये वायु सहायक होता है उसी प्रकार उसका क्रोध भड़काने के लिये कितनेही राजा लोग उसके सहायक हो गये थे सो ठीक ही है क्योंकि पापक्रियाओंके प्रारम्भमें सहायता देनेवाले सुलभ होते हैं ।॥ २०-२१॥
Thus did Arkakīrti, having cast aside all bounds of decorum and lost the discernment between right and wrong, become one whom none could restrain. In that moment, his words out-roared even the tumult of the cosmic ocean at the hour of dissolution. And as the wind stokes the flame, so too did many kings rise in support to inflame his wrath. Yet, such is the way of the world—for companions in sin are ever easy to find at the outset of evil deeds. 20 – 21
श्लोक 22 से 31
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 |
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