Hindi Translation of Adi purana Parv 30
श्लोक 1 से 11 : चक्रवर्ती भरत की सेना का नैर्ऋत्य दिशा पर अभियान
अथानन्तर-पश्चिम दिशाको जीतने के लिये उद्यत हुए चक्रवर्ती भरत अपनी सेनाके द्वारा दक्षिण और पश्चिम दिशाके मध्यभाग (नैर्ऋत्य दिशा) को जीतते हुए निकले ॥१॥ उनकी सेना में घोड़ोंके समूह सबसे आगे जा रहे थे, रथ सबसे पीछे चल रहे थे, हाथियोंका समूह बीचमें जा रहा था और प्यादे सभी जगह चल रहे थे ।।२।। हाथी, घोड़े, रथ, प्यादे इस प्रकार चार तरहकी भरतकी सेना देव और विद्याधरोंकी सेनाके साथ साथ चल रही थी। इस प्रकार वह सेना अपने छह अंगोंके द्वारा चारों ओर विस्तार पा रही थी ।।३।। उस चलती हुई सेना के क्षोभसे समुद्र भी क्षुब्ध हो उठा था- लहराने लगा था और ऐसा जान पड़ता था मानो ‘सबको महापुरुषोंका अनुकरण करना चाहिये’ यही बात सेवक लोगोंको सुना रहा हो ।।४।। सेनाके द्वारा जबर्दस्ती आक्रमण किये हुए राजा लोग नमू हो गये थे, नदियोंमें कीचड़ रह गया था और बड़े बड़े पहाड़-समान जमीनके सदृश हो गये थे ।। ५ ।। जिनका उपभोग अत्यन्त मनो-रम है, जो सतोष उत्पन्न करनेवाली हैं, और जो उपभोगक्री इच्छा करनेवाले मनुष्योंके द्वारा चाहने योग्य हैं ऐसी इस चक्रवर्तीकी समस्त सिद्धियां इसके बड़े भारी उद्योगोंके साथ ही साथ फल जाती थीं अर्थात् सिद्ध हो जाती थीं ।॥६॥ जिन्हें कोई भेद नहीं सकता है, जिनका संगठन अत्यन्त मजबूत है और जो शत्रुओंके क्षयका कारण हैं ऐसी भरतकी शक्ति तथा सेना दोनों ही शत्रु राजाओंपर अपना प्रभाव डाल रहे थे ॥ ७॥ भरतके योद्धा उनके बाणोंके समान थे, क्योंकि जिस प्रकार योद्धा फल अर्थात् इच्छानुसार लाभसे युक्त किये जाते थे उसी प्रकार बाण भी फल अर्थात् लोहेकी नोकसे युक्त किये जाते थे, जिस प्रकार योद्धा तीक्ष्ण अर्थात् तेजस्वी थे उसी प्रकार बाण भी तीक्ष्ण अर्थात्पैने थे, जिस प्रकार योद्धा सपक्ष अर्थात् सहायकोंसे सहित थे उसी प्रकार बाण भी सपक्ष अर्थात् पंखोंसे सहित थे, और जिस प्रकार योद्धा दूर तक गमन करनेवाले थे उसी प्रकार बाण भी दूर तक गमन करनेवाले थे, इस प्रकार वे दोनों साथ साथ ही विजयके अंग हो रहे थे ।।८।। भरत के विपक्ष (विरुद्धः पक्षो येषां ते विपक्षाः) अर्थात् शत्रुओंको उनकी सेनाने दूर भगा दिया था और उनके छत्र चमर आदि सब सामग्री भी छीन ली थी इसलिये वे सचमुच ही विपक्ष-पनेको (विगतः पक्षो येषां ते विपक्षास्तेषां भावस्तत्त्वम्) प्राप्त हो गये थे अर्थात् सहायरहित हो गये थे ।।९।। यह एक आश्चर्यकी बात थी कि भरतके विरोधी राजा सेनाके द्वारा आक्रमण किये जानेपर तथा उनके क्रोधित होनेपर भी अनेक प्रकारको फल-संपदाओंका उपभोग करते हुए कुपतित्व अर्थात् पृथिवीके स्वामीपनेको प्राप्त हो रहे थे। भावार्थ इस श्लोकमें श्लेष-मूलक विरोधाभास अलंकार है इसलिये पहले तो विरोध मालूम होता है बादमें उसका परिहार हो जाता है। श्लोकका जो अर्थ ऊपर लिखा गया है उससे विरोध स्पष्ट ही झलक रहा है क्योंकि भरतके क्रोधित होनेपर और उनकी सेनाके द्वारा आक्रमण किये जानेपर कोई भी शत्रु सुखी नहीं रह सकता था परन्तु नीचे लिखे अनुसार अर्थ बदल देनेसे उस विरोधका परिहार हो जाता है-भरतके विरोधी राज, लोग, उनके कुपित होने तथा सेनाके द्वारा अक्रमण किये जानेपर अपनी राजधानी छोड़कर जंगलों में भाग जाते थे, वहाँ फल खाकर ही अपना निर्वाह करते थे और इस प्रकार कु-पतित्व अर्थात् कुत्सित राजवृत्ति (दरिद्रता) को प्राप्त हो रहे थे ।।१०।। उस भरतको सन्धि (स्वर अथवा व्यंजनोंको मिलाना) और विग्रह (व्युत्पत्ति) की चिन्ता केवल व्याकरण शास्त्रमें ही हुई थी अन्य शत्रुओंके विषयमें नहीं हुई थी सो ठीक हो है क्योंकि जिसने समस्त शत्रुओंको नष्ट कर दिया है उसे कहां सन्धि (अपना पक्ष निर्बल होनेपर बलवान् शत्रुके साथ मेल करना) करनी पड़ती है? और कहां विग्रह (युद्ध) करना पड़ता है ? अर्थात् कहीं नहीं ।।११।।
श्लोक 12 से 21 : समुद्र तट पर सेना का अभियान
इस प्रकार भरतके यद्यपि जीतने योग्य कोई शत्रु नहीं था तथापि वे जो दिग्विजय करनेके लिये उद्यत हुए थे सो केवल दिग्विजयको छलसे अपने उपभोग करने योग्य क्षेत्रों चक्कर लगा आये थे घूम आये थे ।।१२।। महाराज भरतके सैनिकोंने, जहां सुपारीके वृक्षोंके द्वारा छाया की गई है और जो नारियलके बनोंसे व्याप्त हो रही है ऐसे समुद्र के किनारेकी भूमि पर आक्रमण किया था ।।१३।। सरोवरोंके किनारेके वृक्षोंकी छायामें विश्राम करनेवाले भरतके सैनिकोंने नारियलके तरुण अर्थात् बड़े बड़े वृक्षों से निकला हुआ रस खूब पिया था ।।१४।। वहां भरतकी सेनाके लोगोंने ताड़ वृक्षोंके वनों में वायुके हिलनेसे उठी हुई बहुत कठोर सूखे पत्तोंकी मर्मर-ध्वनि सुनी थी ।।१५।। वहां सम्राट् भरतने हम लोगोंका एक ही समान कार्य होगा यही समझकर जो पानकी बेलोंके साथ साथ परस्परमें मिल रहे थे ऐसे सुपारीके वृक्ष देखे ।।१६।। जो पानोंकी लताओंके आश्रय थे तथा जो उनके साथ लिपटकर स्त्री-पुरुषके समान जान पड़ते थे ऐसे सुपारीके वृक्षोंको बड़े गौरके साथ देखकर महाराज भरत बहुत ही प्रसन्न हुए थे ।।१७।। उन वनोंमें सूर्यास्तके समय निवास करनेवाले जो पक्षी निरन्तर शब्द कर रहे थे और ऐसे जान पड़ते थे मानो सूर्यास्तके समय निवास करनेवाले तथा स्वाध्याय करते हुए मुनि ही हों उन्हें भरतने देखा था ।।१८।। जो भीतर कोमल हैं तथा बाहरी त्वचापर कांटोंसे युक्त हैं ऐसे अमृतके समान मीठे कटहलके फल सेनाके लोगोंने अपने इच्छानुसार खाये थे ।।१९।। वहां पीनेके लिये नारियलका रस, खानेके लिये कटहलके फल और व्यंजनके लिये मिरचें मिलती थीं, इस प्रकार सैनिकोंके लिये वनमें होनेवाली भोजनकी व्यवस्था भी सुखकर मालूम होती थी ॥ २०॥ जो सरस अर्थात् गीली मिरचें खाकर कुछ कुछ शब्द कर रहे हैं और जिनकी आंखोंसे आंसू गिर रहे हैं ऐसे पक्षियोंको भी भरतने देखा था ।॥२१॥
श्लोक 22 से 34 : वनों और पर्वतों का सौन्दर्य
जो तरुण वानर बहुत तेज भिरचोंके गुच्छोंको निःशंक रूपसे खाकर बादमें चरपरी लगनेसे शिर हिला रहे थे उन्हें भी महाराजने देखा ॥२२॥ उस समय वहां फलोंसे झुके हुए तथा लोगोंका उपकार करनेवाले वृक्षोंको देखकर लोग कल्प-वृक्षोंके अस्तित्वमें शंकारहित हो गये थे ॥ २३॥ जो लतारूप स्त्रियोंसे लिपटे हुए हैं और अनेक फलोंसे युक्त हैं ऐसे बनके वृक्ष अपने फलोंसे सेनाके लोगोंको संतुष्ट करते हुए ऐसे जान पड़ते थे मानो भरत के लिये कर ही दे रहे हों ।॥ २४।। जो नारियलकी मदिरा पीकर उन्मत्त हो रही हैं और इसीलिये जिनके नेत्र कुछ कुछ घूम रहे हैं ऐसी सिंहल द्वीपकी स्त्रियां वहां गद्गद कण्ठसे महाराज भरतका यश गा रही थीं ।॥ २५॥ त्रिकूट पर्वतपर, मलय गिरिके मध्यभाग पर और पाण्डयकबाटक नामके पर्वतपर किन्नर जातिकी देवियाँ गंभीर स्वरसे चक्रवर्ती का यश गा रही थीं ।। २६ ।। इसी प्रकार मलय गिरिके समीपवर्ती वनमें और सह्य पर्वतके वनोंमें भीलोंकी स्त्रियां विजयसे उत्पन्न हुआ महाराजका यश जोर जोरसे गा रहीं थीं ॥२७॥ उस समय मलय गिरिके लतागृहोंसे झरनोंके जलके छोटे छोटे कण हरण करता हुआ तथा चन्दनके बगीचेको हिलाता हुआ वायु धीरे धीरे बह रहा था ।। २८ ।। वह वायु दक्षिण दिशा को छोड़कर चारों ओर बह रहा था और ऐसा जान पड़ता था मानो अतिथि सत्कारके द्वारा भरतका सन्मान करता हुआ ही उनका परिश्रम दूर कर रहा था । भावार्थ इस श्लोकमें दाक्षिण्य शब्दके श्लेष तथा अपि शब्दके सन्निधानसे नीचे लिखा हुआ विरोध प्रकट होता है-‘वह वायु यद्यपि दाक्षिण्य (स्वामीके इच्छानुसार प्रवृत्ति करना) भावको छोड़कर स्वच्छन्दता पूर्वक चारों ओर घूम रहा था तथापि उसने एक आज्ञाकारी सेवककी तरह भरतका अतिथि-सत्कार कर उनका सब परिश्रम दूर कर दिया था, जो स्वामीके विरुद्ध आचरण करता है वह उसकी सेवा क्यों करेगा ? यह विरोध है परन्तु दाक्षिण्य शब्दका दक्षिण दिशा अर्थ लेनेसे वह विरोध दूर हो जाता है (‘दक्षिणो दक्षिणोद्भूतसरलच्छन्दतिषु’ इति मेदिनी दक्षि-णस्य भावो दाक्षिण्यम्, पक्षे दक्षिणैव दाक्षिण्यम्) ।॥२९॥ तमाल वृक्षोंके वनकी गलियोंमें इच्छानुसार इधर-उधर घूमती हुई केरल देशकी तरुण स्त्रियाँ इलायची, लौंग आदि सुगन्धित वस्तुओंके सम्बन्धसे जिनके निःश्वास सुगन्धित हो रहे हैं ऐसे मुखोंसे, जो घिसे हुए चन्दनके गाढ़ लेपसे सुशोभित हो रहें हैं ऐसे स्तनोंसे, नितम्बोंके भारके साथ ईर्ष्या करनेवाले लीलासहित सुकोमल गमनसे, जो कामदेवके पुष्परूपी शस्त्रोंके गुच्छोंके खिलने के समान सुशोभित हो रहे हैं ऐसे मन्द हास्यसे, कोयलकी कूकके समान मनोहर तथा अव्यक्त वाणीसे, सुकोमल बाहु-रूपी लताओंके इधर उधर फिरानेसे सुन्दर चेष्टाओंसे, जिसमें स्खलित होते हुए पैर पड़ रहे हैं ऐसे नृत्योंसे, अधिकतर मोतियोंके बने हुए आभूषणोंसे, भूमरसमूहकी गुंजारको जीतनेवाले मदसे मनोहर उत्कृष्ट गीतोंसे चक्रवर्ती भरतका मन हरण कर रही थीं ।॥ ३०-३४।।
श्लोक 35 से 50 : दक्षिण और पश्चिम की विजय
इस प्रकार महाराज भरतने अपनी विजयी सेनाके द्वारा दक्षिण दिशाको वश कर चोल, केरल और पाण्ड्य इन तीन राजाओंको एक साथ जीता और एक ही साथ उनसे प्रणाम कराया ।। ३५॥ जो अपने शरीरसे मानो मलय पर्वतकी ऊँचाईकी ही तुलना कर रहे हैं ऐसे कलिंग देशके हाथियोंने मलय पर्वतके समीपवर्ती अन्य समस्त छोटे छोटे पर्वतोंको व्याप्त कर लिया था ।।३६।। दिग्विजयके समय दिशाओंके अन्त भागमें विश्राम करनेवाले भरतके हाथियोंने दिग्गजपना अपने आधीन कर लिया था अर्थात् स्वयं दिग्गज बन गये थे इसलिये अन्य आठ दिग्गजोंकी कथा केवल शोभा के लिये ही रह गई थी ॥ ३७॥ तदनन्तर पश्चिमी भागपर आरूढ़ होकर सह्य पर्वतके किनारे के समीप होकर जाते हुए भरतने पश्चिम समुद्रके किनारेके राजाओंको जीता ॥३८॥ भरत की वह विजयी सेना समुद्रके समीप किनारे किनारे सव जगह फैल गई थी और वह इतनी बड़ी थी कि उसने समुद्रका दूसरा किनारा भी व्याप्त कर लिया था ।। ३९॥ उस समय हवासे लहराता हुआ उपसमुद्र ऐसा जान पड़ता था मानो दोनों किनारेपर भरतकी सेना देखकर भयसे ही अत्यन्त आकुल हो रहा हो ॥४०॥ उस किनारेका उपसमुद्र सेनाके क्षोभसे इस किनारेकी ओर आता था और इस किनारेका उपसमुद्र सेनाके क्षोभसे उस किनारेकी ओर जाता था ।॥४१॥ ऊपर फैली हुई हरे मणियोंकी कान्तिसे व्याप्त हुआ वह समुद्रका जल ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो इस समुद्रका शेवाल सहित नीचेका भाग ही बहुत समय बाद उलट-कर ऊपर आ गया हो ॥४२॥ कहीं कहींपर पद्मराग मणियोंकी किरणोंसे व्याप्त हुआ समुद्रका जाल ऐसा जान पड़ता था मानों सेनाके क्षोभसे समुद्रका हृदय ही फट गया हो और उसीसे खूनकी छटाएँ निकल रही हों ।॥४३॥ सह्य पर्वतकी गोदमें लोटता हुआ (लहराता हुआ) वह समुद्र ऐसा जान पड़ता था मानो उससे अपना दुःख ही कह रहा हो और सहह्य पर्वत भी उसे धारण करता हुआ ऐसा मालूम होता था मानो उसके साथ अपना बन्धुभाव (भाई-चारा) ही बढ़ा रहा हो ॥४४।। सेनाके असह्य संघटनोंसे अत्यन्त पीड़ित हुआ वह सह्य पर्वत अपने टूटे हुए वृक्षोंसे ऐसा जान पड़ता था मानो अपने मस्तकपर लकड़ियोंका गट्ठा रख- कर भरतके प्रति अपनी पराजय ही स्वीकृत कर रहा हो (पूर्व कालमें यह एक पद्धति थी कि पराजित राजा शिरपर लकड़ियोंका गट्ठा रखकर गलेमें कुल्हाड़ी लटकाकर अथवा मुखमें तृण दबाकर विजयी राजाके सामने जाते थे और उससे क्षमा मांगते थे । ॥४५।। वह पर्वत-रूपी बड़ा भारी प्राणी सेनाके द्वारा घायल हो गया था, उसके शिखर टूट-फूट गये थे, उसका सत्त्व अर्थात् धैर्य विचलित हो गया था उसके सब सत्त्व अर्थात् प्राणी इधर-उधर भाग रहे थे, वह गुफाओंके छिद्रोंसे व्याकुल शब्द कर रहा था और इन सब लक्षणोंसे ऐसा जान पड़ता था मानो बहुत शीघ्र मरना ही चाहता हो ।।४६।। उस पर्वतके सब वृक्ष हिलने लगे थे, सब प्राणी इधर-उधर चंचल हो रहे थे- भाग रहे थे और उसके चारों ओरका मध्यभाग भी शिथिल होकर हिलने लगा था इस प्रकार वह पर्वत नाममात्रसे ही अचल रह गया था, वास्तवमें चल हो गया था ।।४७।। लोगोंकी वनक्रीड़ाओंसे तथा घोड़ोंके खुरोंके संघटनसे उस सह्य पर्वतके ऊपरकी भूमि चूर चूर होकर क्षण भरमें स्थलपनेको प्राप्त हो गई थी अर्थात् जमीनके समान सपाट हो गई थी ॥४८॥ चक्रवर्ती भरतके मदोन्मत्त विजयी हाथी, पश्चिम समुद्रके किनारे से लेकर मध्यम पर्वत तक और मध्यम पर्वतसे लेकर ऊंची ऊंची चट्टानोंसे चिह्नित तुंगवरक पर्वत तक, कृष्ण गिरि, सुमन्दर तथा मुकुन्द नामके पर्वतको उल्लंघन कर, चारों ओर घूम रहे थे ।।४९-५०।।
श्लोक 51 से 63 : पश्चिम के हाथी और नदियाँ
जिनकी गर्दन कुछ छोटी है, जो देखनेमें उत्कृष्ट हैं, मोटे लम्बे और चिकने दाँतोंसे सहित हैं, काले हैं, जिनकी सब इन्द्रियाँ अच्छी हैं, चमड़ा कोमल है, पीठ चौड़ी है, शरीर ऊँचा है, जीभ, ओंठ और तालु लाल हैं, जो मानी हैं, जिनकी पूछ और ओंठ लम्बे हैं, जिनसे कमलके समान गंधवाला मद कर रहा है, जो अपने ही वनमें संतुष्ट हैं, शूरवीर हैं, जिनके पैर मजबूत हैं, शरीर अच्छा है और जिन्हें उन वनोंके स्वामी बड़े हर्ष या क्षोभके साथ भेंट देनेके लिये लाये हैं ऐसे पश्चिम दिशामें उत्पन्न होनेवाले हाथी भी भरतने प्राप्त किये थे ।।५१-५३।। वन ही जिनकी रोमावली है और ऊंचे किनारे ही जिनके नितम्ब हैं ऐसी सह्य पर्वतकी पुत्रियोंके समान पूर्व तथा पश्चिम समुद्रकी ओर बहनेवाली अनेक नदियां महाराज भरतने उल्लंघन की थीं- पार की थीं ।॥ ५४।। चलते-फिरते हुए भयंकर मगरमच्छोंसे भया-नक भीमरथी नदी, नाकुओंसे समहसे की हुई आवर्तोंसे भयंकर दारुवेणा नदी, किनारे
पर स्थित बेतोंकी शाखाओंके अग्रभागसे जिसका जल ढका हुआ है ऐसी नीरा नदी, किनारे को तोड़नेवाले अपने प्रवाहसे जिसने किनारेके वृक्ष उखाड़ दिये हैं ऐसी मूला नदी, जिसमें निरन्तर शब्द होता रहता है ऐसी बाणा नदी, जलसे भरी हुई केतवा नदी, जिसके किनारेके प्रदेश हाथियोंने तोड़ दिये हैं अथवा जिसके किनारेके प्रदेश करीर वृक्षोंसे व्याप्त हैं ऐसी करीरी नामकी उत्तम नदी, विषमग्राह अर्थात् नीच मनुष्योंसे दूषित व्यभिचारिणी स्त्रीके समान विषम ग्राह अर्थात् बड़े बड़े मगरमच्छोंसे दूषित प्रहरा नदी, सती स्त्रीके समान अपंका अर्थात् कीचड़-रहित, (पक्षमें-कलंकरहित) तथा कुरर पक्षियोंके द्वारा सेवा करने योग्य सुररा नदी, जिसके जलके किनारेपर क्रौञ्च, कलहंस (बदक) और सारस पक्षी शब्द कर रहे हैं ऐसी पारा नदी, जो समान तथा नीची भूमिपर एक समान जलसे भरी रहती है तथा जिसकी गति कहीं भी स्खलित नहीं होती है ऐसी मदना नदी, जो सह्य पर्वतरूपी हाथी के बहते हुए मदके समान जान पड़ती है, जो अनेक धाराएं बांधकर बहती है, जिसका प्रवाह बीचमें कहीं नहीं टूटता, और जो अत्यन्त चौड़ी है ऐसी गोदावरी नदी, जिसके किनारे के समीपकी भूमि करीर वृक्षोंके वनोंसे भरी हुई है और जो धूपकी गरमीसे कुछ कुछ गरम जलको धारण करती है ऐसी तापी नदी, तथा जिसके किनारेके वृक्षोंकी छायामें हरिणोंके बच्चे सो रहे हैं और जो पश्चिम देशकी परिखाके समान जान पड़ती है ऐसी मनोहर लांगलखातिका नदी, इत्यादि अनेक नदियों को सेनापतिने अपनी सेनाके साथ साथ पार किया था। उस समय वह सेनापति मदोन्मत्त जंगली हाथियोंको भी पकड़वाता जाता था ।। ५५-६३।।
श्लोक 64 से 71 : विन्ध्याचल की समानता और सौन्दर्य
जो अपनी नदियाँरूपी जीभोंको फेलाकर मानो समुद्रको पीने के लिये ही उद्यत हुआ है ऐसे उस सहय पर्वतको उल्लंघन कर भरतकी सेना विन्ध्याचल पर पहुँची ।। ६४ ।। चक्रवर्ती भरतने उस विन्ध्याचलको अपने समान ही देखा था क्योंकि जिस प्रकार आप भूभृत् अर्थात् राजाओंके पति थे उसी प्रकार विन्ध्याचल भी भूभृत् अर्थात् पर्वतोंका पति था, जिस प्रकार आप उत्तुंग अर्थात् अत्यन्त उदार हृदय थे उसी प्रकार वह विन्ध्याचल भी उत्तुंग अर्थात् अत्यन्त ऊँचाथा, जिस प्रकार आप पृथुवंश अर्थात् विस्तृत उत्कृष्ट वंश (कुल) को धारण करनेवाले थे उसीं प्रकार वह विन्ध्याचल भी पृथुवंश अर्थात् बड़े बड़े बाँसके वृक्षोंको धारण करनेवाला था, जिस प्रकार आप धृतायति अर्थात् उत्कृष्ट भविष्यको धारण करनेवाले थे उसी प्रकार वह विन्ध्याचल भी धृतायति अर्थात् लम्बाईको धारण करनेवाला था, और जिस प्रकार आप दूसरोंके द्वारा अलंघ्य अर्थात् अजेय थे उसी प्रकार वह विन्ध्याचल भी दूसरोंके द्वारा अलंघ्य अर्थात् उल्लंघन न करने योग्य था ।॥६५॥ जिनसे बहुत दूरतक फैलनेवाले झरने झर रहे हैं ऐसे ऊंचे ऊंचे शिखरों से वह पर्वत ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो पताकाओंसहित अनेक विमानोंके समह ही विश्राम करनेके लिये उसपर ठहरे हों ।। ६६।। वह पर्वत अपने पूर्व और पश्चिम दिशाके दोनों कोणोंसे समुद्रमें प्रवेश कर खड़ा हुआ था और उससे ऐसा जान पड़ता था मानो दावानलके डरसे समुद्रके साथ मित्रता ही करना चाहता हो ।॥६७॥ उस विन्ध्याचलके झरने ‘स्वामीको अपने चरणोंका आश्रय लेनेवाले पुरुषोंका अवश्य ही पालन करना चाहिये’ मानो यह सूचित करनेके लिये ही अपने किनारेके वृक्षोंका सदा पालन-पोषण करते रहते थे ॥६८॥ वह पर्वत शब्द करते हुए निर्भरनोंसे ऐसा जान पड़ता था मानो अपने किनारेके ऊँचे नीचे पत्थरों से स्खलित होकर जिनका पानी ऊपरकी ओर उछल रहा है ऐसी नदीरूपी स्त्रियोंकी हँसी ही कर रहा हो ॥६९॥ उस पर्वतकी शिखरोंपर लगा हुआ दावानल ऐसा जान पड़ता था मानो उसके सीमारहित बहुत बड़े वनप्रदेशको जलानेके लिये असमर्थ हो ऊपरसे गिरकर आत्म-घात करनेके लिये ही उसके शिखरोंपर चढ़ रहा हो ।॥७०॥ आषाढ़ महीनेके समीप जलती हुई दावानलसे घिरे हुए उस पर्वतके शिखर वहांके भीलोंको सुवर्णसे बने हुएके समान दिखाई देते थे ।।७१।।
श्लोक 72 से 81 : विन्ध्याचल का सौन्दर्य और विविधता
उस पर्वतका वन कहीं कहीं मातंग अर्थात् हाथियोंसे सहित था अथवा मातंग अर्थात् चांडालोंसे सहित था, भुजंग अर्थात् सर्पोंके परिवारसे युक्त था अथवा भुजंग अर्थात् नीच (विटगुंडे) लोगोंके परिवारसे युक्त था और अनेक प्रकारके काँटोंसे भरा हुआ था अथवा अनेक प्रकारके उपद्रवी लोगोंसे भरा हुआ था इसलिये वह बहुत ही दुःखदायी अथवा शोचनीय अवस्थाको धारण कर रहा था ।।७२।। उस पर्वतपरका वन क्षीबकुंजर अर्थात् मदोन्मत्त हाथियोंसे युक्त होकर भी अक्षीबकुंजर अर्थात् मदोन्मत्त हाथियोंसे रहित था, और विपत्र अर्थात् पत्तोंसे रहित होकर भी सत्पत्रपल्लव अर्थात् पत्तों तथा कोंपलोंसे सहितथा इस प्रकार विरोधरूप होकर भी सुशोभित हो रहा था। भावार्थ इस श्लोकमें विरोधा-भास अलंकार है, विरोध ऊपर दिखाया जा चुका है अब उसका परिहार देखिये- वहाँका वन क्षीवकुंजर अर्थात् मदोन्मत्त हाथियोंसे युक्त होनेपर भी अक्षीबकुंजर अर्थात् समुद्री नमक तथा हाथीदाँतोंको देनेवाला था अथवा सोहाजनाके लतामण्डपोंको प्रदान करनेवाला था और विपत्र अर्थात् पक्षियोंके पंखोंसे सहित होकर भी उत्तम पत्तों तथा नवीन कोंपलोंसे सहित था (अक्षीबं च कुञ्जश्चेत्यक्षीबकुञ्जौ, तो राति ददातीत्यक्षीबकुञ्जरम् अथवा ‘अक्षीबाणां शोभाञ्जनानां कुञ्ज लतागृहं राति ददाति’, ‘सामुद्रं यत्तु लवणमक्षीबं वशिरं च तत्’ ‘कुञ्जो दन्तेऽपि न स्त्रियाम्’ ‘शोभाञ्जने शित्रुतीक्ष्णगन्धकाक्षीवैमोचकाः इति सर्वत्रामरः) ।।७३।। उस पर्वतके वनमें कहीं कहीं पर फटे हुए बांसोंके भीतरसे निकल-कर चारों ओर फैले हुए मोतियोंसे ऐसा जान पड़ता था मानो वनलक्ष्मियां ही दाँतोंकी किरणें फैलाती हुई हँस रही हों ।॥ ७४।। गुफाओंके द्वारोंसे निकलती हुई झरनोंकी गंभीर प्रतिध्वनियों से वह पर्वत ऐसा जान पड़ता था मानो अपनी महिमाके कारण कुलाचलोंके साथ स्पर्धा करता हुआ गरज ही रहा हो ।। ७५।। वह पर्वत ऊँचे नीचे प्रदेशोंसे, अनेक रंगकी धातुओंसे और हरिणोंके अचिन्तनीय वर्णोंसे प्रकट रूप ही एक विचित्र प्रकारका आकार धारण कर रहा था ।।७६।। उस पर्वतके वनोंमें रात्रि प्रारम्भ होनेके समय अनेक प्रकारकी औषधियाँ प्रकाश-मान होने लगती थीं जो कि ऐसी जान पड़ती थीं मानों देवताओंने अन्धकारको नष्ट करनेवाले दीपक ही जलाकर लटका दिये हों ।॥७७॥ कहीं कहींपर उस पर्वतके समीपका प्रदेश, सिहों के द्वारा फाड़े हुए हाथियोंके मस्तकोंसे उछलकर पड़े हुए मोतियोंसे ऐसा जान पड़ता था मानो बिखरे हुए फूलोंकी शोभा ही धारण कर रहा हो ॥७८॥ जो वायुसे हिलते हुए किनारेके वृक्षों से
– बुलाता हुआ सा जान पड़ता था ऐसे अपने में आसक्त उस महापर्वतको दूरसे ही देखते हुए चक्रवर्ती भरत उसपर जा पहुंचे । ॥७९॥ वहां जाकर उन्होंने उस पर्वतके वनोंमें रहनेवाले झुण्डके झुण्ड भील और हाथी देखे वे भील मेघोंके समान काले थे और धनुषोंके बाँसोंको ऊँचा उठाकर कंधोंपर रक्खे हुए थे तथा हाथी भी मेघोंके समान काले थे और धनुषके समान ऊँची उठी हुई पीठकी हड्डीको धारण किये हुए थे ॥८०॥ उस पर्वतके किनारेपर उन्होंने चंचल मछलियां ही जिनके नेत्र हैं और बोलते हुए पक्षियोंके शब्द ही जिनके मनोहर शब्द हैं ऐसी उस विन्ध्याचलकी प्यारी स्त्रियोंके समान नदीरूपी स्त्रियोंको बड़ी ही उत्कण्ठाके साथ देखा ।।८१।।
श्लोक 82 से 91 : नर्मदा नदी और विन्ध्याचल की विजय
तदनन्तर उन्होंने विन्ध्याचलके मध्य भागमें समुद्र तक फैली हुई और किसी से न रुकनेवाली उसकी कीर्तिके समान नर्मदा नामकी उत्तम नदी देखी ॥८२॥ जिसके जल-का प्रवाह अनेक लहरोंसे भरा हुआ है ऐसी वह नर्मदा नदी पृथिवीरूपी स्त्रीकी लम्बी चोटी-के समान जान पड़ती थी अथवा शेष सब पर्वतोंको जीत लेनेकी सूचना करनेवाली विन्ध्याचल की विजय-पताकाके समान मालूम होती थी ॥८३॥ सेनाके क्षोभसे जिसके ऊपर पक्षियोंकी पंक्तियां उड़ रही हैं ऐसी वह नदी क्षण भरके लिये ऐसी जान पड़ती थी मानो उसने चक्रवर्ती के आनेपर तोरण ही बांधे हों ।॥८४।।, चूंकि वह नर्मदा नदी जलको पार करनेवाली रानियों के लिये मछलियों के द्वारा धक्का देती थी इसलिये वह सचमुच ही उन्हें नर्मदा अर्थात् क्रीड़ा प्रदान करनेवाली हुई थी ।।८५।। मनुष्योंके क्षोभसे जिसके पक्षियोंकी पंक्ति ऊपरको उड़ रही है ऐसी उस नर्मदा नदीको पार कर उस सेनाने देहली समझकर विन्ध्याचल के उत्तरकी ओर, आक्रमण किया ॥८६॥ वहां भरतने दक्षिण और उत्तर दोनों ही ओर विन्ध्याचलको देखा, उस समय दोनों ओर दिखाई देनेवाला वह पर्वत ऐसा जान पड़ता था मानों अपने दो भाग कर दोनों दिशाओंको ही अर्पण कर रहा हो ॥८७॥। भरतकी सेनाका पड़ाव नर्मदा नदी के दोनों किनारोंपर था और वह ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो अपने विस्तारसे विन्ध्याचल को घेरकर कोई दूसरा विन्ध्याचल ही ठहरा हो ।।८८।। उस समय सेनाका पड़ाव और विन्ध्या-चल दोनों ही परस्परमें किसी भेद (विशेषता) को प्राप्त नहीं हो रहे थे क्योंकि जिस प्रकार सेनाके पड़ाव में हाथी थे उसी प्रकार विन्ध्याचलमें भी हाथियों के समान ही गंडोपल अर्थात् बड़ी बड़ी काली चट्टानें थी और सेनाके पड़ावमें जिस प्रकार अनेक घोड़े इधर उधर फिर रहे थे उसी प्रकार उस विन्ध्याचलमें भी अनेक अश्ववक्त्र अर्थात् घोड़ोंके मुखके समान मुखबाले किन्नर जातिके देव इधर-उधर फिर रहे थे (कवि-सम्प्रदायनें किन्नरोंके मुखोंका वर्णन घोड़ों के मुखोंके समान किया जाता है) ।॥८९॥ सेनाने उस विन्ध्याचलके समस्त फल पत्ते और वृक्षोंका उपभोग कर लिया था और लताओं तथा छोटे छोटे पौधोंको पुष्परहित कर दिया था इसलिये वह विन्ध्याचल उस समय वन्ध्याचल अर्थात् फल-पुष्प आदिसे रहित हो गया था ।॥९०॥ मोतियोंसे मिले हुए वांसी चावलोंसे जिनेन्द्रदेवकी पूजा करते हुए सैनिक लोगोंने वहाँ इच्छानुसार निवास किया था सो ठीक ही है क्योंकि विन्ध्याचलपर रहना बहुत ही रमणीय होता है ॥९१।।
श्लोक 92 से 101 : विन्ध्याचल से पश्चिम की ओर प्रस्थान
विन्ध्याचलके वनोंके राजाओंने वनोंमें उत्पन्न हुई रोग दूर करनेवाली और प्रशंसनीय वड़ी बड़ी औषधियां भेंट कर वहाँपर निवास करनेवाले राजा भरतके दर्शन किये ॥९२।। भीलों के राजाओंने बड़े बड़े हाथियोंके दांत और मोती महाराज भरतकी भेंट किये, सो ठीक ही है क्योंकि स्वामीका सत्कार अपनी योग्यताके अनुसार ही करना चाहिये ।।९३।। विन्ध्या-चलको पश्चिमी किनारेके अन्तभागसे उल्लंघन कर और नर्मदा नदीको पार कर चक्रवर्ती की सेनाने पश्चिम दिशाको जीतनेके लिये प्रस्थान किया ।।९४।। वह सेना पहले तो कुछ उत्तर दिशाकी ओर बढ़ी और फिर पश्चिम दिशामें व्याप्त हो गई। सेनामें सबसे आगे महाराज भरतका दुनिवार प्रताप जा रहा था और उसके पीछे पीछे चक्रसहित सेना जा रही थी।। ९५।। उस समय वेगसे चलते हुए बोड़ोंके समूहके खुरोंसे उड़ी हुई पृथिवीकी धूलिने केवल शत्रुओंके ही तेजको नहीं रोका था किन्तु सूर्यका तेज भी रोक लिया था ॥९६॥ जिन्होंने अपने ललाटसे पृथिवीतलको घिसा है और जो मधुर भाषण कर रहे हैं ऐसे भरतकी आज्ञासे वश किये हुए लाट देशके राजा उनके लालाटिक पदको प्राप्त हुए थे। (ललाटं पश्यति लाला-टिकः-स्वामी क्या आज्ञा देते हैं ? यह जाननेके लिये जो सदा स्वामीके मुखकी ओर ताका करते हैं उन्हें लालाटिक कहते हैं।) ।॥९७।। चक्र रत्नसे विचलित हुए कितने ही वनके राजा ओंने सोरठ देशमें उत्पन्न हुए और कितने ही राजाओंने पंजाबमें उत्पन्न हुए हाथी भेंट देकर भरतके दर्शन किये ॥९८॥ जो चक्रके देखनेसे ही भयभीत हो गये हैं और जिन्होंने अपने देशका अभिभान छोड़ दिया है ऐसे कितने ही राजा लोग सूर्य चन्द्र आदि ग्रहोंके समान चक्रवर्तीके बश हो गये थे । भावार्थ- जिस प्रकार समस्त ग्रह भरतके वशीभूत थे- अनुकूल थे उसी प्रकार उस दिशाके समस्त राजा भी उनके वशीभूत हो गये थे ॥९९॥ चक्रवर्ती भरतने दिग्गजों के समान पृथुवंश अर्थात् उत्कृष्ट वंशमें उत्पन्न हुए (पक्षमें पीठपरकी चौड़ी रीढ़से सहित) और मदो-दूर अर्थात् अभिमानी (पक्षमें मदजलसे उत्कट) राजाओंको जबर्दस्ती आक्रमण कर अपने वश किया था ।।१००।। सैकड़ों ऊंट और घोड़ियोंकी भेंट लेकर आये हुए सोरठ देशके राजाओं से सेवा कराते हुए अथवा उनसे प्रीतिपूर्वक साक्षात्कार (मुलाकात) करते हुए चक्रवर्ती भरत गिरनार पर्वतके मनोहर प्रदेशोंमें जा पहुंचे ।।१०१ ॥
श्लोक 102 से 111 : गिरनार और पश्चिम के राजाओं की भेंट
भविष्यत् कालमें होनेवाले तीर्थ कर नेमिनाथका स्मरण करते हुए वे चक्रवर्ती सोरठ देशमें सुमेरु पर्वतके समान ऊंचे गिरनार पर्वतकी प्रदक्षिणा कर आगे बढ़े ।। १०२॥ उन उन देशोंके राजाओंने उत्तम उत्तम रेशमी वस्त्र, चायना सिल्क तथा और भी अनेक प्रकारके अच्छे अच्छे वस्त्र भेंट देकर महाराज भरत के दर्शन किये ।।१०३॥ भरतने कितने ही राजाओंको सन्मान तथा दानसे, कितने ही राजाओं को विश्वास तथा स्नेहपूर्ण बातचीतसे और कितने ही राजाओंको प्रसन्नतापूर्ण दृष्टिसे अनुरक्त किया था ।।१०४।। कितने ही राजाओंने संतुष्ट होकर उत्तम हाथों, कुलीन घोड़े और अनेक प्रकारके रत्नोंसे अपने देशमें आये हुए महाराज भरतकी पूजा की थी-॥१०५॥ अन्य कितने ही राजाओंने वेगसे चलनेवाले, तथा शरीर, बुद्धि, अवस्था और बल आदि गुणोंसे सहित तुरुष्क आदि देशोंमें उत्पन्न हुए घोड़ोंके द्वारा भरतकी सेवा की थी ॥१०६।। कितने ही राजाओंने उसी देशके घोड़े घोड़ियोंसे उत्पन्न हुए, तथा एक देशके घोड़े और अन्य देशकी घोड़ियोंसे उत्पन्न हुए, नाना दिशाओं और देशोंमें संचार करनेवाले, कुलीन और पूर्ण अंगोंपाङ्ग धारण करनेवाले, काम्बोज, वाल्हीक, तैतिल, आरट्ट, सैन्धव, वानायुज, गान्धार और बाण देशमें उत्पन्न हुए घोड़े भेंट कर महाराज के दर्शन किये थे ।। १०७-१०८।। इस प्रकार भरत को प्रत्येक पड़ावपर केवल रत्नोंकी ही प्राप्ति नहीं हुई थी किन्तु अपने पराक्रमसे बड़े बड़े दुःसाध्य (कठिनाइयोंसे जीते जाने योग्य) राजाओंको जीत लेनेसे यशकी भी प्राप्ति हुई थी ।।१०९।। भरतके सेनापतिने अपनो विजयी सेनाओंके द्वारा चारों ओरसे जल तथा स्थलके मार्ग रोककर पहाड़ी राजाओंको जीता ॥ ११०॥ सेनापतिने अनेक प्रकारके देश, बड़े बड़े जंगल, नदियां और पर्वत उल्लंघन कर सब जगह शीघ्र ही सम्राट् भरतकी आज्ञा स्थापित की ।। १११।।
श्लोक 112 से 121 : पश्चिम समुद्र की ओर विजय
इस प्रकार चक्रवर्ती क्रम क्रमसे पूर्व दिशाके राजाओंके समान पश्चिम दिशाके राजाओंको भी वश करता हुआ तथा उनके अभिमान और धनका हरण करता हुआ पश्चिम समुद्रकी ओर चला ।। ११२।। उस समय वह समुद्र ऐसा जान पड़ता था मानो किनारे पर बहनेवाली नदियां रूपी हाथोंको बहुत दूर तक फैलाकर नाना प्रकारके रत्नरूपी अर्घको धारण करता हुआ महाराज भरतकी अगवानी ही कर रहा हो अर्थात् आगे बढ़कर सत्कार ही कर रहा हो ॥११३॥ जो लोग कहा करते हैं कि समुद्रके रत्न सूपसे नापे जा सकते हैं वे उसकी ठीक ठीक प्रशंसा नहीं करते बल्कि अप्रशंसा ही करते हैं क्योंकि यहाँ तो इतने अधिक रत्न हैं कि जो बड़े बड़े जहाजरूप नापोंसे भी नापे जा सकते हैं ।॥११४।। यह समुद्र ‘लवण समुद्र’ इस नामसे बिलकुल ही तुच्छ कर दिया गया है, वास्तवमें यह रत्नाकर है इस प्रकार उस समय भरत आदि राजाओंने उसे बहुत बड़ा माना था ।।११५।। जिस दिशामें जाकर सूर्य भी अपने तेजकी अपेक्षा मन्द (फीका) हो जाता है उसी दिशामें पश्चिमी राजाओंको जीतते हुए चक्रवर्ती भरत का तेज अतिशय देदीप्यमान हो रहा था ।।११६॥ चक्ररत्नको धारण करता हुआ, युद्ध-रूपी समुद्रको पार करता हुआ और शत्रुओंको उद्विग्न करता हुआ वह भरत उस समय ठीक सूर्य के समान देदीप्यमान हो रहा था ॥११७॥ जो राज्यलक्ष्मीसे युक्त है ऐसे उस भरत ने समुद्रके किनारे किनारे जाकर अपने हृदय के समान कभी क्षुब्ध न होनेवाला अपनी सेनाका पड़ाव सिन्धु नदी के द्वारपर लगवाया। भावार्थ जहाँ सिन्धु नदी समुद्रमें जाकर मिलती है वहां अपनी सेनाके डेरे लगवाये ॥११८॥ सेनाके हाथियोंके उपभोगसे जहाँके वृक्ष निकुञ्ज अर्थात् लतागृहोंके समान हो गये हैं ऐसे सिन्धु नदीके किनारेके मनोहर वनमें भरतुकी सेनाके लोगोंने निवास किया ॥ ११९ ॥ तदनन्तर कार्यके प्रारम्भमें करने योग्य समस्त कार्यों को जाननेवाले पुरोहितने वहांपर मन्त्रोंके द्वारा चक्ररत्नकी पूजा कर विधिपूर्वक धर्मचक्रके स्वामी अर्थात् जिनेन्द्रदेवकी पूजा की और फिर गन्धोदकसे मिले हुए पवित्र सिद्ध शेषाक्षतों और पुण्यरूप अनेक आशीर्वादोंसे चक्रवर्ती भरतको आनन्दित किया ।। १२०-१२१।।
श्लोक 122 से 129 : समुद्र में प्रवेश और अंतिम विजय
तदनन्तर जिसने दिव्य अस्त्र धारण किये हैं ऐसे भरतने पहलेके समान रथपर चढ़कर गोष्पदके समान तुच्छ समझते हुए लवण समुद्रमें प्रवेश किया ।।१२२।। अपनी प्रभासे सूर्यकी प्रभाके समहको तिरस्कृत करते हुए भरतने वहां जाकर अतिशय कान्तिमान् प्रभास नामके व्यन्तरोंके स्वामी को जीता ॥१२३॥ तदनन्तर चक्रवर्तीने उस प्रभासदेवसे जयलक्ष्मीरूपी मछलीको पकड़ने के लिये जालके समान मोतियोंका जाल, कल्पवृक्षके फूलोंकी माला और सुवर्णका जाल भेंट स्वरूप प्राप्त किये ।।१२४।॥ इस प्रकार विजयी भरतने अपने पुण्यकर्मके उदयसे अच्छे अच्छे देवोंको भी जीता इसलिये हे पण्डित जन, तुम भी उत्कृष्ट फल देनेवाले पुण्यरूपी धनका सदा उपार्जन करो ॥१२५।। अनुपम लक्ष्मीके धारक भरत, उछलते हुए बड़े बड़े घोड़ोंकी सेना के खुरोंसे खुदी हुई पृथिवीसे उड़ती हुई रथकी धूलिके द्वारा समुद्रको कलुषता प्राप्त कराते हुए (गॅदला करते हुए) सिन्धुद्वारपर पहुंचे और वहां उन्होंने विधिपूर्वक प्रभास नामके देवको जीतकर उससे सारभूत धन प्राप्त किया । ॥ १२६॥ जो अपने वक्षःस्थलपर लक्ष्मीके भूला की लताके समान कल्पवृक्षके फूलोंकी माला धारण किये हुए है, जिसका ऊँचा शरीर मोती और सुवर्णके बने हुए दो जालोंसे अलंकृत हो रहा है, जो निर्भय है और लक्ष्मीका स्वामी है ऐसा यह भरत लक्ष्मीके विवाहगृहके समान समुद्रसे निकल रहा है और नवीन वरकी उत्कृष्ट कान्तिको धारण करता हुआ अत्यन्त सुशोभित हो रहा है ।। १२७।। इस प्रकार समुद्र-पर्यन्त पूर्व दिशाके राजाओंको, वैजयन्त पर्वत तक दक्षिण दिशाके राजाओंको और पश्चिम समुद्र की सीमा तक पश्चिम दिशाको जीतकर दिक्पालों के समान समस्त राजाओंसे नमस्कार कराते हुए तथा देवोंको भी कम्पायमान करते हुए राजाधिराज भरतने समस्त दिशाओंको शत्रुरहित कर दिया ॥१२८॥ पुण्यसे सबको विजय करनेवाली चक्रवर्तीकी लक्ष्मी मिलती है, इन्द्रकी दिव्य लक्ष्मी भी पुण्यसे मिलती है, पुण्यसे ही तीर्थ करकी लक्ष्मी प्राप्त होती है और परम कल्याण रूप मोक्षलक्ष्मी भी पुण्यसे ही मिलती है इस प्रकार यह जीव पुण्यसे ही चारों प्रकारकी लक्ष्मीका पात्र होता है, इसलिये हे सुधी जन ! तुम लोग भी जिनेन्द्र भगवान्के पवित्र आगमके अनुसार पुण्यका उपार्जन करो ।।१२९।।
इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रहके भाषानुवादमें पश्चिमसमुद्रके द्वारका विजय वर्णन करनेवाला तीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ।
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द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण भाग – 2
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आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena
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