Summary of Ādi purāṇa Parv 43 by Acharya Jinasena
संक्षिप्त सारांश: आदिपुराण पर्व 43 (श्लोक 1 से 339)
आदिपुराण के 43वें पर्व में भगवान वृषभदेव की महिमा, पुराण की रचना, और जयकुमार-सुलोचना के स्वयंवर का वर्णन है। वृषभदेव, प्रथम तीर्थंकर, ने मोक्ष मार्ग स्थापित किया। जिनसेनाचार्य द्वारा रचित पुराण का उत्तर भाग शिष्य गुणभद्र ने पूर्ण किया, जो निर्दोष और धर्मप्रद है। राजा सोमप्रभ ने संसार की अनित्यता समझकर जयकुमार को राज्य सौंपा और श्रेयांस सहित दीक्षा लेकर मोक्ष प्राप्त किया। जयकुमार ने पृथ्वी का पालन किया। एक उद्यान में मुनि शीलगुप्त से धर्म सुनते समय सर्प दंपति ने भी श्रवण किया; सर्प की मृत्यु से वह देव बना। जयकुमार ने सर्पिणी को काकोदर सर्प के साथ देखकर ताड़न किया, जिससे दोनों मरे। सर्पिणी नागकुमार की पत्नी बनी, जिसने जयकुमार पर क्रोध किया, पर धर्म के प्रभाव से उसकी पूजा कर लौट गया। जयकुमार ने स्त्रियों की निंदा की, पर अपनी रानी को दुर्लभ बताया। वह भरत के साथ दिग्विजय कर शांत जीवन जिया।
काशी के वाराणसी में राजा अकम्पन और रानी सुप्रभा की कन्या सुलोचना की शोभा अद्वितीय थी। उसने जिनेंद्र की पूजा, उपवास, और दान कर सम्यग्दर्शन प्राप्त किया। अकम्पन ने उसके विवाह के लिए मंत्रियों से परामर्श किया। सुमति के सुझाव पर स्वयंवर आयोजित हुआ। विचित्रांगद देव ने भव्य स्वयंवर भवन बनाया। वसंत ऋतु में भूमिगोचरी और विद्याधर राजा आए। सुलोचना ने रथ पर सवार हो राजाओं को देखा और जयकुमार को रत्नमाला पहनाकर चुना। उत्सव में नगाड़े बजे, नगरी सजी, और राजा अकम्पन ने अतिथियों का सत्कार किया। जयकुमार का यश फैला, जो सूर्य-चंद्रमा को जीतने वाला था। जिनेंद्र की उपासना से पुण्यार्जन की प्रेरणा दी गई।
हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 43
श्लोक 1 से 11 वृषभदेव की महिमा और पुराण की प्रस्तुति
भगवान वृषभदेव की महिमा का वर्णन किया गया है, जिनके ध्वज में वृषभ चिह्न है और जिन्होंने मोक्ष मार्ग का उपदेश देकर तीनों लोकों को प्रकाशित किया। वे प्रथम तीर्थंकर हैं, जिनके उपदेश से मोक्ष मार्ग की स्थापना हुई, और अन्य तीर्थंकरों के उपदेश उनके अनुसरण में ही हैं। उनकी महिमा को एकमात्र ओम् अक्षर के समान बताया गया है। जिनसेनाचार्य द्वारा रचित इस पुराण का शेष भाग शिष्य गुणभद्र द्वारा पूर्ण किया जा रहा है, जो गुरु के मार्गदर्शन में शब्द और अर्थ से सुशोभित है। विद्वानों से इसकी स्वीकृति और श्रवण की अपेक्षा की गई है।
श्लोक 12 से 21 पुराण की रचना और इसका महत्व
पुराण का पूर्व भाग जिनसेनाचार्य द्वारा और उत्तर भाग शिष्य गुणभद्र द्वारा रचित है, जो गुरु-शिष्य परंपरा से सुंदर बनता है। इसकी रचना को धर्म ग्रहण करने की सलाह दी गई है, न कि रचनाकार की योग्यता पर ध्यान देने की। गुरुओं का प्रभाव रचना को सुसंस्कृत करता है। यह पुराण दोषों को गुणों में बदलने और भव्य जीवों के लिए निर्दोष होने का दावा करता है। सज्जन गुणों को ग्रहण करते हैं, जबकि दुर्जन दोषों को देखते हैं, जो सम्यक् और मिथ्या ज्ञान का परिचायक है।
श्लोक 22 से 31 रचना की चुनौतियाँ और कवि की भूमिका
दुर्जनों द्वारा निंदा को स्वीकार किया गया है, पर गुणों को ग्रहण न करने की प्रार्थना की गई है, ताकि रचना निर्दोष रहे। अज्ञानी की निंदा या स्तुति हास्यास्पद होती है, और महापुरुष छोटे उपद्रवों से विचलित नहीं होते। कवि का परिश्रम केवल कवि ही समझ सकता है। रचना की स्तुति और निंदा दोनों ही कवि की कीर्ति को बढ़ाती हैं, जैसे अर्जुन के बाण खोटे संस्कारों को दुख देते हैं।
श्लोक 32 से 46 पुराण की पूर्णता और प्रभाव
रचना को गुरुओं के मार्गदर्शन में शुद्ध करने की अपेक्षा की गई है। यह पुराण धर्मरूपी रत्न है, जिसे पंडित ग्रहण करेंगे। यह रचना सुंदरी स्त्री के समान रस, अलंकार और विचित्र शब्दों से युक्त है, जो सभी के मनोरथ पूर्ण करती है। यह पापों को नष्ट करती है, पुण्य को बढ़ाती है, और युगों तक स्थिर रहेगी। इसकी सिद्धि में गुरु जिनसेनाचार्य का मार्गदर्शन महत्वपूर्ण है।
श्लोक 47 से 69 जयकुमार के चरित्र की मांग
राजा श्रेणिक, वृषभदेव के चरित्र से प्रभावित होकर, उनके 84 गणधरों में से 71वें गणधर जयकुमार के चरित्र को सुनने की इच्छा प्रकट करते हैं। जयकुमार ने अर्ककीर्ति को युद्ध में जीता और उनके प्रताप की प्रशंसा की गई। गणधरों के नामों का उल्लेख करते हुए उनकी महिमा और गुणों का वर्णन किया गया है, जो सर्वज्ञ के अनुरूप थे।
श्लोक 70 से 81 जयकुमार के चरित्र का प्रारंभ
राजा श्रेणिक की प्रार्थना पर गौतम गणधर जयकुमार का18 के चरित्र को सुनाने के लिए तैयार होते हैं। कुरुजांगल देश के हस्तिनापुर नगर में राजा सोमप्रभ और उनकी पत्नी लक्ष्मीवती के पुत्र जयकुमार का जन्म हुआ। जयकुमार गुणों से युक्त और कीर्ति विस्तारक थे। उनके 14 अन्य भाई भी गुणवान थे, जो राजा सोमप्रभ को सुशोभित करते थे।
श्लोक 82 से 91 जयकुमार का राज्य और धर्म श्रवण
राजा सोमप्रभ, रानी लक्ष्मीवती, छोटा भाई श्रेयांस और पुत्र जयकुमार से सुशोभित राज्य पूजनीय था। सोमप्रभ ने संसार की अनित्यता समझकर जयकुमार को राज्य सौंपा और श्रेयांस के साथ भगवान वृषभदेव से दीक्षा लेकर मोक्ष प्राप्त किया। जयकुमार ने पिता के पद पर पृथ्वी का पालन किया और भाइयों के साथ भोगों का उपभोग किया। एक दिन उद्यान में मुनि शीलगुप्त के दर्शन कर धर्म सुना। वहाँ सर्प दंपति ने भी धर्म श्रवण किया, जिनमें सर्प वज्रपात से मरकर देव हुआ।
श्लोक 92 से 102 सर्पिणी का मरण और नागकुमार का क्रोध
जयकुमार ने उद्यान में सर्पिणी को काकोदर सर्प के साथ देखकर क्रोधित होकर दोनों को ताड़न किया। सैनिकों ने उन्हें मार डाला। सर्प जलदेवता और सर्पिणी नागकुमार की पत्नी बनी। नागकुमार ने जयकुमार पर सर्पिणी के मरण का दोष लगाकर उसे मारने की ठानी और उसके घर पहुँचा। जयकुमार ने रानी श्रीमती से सर्पिणी की कुकृत्य बताते हुए स्त्रियों की निंदा की।
श्लोक 103 से 111 स्त्रियों की निंदा
जयकुमार ने कहा कि स्त्रियाँ धर्म और काम से धन खरीदती हैं, उनमें विष भरा है, और उनके सत्याभास नमस्कार बुद्धिमानों को ठगते हैं। उनकी प्रसन्नता भयंकर है, और वे मायाचारी हैं। गुण स्त्रियों में स्थिर नहीं रहते, और दोष उनकी उत्पत्ति हैं। वे निर्गुण को गुणी मान लेती हैं, और उनके चंचल स्वभाव के कारण शास्त्रों में उनका मोक्ष नहीं माना गया।
श्लोक 112 से 121 नागकुमार का परिवर्तन और जयकुमार का शांत जीवन
जयकुमार ने रानी को अपवाद बताया कि लक्ष्मी, सरस्वती, कीर्ति, मुक्ति और वह स्वयं दुर्लभ हैं। नागकुमार ने जयकुमार की निंदा सुनी, पर धर्म के प्रभाव से क्रोध त्यागकर उसकी पूजा की और अपने इरादे बताकर लौट गया। जयकुमार ने भरत के साथ दिग्विजय किया और शांत भाव से नगर में निवास किया, जो सौम्य, गुणाकर और सुंदर था।
श्लोक 122 से 131 काशी और वाराणसी का वर्णन
भरत क्षेत्र में काशी देश स्वर्ग और मोक्ष को जीतने वाला था, जहाँ कल्पवृक्ष थे। वाराणसी नगरी अमरपुरी को लज्जित करती थी, जहाँ पापी जीव जन्म नहीं लेते थे। यह नगरी जिनवाणी की तरह धर्म मार्ग पर ले जाती थी। राजा अकम्पन, विद्या और नीति से युक्त, प्रजा का पालन करते थे और भगवान वृषभदेव को पूज्य मानते थे। उनकी रानी सुप्रभा चंद्रमा की तरह थी।
श्लोक 132 से 141 सुप्रभा और सुलोचना का वर्णन
सुप्रभा ने राजा को पुत्रों से आनंदित किया। उनके हजार पुत्रों में हेमांगद आदि थे। सुप्रभा से सुलोचना और लक्ष्मीमती कन्याएँ उत्पन्न हुईं। सुलोचना लक्ष्मी की तरह मनोहर थी, और धाय सुमित्रा ने उसका पालन किया। उसके चरणकमल रागी थे, और नख चांदनी की तरह कुमुदिनियों को विकसित करते थे। उसके पैरों की अंगुलियाँ कामदेव के वेगों की तरह थीं, और चरणों की शोभा अद्वितीय थी।
श्लोक 142 से 151 सुलोचना की शारीरिक शोभा
सुलोचना की जंघाएँ संतुलित थीं, और नितम्ब कामदेव की वेदी जैसे थे। उसका मध्य भाग त्रिवली से बंधा था, और नाभि से रोमराजि घास की तरह थी। उसके स्तन स्याद्वाद की तरह विरुद्ध धर्म धारण करते थे। भुजाएँ लक्ष्मी को आलिंगन करती थीं, और कंठ जयकुमार के हाथों से सुशोभित था। कपोल दर्पण जैसे थे, और ओठ बिम्बी फल से भी श्रेष्ठ थे।
श्लोक 152 से 161 सुलोचना के मुख की शोभा
सुलोचना के दाँत सुंदर और चमकीले थे, और नाक मुख की सुगंध का स्वाद लेती थी। उसके नेत्र विशाल और कटाक्षपूर्ण थे, जो जयकुमार को जीतते थे। कान जयकुमार के प्रेम संभाषण के पात्र थे। भौंहें कामदेव के धनुष थीं, और ललाट उन्नत था। बाल काले सर्प जैसे थे, और उसका शरीर परमाणुओं से बना था। उसका मुख चंद्रमा से भी श्रेष्ठ था, क्योंकि वह निष्कलंक और पूर्ण था।
श्लोक 162 से 171 सुलोचना के मुख की शोभा
सुलोचना के मुख की शोभा कमल से श्रेष्ठ थी, जो सदा एकरूप रहकर भी प्रतिक्षण विलक्षण शोभा धारण करती थी, स्याद्वाद का स्वरूप प्रकट करती थी। यह शोभा न चंद्रमा के समान सूर्य से नष्ट होती थी, न कमल की तरह चंद्रमा से। यह रात-दिन पूर्ण और विकसित रहती थी। सुलोचना का मुख देखने वाले और उसके द्वारा देखे जाने वालों की शोभा बढ़ती थी। उसने कुमारी अवस्था में कामदेव और युवावस्था में जयकुमार को जीत लिया, लक्ष्मी आदि को परास्त किया। उसकी कान्ति ने चंद्रमा को क्षयरोगी बना दिया, और उसका मुख कुमुद, कमल सहित सब कुछ जीत लेता था।
श्लोक 172 से 181 सुलोचना की भक्ति और विवाह चिंता
सुलोचना ने जिनेंद्रदेव की रत्नमयी प्रतिमाएँ बनवाकर उनकी पूजा, स्तुति, दान और धर्म-श्रवण किया, जिससे सम्यग्दर्शन प्राप्त किया। फाल्गुन में अष्टाह्निकी पूजा और उपवास कर वह राजा अकम्पन को शेषाक्षत देने गई। राजा ने उसे पारणा के लिए विदा किया और उसकी यौवनावस्था देखकर विवाह की चिंता करने लगा। उन्होंने चार मंत्रियों—श्रुतार्थ, सिद्धार्थ, सर्वार्थ, सुमति—को बुलाकर कन्या के विवाह पर विचार-विमर्श किया।
श्लोक 182 से 191 मंत्रियों का परामर्श
राजा अकम्पन ने मंत्रियों से पूछा कि सुलोचना किसे दी जाए। श्रुतार्थ ने चक्रवर्ती के पुत्र अर्ककीर्ति को उपयुक्त बताया, जिसके गुण और कीर्ति सर्वत्र फैली थी। सिद्धार्थ ने छोटे कुल के साथ बड़े कुल का संबंध उचित न मानकर प्रभंजन, जयकुमार आदि समकक्ष राजपुत्रों का सुझाव दिया। सर्वार्थ ने विद्याधरों से संबंध को लाभकारी और प्रशंसनीय बताया। सुमति ने स्वयंवर की प्राचीन विधि का प्रस्ताव रखा, जिससे किसी से वैर न हो और राजा की यश-कीर्ति बढ़े।
श्लोक 192 से 201 स्वयंवर का निर्णय
सुमति के स्वयंवर प्रस्ताव को सबने स्वीकार किया, क्योंकि यह नीतिसम्मत और वैर-रहित था। राजा ने मंत्रियों को विदा कर सुप्रभा और पुत्र हेमांगद से विचार-विमर्श किया। उन्होंने कुल के वृद्धों और बंधुओं से परामर्श लिया। राजा ने विभिन्न प्रकार के दूत भेजकर राजाओं को स्वयंवर के लिए आमंत्रित किया, जिसमें निसृष्टार्थ, मितार्थ और उपहार सहित पत्र ले जाने वाले दूत शामिल थे।
श्लोक 202 से 213 स्वयंवर भवन की रचना
पूर्वभव में राजा अकम्पन का भाई रहा विचित्रांगद देव सौधर्म स्वर्ग से सुलोचना का स्वयंवर देखने आया। उसने राजा की आज्ञा से नगर के समीप सर्वतोभद्र राजभवन बनाया, जो मंगलद्रव्यों, विवाह मंडप और रत्न-सुवर्ण से सुशोभित था। इसके चारों ओर स्वयंवर महाभवन बनाया गया, जिसमें चार दरवाजे, गोपुर, रत्न-तोरण, सुवर्ण-कलश और नीलमणि-जड़ित धरातल था। यह भवन भोग-उपभोग की वस्तुओं से परिपूर्ण और पुण्य के प्रभाव से निर्मित था।
श्लोक 214 से 221 वसंत ऋतु का आगमन
राजा अकम्पन स्वयंवर भवन देखकर संतुष्ट हुए। वसंत ऋतु का प्रारंभ हुआ, जिसमें मलयानिल चंदन, इलायची और लवंग की सुगंध लिए बह रहा था। लताएँ और वृक्ष शाखाएँ मलयानिल का आलिंगन करती थीं। सूर्य उत्तरायण में था, और कोयलें मधुर स्वर कर रही थीं। चंपा, अशक, चमेली और मौलश्री के वृक्ष फूलों से लदे थे, जो भक्तों और भमरों को आकर्षित करते थे।
श्लोक 222 से 232 स्वयंवर की तैयारियाँ और राजाओं का आगमन
मौलश्री वृक्ष गुणों से युक्त थे। वसंत के सहयोग से दूतों ने भूमिगोचरी और विद्याधर राजाओं को स्वयंवर का समाचार दिया। नगाड़ों के शब्द और सुलोचना की आकर्षिणी विद्या से प्रेरित विद्याधर राजा विमानों से आए। राजा अकम्पन ने उनकी अगवानी की और वाराणसी में प्रवेश कराया। हेमांगद आदि पुत्रों के साथ उन्होंने अर्ककीर्ति और जयकुमार की अगवानी की, मानो उनकी सिद्धि को सूचित करते हुए।
श्लोक 233 से 242 राजाओं का स्वागत और उत्सव
तीनों समुद्रों के बीच के राजा बनारस आए। राजा अकम्पन ने कुछ राजाओं की स्वयं और कुछ की हेमांगद आदि के माध्यम से अगवानी की। सुलोचना के कारण वाराणसी अयोध्या को लज्जित करती थी, क्योंकि कन्या-रत्न सर्वश्रेष्ठ था। राजा ने अर्ककीर्ति आदि को स्वयंवर शाला में ठहराया, जिनेंद्रदेव की पूजा की, और दीन-अनाथों को दान देकर उत्सव की तैयारी की। यह सब पूर्वार्जित धर्म का फल था, जिससे उनकी लक्ष्मी क्षयरहित और पृथ्वी उपभोग्य बनी।
श्लोक 243 से 251 स्वयंवर उत्सव का प्रारंभ
राजा अकम्पन ने जिनेंद्रदेव की पूजा कर स्वयंवर कार्य प्रारंभ किया, जो सफलता की गारंटी थी। भेरी की ध्वनि से आनंद छाया। पृथ्वी पर फूल, आकाश में पताकाएँ, नगाड़ों से दिशाएँ गूंजीं। गलियाँ शुद्ध कर तोरण बाँधे गए, महल चूने से सजाए गए। स्त्रियाँ कज्जल, मालाएँ, तिलक, कुंडल, पत्ररचना, पान, मोती, चंदन, और नूपुरों से सुशोभित थीं, जो स्वर्गपुरी को लज्जित करती थीं।
श्लोक 252 से 264 नगरी और उत्सव की शोभा
वाराणसी नगरी अचिंत्य वैभव से अलंकृत थी, राजमहल का उत्सव नगर से ही प्रकट था। सचेतन और अचेतन सभी उत्सव मना रहे थे। कोई भोग या भोक्ता अभावग्रस्त न था, कामदेव और लक्ष्मी सदा उपस्थित थे। धर्मात्मा इस पुण्य का माहात्म्य देख आदर करते थे। मुनि इसे धर्म का फल मान प्रसन्न हुए। सौभाग्यवती स्त्रियाँ सुलोचना को मंगलद्रव्यों से युक्त मंडप में ले गईं, अभिषेक कर चैत्यालय में जिनपूजा कराई, शेषाक्षत दिए, और शुभ लग्न की प्रतीक्षा में ठहरीं।
श्लोक 265 से 275 राजाओं का आगमन और कामदेव की उपस्थिति
अकम्पन के संदेश पर भूमिगोचरी और विद्याधर राजा सज्जित हो आसनों पर बैठे, जो देवों से युक्त और कामदेव के रूपों जैसे थे। वे सुलोचना को जीतने की आशा में अहंकारी थे। कामदेव, वसंत ऋतु, मलय पर्वत की सुगंध, कावेरी के कमल, और कोयल-भ्रमरों के स्वरों से युक्त, दक्षिण वायु का सहयोग ले सब देशों को जीतकर वहाँ पहुँचा।
श्लोक 276 से 291 सुलोचना का स्वयंवर मंडप में प्रवेश
राजा अकम्पन, सुप्रभा और कुटुंब के साथ स्वयंवर मंडप में विराजमान हुए। महेंद्रदत्त कंचुकी सुलोचना को अलंकृत रथ पर लाया। हेमांगद ने सेना के साथ रथ की रक्षा की। सुलोचना ने नगाड़ों, छत्र, और राजाओं की दृष्टियों के बीच स्वयंवर शाला में प्रवेश किया, नीलकमल-नेत्रों से राजाओं को सींचा। राजा उसकी दृष्टि से संतुष्ट हुए, और वह भी राजाओं को देख प्रसन्न हुई। कंचुकी के कहने पर वह महल से उतरी, जिससे राजा खिन्न हुए। सुलोचना रथ पर सवार हो कामदेव को स्वीकार कर सबके हृदय आकर्षित करती रही।
श्लोक 292 से 301 सुलोचना की श्रेष्ठता
कामदेव सुलोचना के अंगों में प्रविष्ट हो विकार प्रकट करता था, अपने शरीर-रहित होने को श्रेष्ठ मानता था। सुलोचना लक्ष्मी और रति से श्रेष्ठ थी, जो जयकुमार को प्राप्त होगी। उसका पाणिग्रहण करने वाला सच्चा लक्ष्मीवान होगा। उसका लावण्य समुद्र और सुलोचना में ही था, जिसने राजाओं को आकर्षित किया। समुद्र रत्नाकर होने का अहंकार करता था, पर सुलोचना रूपी रत्न अकम्पन और सुप्रभा के पास था। सुलोचना स्वयंवर भवन में लक्ष्मी-सी पहुँची, राजा प्रेम और शोक के मिश्रित रस में डूबे।
श्लोक 302 से 311 सुलोचना का जयकुमार की ओर अग्रसर होना
महेंद्रदत्त कंचुकी ने रथ को विद्याधर राजाओं की ओर ले जाकर नमि, विनमि, सुनमि, सुविनमि आदि का परिचय दिया। सुलोचना ने सबको छोड़ आगे बढ़ी। विद्याधर आशा में बैठे रहे। रथ भूमिगोचरियों की ओर उतरा। सुलोचना, कोयल की तरह, अर्ककीर्ति आदि को छोड़ जयकुमार के पास पहुँची। कंचुकी ने जयकुमार का गुण-वर्णन प्रारंभ किया।
श्लोक 312 से 321 जयकुमार का गुण-वर्णन
कंचुकी ने जयकुमार को सोमप्रभ का पुत्र, कुलदीपक, और भाइयों से युक्त बताया। उसका रूप वर्णनातीत था। उसने मेघकुमार को जीतकर सिंहनाद किया, जिसके लिए भरत ने उसे वीरपट्ट और मेघस्वर नाम दिया। वह गुणवान, आदरणीयों का संग करता था। उसका दोष केवल चार प्रियाएँ—श्री, कीर्ति, वीरलक्ष्मी, सरस्वती—थीं। वह सुलोचना को जीतने के लिए अधीर था, कामदेव को सहायक बनाकर। उसकी कीर्ति और प्रभा सूर्य-चंद्रमा को निस्तेज करती थी। उसकी प्रीति सुलोचना में फलीभूत होगी।
श्लोक 322 से 331 सुलोचना का जयकुमार को वरण
कामदेव, जयकुमार और सुलोचना का शत्रु, सुलोचना पर निष्ठुर था। सुलोचना ने अपनी दृष्टि से जयकुमार को जीत लिया। कंचुकी के वचनों से लज्जा छोड़, सुलोचना ने जन्मांतर के स्नेह, जयकुमार की आकृति, और कामदेव के प्रभाव से रथ से उतरकर रत्नमाला जयकुमार के गले में डाली। बाजों की ध्वनि से उत्सव गूंजा। जयकुमार का मुख लक्ष्मी से सुशोभित था।
श्लोक 332 से 339 उत्सव का समापन और जयकुमार की महिमा
अन्य राजाओं के मुख म्लान हो गए। अकम्पन, सुलोचना और जयकुमार को लेकर नगर में प्रविष्ट हुए। जयकुमार का यश कल्पान्त तक फैला। वह सूर्य-चंद्रमा को जीतने वाला, सौभाग्यशाली था। लोगों ने उसकी पुण्य, रूप, और सौभाग्य की प्रशंसा की। वह पृथ्वीमंडल को प्रसन्न करता, सदा बढ़ता रहा। जिनेंद्र की उपासना से जयकुमार को लक्ष्मी प्राप्त हुई। श्रद्धावान पुरुषों को जिनेंद्र के चरणों की उपासना की सलाह दी गई।
पर्व 44
हिन्दी-भाषानुवाद
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द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण सारांश
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