आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वतकी गुफाका द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61
श्लोक 62 से 71 : राजाओं का समर्थन और युद्ध की तैयारी
समीपवर्ती राजाओं ने भरत की सेना को भूसा और ईंधन प्रदान किया। कुरु देश के जयकुमार सहित अनेक राजा और योद्धा भरत के समर्थन में आए। म्लेच्छ राजाओं को जीतने के लिए धनुष-बाण और तलवारों से सुसज्जित सेना तैयार हुई। योद्धा शत्रुओं को हराने के लिए उत्साहित थे, और उनके कवच और शस्त्र युद्ध की तैयारी को दर्शाते थे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 31 – Shlok 62 to 71
श्लोक ( Shlok ) 62
विष्वगापूर्यमाणस्य रैराशिभिरनारतम् । कोश प्रावेशरत्नानामियत्तां कोऽस्य निर्णयेत् ॥६२॥
धनकी राशियों से निरन्तर चारों ओरसे भरते हुए भरतके खजाने में प्रविष्ट हुए रत्नोंकी मर्यादा (संख्या) का भला कौन निर्णय कर सकता था ? भावार्थ-उसके खजानेमें इतने अधिक रत्न इकट्ठे हो गये थे कि उनकी गणना करना कठिन था ।। ६२।।
“As streams of wealth poured in from all directions, who indeed could reckon the measure of the countless jewels that entered Bharata’s ever-filling treasury?”62
श्लोक ( Shlok ) 63
देशाध्यक्षा बलाध्यक्षैर्बलं सुकृतरक्षणम् । यवसेन्धन सन्धानैस्तदोपजगृ हुश्चिरम् ।॥६३॥
उस समय समीपवर्ती देशोंके राजाओंने, सेनापतियोंके द्वारा जिसकी अच्छी तरह रक्षा की गई है ऐसी भरतकी सेनाको चिरकाल तक भूसा, ईंधन आदि वस्तुएँ देकर उपकृत किया था ।। ६३।।
“At that time, the kings of the neighboring realms, honoring the well-guarded army of Bharata—secured by valiant commanders—rendered noble service by supplying fodder, fuel, and other essential provisions for a long duration.”63
श्लोक ( Shlok ) 64
उत्तरार्द्धजयोद्योगं प्रभोः श्रुत्वा तदागमन् । पार्थिवाः कुरुराजाद्याः समग्रबलवाहनाः ॥६४।।
महाराज भरत विजयार्ध पर्वत से उत्तर भाग को जीतनेका उद्योग कर रहे हैं यह सुनकर कुरु देशके राजा जयकुमार तथा और भी अनेक राजा लोग अपनी समस्त सेना और सवारियाँ लेकर उसी समय आ पहुंचे ॥६४॥
“Hearing that the great Emperor Bharata was preparing to advance northward from the Vijayārddha mountain, King Jayakumāra of the Kuru land, along with many other monarchs, hastened to him at once, bringing their full armies and cavalries in loyal support.”64
श्लोक ( Shlok ) 65
आहूताः केचिदाजग्मुः प्रभुणा मण्डलाधिपाः । अनाहूताश्च संभेजु विभुं चारुभटाः परे ॥६५।।
कितने ही मण्डलेश्वर राजा भरतके बुलाये हुए आये थे और कितने ही उत्तम उत्तम योद्धा बिना बुलाये ही उनके समीप आ उपस्थित हुए थे ।। ६५।।
“Many Maṇḍaleśvara kings came at Bharata’s summons, while countless valiant warriors, without even being called, gathered around him of their own accord.”65
श्लोक ( Shlok ) 66
विदेशः किल यातव्यो जेतव्या म्लेच्छभूमिपाः । इति संचिन्त्य सामन्तैः प्रायः सज्ज धनुर्बलम् ॥६६॥
अब विदेशमें जाना है और म्लेच्छ राजाओंको जीतना है यही विचार कर सामन्तोंने प्रायः धनुष-बाणको धारण करने वाली सेना तैयार की थी ॥६६॥
“Now, with the thought of advancing into foreign lands and subjugating the Mleccha kings, the vassal lords diligently readied their armies—warriors bearing bows and arrows, prepared for battle.”66
श्लोक ( Shlok ) 67
धन्विनः शरनाराचसंभृतेषुधिबन्धनैः । न्यवेदयन्निवात्मानमृणदासमधीशिनाम् ॥६७॥
धनुष धारण करनेवाले योद्धा छोटे-बड़े बाणोंसे भरे हुए तरकसोंके बाँधनेसे ऐसे जान पड़ते थे मानो वे अपने स्वामियोंसे यही कह रहे हों कि हम लोग आपके ऋण के दास हैं अर्थात् आज तक आप लोगोंने जो हमारा भरणपोषण किया है उसके बदले हम लोग आपकी सेवा करनेके लिये तत्पर हैं ।॥ ६७।।
“The bow-bearing warriors, girded with quivers brimming with arrows both great and small, seemed to proclaim to their lords: ‘We are but your indebted servants—sustained by your care, we now stand ready to repay that debt through unwavering service.'”67
श्लोक ( Shlok ) 68
धनुर्धरा धनुः सज्ज्यमास्फाल्य चकृषु परे । चिकीर्षव इवारीणां जीवाकर्ष सहुंकृताः ॥६८।।
हुंकार शब्द करते हुए कितने ही धनुषधारी लोग अपने ड़ोरी सहित धनुषको आस्फालन कर खींच रहे थे और उससे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो शत्रुओं के जीवोंको ही खींचना चाहते हों ॥ ६८॥
“With fierce war-cries, countless bowmen stretched their strung bows in thunderous unison, as though they sought to draw forth not arrows, but the very life-breath of their foes.”68
श्लोक ( Shlok ) 69
करवालान् करे कृत्वा तुलयन्ति स्म केचन । स्वामिसत्कारभारेण नूनं तान् प्रमिमित्सवः ॥६९॥
कितने ही योद्धा लोग हाथमें तलवार लेकर उसे तोल रहे थे मानो स्वामीसे प्राप्त हुए सत्कारके भारके साथ उसका प्रमाण ही करना चाहते हों ।। ६९।।
“Many warriors, swords in hand, were testing their weight—almost as if they sought to measure them against the burden of honor bestowed upon them by their sovereign.”69
श्लोक ( Shlok ) 70
संवर्मिता भृशं रेजुर्भटाः प्रोल्लासितासयः। निर्मोकैरिव विश्लिष्टै ललज्जिह्वामहाहयः ॥७०॥
जो कवच धारण किये हुए हैं और जिनकी तलवारें चमक रही हैं ऐसे कितने ही योद्धा इतने अच्छे सुशोभित हो रहे थे मानो जिनकी काँचली कुछ ढीली हो गई है और जीभ बार-बार बाहर लपक रही है ऐसे बड़े बड़े सर्प ही हों ।॥७०॥
“Clad in armor and radiant with flashing swords, many warriors shone with such splendor that they seemed like great serpents—whose loosened hood-vests fluttered and whose tongues darted forth again and again.”70
श्लोक ( Shlok ) 71
साटोपं स्फुटिताः केचिद् वरुगन्ति स्माभितो भटाः । अस्युद्यताः पुरोऽरातीन् पश्यन्त इव सम्मुखम् ll७१ ll
कितने ही योद्धा अभिमानसहित हाथमें तलवार उठाये और गर्जना करते हुए चारों ओर इस प्रकार घूम रहे थे मानो शत्रुओंको अपने सामने ही देख रहे हों ।।७१।।
“Many warriors, brandishing their swords with proud defiance and roaring aloud, paced fiercely in all directions—as though their enemies already stood before their eyes.”
श्लोक 72 से 81
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 169
आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वतकी गुफाका द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61