आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121
श्लोक 122 से 131 बाणों की तुलना और युद्ध की तीव्रता
बाणों की तुलना वेश्याओं, नौकरों, और पक्षियों से की गई, जो रक्त बहाते और शत्रुओं को वश में करते थे। धनुर्धारी योद्धा शत्रु के बाणों का जवाब देते थे, और बाण सन्धि-विग्रह जैसे गुणों से युक्त होकर सिद्धि प्राप्त करते थे। युद्ध में रुधिर की धारा वीररस की तरह सुशोभित थी, और बाण शत्रुओं को भेदकर उनकी मृत्यु का कारण बने।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 122 to 131
श्लोक ( Shlok ) 122
धर्मेण गुणयुक्तेन प्रेरिता हृदयं गता । शूरान् शुद्धिरिवानैषीद् गर्ति पत्रिपरम्परा ॥१२२॥
जिस प्रकार गुणयुक्त धर्मके द्वारा प्रेरणा की हुई और हृदयमें प्राप्त हुई विशुद्धि पुरुषोंको मोक्ष प्राप्त करा देती है उसी प्रकार गुणयुक्त (डोरी सहित) धर्म (धनुष) के द्वारा प्रेरणा की हुई और हृदयमें चुभी हुई बाणोंकी पंक्ति शूरवीर पुरुषोंको परलोक पहुंचा रही थी ॥१२२॥
“Just as purity, attained through virtuous and righteous conduct, leads men to liberation, even so, the rows of arrows—driven by the virtuous bow, strung with strength, and piercing the heart—were dispatching valiant warriors to the other world.” ॥122॥
श्लोक ( Shlok ) 123
पुंसां संस्पर्शमात्रेण हृद्गता रक्तवाहिनी। क्षिप्रं न्यमीलयन्नेत्रे वेश्येव विशिखावली ॥१२३॥
जिस प्रकार हृदयमें प्राप्त हुई और रक्तवाहिनी अर्थात् अनुराग धारण करनेवाली अथवा रागी पुरुषोंको वश करनेवाली वेश्या स्पर्शमात्रसे ही पुरुषोंके नेत्र बन्द कर देती है उसी प्रकार हृदयमें लगी हुई और रखतवाहिनी अर्थात् रुधिर को बहानेवाली बाणोंकी पंक्ति स्पर्शमात्रसे शीघ्र ही पुरुषोंके नेत्र बन्द कर देती थी-उन्हें मार डालती थी ।।१२३॥
“Just as a courtesan, once lodged in the heart and bearing the allure of passion, closes the eyes of men at a mere touch—subduing them through desire—so too did the rows of arrows, piercing the heart and causing blood to flow, swiftly close the eyes of warriors with but a single touch—striking them down in death.” ॥123॥
श्लोक ( Shlok ) 124
त्यक्त्वेशं खेचरात्रातिवृष्टौ गुद्धूतमस्ततौ । परोऽन्विष्य शरावल्या जारयेव वशीकृतः ॥१२४।॥
जिस प्रकार बहुत वर्षा होने और अन्धकारका समूह छा जानेपर व्यभिचारिणी स्त्री अपना पति छोड़ किसी परपुरुषको खोजकर वश कर लेती है उसी प्रकार विद्याधरोंके खूनकी बहुत वर्षा होने और गुद्ध पक्षीरूपी अन्धकारका समूह फैल जानेपर बाणों-की पंक्ति अपने स्वामीको छोड़ खोज खोजकर शत्रुओंको वश कर रही थी ।। १२४।।
“Just as, when heavy rains fall and darkness spreads, a wanton woman abandons her husband and seeks out another man to ensnare—so too, amidst the heavy rain of the Vidyādharas’ blood and the enveloping darkness of circling vultures, the rows of arrows forsook their masters and, seeking out foes, brought them under their sway.” ॥124॥
श्लोक ( Shlok ) 125
प्रगुणा मुष्टि संवाह्या दूरं दृष्ट्यनुवर्तिनः । गत्वेष्टं साधयन्ति स्म सद्भृत्या इव सायकाः ॥१२५॥
अथवा वे बाण अच्छे नौकरोंके समान दूर दूरतक जाकर इष्ट कार्योंको सिद्ध करते थे क्योंकि जिस प्रकार अच्छे नौकर प्रगुण अर्थात् श्रेष्ठ गुणोंके धारक अथवा सीधे होते हैं उसी प्रकार बाण भी प्रगुण अर्थात् सीधे अथवा श्रेष्ठ डोरीसे सहित थे, अच्छे नौकर जिस प्रकार मुट्ठियोंसे दिये हुए अन्नप्र निर्वाह करते हैं उसी प्रकार वे बाण भी मुट्ठियों द्वारा चलाये जाते थे और अच्छे नौकर जिस प्रकार मालिककी दृष्टिके अनुसार चलते हैं उसी प्रकार वे बाण भी मालिककी दृष्टिके अनुसार चल रहे थे ॥ १२५।।
“Or rather, those arrows resembled loyal servants, who journey far and wide to accomplish their master’s will—for just as good servants are upright and possessed of noble qualities, so too were the arrows straight and bound with fine cords; as faithful servants sustain themselves on handfuls of food, so too were the arrows loosed by the hand’s grasp; and just as true servants act according to the master’s glance, so too did the arrows fly forth guided by the master’s eye.” ॥125॥
श्लोक ( Shlok ) 126
प्रयोज्याभिमुखं तीक्ष्णान् बाणान् परशरान्प्रति । तत्रैव पातयन्ति स्म धानुष्काः सा हि धीर्धियाम् ॥१२६।।
धनुषको धारण करनेवाले योद्धा जहां जहां शत्रुओंके बाण थे वहीं वहीं देखकर अपने पैने बाण फेंक रहे थे सो ठीक ही है क्योंकि शत्रुओंकी वैसी ही बुद्धि होती है ।॥१२६॥
“The bow-wielding warriors, wherever they beheld the enemy’s arrows, there did they hurl their own sharp shafts—and rightly so, for such indeed is the nature of the enemy’s intellect.” ॥126॥
श्लोक ( Shlok ) 127
जाताश्चापधृताः केचिदन्योन्यशरखण्डने । व्यापृताः श्लाघिताः पूर्व रणे किञ्चित्करोपमाः ॥१२७।।
जो बाण एक दूसरे के बाणोंको तोड़नेके लिये चलाये गये थे, धारण किये गये थे अथवा उस व्यापारमें लगाये गये थे वे युद्धमें नौकरोंके समान सबसे पहले प्रशंसाको प्राप्त हुए थे ।।१२७।।
“The arrows that were loosed, drawn, or employed for the sole purpose of breaking the enemy’s arrows were, like devoted servants, the first to earn praise upon the battlefield.” ॥127॥
श्लोक ( Shlok ) 128
हस्त्यश्वरथपत्त्यौघमु द्भिद्यास्पष्टलक्ष्यवत् । शराः पेतुः स्व सम्पातमेवास्ता “दृढमुष्टिभिः ॥१२८॥
मजबूत मुट्ठियोंवाले योद्धाओंके द्वारा छोड़े हुए बाण अस्पष्ट लक्ष्यके समान दिखाई नहीं पड़ते थे और हाथी, घोड़े, रथ तथा पियादोंके समूहको भेदनकर अपने पड़नेसे स्थानपर ही जाकर पड़ते थे ।।१२८॥
“The arrows loosed by warriors with firm and powerful grips were scarcely visible, like indistinct targets, and cleaving through the ranks of elephants, horses, chariots, and foot soldiers, they struck precisely at their destined mark.” ॥128॥
श्लोक ( Shlok ) 129 – 130
पूर्व विहितसन्धानाः स्थित्वा किञ्चिच्छरासने । यानमध्यास्य” मध्यस्था द्वैधीभावमुपागता ।।१२९ llविग्रहे हतशक्तित्वादगत्या शत्रुसंश्रयाः । बाणा “गुणितवाङ्गुण्या इव सिद्धि प्रपेदिरे ॥१३०॥
जिस प्रकार सन्धि विग्रह आदि छह गुणोंको धारण करनेवाले राजा सिद्धिको प्राप्त होते हैं उसी प्रकार वे बाण भी सन्धि आदि छह गुणों-को धारण कर सिद्धिको प्राप्त हो रहे थे क्योंकि जिस प्रकार राजा पहले संधि करते हैं उसी प्रकार वे बाण भी पहले डोरी के साथ सन्धि अर्थात् मेल करते थे, जिस प्रकार राजा लोग अपनी परिस्थिति देखकर कुछ समय तक ठहरे रहते हैं उसी प्रकार वे बाण भी धनुषपर कुछ देरतक ठहरे रहते थे, जिस प्रकार राजा लोग युद्ध के लिये अपने स्थानसे चल पड़ते हैं उसी प्रकार वे बाण भी शत्रुको मारनेके लिये धनुषसे चल पड़ते थे, जिस प्रकार राजा लोग मध्यस्थ बनकर द्वैधीभावको प्राप्त होते हैं अर्थात् भेदनीति द्वारा शत्रुके संगठनको छिन्नभिन्न कर डालते हैं उसी प्रकार वे बाण भी मध्यस्थ (शत्रुके शरीरके मध्यमें स्थित) हो द्वैधीभावको प्राप्त होते थे अर्थात शत्रुके टुकड़े टुकड़े कर डालते थे और अन्तमें राजा लोग जिस प्रकार युद्ध करनेकी सामर्थ्यसे रहित शत्रुको वश कर लेते हैं उसी प्रकार वे बाण भी शत्रुको वश कर लेते थे ।। १२९-१३०॥
“Just as a king, who upholds the six policies—treaty, war, march, halt, alliance, and division—attains success, so too did those arrows, embodying the same sixfold strategy, achieve their mark. For just as a king first forms alliances, so too did the arrows first unite with the bowstring; just as a king pauses, discerning the right moment, so too did the arrows tarry briefly upon the bow; just as a king sets forth to war, so too did the arrows spring forth to strike the foe; just as a king divides the enemy by sowing discord, so too did the arrows, lodged at the center of the enemy’s form, bring about its fragmentation; and in the end, just as a king subjugates the weakened enemy, so too did the arrows bring their targets under control.” ॥129–130॥
श्लोक ( Shlok ) 131
धारा वीररसस्येव रेजे रक्तस्य कस्यचित् । पतन्ती सततं धैर्यादाश्वनूत्पाटिताशुगम् ॥१३१॥
निकाले हुए बाणके पीछे बहुत शीघ्र धीरतासे निरन्तर पड़ती हुई किसी पुरुष के रुधिरकी धारा वीररसकी धाराके समान सुशोभित हो रही थी ॥ १३१॥
“Behind the loosed arrow, a stream of a man’s blood flowed swiftly and steadily with grave intensity—shining resplendently like a torrent of heroic passion.” ॥131॥
श्लोक 132 से 141
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आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121