आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111
श्लोक 112 से 121 : पश्चिम समुद्र की ओर विजय
भरत पश्चिम समुद्र की ओर बढ़े, राजाओं का अभिमान और धन हरते हुए। समुद्र नदियों रूपी हाथों से रत्नों का अर्घ देता प्रतीत हुआ। समुद्र को रत्नाकर माना गया, न कि केवल लवण समुद्र। सूर्य का तेज मंद पड़ता था, पर भरत का तेज देदीप्यमान था। चक्ररत्न धारी भरत सूर्य समान चमके। उन्होंने सिन्धु नदी के द्वार पर पड़ाव डाला। सैनिकों ने सिन्धु के वन में निवास किया। पुरोहित ने चक्ररत्न और जिनेन्द्र की पूजा की, और गंधोदक व आशीर्वादों से भरत को आनंदित किया।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 30 – Shlok 112 to 121
श्लोक ( Shlok ) 112
प्राच्यानिव स भूपालान् प्रतीच्यानप्यनुक्रमात् । श्रावयन् हृततन्मानधनः प्रापापराम्बुधिम् ॥११२॥
इस प्रकार चक्रवर्ती क्रम क्रमसे पूर्व दिशाके राजाओं के समान पश्चिम दिशाके राजाओं को भी वश करता हुआ तथा उनके अभिमान और धन का हरण करता हुआ पश्चिम समुद्रकी ओर चला ।। ११२।।
“Thus did the Emperor, subjugating one by one the kings of the western lands even as he had those of the east, stripping them of their pride and wealth, advance towards the western ocean.” (112)
श्लोक ( Shlok ) 113
‘वेलासरित्करान्वार्द्धि रतिदूरं प्रसारयन् । नूनं प्रत्यग्रहीदेवं नानारत्नार्घमुद्वहन् ।।११३।।
उस समय वह समुद्र ऐसा जान पड़ता था मानो किनारे पर बहनेवाली नदियां रूपी हाथोंको बहुत दूर तक फैलाकर नाना प्रकारके रत्नरूपी अर्घको धारण करता हुआ महाराज भरतकी अगवानी ही कर रहा हो अर्थात् आगे बढ़कर सत्कार ही कर रहा हो ॥११३॥
“At that time, the ocean seemed as though it were extending far and wide its river-like arms that flowed to the shore, bearing diverse jewels as offerings in its grasp—advancing forth to welcome and honor the great King Bharata.” (113)
श्लोक ( Shlok ) 114
शूर्पोन्मेयानि रत्नानि वार्धेरित्यप्रशंसिनी। यानपात्रमहामाने रुन्मेयान्यत्र तानि यत् ॥११४॥
जो लोग कहा करते हैं कि समुद्रके रत्न सूपसे नापे जा सकते हैं वे उसकी ठीक ठीक प्रशंसा नहीं करते बल्कि अप्रशंसा ही करते हैं क्योंकि यहाँ तो इतने अधिक रत्न हैं कि जो बड़े बड़े जहाजरूप नापोंसे भी नापे जा सकते हैं ।॥११४।।
“Those who claim that the jewels of the ocean may be measured with a winnowing basket speak not in true praise, but in ignorance—for here lie treasures so vast they can be measured only with great ships as their scales.” (114)
श्लोक ( Shlok ) 115
नाम्नैव लवणाम्भोधिरित्युदन्वान् लघूकृतः । रत्नाकरोऽयमित्युच्चैर्बहु मेने तदा नृपैः ॥११५॥
यह समुद्र ‘लवण समुद्र’ इस नामसे बिलकुल ही तुच्छ कर दिया गया है, वास्तवमें यह रत्नाकर है इस प्रकार उस समय भरत आदि राजाओंने उसे बहुत बड़ा माना था ।।११५।।
“This ocean, belittled by the name ‘Salt Sea’, was in truth a treasury of gems—Ratnākara—and thus, in that age, King Bharata and the other sovereigns regarded it as a realm of great magnificence.” (115)
श्लोक ( Shlok ) 116
पतन्यत्र पतङ्गोऽपि तेजसा याति मन्दताम् । दिदीपे तत्र तेजोऽस्य प्रतीच्यां जयतो नृपान् ॥११६॥
जिस दिशामें जाकर सूर्य भी अपने तेजकी अपेक्षा मन्द (फीका) हो जाता है उसी दिशामें पश्चिमी राजाओंको जीतते हुए चक्रवर्ती भरत का तेज अतिशय देदीप्यमान हो रहा था ।।११६॥
“In that very direction where even the sun’s radiance wanes, the splendor of Emperor Bharata, as he conquered the kings of the West, blazed forth with surpassing brilliance.” (116)
श्लोक ( Shlok ) 117
धारयंश्चक्ररत्नस्य पारयः सङ्गरोदधेः । द्विषामुदे जयस्तीवं स तिग्मांशुरिवाद्युतत् ॥११७॥
चक्ररत्नको धारण करता हुआ, युद्ध-रूपी समुद्रको पार करता हुआ और शत्रुओंको उद्विग्न करता हुआ वह भरत उस समय ठीक सूर्य के समान देदीप्यमान हो रहा था ॥११७॥
“Bearing the divine discus, crossing the ocean-like expanse of war, and striking terror into the hearts of his foes, Bharata shone resplendent in that moment—like the radiant sun itself.” (117)
श्लोक ( Shlok ) 118
अनुवार्द्धि तटं गत्वा सिन्धुद्वारे न्यवेशयत् । स्कन्धावारं स लक्ष्मीवान क्षोभ्यं स्वमिवाशयम् ॥११८॥
जो राज्यलक्ष्मीसे युक्त है ऐसे उस भरत ने समुद्रके किनारे किनारे जाकर अपने हृदय के समान कभी क्षुब्ध न होनेवाला अपनी सेना का पड़ाव सिन्धु नदी के द्वार पर लगवाया। भावार्थ जहाँ सिन्धु नदी समुद्रमें जाकर मिलती है वहां अपनी सेनाके डेरे लगवाये ॥११८॥
“That Bharata, endowed with royal fortune, advanced along the seashore and stationed his ever-undaunted army—calm as his own steadfast heart—at the gateway where the Sindhu River meets the ocean.” (118)
श्लोक ( Shlok ) 119
सिन्धोस्तटवने रम्ये न्यविक्षन्नास्य सैनिकाः । चमूद्विरदसम्भोगनिकुब्जी “भूतपादपे ॥११९।॥
सेनाके हाथियोंके उपभोगसे जहाँके वृक्ष निकुञ्ज अर्थात् लतागृहोंके समान हो गये हैं ऐसे सिन्धु नदीके किनारेके मनोहर वनमें भरतुकी सेनाके लोगोंने निवास किया ॥ ११९ ॥
“In the delightful forests along the banks of the Sindhu River—where the trees, shaped by the browsing of the army’s elephants, had taken on the form of leafy bowers—the soldiers of Bharata made their dwelling.” (119)
श्लोक ( Shlok ) 120 –121
तत्राधिवासितानोङ्गः पुरश्चरण कर्मवित् । पुरोधा धर्मचक्रेशान् “प्रपूज्य विधिवत्ततः ॥१२०॥ सिद्धशेषाक्षतैः पुण्यैः गन्धोदकविमिश्रितैः । अभ्यनन्दत्सुयज्वा तं पुण्याशीर्भिश्च चक्रिणम् ॥१२१॥
तदनन्तर कार्यके प्रारम्भमें करने योग्य समस्त कार्यों को जाननेवाले पुरोहितने वहांपर मन्त्रोंके द्वारा चक्ररत्नकी पूजा कर विधिपूर्वक धर्मचक्रके स्वामी अर्थात् जिनेन्द्रदेवकी पूजा की और फिर गन्धोदकसे मिले हुए पवित्र सिद्ध शेषाक्षतों और पुण्यरूप अनेक आशीर्वादोंसे चक्रवर्ती भरतको आनन्दित किया ।। १२०-१२१।।
“Thereafter, at the commencement of the sacred undertaking, the royal priest—well-versed in all rites proper to the occasion—worshipped the divine discus with solemn mantras, and with due ceremony offered homage to the Lord of the Dharma-wheel, the venerable Jina. Then, with sanctified grains, consecrated water, and a host of auspicious blessings embodying merit itself, he gladdened the heart of Emperor Bharata.” (120–121)
श्लोक 122 से 129
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 169
आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111