आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
श्लोक 32 से 41 स्वयंवर की मर्यादा और अकम्पन की महत्ता
अनवद्यमति ने कहा कि स्वयंवर विवाह की प्राचीन और श्रेष्ठ विधि है, जिसमें कन्या अपनी इच्छा से वर चुनती है। इस न्याय का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। उन्होंने अकम्पन को चक्रवर्ती भरत के समान पूज्य बताया और नाथवंश तथा सोमवंश को उनके कुल के सहायक अंग कहा। अकम्पन का सम्मान करना अर्ककीर्ति का कर्तव्य है, क्योंकि पूज्य पुरुषों का अपमान अकल्याणकारी है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok )32
सनातनोऽस्ति मार्गोऽयं श्रुतिस्मृतिषु भाषितः । विवाहविधिभेदेषु वरिष्ठो’ हि स्वयंवरः ॥३२॥
विवाहविधिके सब भेदोंमें यह स्वयंवर ही श्रेष्ठ है। श्रुतियों और स्मृतियोंमें कहा गया यह स्वयंवर ही सनातन (प्राचीन) मार्ग है ॥३२॥
Of all the modes of marriage, this svayaṁvara is deemed the most exalted.Proclaimed in the Śruti and Smṛti, this svayaṁvara alone is the eternal and ancient path. ॥32॥
श्लोक ( Shlok )33
यदि स्यात् सर्वसम्प्रार्थ्या कन्यैका पुण्यभाजनम् । अविरोधो व्यधाय्यत्र दैवायत्तो विधिर्बुधैः ॥३३॥
यदि पुण्यके पात्र स्वरूप किसी एक कन्याकी याचना सब मनुष्य करने लग जायं तो उस समय परस्परका विरोध दूर करने के लिये विद्वानोंने केवल भाग्यके आधीन होनेवाली इस स्वयंवर विधिका विधान किया है ॥३३॥
When all men, drawn by merit, begin to seek the hand of a single maiden,Then, to avert mutual conflict, the wise have ordained this rite of svayaṁvara,wherein destiny alone determines the outcome. ॥33॥
श्लोक ( Shlok )34 – 35
मध्ये महाकुलीनेपु कञ्चिदेकमभीप्सितम् । सलक्ष्मीकमलक्ष्मीकं गुणितं गुणदुर्गतम् ॥३४॥विरूपं रूपिणं चापि वृणीतेऽसौ विधेर्वशात् । न तत्र मत्सरः कार्यः शेषैर्न्यायोऽयमीदृशः ॥३५॥
बड़े बड़े कुलोंमें उत्पन्न हुए पुरुषोंके मध्यमें वह कन्या भाग्यवश अपनी इच्छानुसार किसी एकको स्वीकार करती है चाहे वह लक्ष्मीसहित हो या लक्ष्मीरहित, गुणवान् हो याा निर्गुण, सुरूप हो या कुरूप । अन्य लोगोंको इसमें ईर्ष्या नहीं करनी चाहिये क्योंकि यह ऐसा ही न्याय है ॥ ३४-३५॥
Amidst men born in great and noble lineages,the maiden, by the decree of fate, freely chooses one according to her will—whether he be endowed with wealth or bereft of it, virtuous or devoid of virtue, fair in form or uncomely.Let none feel envy, for such is the rightful and righteous course. ॥34–35॥
श्लोक ( Shlok )36
लङ्घ्यते यदि केनापि न्यायो रक्ष्यस्त्वयैव सः । नेदं तवोचितं क्वापि “पाता स्यात्पारिपान्थिकः ॥३६॥
यदि किसीके द्वारा इस न्याय का उल्लंघन किया जाय तो तुम्हें ही इसकी रक्षा करनी चाहिये इसलिये यह सब तुम्हारे लिये उचित नहीं है। क्या कभी रक्षक भी चोर या शत्रु होता है ।। ३६ ।।
If ever this just order be transgressed by anyone,it is thou who must uphold its sanctity—for such conduct befits thee not.Can the guardian himself become a thief or foe? ॥36॥
श्लोक ( Shlok )37
भवत्कुलाचलस्योभौ नाथसोमान्वयौ पुरा । मेरोर्निषधनीलौ वा सत्पक्षौं पुरुणा कृतौ ॥३७॥
जिस प्रकार निषध और नील कुलाचल मेरुपर्वतके उत्तम पक्ष हैं उसी प्रकार भगवान् आदिनाथने पहले नाथवंश और चन्द्रवंश दोनों ही आपके कुलरूपी पर्वतके उत्तम पक्ष अर्थात् सहायक बनाये थे ॥३७॥
Even as Niṣadha and Nīla stand as the noble flanks of Mount Meru,so too did Lord Ādinātha once ordain the Nātha lineage and the Lunar line as the exalted sides—nay, the steadfast allies—of thy mountain-like house. ॥37॥
श्लोक ( Shlok )38
सकलक्षत्रियज्येष्ठः पूज्योऽयं राजराजवत् । अकम्पनमहाराजो राजेव ज्योतिषां गणैः ॥३८॥
जिस प्रकार चन्द्रमा समस्त ज्योतिषी देवोंके समूहके द्वारा पूज्य है उसी प्रकार समस्त क्षत्रियोंमें ब्रड़े महाराज अकंपन भी भरत चक्रवर्तीके समान सबके द्वारा पूज्य हैं ।॥ ३८॥
Even as the moon is revered by the entire host of celestial luminaries,so too is the great King Akampana, foremost among all kṣatriyas,venerated by all—like unto the mighty Bharata, the emperor of the wheel. ॥38॥
श्लोक ( Shlok )39
निर्विशेषं पुरोरेनं मन्यते भरतेश्वरः । पूज्यातिलङ्घनं प्राहुरुभय त्राशुभावहम् ॥३९॥
महाराज भरत इन अकंपनको भगवान् वृषभदेवके समान ही मानते हैं इसलिये तुम्हें भी इनके प्रति नम्रता का व्यवहार करना चाहिये क्योंकि पूज्य पुरुषोंका उल्लंघन करना दोनों लोकोंमें अकल्याण करनेवाला कहा गया है ॥ ३९॥
Emperor Bharata esteems this Akampana even as he doth Lord Ṛṣabhadeva;therefore, thou too shouldst bear thyself with everence toward him.For to transgress the honour of the venerable is declared unwholesome in both the worlds. ॥39॥
श्लोक ( Shlok ) 40
पश्य तादृश एवाय सोमवंशोऽपि कथ्यते । धर्मतीर्थं भवद्वंशाद् दानतीर्थं “ततो यतः ॥४०॥
और देखो यह सोमवंश भी नाथवंशके समान ही कहा जाता है। क्योंकि जिस प्रकार तुम्हारे वंशसे धर्मतीर्थकी प्रवृत्ति हुई है उसी प्रकार सोमवंशसे दान-तीर्थकी प्रवृत्ति हुई है ॥४०॥
Behold, the Lunar line is held equal to the Nātha lineage;
for as from thy noble house arose the sacred stream of Dharma,
even so from the Lunar race flowed forth the holy current of Charity. ॥40॥
श्लोक ( Shlok ) 41
पुरस्सरणमात्रेण श्लाघ्यं चक्रं विशां विभोः । प्रायो दुस्साधसंसिद्धौ श्लाघते जयमेव सः ॥४१॥
चक्रवर्तीका चक्ररत्न आगे आगे चलने मात्रसे प्रशंसनीय अवश्य है परन्तु कठिनाईसे सिद्ध होने योग्य कार्योंमें वे प्रायः जयकुमार की ही प्रशंसा करते हैं ॥४१॥
The divine Discus of the Cakravartin, though worthy of praise as it moves ahead,is yet silent in deeds of great endeavour;for in tasks of rare attainment,it is Jayakumāra alone whom they extol. ॥41॥
श्लोक 42 से 51
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
Download PDF