आदिपुराण 26 पर्व सारांश
Summary of Ādi purāṇa Parv 26 by Acharya Jinasena
संक्षिप्त सारांश: आदिपुराण पर्व 26 (श्लोक 1 से 150)
महाराज भरत ने चक्ररत्न की पूजा और पुत्र जन्म का उत्सव मनाया, जिसमें दान से याचक संतुष्ट हुए और नगर रत्नों से सुशोभित था। शरद् ऋतु की निर्मल शोभा, कमलों, हंसों, और स्वच्छ जल से युक्त सरोवरों, नदियों, और खेतों ने प्रकृति की सुंदरता को दर्शाया। हंसों के मधुर शब्द, काश के फूल, और तारे आकाश को अलंकृत करते थे। भरत ने दिग्विजय के लिए उद्योग किया, जिसमें चांदनी जैसे वस्त्र, मुकुट, और कौस्तुभ मणि धारण किए। उनकी विशाल सेना चक्ररत्न और दण्डरत्न के नेतृत्व में पूर्व दिशा की ओर बढ़ी। मार्ग में शरद् ऋतु के सरोवर, हंस, चकवा-चकवी, और लतागृहों की शोभा ने भरत को प्रसन्न किया। गायें, बैल, और पके धान के खेत ग्रामीण समृद्धि दर्शाते थे। धान की रखवाली करने वाली स्त्रियां और गांववासी भेंट देकर सम्मान करते थे। अंत में, भरत गंगा नदी के समीप पहुंचे, जिसकी शोभा उनकी कीर्ति, जिनवाणी, और विजयलक्ष्मी के समान थी। गंगा की लहरें, वन, और किनारे इसे स्त्री, गाय, और सेना समान बनाते थे, जिसे देखकर भरत परम आनंद को प्राप्त हुए।
श्लोक 1 से 11
चक्रवर्ती भरत का उत्सव और शरद् ऋतु की शोभा
महाराज भरत ने विधिपूर्वक चक्ररत्न की पूजा की और पुत्र जन्म का आनंद मनाया। उनके उत्सव में कोई दरिद्र नहीं रहा, क्योंकि दान से याचक संतुष्ट होकर याचना छोड़ चुके थे। नगर में रत्नों के ढेर लगाए गए, जो याचकों को दे दिए गए। चक्ररत्न की पूजा शत्रुओं के लिए हिंसक और पुत्र जन्म उत्सव संसार के लिए शांति कर्म समान था। शरद् ऋतु की निर्मल शोभा, सप्तपर्ण फूलों की पराग, स्वच्छ जल, हंसों की पंक्तियां, और कमलों से सुशोभित सरोवर प्रकृति की सुंदरता को दर्शाते थे।
श्लोक 12 से 21
चक्रवर्ती भरत का उत्सव और शरद् ऋतु की शोभा
महाराज भरत ने विधिपूर्वक चक्ररत्न की पूजा की और पुत्र जन्म का आनंद मनाया। उनके उत्सव में कोई दरिद्र नहीं रहा, क्योंकि दान से याचक संतुष्ट होकर याचना छोड़ चुके थे। नगर में रत्नों के ढेर लगाए गए, जो याचकों को दे दिए गए। चक्ररत्न की पूजा शत्रुओं के लिए हिंसक और पुत्र जन्म उत्सव संसार के लिए शांति कर्म समान था। शरद् ऋतु की निर्मल शोभा, सप्तपर्ण फूलों की पराग, स्वच्छ जल, हंसों की पंक्तियां, और कमलों से सुशोभित सरोवर प्रकृति की सुंदरता को दर्शाते थे।
श्लोक 22 से 31
शरद् ऋतु की प्राकृतिक सौंदर्यता
शरद् ऋतु में नदियों के किनारे स्वच्छ हो गए, सरोवर कमलों से और खेत नीलोत्पलों से सुशोभित थे। हंस और सारस पक्षियों के मधुर शब्द तालाबों को और आकर्षक बनाते थे। शरद् ऋतु लक्ष्मी रूपी स्त्री के समान थी, जिसके नेत्र नीलोत्पल और मुख कमल थे। पके चावल के खेत हल्दी से स्नान किए हुए से प्रतीत होते थे। हंसों को शरद् की शोभा से हर्ष और मयूरों को दुख हुआ, जो शुद्ध और अशुद्ध स्वभाव को दर्शाता है। बंधूक पुष्पों ने वनों की शोभा बढ़ाई।
श्लोक 32 से 41
प्रकृति और भरत की शोभा
मेघों के नष्ट होने से दिशाएं प्रसन्न थीं और हंसों से अलंकृत थीं। मयूरों ने कलहंसों के मधुर शब्दों से पराजित होकर अपनी वाणी छोड़ दी। शरद् ऋतु चांदनी और नक्षत्रों से सुशोभित थी। चंद्रमा कीर्ति फैलाता हुआ राजा के समान था। शरद् ऋतु नवोढ़ा स्त्री की तरह बंधूक फूलों से लालिमा धारण किए थी। आकाश, नदियां और दिशाएं स्वच्छ और निर्मल थीं। वन-पंक्तियां सुगंधित फूलों और भौंरों से आकर्षक थीं।
श्लोक 42 से 51
ग्रामीण जीवन और प्रकृति
मदोन्मत्त बैल स्थलकमलों को खोद रहे थे और गायें दूध से भूमि को तर कर रही थीं। गायें और उनके बछड़े शरद् ऋतु की शोभा के समान थे। मेघों के नष्ट होने से मयूरों को दुख हुआ। फूले हुए वृक्ष और झरने पर्वतों को हंसते और फाग खेलते हुए दर्शाते थे। कलमी धान और सहजना वृक्ष प्रकृति की समृद्धि को दर्शाते थे।
श्लोक 52 से 61
प्रकृति और भरत का दिग्विजय उद्योग
सहजना वृक्ष और मेघ-मुक्त दिशाएं नेत्रों को आनंद देती थीं। पर्वत सफेद बादलों से नवीन वस्त्र धारण किए थे। मेघरूपी हाथी और तोताओं की पंक्तियां प्रकृति की शोभा बढ़ाती थीं। सूर्य भरत के समान प्रतापी और तेजस्वी था। शरद् ऋतु की निर्मलता में भरत ने चक्ररत्न के साथ दिग्विजय का उद्योग किया।
श्लोक 62 से 71
भरत का राजसी वैभव
भरत ने चांदनी जैसे वस्त्र, ब्रह्मसूत्र, और मुकुट धारण किए। उनके कुण्डल सूर्य-चंद्र के समान थे। कौस्तुभ मणि और छत्र विजयलक्ष्मी के प्रतीक थे। स्थपति रत्न ने सुवर्ण और मणियों से युक्त रथ तैयार किया, जिसमें वेगशाली घोड़े जोते गए।
श्लोक 72 से 81
भरत की सेना का प्रस्थान
भरत ने दिग्विजय के लिए प्रस्थान किया। जय-जयकार से आकाश गूंज उठा। राजा और सेनापति उन्हें घेरे थे। सेना पैदल, घुड़सवार, रथ, और हाथियों के क्रम में थी। सुवर्णमय धूलि से आकाश सुशोभित था। नगर की गलियां खाली हो गईं, और स्त्रियां पुष्पांजलि अर्पित कर रही थीं।
श्लोक 82 से 91
नगर से प्रस्थान और सेना की शोभा
नगरवासी आशीर्वाद दे रहे थे। भरत रत्नों से देदीप्यमान गोपुरद्वार से निकले। सेना असंख्य और विशाल थी, मानो नवीन सृष्टि हो। देवता आश्चर्य से इसे देख रहे थे। चक्ररत्न और दण्डरत्न के नेतृत्व में सेना पूर्व दिशा की ओर बढ़ी।
श्लोक 92 से 101
मार्ग की प्राकृतिक शोभा
भरत ने शरद् ऋतु की शोभा देखी। सरोवर, हंस, चकवा-चकवी, और नदियों के किनारे मनोहर थे। हंस और चकवी की गतिविधियां भरत के मन को प्रसन्न करती थीं। नदियों और लतागृहों की शोभा ने उनके हृदय में प्रीति जागृत की।
श्लोक 102 से 111
मार्ग के दृश्य
भरत ने लतागृहों में किन्नरों, भौंरों, और फूलों से सजे वृक्षों को देखा। सरोवरों की भूमि सुवर्ण धूलि सी प्रतीत होती थी। सेना की धूलि से चकवी को रात्रि का भ्रम हुआ। गायें, बैल, और बछड़े ग्रामीण जीवन की शोभा बढ़ाते थे।
श्लोक 112 से 121
खेतों और ग्रामीण जीवन की शोभा
पके धान के खेत और कमल सूंघते पौधे भरत को आनंदित करते थे। धान की समृद्धि गायों के समान थी। धान की रखवाली करने वाली स्त्रियां गीत गाती थीं। किसान खेतों की रक्षा करते थे। गांव के मार्ग और बगीचे मनोहर थे।
श्लोक 122 से 128
ग्रामों और गंगा की ओर प्रस्थान
भरत ने गांवों के मुखिया, बगीचे, और लताओं से सजे ग्राम देखे। गांववासी घी, दही, और फल भेंट करते थे। सेना के साथ भरत गंगा नदी के समीप पहुंचे।
श्लोक 129 से 147
गंगा नदी का वर्णन
गंगा नदी भरत की कीर्ति, जिनवाणी, विजयलक्ष्मी, और राज्यलक्ष्मी के समान थी। इसके किनारे वन, लहरें, हंस, और भंवर इसे स्त्री, गाय, और सेना के समान शोभायमान करते थे। किन्नरों के गीत और हरिणों की उपस्थिति इसकी शोभा बढ़ाते थे।
श्लोक 148 से 150
गंगा की शोभा और भरत का आनंद
शरद् ऋतु में गंगा की कान्ति, वन, बालू के टीले, और भंवर इसे तरुण स्त्री समान बनाते थे। कमलों की सुगंध और वायु रानियों के परिश्रम को हरते थे। गंगा जिनेन्द्र की कीर्ति के समान पवित्र और आनंददायी थी, जिसे देखकर भरत परम प्रीति को प्राप्त हुए।
हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 26
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आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena
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