Summary of Ādi purāṇa Parv 41 by Acharya Jinasena
संक्षिप्त सारांश: आदिपुराण पर्व 41 (श्लोक 1 से 158)
आदिपुराण पर्व 41 में चक्रवर्ती भरत के स्वप्न, वृषभदेव से उनके फल का ज्ञान, ब्राह्मण सृष्टि का मूल्यांकन, और भरत की धार्मिक-राजकीय दिनचर्या का वर्णन है। श्लोक 1-81 में भरत अनिष्टसूचक सोलह स्वप्न देखते हैं, जो पंचम काल में धर्म के हास को दर्शाते हैं। वृषभदेव बताते हैं कि स्वप्न सत्य हैं और ब्राह्मण सृष्टि कृतयुग में सदाचारी रहेगी, पर पंचम काल में मिथ्यादृष्टि होकर हिंसक-पाखंडी बन जाएगी। स्वप्नों के फल में तीर्थंकरों के समय दुष्ट नयों की अनुपस्थिति, साधुओं की तप-हीनता, दुराचार, और धर्म के म्लेच्छ खंडों में सीमित होने जैसे संकेत हैं। श्लोक 82-158 में भरत वृषभदेव के वचनों से संदेहरहित होकर अयोध्या लौटते हैं। वे स्वप्नों के अनिष्ट निवारण के लिए जिनेंद्रदेव का अभिषेक, दान, और शांति कर्म करते हैं। रत्नजड़ित घंटे लगवाकर अरहंतदेव की स्मृति और पूजा करते हैं, जिससे वंदनमाला की परंपरा शुरू होती है। धर्मात्मा भरत की प्रेरणा से प्रजा धर्मप्रिय बनती है। वे गृहस्थ धर्म—दान, पूजा, शील, उपवास—का पालन करते हैं। प्रातःकाल जिनेंद्रदेव का चिंतन, पूजा, और प्रजा के सदाचार पर विचार करते हैं। सभा में राजाओं को सन्मानित कर, विद्वानों से विद्याचर्चा, और क्रीड़ाओं में समय बिताते हैं। रात्रि में राजकीय कार्य और शास्त्रज्ञान का प्रचार करते हैं। राजशास्त्र, धर्मशास्त्र, आयुर्वेद, व्याकरण, और निमित्त-ज्योतिष में निपुण भरत विद्वानों में चक्रवर्ती के रूप में यशस्वी हैं। वे जिनेंद्रदेव के धर्ममार्ग का पालन और प्रचार कर शत्रुरहित पृथ्वी का पालन करते हैं।
हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 41
श्लोक 1 से 11 भरत के स्वप्न और विचार
चक्रवर्ती भरत ने एक रात अनिष्टसूचक स्वप्न देखे, जिनसे चित्त में खेद उत्पन्न हुआ। वे जागकर स्वप्नों के फल पर विचार करने लगे, यह मानते हुए कि ये स्वप्न पंचम काल में अनिष्ट फल देंगे, क्योंकि वृषभदेव के समय में प्रजा को उपद्रव असंभव है। उन्होंने अनुमान लगाया कि कृतयुग के अंत में पाप की अधिकता होने पर ये स्वप्न फलित होंगे। स्वप्नों का प्रभाव राजा और प्रजा पर समान होगा। केवलज्ञान ही सूक्ष्म तत्त्वों की प्रतीति दे सकता है। भरत ने निर्णय लिया कि वृषभदेव के समक्ष स्वप्नों का रहस्य और ब्राह्मण सृष्टि का निवेदन करना उचित है।
श्लोक 12 से 21 भरत का समवसरण की ओर प्रस्थान
भरत ने प्रातःकालीन क्रियाएँ पूरी कर सभा में राजाओं के साथ वृषभदेव की वंदना के लिए प्रस्थान किया। सेना और मुकुटबद्ध राजाओं के साथ वे समवसरण पहुँचे। दूर से समवसरण भूमि देखकर उन्होंने नमस्त्रीभूत मस्तक पर कमल के समान हाथ जोड़कर नमस्कार किया। बाहरी प्रदक्षिणा देकर, कक्षाओं का उल्लंघन करते हुए, मानस्तंभ, चैत्यवृक्ष, और सिद्धार्थवृक्ष को निहारते हुए वे भीतर प्रवेश किए।
श्लोक 22 से 31 समवसरण में पूजा और भक्ति
समवसरण की कक्षाओं में देवांगनाओं के गीत-नृत्य से भरत का चित्त अनुरक्त हुआ। ऊँचे गोपुर मार्ग से वे गणधरदेव की सभा में पहुँचे। वहाँ तीन कटनी वाले पीठ की प्रथम कटनी पर चढ़कर धर्मचक्र की पूजा और प्रदक्षिणा की। दूसरी कटनी पर महाध्वजाओं की पूजा कर गंधकुटी के समीप पहुँचे। भक्तिपूर्वक वृषभदेव को नमस्कार कर, स्तोत्रों से स्तुति और विधिपूर्वक पूजा की। भक्ति से उनके परिणाम विशुद्ध हुए, जिससे अवधिज्ञान उत्पन्न हुआ। धर्मरूपी अमृत का पान कर संतुष्ट होकर उन्होंने ब्राह्मण सृष्टि और ग्यारह प्रतिमाओं के यज्ञोपवीत के बारे में निवेदन किया।
श्लोक 32 से 41 भरत का प्रश्न और स्वप्नों का वर्णन
भरत ने वृषभदेव से पूछा कि उनकी ब्राह्मण सृष्टि में गुण-दोष क्या हैं और क्या यह योग्य है। साथ ही, उन्होंने रात में देखे सोलह स्वप्नों का वर्णन किया, जो अनिष्टसूचक प्रतीत हुए। स्वप्न थे: (1) सिंह, (2) सिंह का बच्चा, (3) हाथी का भार उठाने वाला घोड़ा, (4) सूखे पत्ते खाने वाले बकरे, (5) हाथी पर वानर, (6) कौवों से त्रस्त उलूक, (7) आनंदित भूत, (8) मध्य में सूखा तालाब, (9) धूल से मलिन रत्न, (10) नैवेद्य खाता कुत्ता, (11) तरुण बैल, (12) मंडल युक्त चंद्रमा, (13) मिलते हुए दो बैल, (14) मेघों से आच्छादित सूर्य, (15) छायारहित सूखा वृक्ष, (16) जीर्ण पत्तों का समूह। उन्होंने इनके फल का निश्चय करने को कहा।
श्लोक 42 से 51 वृषभदेव का व्याख्यान और ब्राह्मण सृष्टि का दोष
भरत के प्रश्न पर वृषभदेव ने सभा को संतुष्ट करते हुए व्याख्यान दिया। उन्होंने भरत की ब्राह्मण सृष्टि की प्रशंसा की, परंतु दोष बताया कि कृतयुग में ये सदाचार का पालन करेंगे, किंतु पंचम काल में जातिवाद के अभिमान से भ्रष्ट होकर मिथ्या शास्त्रों से लोगों को मोहित करेंगे। ये हिंसा, मधु, और मांस का भोजन करेंगे, अहिंसारूप धर्म को दूषित कर हिंसक वेदों को पुष्ट करेंगे।
श्लोक 52 से 61 ब्राह्मण सृष्टि का भविष्य और स्वप्नों का प्रकार
पंचम काल में ब्राह्मण मिथ्यादृष्टि होकर धर्मद्रोही बनेंगे, पाखंडी मतों का प्रचार करेंगे। यह सृष्टि वर्तमान में दोषरहित है, पर भविष्य में दोष का बीज बनेगी। फिर भी, धर्म सृष्टि के उल्लंघन से बचने के लिए इसे अभी त्यागना उचित नहीं। स्वप्न दो प्रकार के होते हैं: स्वस्थ (सत्य) और अस्वस्थ (असत्य), तथा दोषजन्य (मिथ्या) और दैवजन्य (सत्य)। भरत के स्वप्न दैवजन्य और सत्य हैं, जिनका फल पंचम काल में होगा।
श्लोक 62 से 71 स्वप्नों का फल (भाग 1)
वृषभदेव ने स्वप्नों का फल बताया: (1) तेईस सिंह: महावीर स्वामी को छोड़कर अन्य तीर्थंकरों के समय दुष्ट नय नहीं होंगे। (2) सिंह का बच्चा और हरिण: महावीर के तीर्थ में परिग्रही कुलिंगी होंगे। (3) भारवाहक घोड़ा: पंचम काल में साधु तप के गुणों को धारण नहीं कर पाएंगे। (4) सूखे पत्ते खाने वाले बकरे: मनुष्य सदाचार छोड़ दुराचारी होंगे। (5) हाथी पर वानर: प्राचीन क्षत्रिय वंश नष्ट होकर नीच कुलवाले शासक बनेंगे। (6) कौवों से त्रस्त उलूक: लोग जैन मुनियों को छोड़ अन्य मतों के साधुओं का अनुसरण करेंगे। (7) आनंदित भूत: लोग व्यंतरों को देव मानकर पूजेंगे।
श्लोक 72 से 81 स्वप्नों का फल (भाग 2)
(8) मध्य में सूखा तालाब: धर्म आर्यखंड से हटकर म्लेच्छ खंडों में रहेगा। (9) धूल से मलिन रत्न: पंचम काल में ऋद्धिधारी मुनि नहीं होंगे। (10) नैवेद्य खाता कुत्ता: व्रतरहित ब्राह्मण सत्कार पाएंगे। (11) तरुण बैल: लोग केवल तरुण अवस्था में मुनिपद ग्रहण करेंगे। (12) मंडल युक्त चंद्रमा: मुनियों में अवधि और मनःपर्यय ज्ञान नहीं होगा। (13) मिलते हुए बैल: मुनि एक साथ रहेंगे, अकेले विहार नहीं करेंगे। (14) मेघाच्छादित सूर्य: केवलज्ञान का उदय नहीं होगा। (15) सूखा वृक्ष: चारित्र भ्रष्ट होगा। (16) जीर्ण पत्ते: महाऔषधियों का रस नष्ट होगा। ये स्वप्न पंचम काल में धर्म के हास को दर्शाते हैं। भरत को विघ्न शांति के लिए धर्म में बुद्धि लगाने की सलाह दी गई।
श्लोक 82 से 91 भरत का शांति कर्म और घंटा स्थापना
वृषभदेव के वचनों से भरत का संदेहरूपी कीचड़ नष्ट हो गया और उनका चित्त निर्मल हुआ। उन्होंने भगवान को बार-बार प्रणाम कर प्रसन्न मन से अयोध्या में प्रवेश किया। स्वप्नों के अनिष्ट निवारण के लिए उन्होंने जिनेंद्रदेव का अभिषेक, दान, और शांति कर्म किए। गाय के दूध से पृथ्वी का सिंचन, ऋषियों की पूजा, और प्रेमियों को संतुष्ट किया। रत्नजड़ित, सुवर्ण रस्सियों से बंधे चौबीस घंटे नगर के दरवाजों, राजभवन, और गोपुरों पर लगवाए। ये घंटे अरहंतदेव की स्मृति कराते और पूजा का साधन बने, जो सूत्रों से युक्त ग्रंथों की टीकाओं के समान शोभित थे।
श्लोक 92 से 101 वंदनमाला और धर्मप्रिय प्रजा
भरत के मस्तक पर लगे घंटे जिनेंद्रदेव के चरणों की छाया जैसे सुशोभित थे। उनके द्वारा रत्नजड़ित तोरणों में स्थापित घंटों को देख अन्य लोग भी अपने घरों में वंदनमालाएँ लगाने लगे। ये मालाएँ अरहंतदेव की वंदना के लिए बनाई गईं, इसलिए वंदनमाला नाम से प्रसिद्ध हुईं। धर्मात्मा राजा होने से प्रजा भी धर्मप्रिय थी। भरत के सदाचार के कारण प्रजा धर्मत्रिय हो गई। लोग उनके धर्मप्रेम और सन्मान को देख धर्म में प्रीति करने लगे। भरत धर्मविजयी, सदाचारी, और बलिष्ठ थे, जिससे प्रजा को धार्मिक क्रियाएँ करने का उपदेश मिला।
श्लोक 102 से 111 भरत का गृहस्थ धर्म
आश्रित राजा भरत के धर्माचरण का अनुसरण करते थे। चक्रवर्ती भरत अर्थ और काम की सफलता के बाद भी धर्म में एकाग्र रहते थे। गृहस्थ धर्म के चार प्रकार—दान, पूजा, शील, और उपवास—का पालन करते थे। वे मुनियों को विशुद्ध आहार, औषधि, और अभय दान देते थे। जिनेंद्रदेव की पूजा से पूज्यपना प्राप्त होता है, यह मानकर वे भक्ति से संतुष्ट रहते थे। जिनविम्ब और मंदिरों की रचना कर कल्पवृक्ष यज्ञ किया। शील की रक्षा आत्मा की रक्षा करती है। वे व्रतों का पालन कर गृहस्थों में मुख्य थे।
श्लोक 112 से 121 भरत की धार्मिक दिनचर्या
पर्व के दिन उपवास कर भरत जिनमंदिर में सामायिक करते और मुनियों का आचरण धारण करते थे। जिनेंद्रदेव का स्मरण कर उनका चित्त स्थिर हो जाता था, जिससे आभूषण शिथिल पड़ते थे। धर्म की चिंता से अन्य पदार्थों का चिंतन स्वतः हो जाता था। उनकी सभी क्रियाएँ धर्म चिंतन से प्रारंभ होती थीं। प्रभात में दिशाओं की लालिमा को वे जिनेंद्रदेव के चरणों की लालिमा मानते थे। सूर्योदय को केवलज्ञान का प्रतिविम्ब और कमलों की शीतलता को भगवान की दिव्यध्वनि समान समझते थे। धर्मप्रधान जीवन जीते हुए वे प्रातः धर्म चिंतन, पूजा, और प्रजा के सदाचार-असदाचार पर विचार करते थे।
श्लोक 122 से 131 राजकीय और सामाजिक कर्तव्य
सभाभवन में राजसिंहासन पर विराजमान होकर भरत राजाओं को दर्शन, मुस्कान, वार्तालाप, सन्मान, और दान से संतुष्ट करते थे। दूतों और भेंट लाने वालों को सम्मानित कर उनके कार्य पूरे करते थे। नृत्य-कलाकारों को पारितोषिक देकर प्रसन्न करते थे। सभा विसर्जन के बाद क्रीड़ाएँ करते, स्नान-भोजन कर अलंकार धारण करते थे। परिवार की स्त्रियाँ उनकी सेवा करती थीं। दोपहर बाद विद्वानों के साथ विद्याचर्चा और वेश्याओं के हास्य-भोगों में समय बिताते थे।
श्लोक 132 से 141 रात्रिकाल और शास्त्रज्ञान
दिन के अंतिम भाग में मणिजड़ित भूमि पर टहलते हुए राजमहल की शोभा निहारते थे। क्रीड़ासचिवों के साथ विहार कर देवकुमारों जैसे शोभित होते थे। रात्रि में चक्रवर्ती के योग्य कार्य करते। कृतकृत्य होने पर भी मंत्रियों से सलाह लेते थे। शत्रुरहित पृथ्वी का पालन करते हुए केवल स्वराष्ट्र की चिंता थी। छह गुणों का अभ्यास अज्ञान नाश के लिए किया। राजविद्याओं—आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता, दण्डनीति—का व्याख्यान करते। निधि-रत्नों का निरीक्षण और धर्मशास्त्र के विवादों का निराकरण करते थे।
श्लोक 142 से 151 शास्त्रों में निपुणता
भरत अर्थशास्त्र, कामशास्त्र, हस्तितंत्र, और अश्वतंत्र में निपुण थे, जिससे लोग उन्हें इन शास्त्रों के कर्ता मानते थे। आयुर्वेद में उनकी प्रशंसा मूर्तिमान आयुर्वेद के रूप में होती थी। वे व्याकरण, शब्दालंकार, और छंदशास्त्र में कुशल थे। निमित्त, शकुन, और ज्योतिष शास्त्र उनके मतानुसार थे। वे इन शास्त्रों के अधिष्ठाता और मान्य थे। उनकी स्वाभाविक बुद्धि के कारण सभी विद्याओं में प्रगति थी। शास्त्रज्ञान में वे दर्पण समान थे, जिससे विद्वान संशयमुक्त होते थे।
श्लोक 152 से 158 भरत की महिमा
बुद्धिपरक कुलकर भरत लोकाचार के सूत्रधार थे। वे राजशास्त्र, धर्मशास्त्र, और कलाओं में श्रेष्ठ थे। उनका प्रथम राज्य, सार्वभौम पद, और यश आश्चर्यजनक था। विद्वानों में चक्रवर्ती के रूप में उनकी कीर्ति फहराती थी। समस्त तत्त्वों को जानकर वे जिनेंद्रदेव के धर्ममार्ग का स्मरण और प्रचार करते थे। शत्रुरहित पृथ्वी का पालन कर भोगों के साथ क्रीड़ा करते थे। लक्ष्मी और सरस्वती के समागम से सुख स्वामी, शास्त्र-शस्त्र निपुण, और जिनेंद्रदेव की सेवा में अग्रेसर थे। इस प्रकार इकतालीसवाँ पर्व समाप्त हुआ।
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