आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91
श्लोक 92 से 102 सर्पिणी का मरण और नागकुमार का क्रोध
जयकुमार ने उद्यान में सर्पिणी को काकोदर सर्प के साथ देखकर क्रोधित होकर दोनों को ताड़न किया। सैनिकों ने उन्हें मार डाला। सर्प जलदेवता और सर्पिणी नागकुमार की पत्नी बनी। नागकुमार ने जयकुमार पर सर्पिणी के मरण का दोष लगाकर उसे मारने की ठानी और उसके घर पहुँचा। जयकुमार ने रानी श्रीमती से सर्पिणी की कुकृत्य बताते हुए स्त्रियों की निंदा की।
आदिपुराण पर्व 43 – श्लोक 92 से 102
श्लोक ( Shlok ) 92 – 93
अन्येद्युरिभमारुह्य पुनस्तद्वनमापतत्। नागीं श्रुतवतीं’ धर्म राजाऽत्रैव महात्मना ॥९२॥ वीक्ष्य काकोदरे णामा’ जातकोपो विजातिना । लीलानीलोत्पलेनाहन् दम्पती तौ धिगित्यसौ ॥९३॥
किसी दूसरे दिन वही राजा जयकुमार हाथीपर सवार होकर फिर उसी वनमें गया और वहाँ अपने साथ साथ मुनिराजसे धर्म श्रवण करनेवाली सर्पिणीको काकोदर नामके किसी विजातीय सर्पके साथ देखकर बहुत ही कुपित हुआ तथा उन दोनों सर्प सर्पिणीको धिक्कार देकर क्रीड़ाके नील कमलसे उन दोनोंका ताड़न किया ॥ ९२-९३।।
On another day, King Jayakumāra once again ventured into that forest, mounted upon an elephant. There he beheld the same serpentess—who had earlier listened to the sage’s discourse beside him—now in the company of a serpent named Kākodara, one of a different lineage. Struck with fierce anger, he rebuked both the serpent and the serpentess, and in wrath, struck them with a blue lotus plucked from his play.॥92–93॥
श्लोक ( Shlok ) 94
पलायमानौ पाषाणैः काष्ठर्लोष्ठैः पदातयः । अघ्नन् सर्वे न को वाऽत्र दुश्चरित्राय कुप्यति ॥९४॥
वे दोनों वहाँसे भागे किन्तु पैदल चलनेवाले सेनाके सभी लोग भागते हुए उन दोनोंको लकड़ी तथा ढेलोंसे मारने लगे सो उचित ही है क्योंकि इस संसारमें दुराचारी पुरुषोंपर कौन क्रोध नहीं करता है ? ।।९४।।
The two fled from that place, but the king’s foot soldiers pursued them, striking them with sticks and stones as they ran. And rightly so—for in this world, who does not grow wrathful upon those of wicked conduct?॥94॥
श्लोक ( Shlok ) 95
पापः स तद् व्रणैर्मृत्वा वेदनाकुलधीस्तदा । नाम्नाऽजायत गङ्गायां कालीति जलदेवता ॥९५וו
उन घावोंके द्वारा दुःखसे व्याकुल हुआ वह पापी सर्प उसी समय मरकर गंगा नदीमें काली नामका जलदेवता हुआ ॥९५॥
Tormented by the pain of his wounds, that sinful serpent perished then and there, and was reborn in the waters of the Gaṅgā as a celestial being named Kāli, a deity of the river.॥95॥
श्लोक ( Shlok ) 96
सञ्जातानुशया सापि धृत्वा धर्म हृदि स्थिरम्। भूत्वा प्रिया स्वनागस्य राज्ञा स्वमूतिमब्रवीत् ॥९६॥
जिसे भारी पश्चात्ताप हो रहा है ऐसी वह सर्पणी हृदयमें निश्चल धर्मको धारणकर मरी और मरकर अपने पहले के पति नागकुमारदेवकी स्त्री हुई । वहाँ जाकर उसने उसे राजाके द्वारा अपने मरणकी सूचना दी ।। ९६।।
The serpentess, overwhelmed with deep remorse, embraced steadfast virtue within her heart and, at the end of her life, passed on—only to be reborn as the consort of her former husband, now a celestial Nāgakumāra deity. There, she sorrowfully conveyed to him the tale of her death, caused by the king.॥96॥
श्लोक ( Shlok ) 97
नागामरोऽपि तां पश्यन् कोपादेवममन्यत । दर्यात्तेन खलेनैषा वराकी” हा हता वृथा ॥९७॥
वह नागकुमार देव भी उसे देखकर क्रोधसे ऐसा मानने लगा कि इस दुष्ट राजाने अहंकारसे इस बेचारी सर्पिणी को व्यर्थ ही मार दिया ।। ९७।।
Beholding her and hearing her account, the Nāgakumāra deity was seized with wrath, thinking thus: “This wicked king, in his arrogance, has unjustly slain this helpless serpentess without cause.”॥97॥
श्लोक ( Shlok ) 98 – 99
विधवेति विवेवाधीर्नेंदृक्षं मामिर्म धवम् । न तत्प्राणान् हरे यावद् भुजङ्गा केन वाऽस्म्यहम् ॥९८॥ इत्यतोऽसौ दि दक्षुस्तं जयं तद्गृहमासदत् । न सहन्ते ननु स्त्रीणां तिर्यञ्चोऽपि पराभवम् ॥९९॥
उस मूर्खने इसे विधवा जाना, यह न जाना कि इसका मेरा जैसा पति है इसलिये में जबतक उसका प्राण हरण न करूं तब तक सर्प (नागकुमार) कैसे कहला सकता हूँ ? ऐसा सोचता हुआ वह नागकुमार जयकुमारको काटनेकी इच्छा से शीघ्र ही उसके घर आया सो ठीक ही है क्योंकि तिर्यञ्च भी स्त्रियोंका पराभव सहन नहीं कर सकते हैं ।॥९८-९९।।
That fool deemed her a widow, unaware that she had a husband such as I! Until I take his life, how can I still be called a Nāga?”—thus thinking in burning rage, the Nāgakumāra swiftly descended to the king’s abode with the intent to bite Jayakumāra.And rightly so—for even among lower beings, the dishonor of their consorts is intolerable.॥98–99॥
श्लोक ( Shlok ) 100
“वासगेहे जयो रात्रौ श्रीमत्याः कौतुकं प्रिये । शृण्वेकं दृष्टमित्याख्यत् तद्भुजङ्गीविचेष्टितम् ॥१००॥
जयकुमार रात्रिके समय शयनागारमें अपनी रानी श्रीमतीसे कह रहा था कि हे प्रिये, आज मैंने एक कौतुक देखा है उसे सुन, ऐसा कहकर उसने उस सर्पिणीकी सब कुचेष्टाएं कहीं ॥१००।।
“In the inner chambers that night, as the beloved Queen Śrīmatī delighted in festivity, she heard and beheld a certain movement—thus was revealed the stealthy act of that serpent.”॥100॥
श्लोक ( Shlok ) 101 –102
आभिजात्यं वयो रूपं विद्यां वृत्तं यशः श्रियम् । विभुत्वं विक्रमं कान्तिमैहिकं पारलौकिकम् ॥१०१॥प्रीतिमप्रीतिमादेयमनादेयं कृपां त्रपाम् । हानिं वृद्धिं गुणान् दोषान् गणयन्ति न योषितः ।॥१०२॥
इसी प्रकरणमें वह कहने लगा कि देखो स्त्रियाँ कुलीनता, अवस्था, रूप, विद्या, चारित्र, यश, लक्ष्मी, प्रभुता, पराक्रम, कान्ति, यह लोक-परलोक, प्रीति, अप्रीति, ग्रहण करने योग्य, ग्रहण न करने योग्य, दया, लज्जा, हानि, वृद्धि, गुण और दोषको कुछ भी नहीं गिनती हैं ।।१०१-१०२।।
And in that very episode, he spoke thus:
“Behold! Women regard not nobility of birth, nor age, nor beauty, nor learning, nor virtue, nor fame, nor fortune, nor sovereignty, nor valor, nor radiance. They weigh not this world nor the next, affection nor aversion, what is worthy of acceptance nor what is to be rejected. Compassion, modesty, loss, gain, merit or fault—none of these hold meaning for them.”॥101–102॥
श्लोक 103 से 111
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91
Download PDF