आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
श्लोक 172 से 181 प्रकृति की शांति
वन की लताएं फूलों से नमस्कार-सी करती हैं, और वृक्ष नृत्य-से प्रतीत होते हैं। सर्प रत्न-किरणों से नृत्य करते हैं, और मोर कोकिलों के स्वरों पर नाचते हैं। बाहुबली के माहात्म्य से वन शांत हो जाता है, जहां कोई जीव एक-दूसरे को बाधा नहीं पहुंचाता। उनका तेज तीर्थंकरों का अंधकार दूर करता है। विद्याधर उनकी पूजा करते हैं, और देवों के आसन उनके माहात्म्य से कंपित होते हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 36 – Shlok 172 to 181
श्लोक ( Shlok ) 172
फणमात्रोद्गता रन्ध्रात् फणिनः शितयोऽद्युतन् । कृताः कुवलवैरर्घा मुनेरिव पदान्तिके ।। १७२॥
बामी के छिद्रोंसे जिन्होंने केवल फणा ही बाहर निकाले हैं ऐसे काले सर्प उस समय ऐसे जान पड़ते थे मानो मुनिराज के चरणोंके समीप किसीने नील-कमलों का अर्घ बनाकर रक्खा हो ।। १७२ ।।
The black serpents, who had extended only their hoods from the hollows of the earth,seemed at that moment as though someone had arranged an offering of blue lotuses at the feet of the great sage—a silent arghya laid in reverence.172
श्लोक ( Shlok ) 173
रेजुर्वनलता नम्रै शाखाग्रै कुसुमोज्ज्वलैः । मुनि भजन्त्यो भक्त्येव पुष्पार्घैर्न तिपूर्वकम् ॥१७३॥
वनकी लताएं फूलोंसे उज्ज्वल तथा नीचेको झुक्री हुई छोटी छोटी डालियोंसे ऐसी अच्छी सुशोभित हो रही थीं मानो फूलोंका अर्घ लेकर भक्तिसे नमस्कार करती हुई मुनिराजकी सेवा ही कर रही हों ।॥ १७३॥
The forest creepers, radiant with blossoms and bowed low with delicate branches,appeared as though they bore floral offerings in hand—bending in devotion, they seemed engaged in the worship
and service of the great sage.173
श्लोक ( Shlok ) 174
शश्वद्विकासिकुसुमैः शाखाग्रैरनिलाहतैः । बभुर्वनद्रुमास्तोषान्निनृत्सव इवासकृत् ॥१७४।।
वनके वृक्ष, जिनपर सदा फूल खिले रहते हैं और जो वायुसे हिल रहे हैं ऐसे शाखाओंके अग्रभागोंसे ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो संतोष से बार बार नृत्य ही करना चाहते हों ।॥ १७४।॥
The forest trees, ever adorned with blossoms and swaying gently in the breeze, seemed, with their trembling branch-tips, as though they longed to dance again and again in joyous contentment.174
श्लोक ( Shlok ) 175
कलैरलिरुतोद्गानै फणिनो ननृतुः किल । उत्फणाः फणरत्नांशुदीप्रैर्भोंगै ‘र्विंवर्तितैः ॥१७५॥
जिनके फणा ऊंचे उठ रहे हैं ऐसे सर्प, भ्रमरों के शब्दरूपी सुन्दर गाने के साथ साथ फणाओंपर लगे हुए रत्नोंकी किरणों-से देदीप्यमान अपने फणाओं को घुमा घुमाकर नृत्य कर रहे थे ।। १७५।।
The serpents, their hoods raised high, danced in radiant delight,
twirling their jeweled crests that sparkled with lustrous rays,while the hum of bees around them rose like a melodious song to accompany their graceful motion.175
श्लोक ( Shlok ) 176
पुंस्कोकिलकलालापडिण्डिमानुगतैर्लयै । ‘चक्षुःश्रवस्तु पश्यत्सु तद् द्विषोऽनटिषु र्मुहुः ॥१७६॥
मोर, कोकिलोंके सुन्दर शब्दरूपी डिण्डिम बाजेके अनुसार होनेवाले लयके साथ साथ सर्पोंके देखते रहते भी बार बार नृत्य कर रहे थे ।।१७६।॥
The peacocks, dancing again and again,kept perfect rhythm with the sweet cadences of the cuckoos’ song, while the serpents looked on, their gaze unwavering—as if the entire forest were entranced in a divine performance.176
श्लोक ( Shlok ) 177
महिम्ना शमिनः शान्तमित्यभूत्तच्च काननम्। धत्ते हि महतां योगः शममप्यशमात्मसु ।।१७७।।
इस प्रकार अतिशय शान्त रहनेवाले उन मुनिराजके माहात्म्य से वह वन भी शान्त हो गया था सो ठीक ही है, क्योंकि महापुरुषोंका संयोग क्रूर जीवों में भी शान्ति उत्पन्न कर देता है ।। १७७।।
Thus, through the sublime presence of that supremely tranquil sage,even the forest itself was transformed into a realm of peace.And rightly so—for the mere association of the great and noble brings serenity even to the fiercest of beings.177
श्लोक ( Shlok ) 178
शान्तस्वनैर्नदन्ति स्म वनान्तेऽस्मिन् शकुन्तयः । घोषयन्त इवात्यन्तं” शान्तमेतत्तपोवनम् ॥१७८॥
इस वनमें अनेक पक्षी शान्त शब्दों से चहक रहे थे और वे ऐसे जान पड़ते थे मानो इस बातकी घोषणा ही कर रहे हों कि यह तपोवन अत्यन्त शान्त है ।।१७८।।
In that forest, myriad birds chirped in gentle, soothing tones,as though proclaiming to all the world:“This sacred grove of penance is steeped in deepest peace.” 178
श्लोक ( Shlok ) 179
तपोऽनुभावादस्यैवं प्रशान्तेऽस्मिन् वनाश्रये । विनिपातः कुतोऽप्यासीत् कस्यापि न कथञ्चन ॥१७९॥
उन मुनिराजके तपके प्रभावसे यह वनका आश्रम ऐसा शान्त हो गया था कि यहांके किसी भी जीवको किसी के भी द्वारा कुछ भी उपद्रव नहीं होता था ।।१७९।।
By the power of that great sage’s austerities, the hermitage within this forest became so serene that no creature here suffered any disturbance or harm from another.179
श्लोक ( Shlok ) 180
*महसास्य तपोयोगजृम्भितेन महीयसा । बभूवुर्ह तहृद्ध्वान्ताः तिर्यञ्चोऽप्यनभिद्रुहः ॥१८०॥
तपके सम्बन्धसे बड़े हुए मुनिराजके बड़े भारी तेजसे त्रियन्चो के भी हृदयका अन्धकार दूर हो गया था और अब वे परसर में किसीसे द्रोह नहीं करते थे-अहिंसक हो गये थे ।।१८०।।
By the immense radiance born of his austerities,the great sage dispelled the darkness from the hearts of the three worlds;and now, in the wilderness, they harbored no enmity toward any being—having become gentle and harmless.180
श्लोक ( Shlok ) 181
गतिस्खलनतो ज्ञात्वा योगस्थं तं मुनीश्वरम् । असकृत्पूजयामासुरवतीर्य नभश्चराः ॥१८१॥
विद्याधर लोग गति भंग हो जानेसे उनका सद्भाव जान लेते थे और विमानसे उतरकर ध्यान में बैठे हुए उन मुनिराजकी बार बार पूजा करते थे ।। १८१॥
When the Vidyadharas perceived the disruption of their celestial flight,they recognized the sage’s noble aura,and descending from their aerial vehicles,reverently paid homage to him time and again in meditation.181
श्लोक 182 से 191
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
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