आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |
श्लोक 22 से 31 सिंहासन और भगवान की उपस्थिति
गंधकुटी ने सुगंध से दिशाएँ भर दीं। यह छह सौ धनुष विस्तृत थी। इसके मध्य रत्नमय सिंहासन पर भगवान वृषभदेव अधर विराजमान थे। इंद्र ने फूल बरसाए, जो भ्रमरों से गूंजते थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 23 – Shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22
धूपगन्धै र्जिनेन्द्राङ्गसौगन्ध्यबहलीकृतैः । सुरभीकृतविश्वार्थ्या याधाद् गन्धकुटीश्रुतिम् ॥२२॥
भगवान् के शरीर की सुगंधि से बड़ी हुई धूप की सुगंधि से उसने समस्त दिशाएँ सुगंधित कर दी थीं इसलिए ही वह गंधकुटी इस सार्थक नाम को धारण कर रही थी ।।22।।
Infused with the divine fragrance of the Lord’s body and enriched by the aroma of incense, it filled all directions with its sweet scent. For this very reason, the fragrant cottage truly lived up to its meaningful name. ( 22)
श्लोक ( Shlok ) 23
गन्धानामिव या सूतिर्भासां येवाधिदेवता। शोभानां प्रसवक्ष्मेव या लक्ष्मीमधिकां दधे ॥२३॥
अथवा वह गंधकुटी ऐसी शोभा धारण कर रही थी मानो सुगंधि को उत्पन्न करने वाली ही हो, कांति की अधिदेवता अर्थात् स्वामिनी ही हो और शोभाओं को उत्पन्न करने वाली भूमि ही हो ।।23।।
Or, that fragrant cottage possessed such divine splendor as if it were the very source of all fragrance, the supreme deity of radiance, and the very abode from which all beauty emerged. ( 23)
श्लोक ( Shlok ) 24
धनुषां षट्शतीमेषा विस्तीर्णा यावदायता । विष्कम्भात् साथिकोच्छ्रया मानोम्मानप्रमान्विता ॥२४॥
वह गंधकुटी छह सौ धनुष चौड़ी थी, उतनी ही लंबी थी और चौड़ाई में कुछ अधिक ऊँची थी इस प्रकार वह मान और उन्मान के प्रमाण से सहित थी ।।24।।
That fragrant cottage was six hundred bows wide, equally long, and slightly taller in proportion to its width. Thus, it was perfectly measured in both scale and symmetry. ( 24)
श्लोक ( Shlok ) 25
तस्या मध्ये सैंहं पीठं नानारत्नव्राताकीर्णम् । मेरोः शृङ्ग न्यक्कुर्वाणं चक्रे शक्रादेशाद् वित्तेट् ॥२५॥
उस गंधकुटी के मध्य में धनपति ने एक सिंहासन बनाया था जो कि अनेक प्रकार के रत्नों के समूह से जड़ा हुआ था और मेरु पर्वत के शिखर को तिरस्कृत कर रहा था ।।25।।
At the center of that fragrant cottage, the Lord of Wealth had crafted a throne, encrusted with an array of precious jewels, so magnificent that it surpassed even the lofty peak of Mount Meru in grandeur. ( 25)
श्लोक ( Shlok ) 26
भानुह्रेपि श्रीमद्धेमं तुङ्ग भक्त्या जिष्णु भक्तुम् । मेरुः शुङ्ग स्वं वा निन्ये पीठव्याजाद् दीप्रं भासा
वह सिंहासन सुवर्ण का बना हुआ था, ऊँचा था, अतिशय शोभायुक्त था और अपनी कांति से सूर्य को भी लज्जित कर रहा था तथा ऐसा जान पड़ता था मानो जिनेंद्र भगवान् की सेवा करने के लिए सिंहासन के बहाने से सुमेरु पर्वत ही अपने कांति से दैदीप्यमान शिखर को ले आया हो ।।26।।
That throne was made of pure gold, elevated in stature, and exceptionally radiant, its brilliance even surpassing the sun. It appeared as though Mount Sumeru itself had brought its resplendent peak, disguised as a throne, to serve Lord Jina. ( 26)
श्लोक ( Shlok ) 27
यत्प्रसर्पदंशुदष्टदिङ्मुखं महर्दिभासि । चारुरत्नसारमूर्ति भासते स्म नेत्रहारि ॥२७॥
जिससे निकलती हुई किरणों से समस्त दिशाएँ व्याप्त हो रही थीं, जो बड़े भारी ऐश्वर्य से प्रकाशमान हो रहा था, जिसका आकार लगे हुए सुंदर रत्नों से अतिशय श्रेष्ठ था और जो नेत्रों को हरण करने वाला था ऐसा वह सिंहासन बहुत ही शोभायमान हो रहा था ।।27।।
That throne was exceedingly magnificent, spreading its radiant beams across all directions. It shone with immense splendor, its form adorned with exquisite gems of the highest brilliance. Captivating to the eyes, it stood as a dazzling symbol of supreme beauty. ( 27)
श्लोक ( Shlok ) 28
पृथुप्रदीप्तदेहकं स्फुरत्प्रभाप्रप्तानकम् । परार्ध्य रत्नभासुरं सुराद्रिहासि यद् बभौ ॥२८॥
जिसका आकार बहुत बड़ा और दैदीप्यमान था, जिससे कांति का समूह निकल रहा था, जो श्रेष्ठ रत्नों से प्रकाशमान था और जो अपनी शोभा से मेरु पर्वत की भी हंसी करता था ऐसा वह सिंहासन बहुत अधिक सुशोभित हो रहा था ।।28।।
That throne was vast and resplendent, radiating waves of brilliance. Adorned with the finest jewels, it shone with an unmatched luster, its grandeur so remarkable that it seemed to mock even the magnificence of Mount Meru. ( 28)
श्लोक ( Shlok ) 29
विष्टरं तदलंचक्रे भगवानादितीर्थकृत् । चतुर्भिरङ्गुलैः स्वेन महिम्ना स्पृष्टतत्तलः ॥२९॥
प्रथम तीर्थंकर भगवान् वृषभदेव उस सिंहासन को अलंकृत कर रहे थे । वे भगवान् अपने माहात्म्य से उस सिंहासन के तल से चार अंगुल ऊँचे अधर विराजमान थे उन्होंने उस सिंहासन के तलभाग को छुआ ही नहीं था ।।29।।
The first Tirthankara, Lord Rishabhadeva, graced that throne with His divine presence. Through His spiritual magnificence, He remained four fingers’ breadth above the throne’s surface, never actually touching its base. (29)
श्लोक ( Shlok ) 30
तत्रासीनं तमिन्द्राद्याः परिचेरु र्मंहेज्यया । पुष्पवृष्टिं प्रवर्षन्तो नभोमार्गाद् घना इव ॥३०॥
उसी सिंहासन पर विराजमान हुए भगवान की इंद्र आदि देव बड़ी-बड़ी पूजाओं द्वारा परिचर्या कर रहे थे और मेघों की तरह आकाश से पुष्पों की वर्षा कर रहे थे ।।30।।
As Lord Rishabhadeva sat upon that throne, Indra and other deities served Him with grand offerings and reverence. Like clouds in the sky, they showered a continuous rain of flowers from above. ( 30)
श्लोक ( Shlok ) 31
अपप्तत्कौसुमी वृष्टिः प्रोर्णुवाना नमोऽङ्गणम् । दृष्टिमालेव मत्तालिमाला वाचालिता नृणाम् ॥३१॥
मदोन्मत्त भ्रमरों के समूह से शब्दायमान तथा आकाशरूपी आंगन को व्याप्त करती हुई पुष्पों की वर्षा ऐसी पड़ रही थी मानो मनुष्य के नेत्रों की माला ही हो ।।31।।
The shower of flowers, resonating with the humming of intoxicated bees and filling the vast courtyard of the sky, seemed as if it were a garland woven from the very eyes of humankind. ( 31)
श्लोक 32 से 41
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 316
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