भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |
श्लोक 172 से 181 पंडिता का आश्वासन और चैत्यालय
श्रीमती ने कहा कि चित्रपट से धूर्तों को लज्जित करें। पंडिता ने हास्य के साथ आश्वासन दिया कि वह ललितांग को खोजेगी। वह चित्रपट लेकर महापूत जिनमंदिर गई, जो रत्न-शिखरों, चित्रित दीवालों, और ऊँचे शिखरों से शोभित था।
English translation of Ādi purāṇa parv 6- Shlok 172 to 181
श्लोक ( Shlok ) 172
“पति ब्रुवाश्च ये मिथ्या “वैयात्योद्धतबुद्धयः । तान् स्मितांशुपरच्छन्नान् कुरु गूढार्थसङ्कटे ॥१७२॥
धृष्टता के कारण उद्धत बुद्धि को धारण करने वाले जो पुरुष झूठमूठ ही यदि अपने-आपको पति कहें―मेरा पति बनना चाहें उन्हें गूढ़ विषयों के संकट में हास्यकिरणरूपी वस्त्र से आच्छादित करना अर्थात् चित्रपट देखकर झूठमूठ ही हमारा पति बनना चाहें उनसे तू गूढ़ विषय पूछना जब वे उत्तर न दे सकें तो अपने मंद हास्य से उन्हें लज्जित करना ।।172।।
Those men who, due to their arrogance, foolishly claim to be our husbands or seek to become our husbands—take them into the depths of profound topics, and cover them with the radiant cloth of mockery. That is, after they have viewed the pictorial representation and falsely claim to be our husbands, you should ask them difficult questions. When they are unable to answer, embarrass them with your subtle laughter. ||172||
श्लोक ( Shlok ) 173
इत्युक्त्वापण्डितावोचत् तच्चित्ताश्वासनं वचः । स्मितांशु मञ्जरीपुञ्जैः “किरती वोदमाञ्जलिम॥१७३॥
इस प्रकार जब श्रीमती कह चुकी तब ईषत् हास्य की किरणों के बहाने पुष्पांजलि बिखेरती हुई पंडिता सखी, उसके चित्त को आश्वासन देनेवाले वचन कहने लगी ।।173।।
Thus, after Shrimati spoke, the learned friend, scattering flower offerings with a hint of a smile, began to speak words that would reassure her heart. ||173||
श्लोक ( Shlok ) 174
मयि सत्यां मनस्तापो मा भूत् ते कलभाषिणि । लसत्यां चूतमञ्जर्या कोकिलायाः कुतोऽसुखम् ॥१७४॥
हे मधुरभाषिणि, मेरे रहते हुए तेरे चित्त को संताप नहीं हो सकता क्योंकि आम्रमंजरी के रहते हुए कोयल को दुःख कैसे हो सकता है ? ।।174।।
O sweet-voiced one, while I am here, your heart cannot suffer, for how can the cuckoo feel sorrow when the mango blossom is present? ||174||
श्लोक ( Shlok ) 175
कवेधींरिव सुश्लिष्टमर्थ ते मृगये पतिम् । सखि लक्ष्मीरिवोद्योगशालिनं पुरुषं परम् ॥१७५॥
हे सखी, जिस प्रकार कवि की बुद्धि सुश्लिष्ट―अनेक भावों को सूचित करने वाले उत्तम अर्थ को और लक्ष्मी जिस प्रकार उद्योगशाली मनुष्य को खोज लाती है उसी प्रकार मैं भी तेरे पति को खोज लाती हूँ ।।175।।
O friend, just as a poet’s intellect is refined and reveals profound meanings, and as Lakshmi finds her way to the industrious person, in the same way, I will bring your husband to you. ||175||
श्लोक ( Shlok ) 176
घटयिष्यामि ते कार्य पटुधीरहमुद्यता । दुर्घटं नास्ति मे किंचित् प्रतीहीह जगत्त्रये ॥१७६
हे सखी , मैं चतुर बुद्धि की धारक हूँ तथा कार्य करने में हमेशा उद्यत रहती हूँ इसलिए तेरा यह कार्य अवश्य सिद्ध कर दूंगी । तू यह निश्चित जान कि मुझे इन तीनों लोकों में कोई भी कार्य कठिन नहीं है ।।176।।
O friend, I am endowed with sharp intellect and always eager to perform tasks. Therefore, I will certainly bring success to your endeavor. Be assured that in these three worlds, no task is difficult for me. ||176||
श्लोक ( Shlok ) 177
नानाभरणविन्यासमतो धारय सुन्दरि । ‘वसन्तलतिकेवोद्यत्प्रवा लाङ्कुरसंकुलम् ॥ १७७॥
इसलिए हे सुंदरि, जिस प्रकार माधवी लता प्रकट होते हुए प्रवालों और अंकुरों के समूह को धारण करती है उसी प्रकार अब तू अनेक प्रकार के आभरणों के विन्यास को धारण कर ।।177।।
Therefore, O beautiful one, just as the Madhavi vine, blossoming, embraces a cluster of corals and buds, now you should adorn yourself with a variety of ornaments. ||177||
श्लोक ( Shlok ) 178
तदत्र संशयो नैव कार्यः कार्यस्य साधने । श्रीमतीप्रार्थितार्थानां ननु सिद्धिरसंशयम् ॥१७८॥
इस कार्य की सिद्धि में तुझे संशय नहीं करना चाहिए क्योंकि श्रीमती के द्वारा चाहे हुए पदार्थों की सिद्धि निःसंदेह ही होती है ।।178।।
You should have no doubt in the success of this task, for the desires of Shrimati, when sought, are undoubtedly fulfilled. ||178||
श्लोक ( Shlok ) 179
इत्युक्त्वा पण्डिताश्वास्य तां तदर्पितपट्टकम् । गृहीत्वागमदा श्वेव महापूतजिनालयम् ॥ १७९।।
वह पंडिता इस प्रकार कहकर तथा उस श्रीमती को समझाकर उसके द्वारा दिये हुए चित्रपट को लेकर शीघ्र ही महापूत नामक अथवा अत्यंत पवित्र जिनमंदिर गयी ।।179।।
Saying this, the learned one reassured Shrimati and, taking the pictorial representation she had given, quickly went to the sacred Jain temple called Mahaput, which was extremely holy. ||179||
श्लोक ( Shlok ) 180
यः सुदूरोच्छितैः कूटैर्लक्ष्यते रत्नभासुरैः । पातालादुत्फणस्तोषात् किमप्युद्यन्निवाहिराट् ॥१८०॥
वह जिनमंदिर रत्नों की किरणों से शोभायमान अपने ऊँचे उठे हुए शिखरों से ऐसा जान पड़ता था मानो फण ऊँचा किये हुए शेषनाग ही संतुष्ट होकर पाताल लोक से निकला हो ।।180।।
The Jain temple, adorned with rays of jewels, with its towering spires, appeared as if the Sheshnaga, having raised its hood in satisfaction, had emerged from the underworld. ||180||
श्लोक ( Shlok ) 181
वर्ण साङ्कर्यसं भूत चित्रकर्मान्विता अपि । यद्वित्तयो जगच्चित हारिण्यो गणिका इव ॥१८१॥
उस मंदिर की दीवालें ठीक वेश्याओं के समान थीं क्योंकि जिस प्रकार वेश्याएँ वर्णसंकरता (ब्राह्मणादि वर्णों के साथ व्यभिचार) से उत्पन्न हुई तथा अनेक आश्चर्यकारी कार्यों से सहित होकर जगत् के कामी पुरुषों की चित्त हरण करती हैं उसी प्रकार वे दीवालें भी वर्णसंकरता (काले पीले नीले लाल आदि रंगों के मेल) से बने हुए अनेक चित्रों से सहित होकर जगत् के सब जीवों का चित्त हरण करती थी ।।181।।
he walls of that temple were like those of courtesans, for just as courtesans, born from the mixing of castes (engaging with men of higher castes like Brahmins) and possessing many wondrous qualities, captivate the hearts of worldly men, in the same way, those walls, adorned with various images made from a blend of colors like black, yellow, blue, and red, captivated the hearts of all beings in the world. ||181||
श्लोक 182 से 191
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
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