भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111
श्लोक 112 से 121 पंडिता की खोज और वज्रजंघ का आगमन
पंडिता ने श्रीमती को बताया कि उसका मनोरथ पूर्ण हुआ। वह चित्रपट लेकर महापूत जिनalay गई, जहाँ मूर्ख लोग अर्थ न समझ सके। वासव और दुर्दांत ने झूठ बोला कि वे श्रीमती के पति हैं, पर गूढ़ प्रश्नों में चुप हो गए। फिर वज्रजंघ आया, जिनमंदिर की पूजा कर चित्रशाला में प्रवेश किया। उसने चित्रपट को देखा और कहा कि यह उसका पूर्वभव लगता है।
English translation of Ādi purāṇa parv 7 -Shlok 112 to 121
श्लोक ( Shlok ) 112 – 113
तौ तु बासवदुर्दान्तौ यावळी कविचक्षणौ ।दृष्ट्रास्मत्पट्टकं हृष्टा स्वानुमानादयोचताम् ॥११२॥
पट्टकार्थ स्फुटं विद्वो जातिस्मृतिमुपेयुषी ।व्यलिखद्वाजपुत्रीदं स्वपूर्वभवचेष्टितम् ॥११३॥
हाँ, वासव और दुर्दांत, जो झूठ बोलने में बहुत ही चतुर थे, हमारा चित्रपट देखकर बहुत प्रसन्न हुए और फिर अपने अनुमान से बोले कि हम दोनों चित्रपट का स्पष्ट आशय जानते हैं । किसी राजपुत्री को जाति-स्मरण हुआ है, इसलिए उसने अपने पूर्वभव की समस्त चेष्टाएँ लिखी हैं ।।112-113।।
“However, Vasava and Durdanta, who were very skilled in deceit, became delighted upon seeing the painting. Based on their assumptions, they claimed, ‘We clearly understand the meaning of this painting. It appears that some princess has regained the memory of her past lives and has depicted all her past actions in it.'” 112-113
श्लोक ( Shlok ) 114
इति नागरिकत्वेन प्रवृत्तौ नायकब्रुवौ। ताववोचं विहस्याहं चिरात् स्यादिदमीदृशम् ॥११४॥
इस प्रकार कहते-कहते वे बड़ी चतुराई से बोले कि इस राजपुत्री के पूर्व जन्म के पति हम ही हैं । मैंने बहुत देर तक हँसकर कहा कि कदाचित् ऐसा हो सकता है ।।114।।
“While saying this, they cleverly claimed, ‘We are the husband of this princess from her past life.’ I laughed for a long time and said, ‘Perhaps, that could be the case.'” 114
श्लोक ( Shlok ) 115
हठात् प्रकृतगूढार्थ संप्रश्ने च मया कृते । जोषमास्तां विलक्षौ तौ मूकीभूय ततो गतौ ॥ ११५॥
अनंतर जब मैंने उनसे चित्रपट के गूढ़ अर्थों के विषय में प्रश्न किये और उन्हें उत्तर देने के लिए बाध्य किया तब वे चुप रह गये और लज्जित हो चुपचाप वहाँ से चले गये ।।115।।
“Afterwards, when I asked them questions about the profound meanings of the painting and compelled them to answer, they remained silent, embarrassed, and quietly left the place.” 115
श्लोक ( Shlok ) 116
श्वशुर्यस्ते युवा वज्रजङ्घस्तत्रागमत् ततः । दिव्येन वपुषा कान्त्या दीप्त्या चानुपमो भुवि ॥११६॥
तत्पश्चात् तेरे श्वशुर का तरुण पुत्र वज्रजंघ वहाँ आया, जो अपने दिव्य शरीर, कांति और तेज के द्वारा समस्त भूतल में अनुपम था ।।116।।
“Then, your father-in-law’s young son, Vajrajangha, arrived there. He was unparalleled on the entire earth due to his divine body, radiance, and brilliance.” 116
श्लोक ( Shlok ) 117
अथ प्रदक्षिणीकृत्य भव्यस्तजिनमन्दिरम् । स्तुत्वा प्रणम्य चाभ्यर्च्य पट्टशालामुपासदत् ॥
उस भव्य ने आकर पहले जिनमंदिर की प्रदक्षिणा दी । फिर जिनेंद्रदेव की स्तुति कर उन्हें प्रणाम किया, उनकी पूजा की और फिर चित्रशाला में प्रवेश किया ।।117।।
“He, the noble one, first circumambulated the Jain temple. Then, after praising Lord Jinendra, he bowed to him, worshipped him, and entered the art gallery.” 117
श्लोक ( Shlok ) 118
निर्वर्ण्य पट्टकं तत्र श्रीमानिदमवोचत । “ज्ञातपूर्णमिवेदं में चरितं पट्टकस्थितम् ॥११८॥
वह श्रीमान् इस चित्रपट को देखकर बोला कि ऐसा मालूम होता है मानो इस चित्रपट में लिखा हुआ चरित्र मेरा पहले का जाना हुआ हो ।।118।।
“He, the esteemed one, upon seeing the painting, said, ‘It seems as though the character depicted in this painting is a familiar one from my past life.'” 118
श्लोक ( Shlok ) 119
वर्णनातीतमत्रेदं चित्रकर्म विराजते । “मानोन्मानप्रमाणाढ्यं निम्मोन्नतविभागवत् ॥११९॥
इस चित्रपट पर जो यह चित्र चित्रित किया गया है इसकी शोभा वाणी के अगोचर है । यह चित्र लंबाई चौड़ाई ऊँचाई आदि के ठीक-ठीक प्रमाण से सहित है तथा इसमें ऊँचे-नीचे सभी प्रदेशों का विभाग ठीक-ठीक दिखलाया गया है ।।119।।
“The beauty of the image depicted in this painting is beyond the reach of words. The painting is precise in its measurements of length, width, height, and other dimensions, and it accurately displays the division of all regions, both high and low.” 119
श्लोक ( Shlok ) 120
अहो सुनिपुर्ण चित्रकर्मेदं विलसच्छवि । रसभावान्वितं हारि रेखामाधुर्यसंगतम् ॥१२०॥
अहा, यह चित्र बड़ी चतुराई से भरा हुआ है, इसकी दीप्ति बहुत ही शोभायमान है, यह रस और भावों से सहित है, मनोहर है तथा रेखाओं की मधुरता से संगत है ।।120।।
“Ah, this painting is filled with great skill. Its radiance is extremely beautiful, it is full of essence and emotions, charming, and in harmony with the sweetness of its lines.” 120
श्लोक ( Shlok ) 121
अत्रास्मद्भवसंबन्धः पूर्वोऽलेखि सविस्तरम् । श्रीप्रभाधिपतां साक्षात् पश्यामीवेह मामिकाम् ॥१२१॥
इस चित्र में मेरे पूर्वभव का संबंध विस्तार के साथ लिखा गया है । ऐसा जान पड़ता मानो मैं अपने पूर्वभव में होने वाले श्रीप्रभ विमान के अधिपति ललितांगदेव के स्वामित्व को साक्षात् देख रहा हूँ ।।121।।
“In this painting, the connection to my past life has been written in detail. It seems as if I am directly witnessing the ownership of Lalitanga Dev, the ruler of the Shreeprabha Vimana, in my previous life.” 121
श्लोक 112-121 का संक्षेप में सारांश
इन श्लोकों में एक रोचक प्रसंग प्रस्तुत किया गया है। वासव और दुर्दांत, जो छल-कपट में निपुण थे, एक चित्रपट देखकर अत्यंत प्रसन्न होते हैं। वे अपने अनुमान के आधार पर कहते हैं कि यह चित्रपट एक राजकुमारी द्वारा बनाया गया है, जिसे अपने पूर्वजन्म की स्मृति प्राप्त हो गई है और उसने अपने पूर्व जीवन की समस्त घटनाएँ इसमें चित्रित की हैं।
इसके बाद वे यह दावा करते हैं कि उस राजकुमारी के पूर्व जन्म के पति वे स्वयं थे। यह सुनकर narrator (कथावाचक) हंस पड़ता है और कहता है कि शायद ऐसा हो सकता है। लेकिन जब वह उनसे चित्रपट के गूढ़ अर्थों पर प्रश्न करता है और उत्तर देने के लिए बाध्य करता है, तो वे दोनों लज्जित होकर चुप हो जाते हैं और वहाँ से चले जाते हैं।
इसके पश्चात, वज्रजंघ नामक युवक, जो कथावाचक के श्वसुर का पुत्र था, वहाँ आता है। उसका दिव्य स्वरूप, कान्ति और तेज अपूर्व थे। वह पहले जिन मंदिर की परिक्रमा करता है, भगवान जिनेंद्र की स्तुति करता है, प्रणाम करके पूजा करता है और फिर चित्रशाला में प्रवेश करता है।
चित्रपट को देखकर वज्रजंघ को ऐसा अनुभव होता है जैसे यह उसका कोई पुराना, पहचाना हुआ प्रसंग हो। वह चित्र की उत्कृष्ट कला, उसकी सजीवता, सटीक माप-प्रमाण, और उसमें प्रदर्शित विभिन्न प्रदेशों की सुंदर विभाजन प्रणाली की सराहना करता है। वह इसे भावनाओं और रेखाओं की मधुरता से युक्त अद्भुत कृति मानता है।
अंततः, वह इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि इस चित्रपट में उसके पूर्व जन्म का संपूर्ण विवरण चित्रित किया गया है। उसे ऐसा प्रतीत होता है कि मानो वह स्वयं अपने पूर्वजन्म में श्रीप्रभ विमान के अधिपति ललितांगदेव के रूप में साक्षात अपने स्वरूप को देख रहा हो।
Summary of Shlokas 112-121
The verses narrate a scene where Vasava and Durdanta, known for their deceit, become excited upon seeing a painting. They claim to understand its meaning, suggesting that a princess has regained memories of her past life and depicted her past actions in it.
However, they take their assumptions further, boldly stating that they were her husbands in that past life. The narrator laughs and remarks that it might be possible. But when he challenges them with deep questions about the painting’s true meaning, they fall silent, embarrassed, and quietly leave.
Later, Vajrajangha, the young son of the protagonist’s father-in-law, arrives. His divine appearance makes him stand out. He first circumambulates the Jain temple, offers prayers to Lord Jinendra, and then enters the art gallery.
Upon seeing the painting, Vajrajangha feels a deep connection to it, as if it represents a familiar story from his past. He admires the painting’s craftsmanship, precision in proportions, and ability to depict different regions accurately. He finds its beauty beyond words, appreciating its emotional depth and elegant lines.
Finally, he realizes that the painting portrays his past life in detail. He sees himself as the ruler of the celestial Shreeprabha Vimana, known as Lalitanga Dev, as if witnessing his past existence firsthand.
श्लोक 122 से 131
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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