आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64
श्लोक 65 से 71 ध्यान में आसन का महत्व
तीव्र प्राणायाम से चित्त व्याकुल होता है। मंद श्वास से ध्यान सिद्ध होता है। सम शरीर से समाधान रहता है। विषम शरीर से बुद्धि आकुल होती है। पर्यंक और कायोत्सर्ग आसन सुखकर हैं। विषम आसन से पीड़ा होती है। ये दोनों आसन ध्यान के लिए उत्तम हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 21 – Shlok 65 to 71
श्लोक ( Shlok ) 65
प्राणायामेऽतितीव्रे स्यादवश स्याकुलं मनः । व्याकुलस्य समाधानभङ्गान्न ध्यानसंभवः ॥६५॥
अपि व्युत्सृष्टकायस्य समाधिप्रतिपत्तये ।मन्दोच्छवासनिमेषादिवृत्तेर्नास्ति निषेधनम् ॥६६॥
अतिशय तीव्र प्राणायाम होने से अर्थात् बहुत देर तक श्वासोच्छ्वास के रोक रखने से इंद्रियों को पूर्ण रूप से वश में न करने वाले पुरुष का मन व्याकुल हो जाता है । जिसका मन व्याकुल हो गया है उसके चित्त की एकाग्रता नष्ट हो जाती है और ऐसा होने से उसका ध्यान भी टूट जाता है । इसलिए शरीर से ममत्व छोड़ने वाले मुनि के ध्यान की सिद्धि के लिए मंद-मंद उच्छवास लेना और पलकों के लगने, उघड़ने आदि का निषेध नहीं है ।।65-66।।
Excessively intense breath control (Prāṇāyāma), such as holding the breath for too long, can cause restlessness in a person who has not fully mastered the senses.
When the mind becomes restless, concentration is lost, and as a result, meditation is disrupted.
Therefore, for a monk who has renounced attachment to the body, achieving meditative perfection requires gentle and natural breathing. Additionally, there is no strict restriction on the natural blinking or opening and closing of the eyelids. 65-66
श्लोक ( Shlok ) 67 -68
समावस्थितकायस्थ स्यात् समाधानमङ्गिनः । दुःस्थिताङ्गस्य तद्भङ्गाद् भवेदाकुलता धियः ॥६७॥
ततो यथोक्तपस्यङ्कलक्षणासनमास्थितः । ध्यानाभ्यासं प्रकुर्वीत योगी व्याक्षेपमुत्सृजन् ॥ ६८॥
ध्यान के समय जिसका शरीर समरूप से स्थित होता है अर्थात् ऊंचा-नीचा नहीं होता है उसके समाधान अर्थात् चित्त की स्थिरता रहती है और जिसका शरीर विषम रूप से स्थित है उसके समाधान का भंग हो जाता है और समाधान के भंग हो जाने से बुद्धि में आकुलता उत्पन्न हो जाती है इसलिए मुनियों को ऊपर कहे हुए पर्यंक आसन से बैठकर और चित्त की चंचलता छोड़कर ध्यान का अभ्यास करना चाहिए ।।67-68।।
During meditation, one whose body remains in a balanced and steady posture—without being uneven or misaligned—maintains mental stability (Samādhāna).
However, if the body is positioned improperly or unevenly, mental stability is disturbed, leading to restlessness in the intellect.
Therefore, monks should practice meditation while seated in the previously described Paryaṅka Āsana (cross-legged posture), abandoning mental restlessness and maintaining inner stillness. 67-68
श्लोक ( Shlok ) 69
पल्यङ्क इव दिध्यासोः कायोत्सर्गोऽपि सम्मतः । समप्रयुक्तसर्वाङ्गो द्वात्रिंशद्दोषवर्जितः ॥६९॥
ध्यान करने की इच्छा करने वाले मुनि को पर्यंक आसन के समान कायोत्सर्ग आसन करने की भी आज्ञा है । कायोत्सर्ग के समय शरीर के समस्त अंगों को सम रखना चाहिए और आचार शास्त्र में कहे हुए बत्तीस दोषों का बचाव करना चाहिए ।।69।।
A monk who desires to practice meditation is also permitted to adopt the Kāyotsarga Āsana (the posture of complete body relaxation), just as with the Paryaṅka Āsana (cross-legged posture).
During Kāyotsarga, the entire body should be kept aligned and steady, avoiding any imbalance. Additionally, one should take care to prevent the thirty-two faults (Dōṣas) mentioned in the conduct scriptures (Ācāra Śāstra). 69
श्लोक ( Shlok ) 70 – 71
“”विसंस्थुलासनस्थस्य ध्रुवं गात्रस्य निग्रहः । तन्निग्रहान्मनःपीडा ततश्च विमनस्कता ॥७०॥
बैमनस्ये च किं ध्यायेत् तस्मादिष्टं सुखासनम् । कायोत्सर्गश्च पर्यङ्कस्ततोऽन्यविषमासनम् ॥७१॥
जो मनुष्य ध्यान के समय विषम (ऊँचे-नीचे) आसन से बैठता है उसके शरीर में अवश्य ही पीड़ा होने लगती है, शरीर में पीड़ा होने से मन में पीड़ा होती है और मन में पीड़ा होने से आकुलता उत्पन्न हो जाती है । आकुलता उत्पन्न होने पर कुछ भी ध्यान नहीं किया जा सकता इसलिए ध्यान के समय सुखासन लगाना ही अच्छा है । कायोत्सर्ग और पर्यंक ये दो सुखासन हैं इनके सिवाय बाकी सब विषम अर्थात दुःख करने वाले आसन हैं ।।70-71।।
If a person sits in an uneven (Viṣama) posture—where the body is not properly aligned—during meditation, physical discomfort inevitably arises.
Physical discomfort leads to mental distress, which in turn creates restlessness. When the mind becomes restless, meditation becomes impossible.
Therefore, during meditation, it is best to adopt a comfortable posture (Sukhāsana). The two postures considered Sukhāsana are Kāyotsarga (complete relaxation while standing or lying down) and Paryaṅka (cross-legged sitting posture).
All other postures are considered Viṣama (uneven) and cause discomfort, making them unsuitable for meditation. 70-71
श्लोक 72 से 81
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 253 | श्लोक 254 से 261
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