भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 |
श्लोक 272 से 281 ललितांगदेव के भोग
देवों ने ललितांगदेव को स्नान, जिनपूजा, और नृत्य-दर्शन के लिए प्रेरित किया। वह सात हाथ ऊँचा, सुगंधित, और ऋद्धियों से युक्त था। वह एक हजार वर्ष में मानसिक आहार, एक पक्ष में श्वास, और शरीर से संभोग करता था। उसकी माला और वस्त्र निर्मल थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 5- Shlok 272 to 281
श्लोक ( Shlok ) 272 – 277
सप्रश्रयमथोपेत्य स्वनियोगप्रचोदिताः । ते तं विज्ञापयामासुरिति प्रणतमौलयः ॥ २७२।।
प्रतीच्छ प्रथमं नाथ सज्जं मज्जनमङ्गलम् । ततः पूजां जिनेन्द्रार्णा कुरु पुण्यानुबन्धिनीम् ॥ २७३।।
ततो बलमिदं दैवं भवदैवबलाजितम् । समालोकय संघट्टेेेेः समापतदितस्ततः ॥२७४।॥
इतः “प्रेक्षस्व संप्रेक्ष्याः प्रेक्षागृहमुपागतः । सलीलभ्रूलतोरक्षेपं नटन्तीः सुरनर्तकीः ॥२७५।।
मनोज्ञवेषभूषाश्च देवीर्देवाद्य “मानय । “देवभूयत्वसंप्राप्तौ फलमेतावदेव हि ॥२७६।।
इति तद्वचनादेतत् स सर्वमकरोत् कृती । स्वनियोगानतिक्रान्तिः महतां भूषणं परम् ॥२७७।।
तत्पश्चात् अपने-अपने नियोग से प्रेरित हुए अनेक देव विनयसहित उसके पास आये और मस्तक झुकाकर इस प्रकार कहने लगे कि हे नाथ स्नान की सामग्री तैयार है इसलिए सबसे पहले मंगलमय स्नान कीजिए फिर पुण्य को बढ़ाने वाला जिनेंद्रदेव की पूजा कीजिए । तदनंतर आपके भाग्य से प्राप्त हुई तथा अपने-अपने गुटों (छोटी टुकड़ियों) के साथ जहाँ-तहाँ (सब ओर से) आने वाली देवों की सब सेना का अवलोकन कीजिए । इधर नाट्यशाला में आकर, लीलासहित भौंह नचाकर नृत्य करती हुई, दर्शनीय सुंदर देव नर्तकियों को देखिए । हे देव, आज मनोहर वेषभूषा से युक्त देवियों का सम्मान कीजिए क्योंकि निश्चय से देवपर्याय की प्राप्ति का इतना ही तो फल है । इस प्रकार कार्यकुशल ललितांगदेव ने उन देवों के कहे अनुसार सभी कार्य किये सो ठीक ही है क्योंकि अपने नियोगों का उल्लंघन नहीं करना ही महापुरुषों का श्रेष्ठ भूषण है ।।272-277।।
Thereafter, many deities, inspired by their respective duties, approached him with humility and bowed their heads. They said, “O Lord, the preparations for your sacred bath are ready. Therefore, please begin with the auspicious bath, followed by the worship of the venerable Jina, which enhances merit. Afterward, observe the celestial armies arriving from all directions, divided into their respective groups.
Visit the theater hall and behold the graceful celestial dancers performing with delightful expressions and elegant eyebrow movements. O Lord, today, honor the goddesses adorned in beautiful attire and ornaments, for surely this is the true fruit of attaining a celestial existence.
Following their words, the dutiful and skillful Lalitangdeva performed all the prescribed rituals and tasks. And rightly so, for abiding by one’s duties without transgression is the highest adornment of noble souls.” ॥272-277॥
श्लोक ( Shlok ) 278 –279
निष्टप्तकनकच्छायः सप्तहस्वोच्चविग्रहः । वस्त्राभरणमाळाद्ये सहजैरेव भूषितः ।।२७८॥
सुगन्धिबन्धुरामोद निःश्वासो रुक्षणोज्ज्वरः । स दिव्यानन्वभूद् भोगान् अणिमादिगुणैर्युतः ॥२७९॥
वह ललितांगदेव तपाये हुए सुवर्ण के समान कांतिमान था, सात हाथ ऊँचे शरीर का धारक था, साथ-साथ उत्पन्न हुए वस्त्र, आभूषण और माला आदि से विभूषित था, सुगंधित स्वासोच्छ्वास से सहित था, अनेक लक्षणों से उज्ज्वल था और अणिमा, महिमा आदि गुणों से युक्त था । ऐसा वह ललितांगदेव निरंतर दिव्य भोगों का अनुभव करने लगा ।।278-279।।
That Lalitangdeva was radiant like refined gold, with a body measuring seven hands in height. He was adorned with garments, ornaments, and garlands that had appeared along with him. His breath was fragrant, his form shining with numerous auspicious qualities, and he was endowed with divine powers such as Anima (ability to become small) and Mahima (ability to become great). Thus, Lalitangdeva began to continuously experience divine pleasures. ॥278-279॥
श्लोक ( Shlok ) 280
भेजे वर्षसहस्त्रेण मानसीं स तनुस्थितिम् । पक्षेणैकेन चोच्छ्वासं प्रवीचारोऽस्य कायिकः ॥२८०॥
वह एक हजार वर्ष बाद मानसिक आहार लेता था, एक पक्ष में श्वासोच्छ्वास लेता था तथा स्त्रीसंभोग शरीर द्वारा करता था ।।280।।
He consumed mental nourishment once every thousand years, took a breath once every fortnight, and engaged in physical union with celestial women. ॥280॥
श्लोक ( Shlok ) 281
तनुच्छायामिवाग्लानि दधानः स्त्रजमुज्ज्वलाम् । शरत्काळ इवाधत्त स दिव्यमरजोऽम्बरम् ॥२८१॥
वह शरीर की कांति के समान कभी नहीं मुरझाने वाली उज्ज्वल माला तथा शरत्काल के समान निर्मल दिव्य अंबर (वस्त्र, पक्ष में आकाश) धारण करता था ।।281।।
He adorned himself with a radiant garland that never withered, matching the brilliance of his body, and wore pristine, celestial garments as pure as the autumn sky. ॥281॥
श्लोक 282 से 292
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 |
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