आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231
श्लोक 232 से 241 मोह पर विजय
भगवान ने विशुद्धि से कर्मों को नष्ट किया। संयम को टोप और कवच बनाया। ध्यान को अस्त्र और ज्ञान को मंत्री बनाया। गुणों से कर्मों को हराया। कर्मों की प्रकृति बदल गई। उन्होंने कर्मों को जड़ से उखाड़ फेंका।
English translation of Ādi purāṇa parv 20 – Shlok 232 to 241
श्लोक ( Shlok ) 232
तदा ध्यानमयी शक्तिः स्फुरन्ती ददृशे विभोः । मोहारिनाशपिशुना महोल्केव ‘ विजृम्भिता ॥२३२॥
उस समय दैदीप्यमान हुई भगवान की ध्यानरूपी शक्ति ऐसी दिखाई देती थी मानो मोहरूपी शत्रु के नाश को सूचित करने वाली बढ़ी हुई बड़ी भारी उल्का ही हो ।।232।।
At that time, the radiant meditative power of the Lord appeared as if it were a great, blazing meteor, signifying the destruction of the enemy in the form of delusion (Moha). ॥232॥
श्लोक ( Shlok ) 233 – 234
आरचय्य तदा कृत्स्नं ‘विशुद्धिबलमग्रतः । निकृष्टमध्यमोत्कृष्टविभागेन त्रिधा कृतम् ॥२३३॥
कृतान्तः शुद्धिरुद्धूत कृतान्तकृतविक्रियः । “उत्तस्थे सर्वसामग्रयो मोहारिपृतनाजये ॥२३४॥
जिस प्रकार कोई राजा अपनी अंतःप्रकृति अर्थात् मंत्री आदि को शुद्ध कर―उनकी जाँच कर अपनी सेना के जघन्य, मध्यम और उत्तम ऐसे तीन भेद करता है और उनको आगे कर मरणभय से रहित हो सब सामग्री के साथ शत्रु की सेना को जीतने के लिए उठ खड़ा होता है उसी प्रकार भगवान् वृषभदेव ने भी अपनी अंतःप्रकृति अर्थात् मन को शुद्ध कर―संकल्प-विकल्प दूर कर अपनी विशुद्धिरूपी सेना के जघन्य, मध्यम और उत्कृष्ट ऐसे तीन भेद किये और फिर उस तीनों प्रकार की विशुद्धिरूपी सेना को आगे कर यमराज-द्वारा की हुई विक्रिया (मृत्युभय) को दूर करते हुए सब सामग्री के साथ मोहरूपी शत्रु की सेना अर्थात् मोहनीय कर्म के 21 अवांतर भेदों को जीतने के लिए तत्पर हो गये ।।233-234।।
Just as a king purifies his inner council—his ministers and advisors—by examining them, then classifies his army into three divisions: lower, middle, and superior, and fearlessly rises with full preparation to conquer the enemy’s forces, similarly, Lord Rishabhadeva purified His inner nature—His mind—by eliminating all doubts and distractions.
He divided His army of purity into three categories: lower, middle, and supreme. Then, leading this army of absolute purity, He eradicated the fear of death caused by Yamaraja (the lord of death) and prepared to conquer the army of delusion—the 21 subdivisions of Mohaniya Karma (deluding karma). ॥233-234॥
श्लोक ( Shlok ) 235
शिरस्त्राणं तनुत्रं च तस्यासीत् संयमद्वयम् । जैत्रमस्त्रं च सद् ध्यानं मोहारातिं बिभित्सतः ॥२३५॥
मोहरूपी शत्रु को भेदन करने की इच्छा करने वाले भगवान् ने इंद्रियसंयम और प्राणिसंयम रूप दो प्रकार के संयम को क्रम से शिर की रक्षा करने वाला टोप और शरीर की रक्षा करने वाला कवच बनाया था तथा उत्तम ध्यान को जयशील अस्त्र बनाया था ।।235।।
Desiring to pierce through the enemy in the form of delusion (Moha), the Lord fashioned two types of self-restraint—control over the senses (Indriya-Samyama) and non-violence towards living beings (Prani-Samyama). He used them respectively as a protective helmet for His head and armor for His body. Furthermore, He made supreme meditation (Uttama Dhyana) His invincible weapon for victory. ॥235॥
श्लोक ( Shlok ) 236
बलव्यसनरक्षार्थ ज्ञानामात्याः पुरस्कृताः । विशुद्धपरिणामश्च सैनापत्ये नियोजितः ॥२३६॥
विशुद्धिरूपी सेना की आपत्ति से रक्षा करने के लिए उन्होंने ज्ञानरूपी मंत्रियों को नियुक्त किया था और विशुद्ध परिणाम को सेनापति के पद पर नियुक्त किया था ।।236।।
To protect His army of purity from obstacles, the Lord appointed wisdom (Jnana) as His ministers and placed pure spiritual consciousness (Vishuddha Parinama) in the position of commander-in-chief. ॥236॥
श्लोक ( Shlok ) 237
गुणाः सैनिकतां नीता दुर्भेदा ध्रुवयोधिनः। तेषां हन्तव्यपक्षे च रागाद्याः प्रतिचर्चिंताः॥२३७॥
जिनका कोई भेदन नहीं कर सकता और जो निरंतर युद्ध करने वाले थे ऐसे गुणों को उन्होंने सैनिक बनाया तथा राग आदि शत्रुओं को उनके हंतव्य पक्ष में रखा ।।237।।
The Lord appointed indomitable virtues—those that no one could break and that constantly waged battle—as His warriors, while He placed enemies like attachment (Raga) and other passions in the category of those to be destroyed. ॥237॥
श्लोक ( Shlok ) 238
इत्यायोजितसैन्यस्य जयोद्योगे जगद्गुरोः । गुणश्रेणिवलाद्दीर्णं कर्मसैन्यै र्नु शल्कशः ॥२३८॥
इस प्रकार समस्त सेना की व्यवस्था कर जगद्गुरु भगवान ने ज्यों ही कर्मों के जीतने का उद्योग किया त्यों ही भगवान की गुण-श्रेणी निर्जरा के बल से कर्मरूपी सेना खंड-खंड होकर नष्ट होने लगी ।।238।।
Thus, after organizing His entire army, the Lord, the universal teacher, began His effort to conquer karma. The moment He did so, His ascending virtues, empowered by the force of Nirjara (shedding of karma), caused the army of karmas to break apart and be utterly destroyed. ॥238॥
श्लोक ( Shlok ) 239
यथा यथोत्तराशुद्धिरास्कन्दति तथा तथा । कर्मसम्यस्थितेर्भङ्गः संजातश्च रसक्षयः ॥ २३९॥
ज्यों-ज्यों भगवान् की विशुद्धि आगे-आगे बढ़ती जाती थी त्यों-त्यों कर्मरूपी सेना का भंग और रस अर्थान् फल देने की शक्ति का विनाश होता जाता था ।।239।।
As the Lord’s purity continued to advance, the army of karmas kept breaking apart, and their ability to yield results gradually diminished and was ultimately destroyed. ॥239॥
श्लोक ( Shlok ) 240
परप्रकृति संक्रान्तिः स्थिते र्भेदो रसच्युतिः । निर्जीर्णिश्च गुणश्रेण्या तदासीत् कर्मवैरिणाम् ॥२४०॥
उस समय भगवान् के कर्मरूप शत्रुओं में परप्रकृतिरूप संक्रमण हो रहा था अर्थान् कर्मों की एक प्रकृति अन्य प्रकृति रूप बदल रही थी, उनकी स्थिति घट रही थी, रस अर्थात् फल देने की शक्ति क्षीण हो रही थी और गुण-श्रेणी निर्जरा हो रही थी ।।240।।
At that time, the karmic enemies of the Lord were undergoing a transformation in their nature—one form of karma was changing into another. Their duration (sthiti) was decreasing, their potency to yield results (rasa) was weakening, and the ascending virtues of the Lord were leading to the shedding (Nirjara) of karma. ॥240॥
श्लोक ( Shlok ) 241
अधः प्रकृतिसंक्षोभं मूलोद्वर्त च कर्मणाम् । योगशक्त्या स योगीन्द्रो विजिगीषुरिवातनोत् ॥२४१॥
जिस प्रकार कोई विजयाभिलाषी राजा शत्रुओं की मंत्री आदि अंतरंग प्रकृति में क्षोभ पैदा करता है और फिर शत्रुओं को जड़ से उखाड़ देता है उस प्रकार योगिराज भगवान् वृषभदेव ने भी अपने योगबल से पहले कर्मों की उत्तर प्रकृतियों में क्षोभ उत्पन्न किया था और फिर उन्हें जड़सहित उखाड़ फेंकने का उपक्रम किया था अथवा मूल प्रकृतियों में उद्वर्तन (उद्वेलन आदि संक्रमणविशेष) किया था ।।241।।
Just as a victorious king disrupts the inner workings of his enemies, including their ministers and internal forces, before completely uprooting them, in the same way, the supreme yogi, Lord Rishabhadeva, through the power of His spiritual practice, first created disturbance in the advanced forms of karma. Then, He undertook the process of completely uprooting them along with their very roots, or He caused a transformation (Udvartana) in their fundamental nature. ॥241॥
श्लोक 242 से 253
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202 | श्लोक 203 से 209
आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192
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