आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 |
श्लोक 132 से 141 श्रेयान्स का पूर्वभव और दान की विशुद्धि
श्रेयान्स ने बताया कि वह वज्रजंघ के भव में श्रीमती थी। उसने चारणमुनियों को दान दिया था। दान और काव्य पुण्य से प्राप्त होते हैं। उसने भरत को दान की विशुद्धि बताई। दाता, देय, और पात्र की शुद्धि से दान फलदायी होता है। दाता श्रद्धा आदि गुणों से युक्त होता है।
English translation of Ādi purāṇa parv 20 – Shlok 132 to 141
श्लोक ( Shlok ) 132
अहं हि श्रीमती नाम वज्रजङ्घभवे विभोः । विदेहे पुण्डरीकिण्यामभूवं प्राणवल्लभा ॥१३२॥
पूर्वभव में जब भगवान् वज्रजंघ की पर्याय में थे तब विदेह-क्षेत्र की पुंडरीकिणी नगरी में मैं इनकी श्रीमती नाम की प्रिय स्त्री हुआ था ।।132।।
“In a previous birth, when the Lord was in the form of Vajrajangha, I was His beloved wife named Shrimati in the city of Pundarikini, located in the Videha region.” ( 132)
श्लोक ( Shlok ) 133
समं भगवतानेन बिभ्रता वज्रजङ्घताम्। तदा चारणयुग्माय दतं दानमभून्मया ॥१३३॥
उस समय वज्रजंघ की पर्याय को धारण करने वाले इन भगवान् के साथ-साथ मैंने दो चारणमुनियों के लिए दान दिया था ।।133।।
“At that time, along with Lord Vajrajangha, I had given alms to two Charana monks.” ( 133)
श्लोक ( Shlok ) 134
विशुद्धतरमुत्सृष्टकलङ्कं ख्यातिकारणम् । महद्दानं च काव्यं च पुण्याल्लभ्यमिदं द्वयम् ॥ १३४॥
अतिशय विशुद्ध, दोषरहित और प्रसिद्धि का कारण ऐसा महादान देना और काव्य करना ये दोनों ही वस्तुएं बड़े पुण्य से प्राप्त होती हैं ।।134।।
“Giving an extremely pure, faultless, and renowned great alms, as well as composing poetry—both of these are attained through great merit.” (134)
श्लोक ( Shlok ) 135
“का चेद्दानस्य संशुद्धिः शृणु भो भरताधिप । अनुग्रहार्थं स्वस्याविसर्गो दानं त्रिशुद्धिकम् ॥१३५॥
हे भरतक्षेत्र के स्वामी भरत महाराज, दान की विशुद्धि का कुछ थोड़ा-सा वर्णन आप भी सुनिए―स्व और पर के उपकार के लिए मन-वचन-काय की विशुद्धापूर्वक जो अपना धन दिया जाता है उसे दान कहते हैं ।।135।।
“O Lord of Bharat Kshetra, King Bharat, listen to a brief description of the purity of almsgiving—when one offers their wealth with a pure mind, speech, and body for the benefit of oneself and others, it is called true charity.” ( 135)
श्लोक ( Shlok ) 136 –137
दातुर्विशुद्धता देयं पात्रं च प्रपुनाति सा ।शुद्धिर्देयस्य दातारं पुनीते पात्रमप्यदः ॥१३६।॥
पात्रस्य शुद्धिर्दातारं देयं चैव पुनात्यदः । नवकोटिविशुद्धं तद्दानं भूरिफलोदयम् ॥१३७।।
दान देने वाले (दाता) की विशुद्धता दान में दी जाने वाली वस्तु तथा दान लेने वाले पात्र को पवित्र करती है । दी जाने वाली वस्तु की पवित्रता देने वाले और लेने वाले को पवित्र करती है और इसी प्रकार लेने वाले की विशुद्धि देने वाले पुरुष को तथा दी जाने वाली वस्तु को पवित्र करती है इसलिए जो दान नौ प्रकार की विशुद्धतापूर्वक दिया जाता है वही अनेक फल देने वाला होता है । भावार्थ―दान देने में दाता, देय और पात्र की शुद्धि का होना आवश्यक है ।।136-137।।
“The purity of the giver sanctifies both the offering and the recipient. The purity of the offering sanctifies both the giver and the recipient. Likewise, the purity of the recipient sanctifies both the giver and the offering. Therefore, the charity that is given with these nine types of purity is the one that yields manifold rewards.
Interpretation: In giving charity, the purity of the donor, the object given, and the recipient is essential.” ( 136-137)
श्लोक ( Shlok ) 138
दाता भद्धादिभिर्युक्तो गुणैः पुण्यस्य साधनैः । देयमाहारभैषज्यशास्त्राभय विकल्पितम् ।।१३८।।
पुण्य प्राप्ति के कारण स्वरूप, श्रद्धा आदि गुणों से सहित पुरुष दाता कहलाता है और आहार, औषधि, शास्त्र तथा अभय से चार प्रकार की वस्तुएँ देय कहलाती हैं ।।138।।
“The person who donates with faith and other virtuous qualities is called a giver (दाता), as they become the cause of earning merit. The four types of offerings are:
- Food (आहार) – Providing sustenance to the needy.
- Medicine (औषधि) – Giving medical aid to the ill.
- Scriptures (शास्त्र) – Offering knowledge for spiritual upliftment.
- Fearlessness (अभय) – Granting protection and security to those in distress.
These four are considered worthy donations.” (138)
श्लोक ( Shlok ) 139
पात्रं रागादिभिर्दोषैरस्पृष्टो गुणवान् भवेत् । तच्च त्रेधा जघन्यादिभेदैर्भेद मुपेयिवत् ।।१३९।।
जो रागादि दोषों से छुआ भी नहीं गया हो और जो अनेक गुणों से सहित हो ऐसा पुरुष पात्र कहलाता है, वह पात्र जघन्य, मध्यम और उत्तम के भेद से तीन प्रकार का होता है । हे राजन्, यह सब मैंने पूर्वभव के स्मरण से जाना है ।।139।।
“A recipient (पात्र) is one who is untouched by faults like attachment (rāga) and possesses numerous virtues. Recipients are classified into three types based on their spiritual merit:
- Inferior (जघन्य) – Those with minimal virtues.
- Medium (मध्यम) – Those with moderate virtues.
- Superior (उत्तम) – Those with exceptional virtues and purity.
O King, I have understood all this through the remembrance of my past life.” (139)
श्लोक ( Shlok ) 140
जघन्यं शीलवान् मिथ्यादृष्टिश्च पुरुषो भवेत्। सद् दृष्टिर्मध्यमं पात्रं निःशीलव्रतभावनः ।।१४०।
जो पुरुष मिथ्यादृष्टि है परंतु मंदकषाय होने से व्रत, शील आदि का पालन करता है वह जघन्य पात्र कहलाता है और जो व्रत शील आदि की भावना से रहित सम्यग्दृष्टि है वह मध्यम पात्र कहा जाता हें ।।140।।
“A person who holds false beliefs (Mithyādṛṣṭi) but follows vows (Vrat) and moral conduct (Śīla) due to mild passions (Manda-kaṣāya) is called an Inferior Recipient (Jaghanya Pātra).
On the other hand, one who possesses the right belief (Samyag-dṛṣṭi) but lacks the practice of vows and moral conduct is known as a Medium Recipient (Madhyama Pātra).” ( 140)
श्लोक ( Shlok ) 141
सद् दृष्टिः शीलसंपन्नः पात्रमुत्तममिष्यते । कुदृष्टियों विशीलश्च नेव पात्रमसौ मतः ॥१४१॥
तो व्रत, शील आदि से सहित सम्यग्दृष्टि है वह उत्तम पात्र कहलाता है और जो व्रत, शील आदि से रहित मिथ्यादृष्टि है वह पात्र नहीं माना गया है अर्थात् अपात्र है ।।141।।
“A person who possesses right belief (Samyag-dṛṣṭi) along with the practice of vows (Vrat), moral conduct (Śīla), and other virtues is called a Superior Recipient (Uttama Pātra).
However, one who lacks both vows and moral conduct and also holds false beliefs (Mithyā-dṛṣṭi) is not considered a worthy recipient (Apātra).” (141)
श्लोक 142 से 151
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