आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111
श्लोक 112 से 121 पर्वत का सौंदर्य और जीवन
चकवी अपने साथी को ढूंढती घूमती थी। शरद् का बादल विद्याधरियों द्वारा खेल में लिया जाता था। गंगा और सिंधु पर्वत को धारण करती थीं। यहाँ सब कुछ सुखद और लुभावना था। वन की पंक्ति धोती और बादल पगड़ी सी थीं। लतागृहों में विद्याधरियाँ क्रीड़ा करती थीं। बादल चंदोवा बन विद्याधरियों को ठंडक देते थे। मयूर बादलों को देख नृत्य करते थे। विद्याधरियाँ बादलों पर शय्या बनाती थीं।
English translation of Ādi purāṇa parv 19 – Shlok 112 to 121
श्लोक ( Shlok ) 112
इयमितो बत कोककुटुम्बिनी कमलिनीनवपत्रतिरोहितम् । अनवलोक्य मुहुः सहचारिणं भ्रमति दीनरुतैः परितः सरः ॥११२॥
इधर यह चकवी कमलिनी के नवीन पत्रों से छिपे हुए अपने साथी―चकवा को न देखकर बार-बार दीन शब्द करती हुई तालाब के चारों ओर घूम रही है ।।112।
Here, the chakvi bird, unable to see her mate—the chakva—who is hidden beneath the fresh leaves of the lotus plant, circles the pond repeatedly, calling out in distress with sorrowful cries. ||112||
श्लोक ( Shlok ) 113
इह शरद घनमल्पकमाश्रितं मणितटं सुरखेचरकन्यकाः ।लघुतया सुखहार्यमितस्ततः प्रचलयन्ति नयन्ति च कर्षणेः ॥११३॥
इधर इस पर्वत के मणिमय किनारे पर यह शरद्ऋतु का छोटा-सा बादल आ गया है, हलका होने के कारण इसे सब कोई सुखपूर्वक ले जा सकते हैं और इसीलिए ये देव तथा विद्याधरों की कन्याएँ इसे इधर-उधर चलाती हैं और खींचकर अपनी-अपनी और ले जाती हैं ।।113।।
Here, a small autumn cloud has drifted onto the jewel-studded edges of this mountain. Being light and weightless, it can be easily moved by anyone. For this reason, the celestial maidens and Vidyadhara princesses playfully pull it in different directions, guiding it wherever they please. ||113||
श्लोक ( Shlok ) 114
असु मतां सुमताम्भसमाततां धृत घनान्तघनामिव वीचिभिः । ततवनान्तवनाममरापगां वहति सानुभिरेष महाचलः ॥११४॥
जो सब जीवों को अतिशय इष्ट है, जो बहुत बड़ी है, जो अपनी लहरों से ऐसी जान पड़ती है मानो उसने शरद्ऋतु के बादल ही धारण किये हों और जिसका जल वनों के अंतभाग तक फैल गया है ऐसी गंगा नदी को भी यह महापर्वत अपने निचले शिखरों पर धारण कर रहा है ।।114।।
This great mountain supports the mighty Ganga River upon its lower peaks. The river, immensely beloved by all beings, appears vast and majestic. With its waves resembling drifting autumn clouds and its waters extending deep into the forest regions, it enhances the grandeur of the mountain. ||114||
श्लोक ( Shlok ) 115
असुतरां सुतरां पृथुमम्भसां पतिमित्तां तिमितान्त लतावनाम् । अनुगतां नु गतां स्वतटोपमां वहति सिन्धुमयं धरणीधरः ॥११५॥
और, जो अतिशय विस्तृत है जो कठिनता से पार होने योग्य है, जो लगातार समुद्र तक चली गयी है जिसने लताओं के वन को जल से आर्द्र कर दिया है तथा जो अपने किनारे की उपमा को प्राप्त है ऐसी सिंधु नदी को भी यह पर्वत धारण कर रहा है ।।115।।
This mountain also supports the mighty Sindhu River, which is vast and difficult to cross, continuously flowing toward the ocean. It has drenched the forests of creepers with its waters and stands equal in grandeur to the very edges it flows past. ||115||
श्लोक ( Shlok ) 116
इति यदेव यदेव निरूप्यते बहुविशेषगुणेऽत्र नगाधिपे । किमु तदेव तदेव सुखावहं हृदयहारि दृशां च विलोभनम् ॥११६॥
इस प्रकार अनेक विशेष गुणों से सहित इस पर्वत पर जिसे देखो वही सुख देने वाला, हृदय को हरण करने वाला और आंखों को लुभाने वाला जान पड़ता है ।।116।।
Thus, endowed with countless unique qualities, everything on this mountain appears delightful, captivating to the heart, and enchanting to the eyes. ||116||
श्लोक ( Shlok ) 117
धत्तेऽस्य सानौ कुसुमाचितेयं नीलानालीपरिधानलक्ष्मीम् । शृङ्गाग्रलग्ना च सिताभ्रपंक्तिः संव्यानलीलामियमातनोति ॥११७॥
इस पर्वत के नीचले शिखरों पर जो फूलों से व्याप्त हरी-हरी वन की पंक्ति दिखाई दे रही है वह इस पर्वत की धोती की शोभा धारण कर रही है और शिखर के अग्रभाग पर जो सफेद-सफेद बादलों की पंक्ति लग रही है वह इसकी पगड़ी की शोभा बढ़ा रही है ।।117।।
The lush green rows of flowering forests on the lower peaks of this mountain appear like its resplendent dhoti (lower garment), while the white streaks of clouds adorning its summit enhance its grandeur, resembling a majestic turban. ||117||
श्लोक ( Shlok ) 118
‘तिरस्करिण्येव सिताभ्रपङ्क्त्या परिष्कृतान्तेऽस्य निकुञ्ज देशे । मणिप्रभोत्सर्पहतान्धकारे समं रमन्ते खचरैः खचर्यः ॥११८॥
जिनका अंतभाग परदा के समान सफेद बादलों की पंक्ति से ढका हुआ है और मणियों की प्रभा के प्रसार से जिनका सब अंधकार नष्ट हो गया है ऐसे इस पर्वत के लतागृहों में विद्याधरियाँ विद्याधरों के साथ क्रीड़ा कर रही हैं ।।118।।
In the vine-covered dwellings of this mountain, where the edges are veiled like curtains by rows of white clouds and the radiance of precious gems has dispelled all darkness, the Vidyadhari maidens joyfully engage in playful pastimes with the Vidyadharas. ||118||
श्लोक ( Shlok ) 119
शरद् घनस्योपरि सुस्थिते घने वितानतां तन्वति खेचराङ्गनाः । कृत्तालयास्तत्र चिरं रिरंसया घनातपेऽप्यह्निन जानते क्लमम् ॥११९॥
इस पर्वत के ऊपर शरद्ऋतु का मोटा बादल चंदोवा की शोभा बढ़ाता हुआ हमेशा स्थिर रहता है इसलिए विद्याधरियाँ चिरकाल तक रमण करने की इच्छा से वहीं पर अपना घर-सा बना लेती हैं और गरमी के दिनों से भी गरमी का दुःख नहीं जानती ।।119।।
A thick autumn cloud hovers constantly over this mountain, enhancing its beauty like a grand canopy. Because of this, the Vidyadhari maidens, desiring to dwell there for a long time, make it their home. Even during the hottest days, they remain unaffected by the heat and experience no discomfort. ||119||
श्लोक ( Shlok ) 120
समुल्ल सन्नील मणिप्रभाप्लुतान् शरद घनान् कालघनाघनायितान् । विलोक्य हृष्टोऽत्र रुवन् शिखाबलः प्रनृत्यति व्यातत बर्हमुन्मदः ॥१२०॥
ये शरद्ऋतु के बादल भी चमकते हुए इंद्रनीलमणियों की प्रभा में डूबकर काले बादलों के समान हो रहे हैं, इन्हें देखकर ये मयूर हर्षित हो रहे हैं और उन्मत्त होकर शब्द करते हुए पूंछ फैलाकर सुंदर नृत्य कर रहे हैं ।।120।।
These autumn clouds, immersed in the radiance of shining sapphire gems, appear as dark as rain-laden monsoon clouds. Seeing them, the peacocks become overjoyed, spreading their tails wide in delight and dancing beautifully while calling out in excitement. ||120||
श्लोक ( Shlok ) 121
सितान् घनानिह तटसंश्रितानिमान् स्थळास्थया समुपागताः खगाङ्गनाः। दुकुल संस्तरण इवातिविस्तृते विशायिका सुपरचयन्ति तत्तले ॥१२१॥
इधर ये विद्याधरों की स्त्रियां पर्वत के किनारे में मिले हुए सफेद बादलों को स्थल समझकर उनके पास पहुंची हैं और उन पर इस प्रकार शय्या बना रही हैं मानो बिछे हुए किसी लंबे-चौड़े रेशम की जाजम पर ही बना रही हो ।।121।।
Here, the Vidyadhara women, mistaking the white clouds resting along the mountain’s edges for solid ground, approach them. They arrange their beds upon them as if they were spreading their cushions over a vast expanse of fine silk. ||121||
श्लोक 122 से 131
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
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