आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 |
श्लोक 72 से 81 निष्क्रमण कल्याणक का उत्सव
इंद्रादि देवों ने आकाश घेरा और क्षीरसागर के जल से अभिषेक किया। भरत को राज्य, बाहुबली को युवराज पद मिला। निष्क्रमण और राज्याभिषेक का उत्सव हुआ। शिल्पी पालकी और मंडप बना रहे थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 17 – Shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
तावच्च नाकिनो नैकविक्रियाः कम्पितासनाः । पुरो ऽभूवन् पुरो रस्य पुरोधाय पुरंदरम् ॥७२॥
इतने में ही आसनों के कंपायमान होने से भगवान् के तप-कल्याणक का निश्चय कर देव लोग अपने-अपने इंद्रों के साथ अनेक विक्रियाओं को धारण कर प्रकट होने लगे ।।72।।
“At that moment, as the celestial thrones trembled, the gods realized the certainty of the Lord’s ascetic initiation. They began manifesting themselves with various divine transformations, accompanied by their respective Indras.”
श्लोक ( Shlok ) 73
नभोऽङ्गणमथारुध्य तेऽयोध्यां परितः पुरीम् । तस्थुः स्ववाहनानीका नाकिनाथा निकायशः ॥७३॥
अथानंतर समस्त इंद्र अपने वाहनों और अपने-अपने निकाय देवों के साथ आकाशरूपी आंगन को व्याप्त करते हुए आये और अयोध्यापुरी के चारों ओर आकाश को घेरकर अपने-अपने निकाय के अनुसार ठहर गये ।।73।।
“Then, all the Indras, along with their celestial vehicles and divine retinues, arrived, filling the vast expanse of the sky. They encircled the city of Ayodhya from all directions and stationed themselves according to their respective divine assemblies.”
श्लोक ( Shlok ) 74
ततोऽस्य परिनिष्क्रान्तिमहाकल्याणसंविधौ । महाभिषेकमिन्द्राद्याश्चक्रुः क्षीरार्णवाम्बुभिः ॥७४॥
तदनंतर इंद्रादिक देवों ने भगवान् के निष्क्रमण अर्थात् तपःकल्याणक करने के लिए उस क्षीरसागर के जल से महाभिषेक किया ।।74।।
“Then, Indra and the other deities performed a grand consecration (Mahabhisheka) of the Lord with the sacred waters of the Kshira Sagara (Ocean of Milk) to commemorate His renunciation and ascetic initiation (Tapa Kalyanak).”
श्लोक ( Shlok ) 75
अभिषिच्य विभुं देवा भूषयाञ्चक्रुरादृताः । दिव्यैर्विभूषणैर्वस्त्रैर्माल्यैश्च मलयोद्भवैः ॥७५॥
अभिषेक कर चुकने के बाद देवों ने बड़े आदर के साथ दिव्य आभूषण, वस्त्र, मालाएँ और मलयागिरि चंदन से भगवान् का अलंकार किया ।।75।।
“After completing the consecration, the deities respectfully adorned the Lord with divine ornaments, garments, garlands, and fragrant sandalwood paste from Mount Malaya.”
श्लोक ( Shlok ) 76
ततोऽभिषिच्य साम्राज्ये भरतं सूनुमग्रिमम् । भगवान् भारतं वर्ष तत्सनाथं व्यधादिदम् ॥७६॥
तदनंतर भगवान वृषभदेव ने साम्राज्य पद पर अपने बड़े पुत्र भरत का अभिषेक कर इस भारतवर्ष को उनसे सनाथ किया ।।76।।
“Then, Lord Rishabhadeva anointed His eldest son, Bharat, as the emperor, thus blessing Bharatvarsha with his rule and leadership.”
श्लोक ( Shlok ) 77
यौवराज्ये च तं बाहुबलिनं समतिष्ठिपत् । तदा राजन्वतीत्यासीत् पृथ्वी ताभ्यामधिष्ठिता ॥७७॥
और युवराज पद पर बाहुबली को स्थापित किया । इस प्रकार उस समय यह पृथिवी उक्त दोनों भाइयों से अधिष्ठित होने के कारण राजन्वती अर्थात् सुयोग्य राजा से सहित हुई थी ।।77।।
“And He appointed Bahubali as the crown prince. Thus, at that time, the earth was ruled and adorned by these two noble brothers, making it prosperous under their worthy leadership.”
श्लोक ( Shlok ) 78
परिनिष्क्रान्तिराज्यानुसंक्रान्तिद्वितयोत्सवे । तदा स्वर्लोकभूलोकावास्तां प्रमदनिर्भ रौ॥७८॥
उस समय भगवान् वृषभदेव का निष्क्रमणकल्याणक और भरत का राज्याभिषेक हो रहा था इन दोनों प्रकार के उत्सवों के समय स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक दोनों ही हर्षनिर्भर हो रहे थे ।।78।।
“At that time, both the grand event of Lord Rishabhadeva’s renunciation (Nishkraman Kalyanak) and the coronation of Bharat were taking place. During these celebrations, both the celestial and earthly realms were filled with immense joy.”
श्लोक ( Shlok ) 79
भगवत्परिनिष्क्रान्तिकल्याणोत्सव एकतः । स्फीतरद्धिरन्यतो यूनोः पृथ्वीराज्यार्पणक्षणः ॥७९॥
उस समय एक ओर तो बड़े वैभव के साथ भगवान के निष्क्रमणकल्याणक का उत्सव हो रहा था और दूसरी ओर भरत तथा बाहुबली इन दोनों राजकुमारों के लिए पृथ्वी का राज्य समर्पण करने का उत्सव किया जा रहा था ।।79।।
“At that time, on one side, the grand celebration of Lord Rishabhadeva’s renunciation (Nishkraman Kalyanak) was taking place with great splendor, while on the other side, the ceremony of entrusting the kingdom to Prince Bharat and Prince Bahubali was being joyously conducted.”
श्लोक ( Shlok ) 80
बद्धकक्षस्तपोराज्ये सज्जो राजर्षिरेकतः । युवानावन्यतो राज्यलक्ष्म्युद्वाहे कृतोद्यमौ ॥८०॥
एक ओर तो राजर्षि-भगवान् वृषभदेव तपरूपी राज्य के लिए कमर बाँधकर तैयार हुए थे और दूसरी ओर दोनों तरुण कुमार राज्यलक्ष्मी के साथ विवाह करने के लिए उद्यम कर रहे थे ।।80।।
“On one side, the royal sage Lord Rishabhadeva had girded Himself for the kingdom of asceticism, while on the other, the two young princes were preparing to unite with the goddess of sovereignty and rule the kingdom.”
श्लोक ( Shlok ) 81
एकतः शिबिकायाननिर्माणं सुरशिल्पिनाम् । वास्तुवेदिभिरारब्धः परार्ध्यो मण्डपोऽन्यतः ॥८१॥
एक ओर तो देवों के शिल्पी भगवान को वन में ले जाने के लिए पालकी का निर्माण कर रहे थे और दूसरी ओर वास्तुविद्या अर्थात् महल मंडप आदि बनाने की विधि जानने वाले शिल्पी राजकुमारों के अभिषेक के लिए बहुमूल्य मंडप बना रहे थे ।।81।।
“On one side, the divine architects were crafting a palanquin to escort Lord Rishabhadeva to the forest, while on the other, master artisans skilled in architecture were constructing grand and exquisite pavilions for the coronation of the princes.”
श्लोक 82 से 91
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 |