भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण पंचमं पर्व Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
महाबल का उत्सव, धर्म पर बहस, अरविंद की कथा , अरविंद, दंड, शतबल, सहस्त्रबल की कथाएँ, मेरु का वर्णन, महाबल की भविष्यवाणी , महाबल का पूर्वभव, संन्यास, मृत्यु, देवत्व, और धर्म की महिमा शामिल है।
श्लोक 13 से 21 स्वयंबुद्ध का धर्मोपदेश
स्वयंबुद्ध मंत्री ने महाबल को प्रसन्न देखकर उनके कल्याण हेतु वचन कहे। उन्होंने कहा कि विद्याधर लक्ष्मी पुण्य का फल है। धर्म से संपत्ति, सुख, और प्रसन्नता मिलती है। राज्य, भोग, सुंदरता, पांडित्य, आयु, और आरोग्य पुण्य के फल हैं। कारण के बिना कार्य, दीपक के बिना प्रकाश, या धर्म के बिना संपदा असंभव है। अधर्म से सुख नहीं मिलता। धर्म वह है जो स्वर्ग और मोक्ष देता है, जिसका मूल दया और संपूर्ण प्राणियों पर अनुकंपा है। क्षमा आदि गुण दया की रक्षा करते हैं।
श्लोक 22 से 31 धर्म के लक्षण और मिथ्यादृष्टि की शुरुआत
स्वयंबुद्ध ने धर्म के लक्षण बताए: इंद्रिय दमन, क्षमा, अहिंसा, तप, ज्ञान, शील, ध्यान, और वैराग्य। अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, और परिग्रह त्याग सनातन धर्म हैं। राज्य आदि को धर्म का फल जानकर दृष्टि धर्म में स्थिर रखनी चाहिए। चंचल लक्ष्मी को स्थिर करने के लिए अहिंसादि धर्म का पालन आवश्यक है। स्वयंबुद्ध के ये वचन सुनकर मिथ्यादृष्टि मंत्री महामति ने चार्वाक मत का समर्थन करते हुए जीव के अस्तित्व पर प्रश्न उठाया। उसने कहा कि आत्मा सिद्ध नहीं, इसलिए धर्म का फल कैसे हो सकता है। पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि के संयोग से चेतना उत्पन्न होती है, जैसे महुआ आदि से मादक शक्ति।
श्लोक 32 से 41 महामति और संभिन्नमति के तर्क
महामति ने कहा कि शरीर से पृथक् चेतना नहीं, क्योंकि यह प्रत्यक्ष नहीं। शरीर नष्ट होने पर जीव बुलबुले समान विलीन हो जाता है। परलोक की आशा व्यर्थ है। संभिन्नमति ने विज्ञानवाद का समर्थन करते हुए कहा कि जीव पृथक् नहीं, जगत् विज्ञानमात्र और क्षणभंगुर है। विज्ञान निरंश, स्वतः नष्ट होने वाला, और संतान छोड़ने वाला है। प्रत्यभिज्ञान भ्रांत है, जैसे नये नख-केशों का पुराना समझना। स्कंध (विज्ञान, वेदना आदि) दुःख हैं, और क्षणिक नैरात्म्य से मोक्ष मिलता है। परलोक का भय टिटिहरी के आकाश भय समान है।
श्लोक 42 से 51 शतमति का शून्यवाद और स्वयंबुद्ध का प्रतिवाद
शतमति ने शून्यवाद का समर्थन करते हुए कहा कि जगत् शून्य और मिथ्या है, जैसे स्वप्न या इंद्रजाल। जीव और परलोक असत् हैं। परलोक के लिए तप व्यर्थ है। स्वयंबुद्ध ने भूतवाद का खंडन करते हुए कहा कि ज्ञान-दर्शनरूप चैतन्य भूतचतुष्टय से पृथक् है। शरीर जड़ और चैतन्य चित्स्वरूप हैं, दोनों का स्वभाव विरुद्ध है। चैतन्य तलवार और शरीर म्यान समान हैं। चैतन्य भूतों का कार्य या गुण नहीं, क्योंकि दोनों विजातीय हैं।
श्लोक 52 से 61 भूतवाद का खंडन
स्वयंबुद्ध ने कहा कि चैतन्य अतींद्रिय और शरीर का विकार नहीं। शरीर आधार और चैतन्य आधेय है, जैसे घर और दीपक। भूतवाद के अनुसार प्रत्येक अंग में पृथक् चैतन्य होना चाहिए, पर एक ही चैतन्य सबमें है। मूर्त शरीर से अमूर्त चैतन्य असंभव। कर्मसहित आत्मा ही शरीर का निमित्त है। जीव शरीर के साथ उत्पन्न-नष्ट नहीं, क्योंकि दोनों विलक्षण हैं। चैतन्य का उपादान जीव ही है।
श्लोक 62 से 71 भूतवाद का पूर्ण खंडन
स्वयंबुद्ध ने कहा कि मदशक्ति का दृष्टांत असंगत है, क्योंकि मादक शक्ति जड़ है। भूतवादी अपिशाचग्रस्त हैं। चैतन्य अचेतन में नहीं। पूर्वभव संस्कारों से जीव का अस्तित्व सिद्ध है। परलोक और पुण्य-पाप भोगने वाला जीव पृथक् है। जातिस्मरण, आगम, और शरीर की चेष्टाएँ जीव को प्रमाणित करते हैं। भूतचतुष्टय से बटलोई में जीव नहीं बनता, अतः भूतवाद मूर्खों का प्रलाप है।
श्लोक 72 से 81 विज्ञानवाद का खंडन
स्वयंबुद्ध ने विज्ञानवाद का खंडन करते हुए कहा कि विज्ञान से विज्ञान की सिद्धि असंभव। वाक्य प्रयोग से बाह्य पदार्थ सिद्ध होते हैं। ज्ञान विषयों के बिना नहीं। एक विज्ञान दूसरे को ग्रहण करे तो अद्वैत नष्ट, न करे तो संतान कैसे सिद्ध होगी। विज्ञानमय जगत् में सत्य-असत्य व्यवस्था असंभव। बाह्य पदार्थों की सत्ता आवश्यक है। विज्ञानाद्वैत बालकों की बोली है।
श्लोक 82 से 91 शून्यवाद का खंडन और सभा का समाधान
स्वयंबुद्ध ने शून्यवाद का खंडन करते हुए कहा कि शून्यत्व को सिद्ध करने वाले वचन-ज्ञान हों तो पदार्थ मानने पड़ेंगे, न हों तो शून्यता असिद्ध। शून्यवाद उन्मत्त के रोने समान है। जीव और धर्म सिद्ध हैं। सर्वज्ञ के वचन ही सत्य हैं। सभा ने आत्मा का अस्तित्व स्वीकार किया, महाबल प्रसन्न हुए, और परवाद म्लान हो गए। स्वयंबुद्ध ने कथा शुरू की।
श्लोक 92 से 101 अरविंद की कथा
स्वयंबुद्ध ने अरविंद नामक विद्याधर राजा की कथा शुरू की। वह अलकापुरी का शासक था, जिसने रौद्रध्यान से नरक आयु बाँधी। मृत्यु निकट आने पर दाहज्वर से संतप्त हुआ। कोई उपाय काम न आया। उसने पुत्र हरिचंद्र से उत्तरकुरु के शीतल वनों में भेजने को कहा, पर पुण्यक्षय से विद्या विफल रही। हरिचंद्र समझ गया कि पिता की बीमारी असाध्य है।
श्लोक 102 से 111 अरविंद की मृत्यु
दो छिपकलियों के लड़ने से एक की पूँछ टूटने पर रक्त की बूँदें राजा अरविंद पर गिरीं, जिससे उसका दाहज्वर शांत हुआ। उसने इसे ओषधि माना और पुत्र कुरुविंद से खून से भरी बावड़ी बनाने को कहा। उसने मृगों का रक्त उपयोग करने का सुझाव दिया। कुरुविंद, पाप से डरकर और मुनि से पिता की नरकायु की जानकारी पाकर, असली रक्त की जगह लाख के रंग से बावड़ी बनवाई। अरविंद ने इसे रुधिर समझकर हर्षित होकर क्रीड़ा की, पर कृत्रिमता जानकर क्रोधित हुआ। कुरुविंद को मारने दौड़ा, पर गिरकर अपनी तलवार से मर गया।
श्लोक 112 से 121 अरविंद की नरकगति और दंड की कथा
अरविंद पाप के योग से नरक गया। यह कथा अलकापुरी में प्रसिद्ध है। पिता की मृत्यु से कुरुविंद शोकाकुल हुआ। स्वयंबुद्ध ने दूसरी कथा शुरू की: दंड नामक प्रतापी विद्याधर ने शत्रुओं को दंडित किया। उसके पुत्र मणिमाली को युवराज बनाकर वह विषयासक्त हुआ। आर्तध्यान से तिर्यंच आयु बाँधी और मृत्यु पर अजगर बना। जातिस्मरण से वह भंडार में केवल मणिमाली को प्रवेश देता था।
श्लोक 122 से 131 मणिमाली का पिता को उपदेश
मणिमाली ने मुनि से पिता के अजगर होने का वृत्तांत जाना और भंडार में जाकर उन्हें संबोधित किया। उसने कहा कि धन और विषयासक्ति से वे कुयोनि में आए। विषय कटु, दुर्जर, और धिक्कार योग्य हैं। वे संसार में परिभ्रमण कराते हैं, शिकारी के गाने समान ठगते हैं, और राग बढ़ाते हैं। विषय चंचल और विचित्र हैं, आत्मा को अटवी में भटकाते हैं। मुनियों को नमस्कार है जो इनसे विमुख रहते हैं।
श्लोक 132 से 141 अजगर का उद्धार और शतबल की कथा
मणिमाली के उपदेश से अजगर का मोह नष्ट हुआ। उसने पश्चाताप कर विषयासक्ति छोड़ी, आहार त्यागा, और मृत्यु पर देव बना। उसने मणिमाली को रत्नहार दिया, जो महाबल के कंठ में है। स्वयंबुद्ध ने तीसरी कथा शुरू की: शतबल, महाबल के दादा, ने प्रजा को सुशासित किया। राज्य पुत्र को सौंपकर वे भोगों से विरक्त हुए, श्रावक व्रत लिए, और समाधिमरण से देव बने।
श्लोक 142 से 151 शतबल का देवत्व और सहस्त्रबल की कथा
शतबल महेंद्रस्वर्ग में ऋद्धियों सहित देव बने। एक बार महाबल को सुमेरु पर जैन धर्म का उपदेश दिया। स्वयंबुद्ध ने चौथी कथा शुरू की: सहस्त्रबल, शतबल के पिता, ने पुत्र को राज्य देकर जिनदीक्षा ली। तप से पृथ्वी को प्रकाशित किया, केवलज्ञान प्राप्त किया, और मोक्ष पाया। महाबल के पिता ने भी राज्य सौंपकर दीक्षा ली और मोक्ष की ओर अग्रसर हैं।
श्लोक 152 से 161 चार ध्यानों का फल और धर्म की महिमा
स्वयंबुद्ध ने चार दृष्टांतों को चार ध्यानों से जोड़ा: अरविंद का रौद्रध्यान से नरक, दंड का आर्तध्यान से अजगर, शतबल का धर्मध्यान से देवत्व, और सहस्त्रबल का शुक्लध्यान से मोक्ष। आर्त-रौद्र अशुभ, धर्म-शुक्ल शुभ हैं। धर्म से स्वर्ग-मोक्ष संभव हैं। सभा ने स्वयंबुद्ध के वचनों से जैन धर्म को सत्य माना और उनकी प्रशंसा की। महाबल ने सत्कार किया। स्वयंबुद्ध मेरु पर चैत्यालय वंदन के लिए गए।
श्लोक 162 से 175 मेरु पर्वत का वर्णन
मेरु पर्वत समवसरण, श्रुतस्कंध, महाराज, वृषभदेव, और इंद्र समान है। चार वनों (भद्रशाल आदि) से शोभित, सुवर्णमय, रत्नखचित, और जिनमंदिरों से युक्त है। यह लवणसमुद्र के वस्त्र और जंबूद्वीप का मुकुट समान है। जगत् को सरोवर और मेरु को केशर समूह माना। यह पर्वतों का राजा है, रत्नजड़ित शिखरों और चूलिका से सुशोभित।
श्लोक 176 से 181 मेरु की शोभा
स्वयंबुद्ध ने मेरु की शोभा देखी। इसके शिखर आकाश को घेरते हैं। देव-देवियाँ यहाँ निवास करते हैं। प्रत्यंत पर्वत निषध-नील तक फैले हैं, गजदंत पर्वत भक्ति से फैले हैं। सीता-सीतोदा नदियाँ दो कोस दूर समुद्र की ओर जाती हैं।
श्लोक 182 से 191 मेरु के वन और चैत्यालय
भद्रशाल वन देवकुरु-उत्तरकुरु को तिरस्कृत करता है। नंदन, सौमनस, पांडुक वन फूले वृक्षों से मनोहर हैं। देवकुरु, उत्तरकुरु, जंबू, और शाल्मली वृक्ष शोभित हैं। चैत्यालय रत्नकांति से आकाश प्रकाशित करते हैं। पर्वत पुण्यजनों, बागों, और नदियों से नगर समान है। यह जंबूद्वीप के कमल की कर्णिका है। स्वयंबुद्ध ने चैत्यालयों की वंदना की।
श्लोक 192 से 201 मुनियों से भविष्यवाणी
स्वयंबुद्ध ने सौमनसवन में बैठकर आदित्यगति और अरिंजय मुनियों को देखा। उनकी पूजा कर पूछा कि महाबल भव्य है या अभव्य, और उनके वचनों पर श्रद्धा करेगा या नहीं। आदित्यगति ने कहा कि महाबल भव्य है, उनके वचनों पर विश्वास करेगा, और दसवें भव में जंबूद्वीप के भरत क्षेत्र में प्रथम तीर्थंकर बनेगा।
श्लोक 202 से 221 महाबल का पूर्वभव और स्वप्न
स्वयंबुद्ध ने मुनि से महाबल के वैभव का वर्णन सुना। जंबूद्वीप के विदेह क्षेत्र में गंधिला देश के सिंहपुर में श्रीषेण राजा था, जिसकी पत्नी सुंदरी थी। उनके दो पुत्र थे: जयवर्मा और श्रीवर्मा। श्रीषेण ने छोटे पुत्र श्रीवर्मा को राजपट्ट दिया, जिससे जयवर्मा को वैराग्य हुआ। उसने दीक्षा ली, पर भोगों की इच्छा करते हुए सर्पदंश से मृत्यु पाई और महाबल बना। स्वयंबुद्ध के वचनों से वह विरक्त होगा। महाबल ने स्वप्न देखा: तीन दुष्ट मंत्रियों ने उसे कीचड़ में फँसाया, स्वयंबुद्ध ने उसे बचाकर अभिषेक किया; दूसरा स्वप्न अग्नि ज्वाला का था। मुनि ने कहा कि पहला स्वप्न भविष्य की विभूति और दूसरा आयुक्षय (एक माह शेष) का सूचक है। स्वयंबुद्ध को शीघ्र प्रयत्न करने को कहा।
श्लोक 222 से 231 महाबल का संन्यास
मुनि अंतर्धान हो गए। स्वयंबुद्ध महाबल के पास लौटा और मुनि के वचन सुनाए। उसने उपदेश दिया कि जिनेंद्र का धर्म दुःख नाशक है। महाबल ने समाधिमरण का निर्णय लिया, राज्य पुत्र अतिबल को सौंपा, और सिद्धकूट चैत्यालय में संन्यास लिया। उसने आहार और शरीर से ममत्व त्यागने की प्रतिज्ञा की, स्वयंबुद्ध को निर्यापकाचार्य बनाया, और संसार सागर पार करने की तैयारी की।
श्लोक 232 से 241 महाबल की सल्लेखना
महाबल ने समता, मैत्री, और परिग्रह त्याग धारण किया। प्रायोपगमन संन्यास में उसने शरीर रक्षा की इच्छा छोड़ी। तप से शरीर कृश, पर परिणाम विशुद्ध हुए। उपवास से शिथिलता आई, पर प्रतिज्ञा अडिग रही। शरीर दुर्बल, पर चेहरा कांतिमान रहा। उदर झुक गया, जैसे सूखता तालाब।
श्लोक 242 से 251 महाबल की समाधि और मृत्यु
तप से महाबल शुद्ध और प्रकाशमान हुआ। उसने परीषहों को जीता, पंचपरमेष्ठियों का ध्यान किया। 22 दिन सल्लेखना कर, अंतिम समय में नमस्कार मंत्र जपते हुए शुद्ध आत्मभावना के साथ स्वयंबुद्ध के समक्ष प्राण छोड़े। स्वयंबुद्ध ने मंत्रशक्ति से उसका आत्मबल बनाए रखा।
श्लोक 252 से 261 महाबल का देवत्व
महाबल ऐशानस्वर्ग में ललितांगदेव बना। उपपाद शय्या पर उसका वैक्रियिक शरीर नवयौवन और आभूषणों से शोभित हुआ। उसका रूप मछलियों वाले सरोवर और कल्पवृक्ष समान था। पुष्पवर्षा और दुंदुभि से स्वागत हुआ। सुहावना पवन बहा।
श्लोक 262 से 271 ललितांगदेव का आश्चर्य और ज्ञान
ललितांगदेव ने देवों को नमस्कार करते देखा और आश्चर्यचकित हुआ। अवधिज्ञान से उसने स्वयंबुद्ध और पूर्वभव जाना। उसने स्वर्ग, विमान, देवियाँ, और भोगों को पहचाना। देवों ने उसकी जय-जयकार की।
श्लोक 272 से 281 ललितांगदेव के भोग
देवों ने ललितांगदेव को स्नान, जिनपूजा, और नृत्य-दर्शन के लिए प्रेरित किया। वह सात हाथ ऊँचा, सुगंधित, और ऋद्धियों से युक्त था। वह एक हजार वर्ष में मानसिक आहार, एक पक्ष में श्वास, और शरीर से संभोग करता था। उसकी माला और वस्त्र निर्मल थे।
श्लोक 282 से 292 ललितांगदेव की देवियाँ
ललितांगदेव की चार हजार देवियाँ और चार महादेवियाँ (स्वयंप्रभा, कनकप्रभा, कनकलता, विद्युल्लता) थीं। आयु समाप्त होने पर स्वयंप्रभा उसकी प्रिय पत्नी बनी, जो लक्ष्मी समान थी। वह उसके साथ मेरु, नील, विजयार्ध आदि स्थानों पर भोग करता रहा।
श्लोक 293 से 296 धर्म की महिमा
ललितांगदेव ने एक सागर तक भोग भोगे। पूर्वभव के तप से यह सुख मिला। स्वयंबुद्ध ने कहा कि सुख के लिए धर्म उपार्जन करें, भोग-तृष्णा छोड़ें, जिनवचन में श्रद्धा करें, और मिथ्यामतों से बचें। जैन धर्म कर्म नाशक और पुरुषार्थ देने वाला है।
English translation of Ādi purāṇa parv 5- Shlok 1 to 12
महाबल के जन्मदिन का उत्सव
इस खंड में राजा महाबल के जन्मदिन के उत्सव का वर्णन है। उत्सव मंगलगीत, वादित्र, और नृत्य से परिपूर्ण था। महाबल सिंहासन पर विराजमान थे, जहाँ वारांगनाएँ श्वेत चामर ढो रही थीं। तरुण स्त्रियाँ कामदेव की मंजरियाँ, सौंदर्य की तरंगें, और सुंदरता की कलिकाएँ प्रतीत होती थीं। विद्याधर राजाओं ने उन्हें घेरा था, और महाबल सुमेरु पर्वत समान शोभित थे। उनके वक्ष पर श्वेत हार हिमवत के झरने और इंद्रनीलमणि की कंठी हंसों की पंक्ति समान थी। मंत्री, सेनापति, पुरोहित आदि उपस्थित थे। महाबल हँसकर, संभाषण कर, सम्मान देकर सभी को संतुष्ट करते थे। वे संगीतज्ञों की गोष्ठी का आनंद लेते, सामंतों के दूतों का सत्कार करते, और अन्य राजाओं की भेंट स्वीकार करते थे, इस प्रकार आनंद और विभव के साथ सभा में विराजमान थे।
श्लोक ( Shlok ) 1
कदाचिदथ तस्याऽऽसीद् वर्षवृद्धिदिनोत्सवः । मङ्गलैगीतवादित्रनृत्यास्म्मैश्च संभृतः ॥१॥
तदनंतर, किसी दिन राजा महाबल की जन्मगाँठ का उत्सव हो रहा था । वह उत्सव मंगलगीत, वादित्र तथा नृत्य आदि के आरंभ से भरा हुआ था ।।1।।
After that, one day, the celebration of King Mahabali’s birthday was taking place. The festival was filled with auspicious songs, musical instruments, and dances, among other festivities. ||1||
श्लोक ( Shlok ) 2
सिंहासने तमासीनं तदानीं खचराधिपम् । दुधुवुश्चामरैर्वारनार्यः क्षीरोदपाण्डुरैः ॥२॥
उस समय विद्याधरों के अधिपति राजा महाबल सिंहासन पर बैठे हुए थे । अनेक वारांगनाएँ उन पर क्षीरसमुद्र के समान श्वेतवर्ण चामर ढोर रही थीं ।।2।।
At that time, King Mahabal, the lord of the Vidyadharas, was seated on the throne. Numerous courtesans were waving white chamars (fly-whisks) over him, resembling the milky ocean. ||2||
श्लोक ( Shlok ) 3
मदनक्रममञ्जर्यो लावण्याम्भोधिबीषयः । सौन्दर्यकलिका रेजुस्तरुण्यस्तत्समीपगाः ॥३॥
उनके समीप खड़ी हुई वे तरुण स्त्रियाँ ऐसी मालूम होती थीं मानो कामदेवरूपी वृक्ष की मंजरियाँ ही हों, अथवा सौंदर्यरूपी सागर की तरंग ही हों अथवा सुंदरता की कलिकाएँ ही हों ।।3।।
The young women standing near him appeared as though they were the blossoms of the tree of love (Kamadeva), or the waves of the ocean of beauty, or the delicate buds of elegance itself. ||3||
श्लोक ( Shlok ) 4
पृथुवक्षःस्थलचलन पर्यन्तै मंकुटोज्ज्वलैः । खगेन्द्रैः परिचक्रेऽसौ गिरिराज इवाद्रिमिः ॥४॥
अपने-अपने विशाल वक्षःस्थलों से समीप के प्रदेश को आच्छादित करने वाले तथा मुकुटों से शोभायमान अनेक विद्याधर राजा महाबल को घेरकर बैठे हुए थे । उनके बीच में बैठे हुए महाबल ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो अनेक पर्वतों से घिरा हुआ या उनके बीच में स्थित सुमेरुपर्वत ही हो ।।4।।
The mighty Vidyadhara kings, adorned with crowns and covering the nearby region with their broad chests, surrounded King Mahabal as they sat. Amidst them, Mahabal appeared as magnificent as Mount Sumeru, encircled by or situated among many mountains. ||4||
श्लोक ( Shlok ) 5
तस्य वक्षःस्थले हारो नोहारांशुसमद्युतिः । बमासे हिमवत्सानी प्रपतनिव निर्झरः ॥५॥
उनके वक्षःस्थल पर चंद्रमा के समान उज्ज्वल कांति का धारक―श्वेत हार पड़ा हुआ था जो कि हिमवत् पर्वत के शिखर पर पड़ते हुए झरने के समान शोभायमान हो रहा था ।।5।।
On his chest rested a white necklace, radiating a brilliance akin to the moon. It appeared as splendid as a cascading stream falling upon the peak of the Himalayas. ||5||
श्लोक ( Shlok ) 6
तद्वक्षसि पृथाविन्द्रनीलमध्यमणिर्षभौ । कण्ठिका हंसमालेव व्योम्नि दात्यूहमध्यगा ॥६॥
जिस प्रकार विस्तृत आकाश में जलकाय के इधर-उधर चलती हुई हंसों की पंक्ति शोभायमान होती है उसी प्रकार राजा महाबल के विस्तीर्ण वक्षःस्थल पर इंद्रनीलमणि से सहित मोतियों की कंठी शोभायमान हो रही थी ।।6।।
Just as a flock of swans moving here and there in the vast sky appears beautiful, similarly, the pearl necklace adorned with sapphire gems was shining brilliantly on King Mahabal’s broad chest. ||6||
श्लोक ( Shlok ) 7
मन्त्रिणश्च तदामात्यसेनापतिपुरोहिताः । श्रेष्ठिनोऽधिकृताश्चान्ये तं परीश्यावतस्थिरे ॥
उस समय मंत्री, सेनापति, पुरोहित, सेठ तथा अन्य अधिकारी लोग राजा महाबल को घेरकर बैठे हुए थे ।।7।।
At that time, the ministers, commanders, priests, merchants, and other officials were seated, surrounding King Mahabal. ||7||
श्लोक ( Shlok ) 8
स्मितैः संभाषितैः स्थानैर्दानैः संमाननैरपि । तानसौ तर्पयामास वीक्षितैरपि सादरैः ॥८॥
वे राजा किसी के साथ हंसकर, किसी के साथ संभाषण कर, किसी को स्थान देकर, किसी को दान देकर, किसी का सम्मान कर और किसी की ओर आदरसहित देखकर उन समस्त सभासदों को संतुष्ट कर रहे थे ।।8।।
The king satisfied all the assembled courtiers by laughing with some, conversing with others, offering seats to some, giving gifts to others, honoring some, and looking at others with respect and admiration. ||8||
श्लोक ( Shlok ) 9 – 12
स गोष्ठीर्भावयन् भूयो गन्धर्वादिकलाविदाम् । स्पर्द्धमानाश्च तान् पश्यन्नुप श्रोतृसमक्षतः ॥
सामन्तप्रहितान् दूतान् द्वाःस्यैरानीयमानकान् । संभावयन् यथोक्तेन संमानेन पुनः पुनः ॥१०॥
परचकनरेन्द्राणामानीवानि महत्तरैः । उपायनानि संपश्यन् यथास्वं तांत्र पूजयन् ॥११॥
इत्यसौ परमानन्दमातम्वन्नद्भुतोदयः । यथेष्टं मन्त्रिवर्गेण सहास्तानन्दमण्डपे ॥१२॥
वे महाबल संगीत आदि अनेक कलाओं के जानकार विद्वान् पुरुषों की गोष्ठी का बार-बार अनुभव करते जाते थे । तथा श्रोताओं के समक्ष कलाविद् पुरुष परस्पर में जो स्पर्धा करते थे उसे भी देखते जाते थे । इसी बीच में सामंतों-द्वारा भेजे हुए दूतों को द्वारपालों के हाथ बुलवाकर उनका बार-बार यथायोग्य सत्कार कर लेते थे । तथा अन्य देशों के राजाओं के प्रतिष्ठित पुरुषों-द्वारा लायी हुई भेंट का अवलोकन कर उनका सम्मान भी करते जाते थे । इस प्रकार परम आनंद को विस्तृत करते हुए, आश्चर्यकारी विभव से सहित वे महाराज महाबल मंत्रिमंडल के साथ-साथ स्वेच्छानुसार सभामंडप में बैठे हुए थे ।।9-12।।
King Mahabal frequently engaged in gatherings of learned men who were well-versed in various arts, such as music. He also observed the competitions between these skilled artists as they vied with one another in the presence of the audience. Meanwhile, he summoned the envoys sent by the feudal lords through the doorkeepers and repeatedly extended them appropriate hospitality. He honored the emissaries of other nations by examining the gifts they brought and showing them due respect. Thus, spreading immense joy and surrounded by his remarkable wealth and grandeur, the great King Mahabal sat in the assembly hall, accompanied by his council of ministers, as per his pleasure. ||9–12||
श्लोक 13 से 21
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
Download PDF
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
Front Desk Jainism Forum (FDJF)
FAIR USE DECLARATION
This information is provided by the Front Desk Jainism Forum (FDJF) under Fair Use guidelines for educational and research purposes. To the best of our knowledge, it is in the public domain, and our goal is to make it more accessible.
If you are the intellectual property owner and have concerns, please contact us, and we will address the matter promptly. Users are advised to verify legal use in their jurisdiction before accessing this material. For more details, visit our website.