भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण पर्व 19 में विजयार्ध पर्वत की शोभा, विद्याधरों का जीवन, और नमि-विनमि का राज्य स्थापन शामिल है।
श्लोक 1 से 11 विजयार्ध पर्वत और विद्याधर लोक का परिचय
धरणेंद्र विजयार्ध पर्वत की पहली मेखला पर उतरा। उसने नमि-विनमि को विद्याधर लोक दिखाया। पर्वत भारी होकर समुद्र में फैला था। इसकी श्रेणियाँ राजा और महादेवियों से शोभायमान थीं। दस योजन ऊँची मेखला स्वर्ग खंड सी थी। विद्याधर देवों से निवास करते थे। यह स्थान नागेंद्रों और भोगों से सेवित था। विद्याधरी कन्याएँ नागकन्याओं सी थीं। यहाँ भय, रोग, और ईतियाँ नहीं थीं। चतुर्थ काल की स्थिति यहाँ थी। कर्मभूमि के कर्म और ऋतुएँ यहाँ पूर्ण थे।
श्लोक 12 से 21 विद्याओं की सिद्धि और संपदा
विद्याधरों को महाप्रज्ञप्ति आदि विद्याएँ कामधेनु सी फल देती थीं। विद्याएँ कुल-परंपरा और तप से प्राप्त होती थीं। तप से सिद्धि हेतु पवित्र स्थान पर ब्रह्मचर्य और पूजा करनी पड़ती थी। सिद्ध विद्याधर भगवान की पूजा कर फल भोगते थे। वे धान्य आदि संपदा का भी उपभोग करते थे। यहाँ धान्य बिना बोये उत्पन्न होता था। बावड़ियाँ कमलों से, नदियाँ रत्नों से, और वन कोकिल-भ्रमरों से शोभायमान थे।
श्लोक 22 से 31 पर्वत की शोभा और नगरों का वर्णन
पर्वत पर कृत्रिम पर्वत लतागृहों से युक्त थे। पुर, खानें, और गाँव नदियों, तालाबों से सुंदर थे। स्त्री-पुरुष रति और कामदेव से शोभायमान थे। यहाँ स्वर्ग के दुर्लभ पदार्थ सुलभ थे। पर्वत विद्याधरों के लिए मनोहर था। इसकी दोनों श्रेणियाँ दस योजन चौड़ी और समुद्र तक लंबी थीं। उत्तर श्रेणी की लंबाई अधिक थी। दक्षिण में 50 और उत्तर में 60 नगर स्वर्ग विमानों से शोभायमान थे।
श्लोक 32 से 41 दक्षिण श्रेणी के नगरों का परिचय
पूर्व दिशा में किन्नामित नगर गगनचुंबी था। किन्नरगीत नगर किन्नर गीतों से सेवित था। नरगीत में उत्सव होते थे। बहुकेतुक पताकाओं से बुलाता सा था। पुंडरीक में हंस गाते थे। सिंहध्वज सिंह चिह्नों से शोभायमान था। श्वेतकेतु सफेद ध्वजाओं से था। गरुडध्वज आकाश को व्याप्त करता था। श्रीप्रभ और श्रीधर लक्ष्मी से सुंदर थे। लोहार्गल और अरिंजय दुर्गम और विजयी थे।
श्लोक 42 से 51 दक्षिण श्रेणी के अन्य नगर
वज्रार्गल और वज्राढ्य हीरे की खानों से थे। विमोच और पुरंजय भवनवासियों को पराजित करते थे। शकटमुखी और चतुर्मुखी आकाश को छूती थीं। बहुमुखी, अरजस्का, और विरजस्का तीनों लोकों की लक्ष्मी सी थीं। रथनूपुरचक्रवाल राजधानी थी। मेखलाग्र, क्षेमपुरी, अपराजित, और कामपुष्प मनोहर थे। गगनचरी, विनयचरी, और चक्रपुर सुशोभित थे। संजयंती और अन्य नगर चमकते थे।
श्लोक 52 से 61 दक्षिण श्रेणी की संरचना
दक्षिण श्रेणी में 50 नगर थे। इनके कोट और गोपुर ऊँचे थे। प्रत्येक नगरी तीन परिखाओं से घिरी थी। परिखाएँ सुवर्ण और रत्नों से बनी थीं। इनमें कमल कर्णाभरण से थे। कोट सुवर्ण धूलि का और छह धनुष ऊँचा था। परकोटा कंगूरों से युक्त था। यह बारह धनुष चौड़ा और चौबीस धनुष ऊँचा था।
श्लोक 62 से 71 नगरों की अट्टालिकाएँ और गोपुर
परकोटे पर अट्टालिकाएँ तीस धनुष ऊँची थीं। ये सुवर्ण और मणियों से चित्रित थीं। दो अट्टालिकाओं के बीच गोपुर थे। गोपुर पचास धनुष ऊँचे थे। इनके बीच बुरज और देवपथ थे। नगरियाँ वस्त्रधारी स्त्रियों सी थीं। प्रत्येक नगरी में एक हजार चौक और बारह हजार गलियाँ थीं। पाँच सौ दरवाजे श्रेष्ठ थे। नगरियाँ नौ योजन चौड़ी और बारह योजन लंबी थीं।
श्लोक 72 से 91 उत्तर श्रेणी के नगर
प्रत्येक नगरी के एक करोड़ गाँव थे। गाँव धानों और ईखों से हरे थे। नगरों का अंतर 195 योजन था। उत्तर श्रेणी में अंतर 178 योजन था। उत्तर में 60 नगर थे, जैसे अर्जुनी, वारुणी, और चंद्रपुर। ये स्वर्गीय थे। यहाँ के मनुष्य देवकुमार और स्त्रियाँ अप्सराएँ सी थीं। पर्वत तीनों लोकों की शोभा धारण करता था।
श्लोक 92 से 101 पर्वत की प्राकृतिक शोभा
पर्वत लतागृहों से रतिक्रीड़ा प्रकट करता था। देव और विद्याधर यहाँ संभोग करते थे। विद्याधरी कुपित हो पतियों को मनाती थीं। पर्वत नृत्य, गीत, और कोयल शब्दों से मनोहर था। यह शीतल वायु और मणियों से सुंदर था। मयूर नृत्य करते थे। सूर्य किरणें वन को दैदीप्यमान करती थीं। पर्वत इंद्रों का मन ललचाता था।
श्लोक 102 से 111 विजयार्ध पर्वत की प्राकृतिक शोभा
विजयार्ध पर्वत गंगा से सींचे वृक्षों और मेघ-चुंबित शिखरों से मेरु को जीतता था। इसके उपवन फूलों और भ्रमरों से शोभायमान थे। गंगा और सिंधु नदियाँ इसे पवित्र करती थीं। विद्याधर यहाँ भाग्य और पुरुषार्थ से फल पाते थे। यहाँ धान्य, रत्न, और फल असमय में उत्पन्न होते थे। सरोवरों पर हंस और कोयल शब्द करते थे। वायु विद्याधरियों को संतोष देता था। सिंह, हाथी, और हरिण वन में थे। हंसिनी अपने साथी के लिए रोती थी।
श्लोक 112 से 121 पर्वत का सौंदर्य और जीवन
चकवी अपने साथी को ढूंढती घूमती थी। शरद् का बादल विद्याधरियों द्वारा खेल में लिया जाता था। गंगा और सिंधु पर्वत को धारण करती थीं। यहाँ सब कुछ सुखद और लुभावना था। वन की पंक्ति धोती और बादल पगड़ी सी थीं। लतागृहों में विद्याधरियाँ क्रीड़ा करती थीं। बादल चंदोवा बन विद्याधरियों को ठंडक देते थे। मयूर बादलों को देख नृत्य करते थे। विद्याधरियाँ बादलों पर शय्या बनाती थीं।
श्लोक 122 से 131 वन्य जीवन और विद्याधरियाँ
हाथी तालाबों में प्रवेश करते थे। सूर्य मणियों से आच्छादित होता था। वृक्ष फूलों से रोते से थे। हंस और मयूर शब्द करते थे। बादल हाथियों से युद्ध करते से थे। वायु से ढकी भूमि भ्रमरों से प्रकट होती थी। वन हाथियों और भ्रमरों से सुंदर था। विद्याधरियाँ जघनों से शोभायमान थीं। वन भ्रमरों से विद्याधरियों को बुलाते थे। अंधेरे में वे दीपक जलाती थीं।
श्लोक 132 से 141 विद्याधरियों और वायु की लीला
विद्याधरियाँ फूल तोड़ती थीं। वे मंजरियों और भ्रमरों सी थीं। वायु भ्रमरों से वृक्ष हिलाता था। यह कल्पवृक्षों को कंपित करता था। वायु कमलवनों में लहरें उत्पन्न करता था। यह पत्तों को मसल चंदोवा बनाता था। किन्नर कंकणों से रति को प्रकट करते थे। मयूर और पक्षी शब्द करते थे। वन की पंक्ति नृत्य करती सी थी।
श्लोक 142 से 151 वन और शिखरों की महिमा
भ्रमर और कोयल वन में शब्द करते थे। मयूरों के प्रतिबिंब कमल सी शोभा देते थे। पर्वत की पवित्रता समुद्र को तिरस्कृत करती थी। वन की पंक्ति मेघ संदेह से मयूरों को नचाती थी। उपवन देवों से क्रीड़ा करते थे। सूर्य मणियों से रंगीन होता था। शिखर दिशाओं को आच्छादित करते थे। अजगर गुफा से वन जलाता था। संध्या की लालिमा मेरु सी थी।
श्लोक 152 से 161 पर्वत का जीवन और रूप
हाथी चट्टानों को तोड़ते थे। हरिण घास सूँघते थे। वे रत्नों से कांति पाते थे। हरिण मणियों को घास समझते थे। किन्नर संगीत से हरिण ठहरते थे। सूर्य शिखर में छिप चकवी को भय देता था। कमल, भ्रमर, और हाथी सदा शोभायमान थे। पर्वत बलभद्र की धोती सा था। यह ऐरावत हाथी सा सुंदर था।
श्लोक 162 से 171 : पर्वत का वैभव
वायु भ्रमरों से शोभायमान था। देवांगनाओं और यहाँ की स्त्रियों में अंतर था। हाथी मणियों से डर भागता था। मयूर नीलमणि से नृत्य करता था। हंस और वृक्ष कामदेव को बुलाते थे। किन्नर स्त्रियों संग विहार करते थे। पर्वत सिंह और रंगों से यश धारण करता था। देवों को यहाँ संतोष मिलता था। सिंह चट्टानों पर प्रहार करता था।
श्लोक 172 से 181 पर्वत और नमि-विनमि का राज्य
अजगर बिल में जीवों को खाता था। पर्वत समुद्र को स्पर्श करता था। गंगा-सिंधु इसके तट को विदीर्ण करती थीं। मेघ शिखरों पर गरजते थे। सारस और मेघ शब्द करते थे। विद्याधरी गीत गाती थी। यह वृषभजिनेंद्र सा था। धरणेंद्र ने नमि-विनमि की प्रशंसा की। उसने उन्हें रथनूपुरचक्रवाल में राज्याभिषेक किया। नमि दक्षिण और विनमि उत्तर श्रेणी के अधिपति बने।
श्लोक 182 से 192 विद्याधरों की स्वीकृति और पुण्य
धरणेंद्र ने विद्याधरों को आज्ञा दी। विद्याधरों ने कार्य स्वीकार किया। धरणेंद्र ने उन्हें विद्याएँ दीं। वे संतुष्ट हो भोग भोगते थे। विद्याधर उनकी सेवा करते थे। नमि और विनमि ने श्रेणियों को वश किया। पुण्य से उन्हें विभूति मिली। भगवान वृषभदेव की भक्ति से यह सुख प्राप्त हुआ।
English translation of Ādi purāṇa parv 19 – Shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1
अथास्य मेखलामाद्यामवतीर्णः फणीश्वरः । तत्र व्योमचरेन्द्राणां लोकं तावित्यदीदृ शत् ॥१॥
अथानंतर वह धरणेंद्र उस विजयार्ध पर्वत की पहली मेखला पर उतरा और वहाँ उसने दोनों राजकुमारों के लिए विद्याधरों का वह लोक इस प्रकार कहते हुए दिखलाया ।।1।।
“After that, the great serpent Dharanendra descended onto the first terrace of the Vijayardha Mountain, and there, he showed the world of the Vidyadharas to both the princes while saying this.”
श्लोक ( Shlok ) 2
अयं गिरिरसंभूष्णुः नूनमुर्ध्व महत्तया । वित्तत्य तिर्यगात्मानमवगाढो महार्णवम् ॥२॥
कि ऐसा मालूम होता है मानो यह पर्वत बहुत भारी होने के कारण इससे अधिक ऊपर जाने के लिए समर्थ नहीं था इसीलिए इसने अपने-आपको इधर-उधर दोनों ओर फैलाकर समुद्र में जाकर मिला दिया है ।।2।।
“It seems as if this mountain, being extremely heavy, was unable to rise any higher; therefore, it spread itself on both sides and merged into the ocean.”
श्लोक ( Shlok ) 3
श्रेण्यौ सदानपायिन्यौ भूभृतोऽस्य विराजतः । देव्याविव महाभोग संपन्ने विधृतायती ॥३॥
यह पर्वत एक राजा के समान सुशोभित है और कभी नष्ट न होने वाली इसकी ये दोनों श्रेणियाँ महादेवियों के समान सुशोभित हो रही हैं क्योंकि जिस प्रकार महादेवियाँ महाभोग अर्थात् भोगोपभोग की विपुल सामग्री से सहित होती हैं उसी प्रकार ये श्रेणियाँ भी महाभोग (महा आभोग) अर्थात् बड़े भारी विस्तार से सहित हैं और जिस प्रकार महादेवियाँ आयति अर्थात् सुंदर भविष्य को धारण करने वाली होती हैं उसी प्रकार ये श्रेणियाँ भी आयति अर्थात् लंबाई को धारण करने वाली हैं ।।3।।
“This mountain shines like a king, and its two everlasting ranges appear resplendent like great goddesses. Just as great goddesses are endowed with immense pleasures and abundant luxuries, these ranges too possess vast expanses. Similarly, just as great goddesses uphold a glorious future, these ranges extend in great length, symbolizing endurance and grandeur.”
श्लोक ( Shlok ) 4
योजनानि दशोत्पत्य गिरेरस्या धिमेखलम्। विद्याधरनिवासोऽयं भाति स्वर्गेक देशवत् ॥४॥
पृथ्वी से दस योजन ऊँचा चढ़कर इस पर्वत की प्रथम मेखला पर यह विद्याधरों का निवासस्थान है जो कि स्वर्ग के एक खंड के समान शोभायमान हो रहा है ।।4।।
“Rising ten yojanas above the earth, the first terrace of this mountain is the dwelling place of the Vidyadharas, which shines magnificently like a part of heaven.”
श्लोक ( Shlok ) 5
विद्याधरा विभान्त्यस्मिन् श्रेणीद्वयमधिष्ठिताः। स्वर्गादिव समागत्य कृतवासाः सुधाशनाः ॥५॥
इस पर्वत की दोनों श्रेणियों में रहने वाले विद्याधर ऐसे मालूम होते हैं मानो स्वर्ग से आकर देव लोग ही यहाँ निवास करने लगे हों ।।5।।
“The Vidyadharas residing in both ranges of this mountain appear as if celestial beings from heaven have come down to live here.”
श्लोक ( Shlok ) 6
विद्याधराधिवासोऽयं धसेऽस्मल्लोकविभ्रमम् । निषेवितो महाभोगैः फणीन्द्रैरिव खेचरैः ॥६॥
यह विद्याधरों का स्थान हम लोगों के निवासस्थान का संदेह कर रहा है क्योंकि जिस प्रकार हम लोगों (धरणेंद्रों) का स्थान महाभोग अर्थात् बड़े-बड़े फणों को धारण करने वाले नागेंद्रों के द्वारा सेवित होता है उसी प्रकार यह विद्याधरों का स्थान भी महाभोग अर्थात् बड़े-बड़े भोगोपभोगों को धारण करने वाले विद्याधरों के द्वारा सेवित है ।।6।।
“This dwelling place of the Vidyadharas resembles our own abode, as just like our (Dharanendras’) residence is served by the mighty serpents bearing great hoods, this Vidyadhara realm too is attended by Vidyadharas endowed with immense luxuries and pleasures.”
श्लोक ( Shlok ) 7
“पातालस्वर्गलोकस्य सत्यमद्य स्मराम्यहम् । नागकन्या इव प्रेक्ष्याः पश्यन् खचरकन्यकाः ॥७॥
नागकन्याओं के समान सुंदर इन विद्याधर कन्याओं को देखता हुआ सचमुच ही आज मैं पाताल के स्वर्गलोक का अर्थात् भवनवासियों के निवासस्थान का स्मरण कर रहा हूँ ।।7।।
“Seeing these Vidyadhara maidens, as beautiful as the serpent princesses, I am truly reminded today of the heavenly realm of the netherworld, the abode of the Bhavanavasis.”
श्लोक ( Shlok ) 8
नात्र प्रतिभयं तीव्रं स्वचक्रपरचक्रजम् । नेतयो नैव रोगादिबाधाः सन्तीह जातुचित् ॥८॥
यहाँ न तो अपने राजाओं से उत्पन्न हुआ तीव्र भय है और न शत्रु राजाओं से उत्पन्न होने वाला तीव्र भय है, अतिवृष्टि, अनावृष्टि आदि ईतियाँ भी यहाँ नहीं होती हैं और न यहाँ रोग आदि से उत्पन्न होने वाली कभी कोई बाधा ही होती है ।।8।।
“Here, there is neither the intense fear arising from one’s own kings nor the fear caused by enemy kings. There are no calamities like excessive rainfall or drought, nor is there ever any suffering caused by diseases or other afflictions.”
श्लोक ( Shlok ) 9 –10
प्रारम्भे चापवर्गे च तुर्यकालस्य या स्थितिः । महाभारतवर्षेऽस्मिन् नात्री त्कर्षापकर्षतः ॥९॥
परा स्थितिर्नृणां “पूर्वकोटिवर्षशतान्तरे । उत्सेधहानिरासप्ता रत्नि पञ्चधनुः शतात् ॥१०॥
इस महाभरत क्षेत्र में अवसर्पिणी कालसंबंधी चतुर्थ काल के प्रारंभ में मनुष्यों की जो स्थिति होती है यही यहाँ के मनुष्यों की उत्कृष्ट स्थिति होती है और उस चतुर्थ काल के अंत में जो स्थिति होती हे वही यहाँ की जघन्य स्थिति होती है । इसी प्रकार चतुर्थ काल के प्रारंभ में जितनी शरीर की ऊंचाई होती है उतनी ही यहाँ की उत्कृष्ट ऊँचाई होती है और चतुर्थ काल के अंत में जितनी ऊँचाई होती है उतनी ही यहाँ जघन्य ऊँचाई होती है । इसी नियम से यहाँ की उत्कृष्ट आयु एक करोड़ वर्ष पूर्व की और जघन्य सौ वर्ष की होती है तथा शरीर की उत्कृष्ट ऊँचाई पाँच सौ धनुष और जघन्य सात हाथ की होती है, भावार्थ―यहाँ पर आर्यखंड की तरह छह कालों का परिवर्तन नहीं होता किंतु चतुर्थ काल के आदि अंत के समान परिवर्तन होता है ।।9-10।।
“In this great Bharata region, the superior condition of the people here is similar to the state of humans at the beginning of the fourth era (Chaturtha Kala) of the Avasarpini time cycle. Likewise, the lowest condition of people here corresponds to the state of humans at the end of that fourth era.
Similarly, the highest body height here is equivalent to the height of humans at the beginning of the fourth era, while the lowest height matches that at the end of the era. Following this rule, the maximum lifespan here reaches ten million years, while the minimum lifespan is one hundred years. The greatest body height is five hundred bows (dhanush), whereas the smallest is seven hands.
Interpretation – Unlike Aryakhand, where six different eras cycle through, this region experiences changes only similar to those occurring at the beginning and end of the fourth era.”
श्लोक ( Shlok ) 11
कर्मभूमिनियोगो यः स सर्वोऽप्यत्र पुष्कलः। विशेषस्तु महाविद्या ददत्येषा मभीप्सितम् ॥११॥
कर्मभूमि में वर्षा, सरदी, गरमी आदि ऋतुओं का परिवर्तन तथा असि, मषि आदि छह कर्म रूप जितने नियोग होते हैं वे सब यहाँ पूर्ण रूप से होते हैं किंतु यहाँ विशेषता इतनी है कि महाविद्याएँ यहाँ के लोगों को इनकी इच्छानुसार फल दिया करती हैं ।।11।।
“In the land of karma (Karmabhumi), seasonal changes such as rain, cold, and heat, as well as the six types of karmic duties like warfare (asi) and writing (masi), occur fully. However, the special feature here is that the great mystical sciences (Mahavidyas) grant the inhabitants their desired results according to their wishes.”
श्लोक 12 से 21
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213 आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202 | श्लोक 203 से 209