आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251
श्लोक 252 से 261 राजा और दंड
दंड की आवश्यकता और चार क्षत्रियों (हरि, अकंपन, काश्यप, सोमप्रभ) को मांडलिक राजा बनाया गया।
English translation of Ādi purāṇa parv 16 – Shlok 252 to 261
श्लोक ( Shlok ) 252
प्रजा दण्डधराभावे मात्स्यं न्यायं श्रयन्त्यमूः । ग्रस्यतेऽन्तः प्रदुष्टेन निर्बलो हि बलीयसा ॥२५२॥
कर्मभूमि में दंड देने वाले राजा का अभाव होने पर प्रजा मात्स्यन्याय का आश्रय करने लगेगी अर्थात् जिस प्रकार बलवान् मच्छ छोटे मच्छों को खा जाते हैं उसी प्रकार अंतरंग का दुष्ट बलवान पुरुष, निर्बल पुरुष को निगल जायेगा ।।252।।
“In Karmabhumi, if there is no king to enforce justice, society will fall into Matsyanyaya—the law of the fish. Just as big fish devour smaller fish, in the same way, a wicked and powerful person will oppress and exploit the weak and helpless.”
श्लोक ( Shlok ) 253
दण्डमीत्या हि लोकोऽयमपथं नानुधावति । युक्तदण्ड धरस्तत्मात् पार्थिवः पृथिवीं जयेत् ॥ २५३॥
यह लोग दंड के भय से कुमार्ग की ओर नहीं दौड़ेंगे इसलिए दंड देने वाले राजा का होना उचित ही है और ऐसा राजा ही पृथिवी को जीत सकता है ।।253।।
“People refrain from wrongdoings due to the fear of punishment; therefore, the presence of a just ruler is essential. Only such a king, who enforces justice, can truly conquer and govern the earth.”
श्लोक ( Shlok ) 254
पयस्विन्या यथा क्षीरम द्रोेहणोपजीव्यते । प्रजाप्येवं धनं दोह्या नातिपीडाकरेः करैः ॥२५४॥
जिस प्रकार दूध देने वाली गाय से उसे बिना किसी प्रकार की पीड़ा पहुँचाये दूध दुहा जाता है और ऐसा करने से वह गाय भी सुखी रहती है तथा दूध दुहने वाले की आजीविका भी चलती रहती है उसी प्रकार राजा को भी प्रजा से धन वसूल करना चाहिए । वह धन अधिक पीड़ा न देने वाले करों (टैक्सों) से वसूल किया जा सकता है । ऐसा करने से प्रजा भी दु:खी नहीं होती और राज्य व्यवस्था के लिए योग्य धन भी सरलता से मिल जाता है ।।254।।
“Just as milk is taken from a cow without causing it any pain—ensuring both the cow’s well-being and the livelihood of the milker—similarly, a king should collect taxes from his people in a fair and gentle manner. Taxes should be reasonable and not burdensome, so that the people remain content, while the state secures the necessary resources for governance.”
श्लोक ( Shlok ) 255
ततो दण्डधरानेता ननुमेने नृपान् प्रभुः । तदायत्तं हि लोकस्य योगक्षेमानुचिन्तनम् ॥ २५५॥
इसलिए भगवान वृषभदेव ने नीचे लिखे हुए पुरुषों को दंडधर (प्रजा को दंड देने वाला) राजा बनाया है सो ठीक ही है क्योंकि प्रजा के योग और क्षेम का विचार करना उन राजाओं के ही अधीन होता है ।।255।।
“Therefore, Lord Rishabhdev appointed the following righteous rulers as law enforcers (kings). This was appropriate because ensuring the welfare and protection of the people, including their prosperity (yoga) and security (kshema), is the duty of these kings.”
श्लोक ( Shlok ) 256 – 257
समाहूय महाभागान् हर्यकम्पनकाश्यपान् । सोमप्रभं च संमान्य सत्कृत्य च यथोचितम् ।।२५६॥
कृताभिषेचनानेतान् महामण्डलिकान् नृपान् । चतुःसहस्त्रभूनाथपरिवारान् व्यधाद् विभुः ॥ २५७॥
भगवान् ने हरि, अकंपन, काश्यप और सोमप्रभ इन चार महा भाग्यशाली क्षत्रियों को बुलाकर उनका यथोचित सम्मान और सत्कार किया । तदनंतर राज्याभिषेक कर उन्हें महामांडलिक राजा बनाया । ये राजा चार हजार अन्य छोटे-छोटे राजाओं के अधिपति थे ।।256-257।।
“Lord Rishabhdev summoned the four highly fortunate Kshatriyas—Hari, Akampan, Kashyap, and Somaprabha—and honored them with appropriate respect and hospitality. Thereafter, he performed their royal consecration and appointed them as great provincial kings (Mahamandaleshwar). These kings were the overlords of four thousand other smaller rulers.”
श्लोक ( Shlok ) 258
सोमप्रभः प्रभोराप्तकुरुराजममाह्वयः । कुरूणामधिराजोऽभूत् कुरुवंशशिखामणिः ॥ २५८॥
सोमप्रभ, भगवान् से कुरुराज नाम पाकर कुरुदेश का राजा हुआ और कुरुवंश का शिखामणि कहलाया ।।258।।
Somaprabha, after receiving the name Kururaj from Lord Rishabhdev, became the king of Kurudesh and was honored as the crest jewel of the Kuru dynasty.
श्लोक ( Shlok ) 259
हरिश्च हरिकान्ताख्यां दधानस्तदनुज्ञया । हरिवंशमलंचक्रे श्रीमान् हरिपराक्रमः ॥२५९॥
हरि, भगवान् की आज्ञा से हरिकांत नाम को धारण करता हुआ हरिवंश को अलंकृत करने लगा क्योंकि वह श्रीमान् हरिपराक्रम अर्थात् इंद्र अथवा सिंह के समान पराक्रमी था ।।259।।
Hari, by the command of Lord Rishabhdev, assumed the name Harikant and began to adorn the Harivansh dynasty, as he was Shri Hariparakram, meaning as mighty as Indra or a lion.
श्लोक ( Shlok ) 260
अकम्पनोऽपि सृष्टीशात् प्राप्तश्रीधरनामकः । नाथवंशस्थ नेताभूत् प्रसन्ने भुवनेशिनि ॥२६०।।
अकंपन भी, भगवान् से श्रीधर नाम पाकर उनकी प्रसन्नता से नाथवंश का नायक हुआ ।।260।।
Akampan, receiving the name Shridhar from Lord Rishabhdev, became the leader of the Nath dynasty by His divine grace.
श्लोक ( Shlok ) 261
काश्यपोऽपि गुरोः प्राप्तमाधवाख्यः पतिर्विशाम् । उग्रवंशस्य वंश्योऽभूत् किन्नाप्यं स्वामिसंपदा ॥२६१॥
और काश्यप भी जगद्गुरु भगवान् से मधवा नाम प्राप्त कर उग्रवंश का मुख्य राजा हुआ सो ठीक ही है । स्वामी की संपदा से क्या नहीं मिलता है ? अर्थात् सब कुछ मिलता है ।।261।।
And Kashyap, receiving the name Madhava from the Jagadguru Lord Rishabhdev, became the chief king of the Ugra dynasty—and rightly so. What cannot be attained through the Lord’s grace? Indeed, everything is possible. (261)
श्लोक 262 से 271
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251