आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141
श्लोक 142 से 151 भगवान का चिंतन और समाधान
भगवान ने कर्मभूमि की स्थापना का विचार किया। इंद्र ने अयोध्या में जिनमंदिर बनाए और नगर, ग्राम, देशों की रचना की।
English translation of Ādi purāṇa parv 16 – Shlok 142 to 151
श्लोक ( Shlok ) 142
श्रुत्वेति तद्वचो दीनं करुणाप्रेरिताशयः । मनः प्रणिदधावेवं भगवानादिपूरुषः ॥ १४२॥
इस प्रकार प्रजाजनों के दीन वचन सुनकर जिनका हृदय दया से प्रेरित हो रहा है ऐसे भगवान आदिनाथ अपने मन में ऐसा विचार करने लगे ।।142।।
Hearing the humble words of the people, Lord Adinath, whose heart was filled with compassion, began to contemplate in His mind. ||142||
श्लोक ( Shlok ) 143
पूर्वापरविदेहेषु या स्थितिः समवस्थिता। साथ प्रवर्त्तनीयात्र ततो जीवन्त्यमूः प्रजाः ॥ १४३॥
कि पूर्व और पश्चिम विदेह क्षेत्र में जो स्थिति वर्तमान है वही स्थिति आज यहाँ प्रवृत्त करने योग्य है उसी से यह प्रजा जीवित रह सकती है ।।143।।
That the same system which exists in the eastern and western Videha regions should be established here as well, for only through it can the people survive. ||143||
श्लोक ( Shlok ) 144 –145
षट्कर्माणि यथा तत्र यथा वर्णाश्रमस्थितिः । यथा ग्रामगृहादीनां संस्त्यायाश्च पृथग्विधाः ॥१४४॥
तथात्राप्युचिता वृत्तिरुपायैरेभिरङ्गिनाम् । नोपायान्तरमस्त्येषां प्राणिनां जीविकां प्रति ॥१४५।।
वहाँ जिस प्रकार असी मषी आदि छह कर्म हैं, जैसी क्षत्रिय आदि वर्णों की स्थिति है और जैसी ग्राम-घर आदि की पृथक्-पृथक् रचना है उसी प्रकार यहाँ पर भी होनी चाहिए । इन्हीं उपायों से प्राणियों की आजीविका चल सकती है । इनकी आजीविका के लिए और कोई उपाय नहीं है ।।144-145।।
Just as there are six occupations such as warfare and writing in the eastern and western Videha regions, as well as the established system of Kshatriyas and other varnas, and the distinct organization of villages and homes, the same should be implemented here as well. Only through these means can living beings sustain themselves, as there is no other way for their livelihood. ||144-145||
श्लोक ( Shlok ) 146
कर्मभूरद्य जातेयं व्यतीतौ कल्पभूरुहाम् । ततोऽत्र कर्मभिः षड्भिः प्रजानां जीविकोचिता ।१४६।।
कल्पवृक्षों के नष्ट हो जाने पर अब यह कर्मभूमि प्रकट हुई है, इसलिए यहाँ प्रजा को असि, मषी आदि छह कर्मों के द्वारा ही आजीविका करना उचित है ।।146।।
With the destruction of the Kalpavrikshas, this land has now become a karmabhumi (land of action). Therefore, the people here should sustain themselves through the six occupations, such as warfare and writing. ||146||
श्लोक ( Shlok ) 147
इत्याकलय्य तत्क्षेमवृत्युपायं क्षणं विभुः । मुहुराश्वासयामास मा भैष्टेति तदा प्रजाः ॥१४७ ॥
इस प्रकार स्वामी वृषभदेव ने क्षणभर प्रजा के कल्याण करने वाली आजीविका का उपाय सोचकर उसे बार-बार आश्वासन दिया कि तुम भयभीत मत होओ ।।147।।
Thus, Lord Rishabhdev, after contemplating for a moment on the means of livelihood that would ensure the welfare of the people, reassured them repeatedly, saying, “Do not be afraid.” ||147||
श्लोक ( Shlok ) 148
अथानुध्यानमात्रेण विभो शक्रः सहामरैः । प्राप्तस्तज्जीवनोपायानित्यकार्षी द्विभागतः ॥१४८॥
अथानंतर भगवान् के स्मरण करने मात्र से देवों के साथ इंद्र आया और उसने नीचे लिखे अनुसार विभाग कर प्रजा की जीविका के उपाय किये ।।148।।
Thereafter, as soon as Lord Rishabhdev was remembered, Indra arrived along with the gods and arranged the means of livelihood for the people by making the following divisions. ||148||
श्लोक ( Shlok ) 149 –150
शुभे दिने सुनक्षत्रे सुमुहूर्त्ते शुभोदये । स्वोच्चस्थेषु ग्रहेपूच्चैरानुकूल्ये जगद्गुरोः ॥१४९॥
कृतप्रथममाङ्गल्ये सुरेन्द्रो जिनमन्दिरम् । न्यवेशयत् पुरस्यास्य मध्ये दिक्ष्वप्यनुक्रमात् ॥ १५०॥
शुभ दिन, शुभ नक्षत्र, शुभ मुहूर्त और शुभ लग्न के समय तथा सूर्य आदि ग्रहों के अपने-अपने उच्च स्थानों में स्थित रहने और जगद्गुरु भगवान् के हर एक प्रकार की अनुकूलता होने पर इंद्र ने प्रथम ही मांगलिक कार्य किया और फिर उसी अयोध्या पुरी के बीच में जिनमंदिर की रचना की । इसके बाद पूर्व दक्षिण पश्चिम तथा उत्तर इस प्रकार चारों दिशाओं में भी यथाक्रम से जिनमंदिरों की रचना की ।।149-150।।
On an auspicious day, under a favorable constellation, at an auspicious moment and ascendant, when the Sun and other planets were in their exalted positions, and with every circumstance being favorable to the Jagadguru Bhagwan, Indra first performed the sacred and auspicious rites. Then, in the heart of Ayodhya, he constructed a Jin temple. After that, he systematically built Jin temples in the four directions—east, south, west, and north. ||149-150||
श्लोक ( Shlok ) 151
कोसलादीन् महादेशान् साकेतादिपुराणि च। सारामसीमनिगमान् खेटादींश्च न्यवेशयत् ॥१५१॥
तदनंतर कौशल आदि महादेश, अयोध्या आदि नगर, वन और सीमासहित गाँव तथा खेड़ों आदि की रचना की थी ।।151।।
“After that, the great regions like Kosala, cities like Ayodhya, forests, villages, and settlements, including their boundaries, were established.”
श्लोक 152 से 161
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141