आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 |
श्लोक 112 से 121 धरणेंद्र और कुमारों का संवाद
धरणेंद्र ने कहा कि भोग अंत में संताप देते हैं। उसने सुझाव दिया कि वे भरत से भोग माँगें। उसने भगवान को मोक्षगामी बताया। नमि-विनमि ने जवाब दिया कि धरणेंद्र उनके कार्य में हस्तक्षेप न करे। उन्होंने कहा कि वे योग्य-अयोग्य जानते हैं। उन्होंने अवस्था का भेद मिथ्या बताया। उन्होंने धरणेंद्र को ढीठ कहा।
English translation of Ādi purāṇa parv 18 – Shlok 112 to 121
श्लोक ( Shlok ) 112
‘आपातमात्ररम्याणां भोगानां वशगः पुमान् । महानप्यर्थिता दोषात् सद्यस्तृण लघुर्भवेत् ॥११२॥
प्रारंभ मात्र में ही मनोहर दिखाई देनेवाले भोगों के वश हुआ पुरुष चाहे जितना बड़ा होने पर भी याचनारूपी दोष से शीघ्र ही तृण के समान लघु हो जाता है ।।112।।
“A person who falls under the sway of pleasures, which appear enchanting only in the beginning, no matter how great he may be, is soon reduced to insignificance—like a mere blade of grass—by the fault of begging.” ॥112॥
श्लोक ( Shlok ) 113
युवां चेद्भोगकाम्यन्तौ व्रजतं भरतान्तिकम्। स हि साम्राज्यधौरेयो वर्तते नृपपुङ्गवः ॥११३॥
यदि तुम दोनों भोगों को चाहते हो तो भरत के समीप जाओ क्योंकि इस समय वही साम्राज्य का भार धारण करने वाला है और वही श्रेष्ठ राजा है ।।113।।
“If you both desire worldly pleasures, then go to Bharat, for he is the one who now bears the burden of the empire and is the foremost of kings.” ॥113॥
श्लोक ( Shlok ) 114
भगवांस्त्यक्तरागादिसंगो देहेऽपि निःस्पृहः । कुतो वामधुना दद्याद भोगान् भोगस्पृहावतोः ॥११४॥
भगवान तो राग, द्वेष आदि अंतरंग परिग्रह का त्याग कर चुके हैं और अपने शरीर से भी नि:स्पृह हो रहे हैं, अब यह भोगों की इच्छा करने वाले तुम दोनों को भोग कैसे दे सकते हैं ? ।।114।।
“The Lord has already renounced all internal possessions, such as attachment and aversion, and is even becoming detached from His own body. How, then, can He possibly grant pleasures to you, who are still filled with desire?” ॥114॥
श्लोक ( Shlok ) 115
ततोऽलमुपरुद्धयैनं देवं मुक्त्यर्थमुद्यतम् । भुक्तिकामौ युवां यातं भरतं पर्युपासितुभ्॥ ११५॥
इसलिए, जो केवल मोक्ष जाने के लिए उद्योग कर रहे हैं ऐसे इन भगवान् के पास धरना देना व्यर्थ है । तुम दोनों भोगों के इच्छुक हो अत: भरत की उपासना करने के लिए उसके पास जाओ ।।115।।
“Therefore, it is futile to persist before this Lord, who strives only for liberation. Since you both desire worldly pleasures, go to Bharat and seek his favor instead.” ॥115॥
श्लोक ( Shlok ) 116
इति तद्वचनस्यान्ते कुमारौ प्रत्यवोचताम् । परकार्येंषु वः कास्था तूष्णीं यात महाधियः ।।११६।।
इस प्रकार जब वह धरणेंद्र कह चुका तब वे दोनों नमि, विनमि कुमार उसे इस प्रकार उत्तर देने लगे कि दूसरे के कार्यों में आपकी यह क्या आस्था (आदर, बुद्धि) है ? आप महा बुद्धिमान् हैं, अत: यहाँ से चुपचाप चले जाइए ।।116।।
“When Dharanendra had spoken in this way, the two princes, Nami and Vinami, responded, ‘Why are you so concerned with another’s affairs? You are a great wise one, so it is best for you to remain silent and leave from here.'” ॥116॥
श्लोक ( Shlok ) 117
यदत्र युक्तमन्यद्वा जानीमस्तदद्वयं वयम् । अनभिज्ञा भवन्तोऽत्र साधयन्तु यथेहितम् ॥११७॥
क्योंकि इस विषय में जो योग्य अथवा अयोग्य है उन दोनों को हम लोग जानते हैं परंतु आप इस विषय में अनभिज्ञ हैं इसलिए जहाँ आप को जाना है जाइए ।।117।।
“For we ourselves know what is appropriate and what is not in this matter, whereas you are unaware of it. So, go wherever you wish to go.” ॥117॥
श्लोक ( Shlok ) 118 – 119
वर्षीयांसों यवीयांस इति भेदोवयस्कृतः । न बोधवृद्धिर्वार्धक्ये न यून्यपचयो धियः ॥११८॥
वयसः परिणामेन धियः प्रायेण मन्दिमा । कृतात्मनां वयस्याद्ये ननु मेधा विवर्धते ॥ ११९॥
ये वृद्ध हैं और ये तरुण है यह भेद तो मात्र अवस्था का किया हुआ है । वृद्धावस्था में न तो कुछ ज्ञान की दृष्टि होती है और न तरुण अवस्था में बुद्धि का कुछ ह्रास ही होता है, बल्कि देखा ऐसा जाता है कि अवस्था के पकने से वृद्धावस्था में प्राय: बुद्धि की मंदता हो जाती है और प्रथम अवस्था प्राय: पुण्यवान् पुरुषों की बुद्धि बढ़ती रहती है ।।118-119।।
“The distinction between ‘elderly’ and ‘youthful’ is merely an effect of age. Old age does not necessarily grant wisdom, nor does youth diminish intellect. In fact, it is often observed that as age advances, the intellect tends to decline, whereas in the early stages of life, the wisdom of virtuous individuals continues to grow.” ॥118-119॥
श्लोक ( Shlok ) 120
नवं क्यो न दोषाय न गुणाय दशान्तरम् । नवोऽपीन्दुर्जनाह्वादी दहत्यग्निर्जरन्नपि ॥१२०॥
न तो नवीन-तरुण अवस्था दोष उत्पन्न करने वाली है और न वृद्ध अवस्था गुण उत्पन्न करने वाली है क्योंकि चंद्रमा नवीन होने पर भी मनुष्यों को आह्लादित करता है और अग्नि जीर्ण (बुझने के सम्मुख) होने पर भी जलाती ही है ।।120।।
“Neither youth is inherently a cause of fault, nor is old age necessarily a source of virtue. After all, the moon, though new, still brings joy to people, while fire, even when fading, continues to burn.” ॥120॥
श्लोक ( Shlok ) 121
अपृष्टः कार्यमाचष्टे यः स धृष्टतरो मतः । न पिपृच्छिषिता यूयमावाभ्यां कार्यमीदृशम् ।।१२१॥
जो मनुष्य बिना पूछे ही किसी कार्य को करता है वह बहुत ढीठ समझा जाता है । हम दोनों ही इस प्रकार का कार्य आपसे पूछना नहीं चाहते फिर आप व्यर्थ ही बीच में क्यों बोलते हैं ।।121।।
“A person who interferes in matters without being asked is considered very obstinate. We have no intention of seeking your opinion on this matter, so why do you speak unnecessarily in between?” ॥121॥
श्लोक 122 से 131
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आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
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