आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 |
श्लोक 12 से 21 तप की महिमा और राजाओं का क्षोभ
हिलते वृक्ष चमर से क्लेश दूर करते दिखे। दीक्षा के बाद उन्हें मनःपर्यय ज्ञान प्राप्त हुआ। चार ज्ञानों से वे परलोक देखते थे। कच्छ आदि राजाओं का धैर्य टूटने लगा। दो-तीन माह में परीषह से उनका धैर्य छूट गया। वे भगवान के कठिन मार्ग पर चलने में असमर्थ थे। वे भगवान के धैर्य और बल की प्रशंसा करने लगे। वे सोचते थे कि भगवान कितने समय खड़े रहेंगे। उन्हें लगा कि भगवान उन्हें क्लेशित कर रहे हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 18 – Shlok 12 to 21
श्लोक ( Shlok ) 12
पर्यन्ततरुशाखाग्रैर्मन्दानिलविधूनितैः । प्रकीर्णकैरिवायत्न विधूतैर्विधुतक्लमः ॥१२॥
मंद-मंद वायु से जो समीपवर्ती वृक्षों की शाखाओं के अग्रभाग हिल रहे थे उनसे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो बिना यत्न के बुलाये हुए चमरों से उनका क्लेश ही दूर हो रहा हो ।।12।।
As the gentle breeze swayed the tips of the nearby tree branches, it appeared as if natural fly-whisks (chamaras), effortlessly summoned, were relieving Him of all discomfort. ||12||
श्लोक ( Shlok ) 13
दीक्षानन्तरमुद् भूतमनः पर्ययबोधनः । चक्षुर्ज्ञानधरः श्रीमान् सान्तदीप इवालयः ॥१३॥
दीक्षा के अनंतर ही उन्हें मनःपर्यय ज्ञान प्राप्त हो गया था इसलिए मति, श्रुत, अवधि और मनःपर्यय इन चार ज्ञानों को धारण करने वाले श्रीमान् भगवान् ऐसे जान पड़ते थे मानो जिसके भीतर दीपक जल रहे हैं ऐसा कोई महल ही हो ।।13।।
Upon initiation, He attained Manahparyaya Jnana (direct knowledge of others’ thoughts). Thus, possessing the four types of knowledge—Mati (sensory perception), Shruta (scriptural knowledge), Avadhi (clairvoyance), and Manahparyaya (telepathy)—the glorious Lord appeared like a grand palace illuminated by inner lamps. ||13||
श्लोक ( Shlok ) 14
चतुर्भिरूर्जितैर्बोधैरमात्यैरिव चर्चि***
तम् । विलोकयन् विभुः कृत्स्नं परलोकगतागतम् ॥१४॥
जिस प्रकार कोई राजा मंत्रियों के द्वारा चर्चा किये जाने पर परलोक अर्थात् साधुओं के सब प्रकार के आना-जाना आदि को देख लेता हैं―जान लेता है उसी प्रकार भगवान् वृषभदेव भी अपने सुदृढ़ चार ज्ञानों के द्वारा सब जीवों के परलोक अर्थात् पूर्वपरपर्यायसंबंधी आना-जाना आदि को देख रहे थे―जान रहे थे ।।14।।
ust as a king, through discussions with his ministers, comes to know about the movements and affairs of ascetics in the afterlife, similarly, Lord Rishabhadeva, with His firm mastery over the four types of knowledge, perceived and understood the transmigration (comings and goings) of all beings across their past and future existences. ||14||
श्लोक ( Shlok ) 15
यदैवं स्थितवान् देवः पुरुः परमनिःस्पृहः । तदामीषां नृपर्षीणां धृतेः क्षोभो महानभूत् ॥१५॥
इस प्रकार भगवान् वृषभदेव जब परम निःस्पृह होकर विराजमान थे तव कच्छ महाकच्छ आदि राजाओं के धैर्य में बड़ा भारी क्षोभ उत्पन्न होने लगा―उनका धैर्य छूटने लगा ।।15।।
Thus, when Lord Rishabhadeva remained in a state of supreme detachment, the patience of kings like Kaccha and Mahakaccha began to waver greatly—they started losing their composure. ||15||
श्लोक ( Shlok ) 16
मासाद्वि त्राश्च नो यावत्तावत्ते मुनिमानिनः । परीषहमहावातैर्भग्नाः सद्यो धृति जहुः ॥१६॥
दीक्षा धारण किये हुए दो तीन माह भी नहीं हुए थे कि इतने में ही अपने को मुनि मानने वाले उन राजाओं ने परीषहरूपी वायु से भग्न होकर शीघ्र ही धैर्य छोड़ दिया था ।।16।।
Not even two or three months had passed since their initiation, yet those kings, who considered themselves ascetics, were soon shaken by the hardships of renunciation, like trees broken by a stormy wind, and they quickly lost their patience. ||16||
श्लोक ( Shlok ) 17
अशक्ताः पदवीं गन्तुं गुरोरतिगरीयसीम् । त्यक्त्वाभिमानमित्युच्चैर्जजल्पुस्ते परस्परम् ॥१७॥
गुरुदेव―भगवान वृषभदेव के अत्यंत कठिन मार्ग पर चलने में असमर्थ हुए वे कल्पित मुनि अपना-अपना अभिमान छोड़कर परस्पर में जोर-जोर से इस प्रकार कहने लगे ।।17।।
Unable to follow the extremely arduous path of their Guru, Lord Rishabhadeva, those so-called ascetics abandoned their pride and began exclaiming loudly to one another in this manner. ||17||
श्लोक ( Shlok ) 18
अहो “धैर्यमहो स्थैर्यमहो जङ्घावलं प्रभोः । को नामैवमिनं मुक्त्वा कुर्यात् साहसमीदृशम् ॥१८॥
कि, अहा आश्चर्य है भगवान का कितना धैर्य है, कितनी स्थिरता है और इनकी जंघाओं में कितना बल है इन्हें छोड़कर और दूसरा कौन है जो ऐसा साहस कर सके ।।18।।
They exclaimed, “Ah! What a wonder! How immense is the Lord’s patience, how unwavering His steadiness, and how powerful His thighs are! Apart from Him, who else could possess such courage?” ||18||
श्लोक ( Shlok ) 19
क्रियन्तमथवा कालं तिष्ठेदेवमतन्द्रितः । सोढ्वा बाधाः क्षुधाद्युत्था गिरीन्द्र इव निश्चलः ॥१९॥
अब यह भगवान् इस तरह आलस्यरहित होकर क्षुधा आदि से उत्पन्न हुई बाधाओं को सहते हुए निश्चल पर्वत की तरह और कितने समय तक खड़े रहेंगे ।।19।।
“Now, how much longer will this Lord, free from all laziness, stand unwavering like a mountain, enduring the hardships caused by hunger and other afflictions?” ||19||
श्लोक ( Shlok ) 20
तिष्ठेदेकं दिनं द्वे वा कामं त्रिचतुराणि वा । परं मासावधेस्तिष्ठन्नस्मान् क्लेशयतीशिता ॥२०॥
हम समझते थे कि भगवान् एक दिन, दो दिन अथवा ज्यादा-से-ज्यादा तीन चार दिन तक खड़े रहेंगे परंतु यह भगवान् तो महीनों पर्यंत खड़े रहकर हम लोगों को क्लेशित (दुःखी) कर रहे हैं ।।20।।
“We thought that the Lord would stand for a day or two, or at most three to four days. But He has been standing for months, causing us great distress!” ||20||
श्लोक ( Shlok ) 21
कामं तिष्ठतु वा भुक्त्वा पीत्या निर्वाप्य नः पुनः । अनाश्वान्निष्प्रतीकारः तिष्ठनिष्ठा करोति नः ॥२१॥
अथवा यदि स्वयं भोजन पान कर और हम लोगों को भी भोजन पान आदि से संतुष्ट कर फिर खड़े रहते तो अच्छी तरह खड़े रहते, कोई हानि नहीं थी परंतु यह तो बिल्कुल ही उपवास धारण कर भूख-प्यास आदि का कुछ भी प्रतीकार नहीं करते और इस प्रकार खड़े रहकर हम लोगों का नाश कर रहे हो ।।21।।
“Or, if He Himself ate and drank and allowed us to do the same, then standing like this would have been fine—there would be no harm. But He has completely embraced fasting, making no effort to counter hunger and thirst, and by standing in this way, He is bringing about our ruin!” ||21||
श्लोक 22 से 31
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273 आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 |