आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41
श्लोक 42 से 51 राजकुमारों का अधोभाग और आभूषण
पुत्रों के अंगों की शोभा का और विस्तार। उनके ऊरु, जंघाएँ, चरण आदि की तुलना कमलों और प्राकृतिक तत्वों से की गई। उनके आभूषणों (यष्टि, हार, रत्नावली) के प्रकार और भेदों (शीर्षक, उपशीर्षक, अवघाटक आदि) का वर्णन शुरू हुआ।
English translation of Ādi purāṇa parv 16 – Shlok 42 to 51
श्लोक ( Shlok ) 42
पीनौ चारुरुचावूरू नारीजनमनोरमौ । जङ्घे विनिर्जितानङ्गनिषङ्ग रुचिराकृतो ॥४२॥
उनके ऊरु स्थूल थे, सुंदर कांति के धारक थे और स्त्रीजनों का मन हरण करने वाले थे । उनकी जंघाएँ कामदेव के तरकश की सुंदर आकृति को भी जीतने वाली थीं ।।42।।
Their thighs were well-built, radiant with beauty, and capable of captivating the hearts of women. Their calves surpassed even the exquisite shape of Kāmadeva’s quiver, embodying unmatched grace and allure. ||42||
श्लोक ( Shlok ) 43
सर्वाङ्गसंगतां कान्तिमिवोच्चित्य स्त्रुतामधः । क्रमौ विनिर्मितौ लक्ष्म्यान्य क्कृतारुणपङ्कजौ ॥४३॥
अपनी शोभा से लाल कमलों का भी तिरस्कार करने वाले उनके दोनों पैर ऐसे जान पड़ते थे मानो समस्त शरीर में रहने वाली जो कांति नीचे की ओर बहकर गयी थी उसे इकट्ठा करके ही बनाये गये हों ।।43।।
Their feet, outshining even the brilliance of red lotuses, appeared as if they were formed by gathering all the radiance that had gracefully flowed downward from their entire body. ||43||
श्लोक ( Shlok ) 44
तेषां प्रत्यङ्गमत्युद्धा शोभा स्वात्मगतैव या । तत्समुत्कीर्तनेवालं खलूक्त्वा वर्णनान्तरम् ॥४४॥
इस प्रकार उन राजकुमारों के प्रत्येक अंग में जो प्रशंसनीय शोभा थी वह उन्ही के शरीर में थीं―वैसी शोभा किसी दूसरी जगह नहीं थी इसलिए अन्य पदार्थों का वर्णन कर उनके शरीर की शोभा का वर्णन करना व्यर्थ है ।।44।।
In this way, the praiseworthy splendor present in each part of those princes’ bodies existed only within them—such beauty was found nowhere else. Therefore, attempting to describe their radiance by comparing it to other objects is futile, as no external element can truly capture their magnificence. ||44||
श्लोक ( Shlok ) 45
निसर्गरुचिराण्येषां वपूंषि मणिभूषणैः । भृशं रुरुचिरे पुष्पैर्वनानी विकासिभिः ॥४५॥
उन राजकुमारों के स्वभाव से ही सुंदर शरीर मणिमयी आभूषणों से ऐसे सुशोभित हो रहे थे जैसे कि खिले हुए फूलों से वन सुशोभित रहते हैं ।।45।।
The naturally beautiful bodies of those princes were adorned with gem-studded ornaments, just as a blooming forest is gracefully adorned with its vibrant flowers. ||45||
श्लोक ( Shlok ) 46
तेषां विभूषणान्यासन् मुक्तारत्नमयानि वै। यष्टयो हारभेदा तेषां विभूषणान्यासन् मुक्तारत्नमयानि वै। यष्टयो हारभेदाश्च रत्नावल्यश्च नेकधा ॥४६॥
उन राजकुमारों के यष्टि, हार और रत्नावली आदि, मोती तथा रत्नों के बने हुए अनेक प्रकार के आभूषण थे ।।46।।
The princes wore various ornaments such as garlands, necklaces, and jeweled strings, all intricately crafted from pearls and precious gems. ||46||
श्लोक ( Shlok ) 47
यष्टयः शीर्षकं चोपशीर्षकं चावघाटकम् । प्रकाण्डकं च तरलप्रबन्धश्चेति प्रञ्चधा ॥४७॥
उनमें से यष्टि नामक आभूषण शीर्षक, उपशीर्षक, अवघाटक, प्रकांडक और तरलप्रबंध के भेद से पाँच प्रकार का होता है ।।47।।
Among these, the Yaṣṭi ornament is classified into five types: Śīrṣaka (head ornament), Upaśīrṣaka (secondary head ornament), Avaghāṭaka (dangling piece), Prakāṇḍaka (broad bracelet), and Tarala-prabandha (flexible linked jewelry). ||47||
श्लोक ( Shlok ) 48 – 49
केषांचिच्छीर्षकं यष्टिः केषांचिदुपशीर्षकम् । अवघाटकमन्येषामपरेषां प्रकाण्डकम् ॥४८॥
तरलप्रतिबन्धश्च केषांचित् कण्ठ भूषणम् । मणिमध्यान शुद्धाश्च तास्तेषां यष्टयोऽभवन् ॥४९॥
उन राजकुमारों में किन्हीं के शीर्षक, किन्हीं के उपशीर्षक, किन्हीं के अवघाटक, किन्हीं के प्रकांडक और किन्हीं के तरलप्रतिबंध नाम की यष्टि कंठ का आभूषण हुई थी । उनकी वे पाँचों प्रकार की यष्टियाँ मणिमध्या और शुद्धा के भेद से दो-दो प्रकार की थीं । [जिसके बीच में एक मणि लगा हो उसे मणिमध्या और जिसके बीच में मणि नहीं लगा हो उसे शुद्धा यष्टि कहते हैं ।] ।।48-49।।
Among those princes, some wore Śīrṣaka, some Upaśīrṣaka, some Avaghāṭaka, some Prakāṇḍaka, and some Tarala-prabandha as their Yaṣṭi (neck ornament). These five types of Yaṣṭis were further classified into two varieties:
- Maṇimadhyā – Adorned with a central gemstone.
- Śuddhā – Without a central gemstone.
||48-49||
श्लोक ( Shlok ) 50
“सूत्रमेकावली सैव यष्टिः स्यान्मणिमध्यमा । रत्नावली भवेत् सैव सुवर्णमणिचित्रिता ॥५०॥
मणिमध्यमा यष्टि को सूत्र तथा एकावली भी कहते हैं और यदि यही मणिमध्यमा यष्टि सुवर्ण तथा मणियों से चित्र-विचित्र हो तो उसे रत्नावली भी कहते हैं ।।50।।
The Maṇimadhyamā Yaṣṭi is also known as Sūtra and Ekāvalī. If this same Maṇimadhyamā Yaṣṭi is intricately designed with gold and precious gemstones, it is called Ratnāvalī. ||50||
श्लोक ( Shlok ) 51
“युक्तप्रमाणसौवर्णमणिमाणिक्य मौक्तिकैः । सान्तरं ग्रथिता भूषा भवेयुरपवर्तिका ॥५१॥
जो यष्टि किसी निश्चित प्रमाण वाले सुवर्णमणि, माणिक्य और मोतियों के द्वारा बीच में अंतर दे-देकर गुँथी जाती है उसे अपवर्तिका कहते हैं ।।51।।
The Yaṣṭi, which is woven with golden gems, rubies, and pearls at fixed intervals, is known as Apavartikā. ||51||
श्लोक 52 से 61
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