आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |
श्लोक 172 से 181 भगवान का प्रस्थान और पीछे चलना
रानियाँ परिकर छोड़ पीछे चलीं, पर वृद्धों ने रोका। यशस्वती, सुनंदा, नाभिराज, और भरत साथ चले। भगवान सिद्धार्थक वन पहुँचे।
English translation of Ādi purāṇa parv 17 – Shlok 172 to 181
श्लोक ( Shlok ) 172
इत्यन्तः पुरवृद्धामिर्मुहुराश्वासिता सती । यशस्वती सुनन्दा च प्रतस्थे पादचारिणी ॥१७२॥
इस प्रकार अंतःपुर की वृद्ध स्त्रियों के द्वारा समझायी गयी यशस्वती और सुनंदा देवी पैदल ही चल रही थी ।।172।।
Thus, after being consoled by the elderly women of the inner palace, Devi Yashasvati and Devi Sunanda continued walking on foot. ( 172)
श्लोक ( Shlok ) 173
बहुनात्र किमुक्तेन मुक्तसर्वपरिच्छदाः । देव्यो यथाश्रुतं भर्तुरनुमार्ग प्रतस्थिरे ॥१७३॥
इस विषय में बहुत कहने से क्या लाभ है उन देवियों ने ज्यों ही भगवान के जाने के समाचार सुने त्यों ही उन्होंने अपने छत्र चमर आदि सब परिकर छोड़ दिये थे और भगवान के पीछे-पीछे चलने लगी थीं ।।173।।
What is the use of saying more on this matter? As soon as those divine ladies heard the news of the Lord’s departure, they abandoned their umbrellas, fly whisks, and all royal insignia and began following the Lord. ( 173)
श्लोक ( Shlok ) 174 –175
मा भूद् व्याकुलता काचित् भर्तुरित्यनुयायिभिः । रुद्धः सर्वावरोध स्त्रीसार्थः कस्मिश्चिदन्तरे ॥ १७४॥
ब्रुवाणैर्भर्तुराज्ञेति राज्ञीवर्गों महत्तरैः । संरुद्धः सरितामोघः प्रवृद्धोऽपि यथार्णवैः ॥१७५॥
भगवान् को किसी प्रकार की व्याकुलता न हो यह विचारकर उनके साथ जाने वाले वृद्ध पुरुषों ने यह भगवान की आज्ञा है, ऐसा कहकर किसी स्थान पर अंतःपुर की समस्त स्त्रियों के समूह को रोक दिया और जिस प्रकार नदियों का बढ़ा हुआ प्रवाह समुद्र से रुक जाता है उसी प्रकार वह रानियों का समूह भी वृद्ध पुरुषों (प्रतीहारों) से रुक गया था ।।174-175।।
Considering that the Lord should not experience any distress, the elderly men accompanying him stopped the entire group of royal women at a certain place, saying, “This is the Lord’s command.” Just as the overflowing currents of rivers are halted by the ocean, similarly, the group of queens was restrained by these elderly attendants (gatekeepers). ( 174-175)
श्लोक ( Shlok ) 176
निःश्वस्य दीर्घमुष्णं च निन्दन् सौभाग्यमात्मनः । न्यवृतत् प्राप्तनैराश्यो नृपवल्ल भिकाजनः ॥ १७६॥
इस प्रकार रानियों का समूह लंबी और गरम साँस लेकर आगे जाने से बिल्कुल निराश होकर अपने सौभाग्य की निंदा करता हुआ घर को वापस लौट गया ।।176।।
Thus, the group of queens, heaving deep and warm sighs, completely disheartened from going any further, lamented their fate and returned home. (176)
श्लोक ( Shlok ) 177
महादेव्यौ तु शुद्धान्तमुख्याभिः परिवारिते । भर्तुरिच्छानु वर्त्तिन्यावन्वयातां सपर्यया ॥१७७॥
किंतु स्वामी की इच्छानुसार चलने वाली यशस्वती और सुनंदा ये दोनों ही महादेवियां अंतःपुर की मुख्य-मुख्य स्त्रियों से परिवृत होकर पूजा की सामग्री लेकर भगवान के पीछे-पीछे जा रही थी ।।177।।
However, the two great ladies, Yashasvati and Sunanda, who followed the will of their Lord, continued to walk behind him, accompanied by the chief women of the inner palace and carrying worship materials. ( 177)
श्लोक ( Shlok ) 178
मरुदेव्या समं नाभिराजो राजशतैर्वृतः । अनुत्तस्थौ तदा द्रष्टुं विभोर्निष्क्रमणोत्सवम् ॥१७८॥
उस समय महाराज नाभिराज भी मरुदेवी तथा सैकड़ों राजाओं से परिवृत होकर भगवान् के तपकल्याण का उत्सव देखने के लिए उनके पीछे-पीछे जा रहे थे ।।178।।
At that time, King Nabhiraj, accompanied by Queen Marudevi and hundreds of other kings, followed behind the Lord to witness the auspicious occasion of his ascetic initiation. (178)
श्लोक ( Shlok ) 179
समं पौरेरमात्यैश्च पार्थिवैश्च महान्वयैः । सानुजो भरताधीशो महद् र्ध्या गुरुमन्वयात् ॥१७९॥
सम्राट् भरत भी नगरनिवासी, मंत्री, उच्च वंश में उत्पन्न हुए राजा और अपने छोटे भाइयों के साथ-साथ बड़ी भारी विभूति लेकर भगवान के पीछे-पीछे चल रहे थे ।।179।।
Emperor Bharata, along with the citizens of the city, ministers, high-born kings, and his younger brothers, followed behind the Lord with great majesty and splendor. ( 179)
श्लोक ( Shlok ) 180
नातिदूरं खमुत्पत्य जनानां दृष्टिगोचरे। यथोक्तैर्मङ्गलारम्भैः प्रस्थानमकरोत् प्रभुः ।।१८०।।
भगवान् ने आकाश में इतनी थोड़ी दूर जाकर कि जहाँ से लोग उन्हें अच्छी तरह से देख सकते थे, ऊपर कहे हुए मंगलारंभ के साथ प्रस्थान किया ।।180।।
The Lord ascended only a short distance into the sky, just enough for the people to see him clearly, and then departed with the previously mentioned auspicious rituals. ( 180)
श्लोक ( Shlok ) 181
नातिदूरे पुरस्यास्य नात्यासन्नेतिविस्तृतम् । सिद्धार्थकवनोद्देशमभिप्राया “ज्जगद्गुरुः ॥१८१॥
इस प्रकार जगद्गुरु भगवान वृषभदेव अत्यंत विस्तृत सिद्धार्थक नाम के वन में जा पहुंचे । वह वन उस अयोध्यापुरी से न तो बहुत दूर था और न बहुत निकट ही था ।।181।।
Thus, the universal teacher, Lord Rishabhadeva, arrived at the vast forest named Siddharthaka. This forest was neither too far nor too close to the city of Ayodhya. (181)
श्लोक 182 से 191
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273 आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |