आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
श्लोक 172 से 181 भरत का शारीरिक वर्णन (ऊपरी भाग)
भरत का बलिष्ठ शरीर तेज से शोभायमान था। उसका मुकुट मेरु शिखर सा था। उसका शिर लक्ष्मी के लिए छत्र सा था। काले केश इंद्रनील टोपी से लगते थे। उसकी कुटिलता केशों में सीमित थी। उसका मुखकमल दाँतों और सुगंध से शोभायमान था। उसका मुख चंद्रमा सा सुखद, गोल, और कांतियुक्त था। दाँतों की चाँदनी और कर्णभूषण से वह शोभायमान था। उसका मुख सूर्य, चंद्र, और कमल के गुणों से युक्त था। वह संकोचरहित और अनुपम था।
English translation of Ādi purāṇa parv 15 – Shlok 172 to 181
श्लोक ( Shlok ) 172
दिव्यमानुषतामस्य व्यापयद्वपुरूर्जितम् । तेजोमयैरिवारब्धमणुभिर्व्यद्युतत्तराम् ॥१७२॥
‘यह कोई अलौकिक पुरुष है’ [‘मनुष्य रूपधारी देव है’] इस बात को प्रकट करता हुआ भरत का बलिष्ठ शरीर ऐसा शोभायमान होता था मानो वह तेजरूप परमाणुओं से ही बना हुआ हो ।।172।।
Bharata’s powerful physique shone brilliantly, revealing that he was no ordinary man but a divine being in human form. He appeared as if he were composed entirely of radiant energy particles. ॥172॥
श्लोक ( Shlok ) 173
तस्योत्तमाङ्गमुत्तुङ्ग मौलिरत्नांशुपेशलम् । सचूलिकमिवाद्रीन्द्रशिखरं भृशमद्युतत् ॥१७३॥
अत्यंत ऊँचे मुकुट में लगे हुए रत्नों की किरणों से शोभायमान उसका मस्तक चूलिका सहित मेरुपर्वत के शिखर के समान अतिशय शोभायमान होता था ।।173।।
His head, adorned with an exceedingly tall crown encrusted with radiant gemstones, shone brilliantly—resembling the lofty peak of Mount Meru crowned with its summit. ॥173॥
श्लोक ( Shlok ) 174
क्रमोन्नतं सुवृत्तं च शिरोऽस्य रुरुचेतराम् । धात्रा निवेशितं दिव्यमातपत्रमिव श्रियः ।।१७४।।
क्रम-क्रम से ऊँचा होता हुआ उसका गोल शिर ऐसा अच्छा शोभायमान होता था मानो विधाता ने [वक्षःस्थल पर रहने वाली] लक्ष्मी के लिए छत्र ही बनाया हो ।।174।।
His perfectly rounded head, rising in a graceful sequence, shone magnificently— as if the Creator had fashioned it as a royal canopy for Goddess Lakshmi, who resides on the chest. ॥174॥
श्लोक ( Shlok ) 175
शिरोऽस्याकुञ्चित स्निग्धविनीलैक जमूर्द्धजम् । विनीलरत्नविन्यस्त शिरस्त्राणमिवारुचत् ॥१७५॥
कुछ-कुछ टेढ़े, स्निग्ध, काले और एक साथ उत्पन्न हुए केशों से शोभायमान उसका मस्तक ऐसा जान पड़ता था मानो उस पर इंद्रनीलमणि की बनी हुई टोपी ही रखी हो ।।175।।
His head, adorned with slightly curved, smooth, black, and uniformly arranged hair, appeared as if it were crowned with a cap made of Indranīla (sapphire) gems. ॥175॥
श्लोक ( Shlok ) 176
ऋज्वी मनोवचः कायवृत्तिमुद्वहतः प्रभोः । केशान्तान लिसङ्काशान् भेजे कुटिलता परम् ॥१७६॥
भरत अपने मन, वचन, काय की प्रवृत्ति को बहुत ही सरल रखता था इसलिए जान पड़ता था कि उनकी कुटिलता उसके भ्रमर के समान काले केशों के अंत भाग में ही जाकर रहने लगी ।।176।।
Bharata kept his mind, speech, and actions exceedingly pure and straightforward. It seemed as if all crookedness had taken refuge only in the tips of his bee-like black locks. ॥176॥
श्लोक ( Shlok ) 177
स्मेरं वक्त्राम्बुजं तस्य दशनाभीषुकेसरम्। बभौ सुरभिनिःश्वासपवनाहूतषट्पदम् ॥१७७॥
दांतों की किरणोंरूपी केशर से सहित और सुगंधित श्वासोच्छवास के पवन-द्वारा भ्रमरों का आह्वान करने वाला उसका प्रफुलित मुखकमल बहुत ही शोभायमान होता था ।।177।।
His radiant face, resembling a blooming lotus, shone brilliantly. With the saffron-like glow of his teeth and the fragrant breeze of his breath, it seemed as if he were inviting bees to come near. ॥177॥
श्लोक ( Shlok ) 178
मुखमस्य मुखालोकमखण्डपरिमण्डलम् । शशाङ्कमण्डलस्या धाल्लक्ष्मी मक्षुणकान्तिकम् ।।१७८॥
अथवा उसका मुख पूर्ण चंद्रमंडल की शोभा धारण कर रहा था क्योंकि जिस प्रकार पूर्ण चंद्रमंडल के देखने से सुख होता है उसी प्रकार उसका मुख देखने से भी सबको सुख होता था जिस प्रकार पूर्ण चंद्रमंडल अखंड गोलाई से सहित होता है उसी प्रकार उसका मुख भी अखंड गोलाई से सहित था और जिस प्रकार पूर्ण चंद्रमंडल अखंड कांति से युक्त होता है उसी प्रकार उसका मुख भी अखंड कांति से युक्त था ।।178।।
Or rather, his face embodied the radiance of the full moon, for just as gazing at the full moon brings joy, so too did the sight of his face delight everyone. Like the full moon, his face was perfectly round and flawless, and just as the moon shines with an unbroken glow, his face radiated a continuous brilliance. ॥178॥
श्लोक ( Shlok ) 179
कर्णाभरणदी प्रांशुपरिवेषेण दिद्युते। मुखेन्दुरस्य दन्तोस्त्र चन्द्रिकामभितः किरन् ॥ १७९॥
चारों ओर दाँतों की किरणोंरूपी चाँदनी को फैलाता हुआ उसका मुखरूपी चंद्रमा कर्णभूषण की दैदीप्यमान किरणों के गोल परिमंडल से बहुत ही शोभायमान होता था ।।179।।
His moon-like face, spreading a cool radiance through the moonlight-like glow of his teeth, appeared exceedingly magnificent, encircled by the brilliant halo of his radiant earrings. ॥179॥
श्लोक ( Shlok ) 180
रवौ दीप्तिर्विंधौ कान्तिर्विकासश्च महोत्पले । इति व्यस्ता गुणाः प्रापुस्तदास्ये सहयोगिताम् ॥१८०॥
सूर्य में दीप्ति, चंद्रमा में कांति और कमल में विकास इस प्रकार ये सब गुण अलग-अलग रहते हैं परंतु भरत के मुख पर वे सब गुण सहयोगिता को प्राप्त हुए थे अर्थात् साथ-साथ विद्यमान रहते थे ।।180।।
The sun’s brilliance, the moon’s radiance, and the lotus’s bloom—though these qualities exist separately in their respective sources, they all came together in perfect harmony on Bharata’s face, existing simultaneously. ॥180॥
श्लोक ( Shlok ) 181
शशी परिक्षयी पद्मः संकोचं यात्यनुक्षपम् । सदाविकासि पूर्ण च तम्मुखं क्वोपमीयते ॥१८१॥
चंद्रमा क्षय से सहित है और कमल प्रत्येक रात्रि में संकोच को प्राप्त होता रहता है परंतु उसका मुख सदा विकसित रहता था और कभी संकोच को प्राप्त नहीं होता था―पूर्ण रहता था इसलिए उसकी उपमा किसके साथ दी जाये उसका मुख सर्वथा अनुपम था ।।181।।
The moon wanes, and the lotus closes every night, but his face remained ever radiant and never faded—always full and luminous. Thus, to what could it be compared? His face was truly incomparable. ॥181॥
श्लोक 182 से 191
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