नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 46 | श्लोक 47 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 72- shlok 92 to 101
श्लोक ( Shlok ) 92
योषित्सु व्रतशीलादिसत्क्रियाश्चामवन्ति चेत् । नं शुद्धिं ताः स्वपर्यन्तं कथं नायान्त्वसत्क्रियाः ॥ ९२ ॥
जिन किन्हीं स्त्रियोंमें व्रत शील आदि सत्क्रियाएं रहती हैं वे भी शुद्धिको प्राप्त नहीं होतीं फिर जिनमें सत्क्रियाएँ नहीं हैं वे अपनं अशुद्धताके परम प्रकर्षको क्यों न प्राप्त हों ? ॥ ९२ ॥
Even those women who possess vows, virtuous conduct, and noble deeds do not achieve ultimate purity; how then should those who completely lack noble deeds not reach the absolute height of impurity? ॥ 92 ॥
श्लोक ( Shlok ) 93
अम्भो वाम्भोजपत्रेषु चित्तं तासां न केषुचित् । स्थास्नु तिष्ठदपि स्पृष्ट्वाप्यस्पृष्टवदतः पृथक् ॥ ९३ ॥
जिस प्रकार कमलके पत्तोंपर पानी स्थिर नहीं रहता उसी प्रकार इन स्त्रियोंका चित्त भी किन्हीं पुरुषोंपर स्थिर नहीं ठहरता । वह स्पर्शकरके भी स्पर्श नहीं करनेवालेके समान उनसे पृथक् रहता है ॥ ९३ ॥
Just as water does not stay firmly on lotus leaves, the minds of these women do not remain steadfastly attached to any man. Even after making contact, their heart remains detached from them, as if it had never touched them at all. ॥ 93 ॥
श्लोक ( Shlok ) 94
सर्वदोषमयो भावो दुर्लक्ष्यः सर्वयोषिताम् । दुःसाध्यश्च महामोहावहोऽसौ सन्निपातवत् ॥ ॥९४ ॥
सब स्त्रियोंके सब दोषोंसे भरेभाव दुर्लक्ष्य रहते हैं- कष्टसे जाने जा सकते हैं। ये सन्निपातके समान दुःसाध्य तथा बहुत भारी मोह उत्पन्न करनेवाले होते हैं ॥ ९४॥
The dispositions of all women, filled with myriad flaws, remain imperceptible and can only be discerned with great difficulty. Like a severe delirium, they are incurable and cause immense delusion. ॥ 94 ॥
श्लोक ( Shlok ) 95
कः कं किं वक्ति केनेति विचार्य कार्यकारिणा । ऐहिकामुष्मिकार्थेषु ततोऽयं नैति वञ्चनाम् ॥ ९५ ॥
कौन किसके प्रति किस कारणसे क्या कहता है!’ इस बातका विचार कार्य करनेवाले मनुष्यको अवश्य करना चाहिए । क्योंकि जो इस प्रकारका विचार करता है वह इस लोक तथा परलोक सम्बन्धी कर्मोंमें कभी प्रतारणाको प्राप्त नहीं होता – ठगाया नहीं जाता ॥ ९५ ॥
“Who is saying what, to whom, and for what reason!”—a person taking action must absolutely contemplate this matter. For one who deliberates in this manner is never deceived or misled in the affairs of both this world and the world beyond. ॥ 95 ॥
श्लोक ( Shlok ) 96
प्रमाणवचनः किं वा नेति वक्ता परीक्ष्यताम् । विदुषा तस्य वृत्तेन परिज्ञानेन च स्फुटम् ॥९६॥
‘यह वक्ता प्रामाणिक वचन बोलता है या नहीं’ इसबातकी परीक्षा विद्वान् पुरुषको उसके आचरण अथवा ज्ञानसे स्पष्ट ही करना चाहिए ।। ९६ ।।
“Whether this speaker utters trustworthy words or not”—a wise man must clearly examine and verify this through the speaker’s conduct or their knowledge. ॥ 96 ॥
श्लोक ( Shlok ) 97 – 98
एतस्मिन्सम्भवेदेतन्न वेति नयवेदिना । तदाचारैः परीक्ष्यः प्राग्यमुद्दिश्य वचस्स च ॥ ९७॥किं प्रत्येयमिदं नेति शब्देनार्थेन च ध्रुवम् । उक्त व्यक्त परीक्ष्यं तत्समीक्षापूर्वकारिभिः ॥ ९८ ॥
नयोंके जाननेवाले मनुष्यको पहले यह देखना चाहिये कि इसमें यह बात संभव है भी या नहीं ? इसी प्रकार जिसे लक्ष्यकर वचन कहे जानें पहिले उसके आचरणसे उसकी परीक्षा कर लेनी चाहिए।विचार कर कार्य करनेवाले मनुष्यको शब्द अथवा अर्थके द्वारा कहे हुए पदार्थका ‘यह विश्वासकरनेके योग्य है अथवा नहीं’ इस प्रकार स्पष्ट ही परीक्षा कर लेनी चाहिए ॥९७-९८।।
A person who understands the various perspectives (Nayas) must first evaluate whether a statement is even possible or reasonable. Similarly, before reaching a conclusion about the person at whom the words are directed, one must first test and examine them through their actual conduct. A person who acts with deliberate thought must clearly examine the substance of what has been spoken, whether through literal words or implied meaning, to determine, “Is this worthy of belief or not?” ॥ 97-98 ॥
श्लोक ( Shlok ) 99 – 100
भिया स्नेहेन लोभेन मात्सर्येण कुधा ह्रिया । किमबोधेन बोधेन परेषां प्रेरणेन वा ॥ ९९ ॥वक्तीत्येतन्निमित्तानि परीक्ष्याणि सुमेधसा । एवं प्रवर्तमानोऽयं विद्वान्विद्वत्सु चेष्यते ॥ १०० ॥
‘यह जो कहरहा है सो भयसे कह रहा है, या स्नेहसे कह रहा है, या लोभसे कह रहा है, या मात्सर्यसे कह रहा है, या क्रोधसे कह रहा है, या लज्जासे कह रहा है, या अज्ञानसे कह रहा है, या जानकर कह रहाहै, और या दूसरोंकी प्रेरणासे कह रहा है, इस प्रकार बुद्धिमान् मनुष्यको निमित्तोंकी परीक्षा करनी चाहिए । जो मनुष्य इस प्रकार प्रवृत्ति करता है वह विद्वानोंमें भी विद्वान् माना जाता है ॥ ९९-१०० ।।
“Whether what this person is saying is spoken out of fear, or out of affection, or out of greed, or out of envy, or out of anger, or out of shame, or out of ignorance, or with deliberate knowledge, or at the instigation of others”—in this manner, a wise person must thoroughly examine the underlying motives and causes. The person who conducts themselves in this way is considered a scholar even among scholars. ॥ 99-100 ॥
श्लोक ( Shlok ) 101
सा स्रीत्वान्नावबुध्येत दुष्टा कष्टमयञ्च तत् । ‘शिष्टाशिष्टानुसंशिष्टौ शिष्टः संमोमुहीति यत् ॥ १०१ ॥
‘अच्छी और बुरी आज्ञा देनेमें जो शिष्ट (उत्तम) पुरुष भी भूलकर जाते हैं वह बड़े कष्टकी बात है’ यह बात दुष्टा स्त्री अपने स्त्री स्वभाव के कारण नहीं समझ पाती है ।। १०१ ।।
“It is a matter of great sorrow that even noble (excellent) men commit errors in distinguishing between a good and a bad command”—a wicked woman, due to her inherent nature, is utterly incapable of understanding this truth. ॥ 101 ॥
श्लोक 102 से 111
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नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 46 | श्लोक 47 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 |
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