राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 222 से 235 | श्लोक 236 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 276 | श्लोक 277 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 317 | श्लोक 318 से 332
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 333 to 353
श्लोक ( Shlok ) 333
तस्मात्तदाशामुन्झित्वा मदाशां पूरय प्रिये । अवश्यं भाविकार्येऽस्मिन् किं कालहरणेन ते ॥ ३३३॥
इसलिए हे प्रिये ! रामकी आशा छोड़कर मेरी आशा पूर्ण करो। जो कार्य अवश्य ही पूर्ण होने-वाला है उसमें समय बितानेसे तुझे क्या लाभ है ? ॥ ३३३ ॥
“‘Therefore, O beloved! Give up all hope for Rama and fulfill my desire. What benefit is there for you in wasting time over an outcome that is surely inevitable?’ || 333 ||”
श्लोक ( Shlok ) 334
हसन्त्याश्च रुदन्त्याश्च तव प्राघूर्णिकोऽस्म्यहम् । मल्कान्तकान्तासन्ताने कान्ते चूलामणिर्भव ॥ ३३४ ॥
तू चाहे रो और चाहे हँस, मैं तो तेरा पाहुना हो चुका हूं। हे सुन्दरी ! तू मेरी सुन्दर स्त्रियोंके समूहमें चूडामणिके समान हो ।॥ ३३४ ॥
“‘Whether you weep or whether you laugh, I have already become your guest. O beautiful one! May you be like the crest-jewel among the assembly of my beautiful wives.’ || 334 ||”
श्लोक ( Shlok ) 335
न चेदसि विभाग्यत्वादचैव घटदासिका । अतिथिर्वा भव प्रेतनाथावासनिवासिनाम् ॥ ३३५॥
यदि तू अभाग्य वश मेरा कहना नहीं मानेगी तो तुझे आज ही मेरी घटदासी बनना पड़ेगा अथवा यमराजके घर रहनेवालोंका अतिथि होना पड़ेगा ।। ३३५ ॥
“‘If, out of misfortune, you do not heed my words, then this very day you will either have to become my menial water-carrier (ghatadasi) or become a guest of those who dwell in the abode of Yama (the God of Death).’ || 335 ||”
श्लोक ( Shlok ) 336 – 347
इति तां ‘मामिवापुण्यः स्वकत्तुं व्यर्थमब्रवीत् । तदाकर्णापि भूभूता समाहितमनास्तदा ॥ ३३६ ॥ ध्याति धर्येव नैर्मल्यमादधानाभवत्स्थिरा । खगेशवक्त्रनिर्यातबाग्जालज्वलनावली ॥ ३३७ ॥ सीताधैर्याम्बुधिं प्राप्य सद्यः शान्तिमगात्तदा । विक्रमेण यथा पुंसः सर्वसौभाग्यसम्पदा ॥ ३३८ ॥ श्रीसृष्टिमपि जेतारं मामेषा परिभावुका । किकेति क्रुध्यतः पत्युर्दीप्तक्रोधदवानलम् ॥ ३३९ ॥ सद्यः सीतालतां दग्धुं जुम्भमाणं मनोरणे । मन्दोदरी हितश्रव्यवचनामृतवारिभिः ॥ ३४० ॥ प्रशमय्य किमस्थाने जनवत्कोपवान् भवेः । विचिन्तय किमेषा ते दण्डयोग्याऽवभासते ॥ ३४१ ॥ मन्दारप्रसवारब्धमालाग्निक्षेपमर्हति । सतीनां परिभूत्याशु खगामिन्यादिका अध्रुवम् ॥ ३४२ ॥विद्याविनाशमायान्ति तत्स्या विर्वा विपक्षकः । पुरा स्वयम्प्रभाहेतोरश्वग्रीवः खगाधिपः ॥ ३४३ ॥प्रीतिमिले प्रसिद्धोदनः समासतः सतारायां विधीरशनिघोषकः ॥ ३४४ ॥पराभवं परिप्राप्तो मा भूस्त्वमपि तादृशः । मा मंस्था मां सपत्नीति मद्वप्वस्त्वं प्रमाणयन् ॥ ३४५ ॥त्यज सीतागतं मोहमित्यसौ निजगाद तम् । तदुक्तेरुत्तरं वाक्यमभिधातुमशक्नुवन् ॥ ३४६ ॥समं प्राणैरियं त्याज्येत्यगात्स कुपितः पुरम् । मन्दोदरी परित्यक्तनिजपुत्रीशुगाहिता ॥ ३४७ ॥
इस तरह जिस प्रकार पुण्यहीन मनुष्य लक्ष्मीको वश करने के लिए व्यर्थ ही बकवास करता है उसी प्रकार उस रावणने सीताको वश करनेके लिए व्यर्थ ही बकवास किया। उसे सुनकर सीता निश्चल चित्त हो धर्म्यध्यानके समान निर्मलता धारण करती हुई निश्चल बैठी रही। रावणके मुखसे निकले हुए वचन-समूहरूपी अग्निकी पंक्ति सीताके धैर्यरूपी समुद्रको पाकर शीघ्र ही उसी समय शान्त हो गई। उस समय रावण सोचने लगा कि ‘मैं जिस प्रकार पराक्रमके द्वारा समस्त पुरुषोंको जीतता हूँ उसी प्रकार अपनी सौभाग्य-रूपी सम्पदाके द्वारा समस्त स्त्रियोंको भी जीतता हूं- उन्हें अपने वश कर लेता हूं फिर भी यह सीता मेरा तिरस्कार कर रही है’ ऐसा विचारकर रावण क्रोध करने लगा। सीतारूपी लताको शीघ्र ही जलानेके लिए रावणके मनरूपी युद्धस्थलमें जो प्रचण्ड क्रोधरूपी दावानल फैल रही थी उसे मन्दोदरीने हितकारी तथा सुननेके योग्य वचनरूपी अमृत जलसे शान्तकर कहा कि आप इसतरह साधारण पुरुषके समान अस्थानमें क्यों क्रोध करते हैं ? जरा सोचो तो सही, यह स्त्री क्या आपके दण्ड देने योग्य मालूम होती है ? अरे, मन्दारवृक्ष के फूलोंसे बनी हुई माला क्या अग्निमें डाली जानेके योग्य है ? आप यह याद रखिये कि सती स्त्रियोंका तिरस्कार करनेसे आकाशगामिनी आदि विद्याएँ निश्चित ही नष्ट हो जाती हैं और ऐसा होनेसे आप पक्षरहित पक्षीके समान हो जायेंगे। पहले स्वयंप्रभाके लिए अश्वग्रीव विद्याधर, पद्मावतीके कारण राजा मधुसूदन और सुतारामें आसक्त हुआ निर्बुद्धि अशनिघोष पराभवको पा चुका है अतः आप भी उन जैसे मत होओ। ऐसा मत समझिये कि मैं सौतके भयसे ऐसा कह रही हूँ। आप मेरे वचनको प्रमाण मानते हुए सीता सम्बन्धी मोह छोड़ दीजिये। ऐसा मन्दोदरी ने रावणसे कहा । रावण उसके वचनोंका उत्तर देनेमें समर्थ नहीं हो सका अतः यह कहता हुआ कुपित हो नगर में वापिस चला गया कि अब तो यह प्राणोंके साथ ही छोड़ी जा सकेगी ॥ ३३६-३४७ ॥
“In this manner—just as a man devoid of merit talks nonsense in vain to woo the Goddess of Wealth—Ravana prattled in vain to win over Sita. Hearing him, Sita remained seated completely unmoving, maintaining a purity of mind akin to righteous meditation (dharmadhyana). The torrent of words emanating from Ravana’s mouth, like a advancing line of fire, was instantly extinguished upon meeting the vast ocean of Sita’s fortitude.
At that moment, Ravana began to reflect: ‘Just as I conquer all men through my sheer prowess, I also conquer all women and bring them under my control through the wealth of my supreme charm—and yet, this Sita dares to disdain me!’ Disquieted by this thought, Ravana grew furious.
As the blazing forest fire of fierce wrath erupted within the battlefield of Ravana’s mind, threatening to instantly consume the creeper-like Sita, Mandodari quenched it with the nectar-like water of her beneficial and wholesome words. She said, ‘Why do you give in to anger at such an inappropriate place, like an ordinary man? Just ponder for a moment—does this woman appear fit for your punishment? Tell me, is a garland woven from the blossoms of the celestial mandara tree meant to be cast into the fire?
You must remember that by insulting chaste and virtuous women, your supernatural powers—including the art of flying through the sky (akashagamini vidya)—will surely be destroyed. Should that happen, you will be rendered helpless, like a bird stripped of its wings. In the past, the Vidyadhara Ashvagriva met his downfall because of Swayamprabha; King Madhusudan perished on account of Padmavati; and the foolish Ashanighosha suffered utter humiliation due to his infatuation with Sutara. Therefore, do not follow in their footsteps.
Do not misinterpret my words as though I speak out of fear of a co-wife. Accepting my words as the truth, abandon this delusion regarding Sita.’
Thus spoke Mandodari to Ravana. Unable to counter her reasoning, Ravana departed for his city in a fit of rage, muttering, ‘Now, she will only be released along with her life!’ || 336-347 ||”
श्लोक 354 से 364
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