राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन पर्व 76 – श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 151 | श्लोक 152 से 161
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 162 to 171
श्लोक ( Shlok ) 162
व्यज तन्मोहमिस्येनं भवदेवोऽप्यनुत्तरः । मति ज्येष्ठानुरोधेन व्यधाद्दीक्षाविधौ च सः ॥ १६२ ॥
इसलिए तू स्त्रीका मोह छोड़ दे। बड़े भाईके अनुरोधसे भवदेव चुप रह गया और उसने दीक्षा धारण करनेका विचार कर लिया ।। १६२ ॥
“Therefore, you must cast aside your attachment to women.’ Yielding to his elder brother’s earnest request, Bhavadeva remained silent and made up his mind to receive initiation (Diksha). || 162 ||”
श्लोक ( Shlok ) 163
नीत्वा स्वगुरुसामीप्यं भगदत्तो भवच्छिदे । दीक्षामग्राहयन्मौलीं सतां ‘सोदर्यमीदृशम् ॥१६३॥
अन्तमें भगदत्तने अपने गुरुके पास ले जाकर उसे संसारका छेद करनेके लिए मोक्ष प्राप्त करानेवाली दीक्षा ग्रहण करवा दी सो ठीक ही है क्योंकि सज्जनोंका भाईपना ऐसा ही होता है ।॥ १६३ ॥
“Ultimately, Bhagadatta brought him before his preceptor and had him receive the initiation (Diksha) that severs worldly bonds and leads to liberation (Moksha). And this is only fitting, for such is the true nature of brotherhood among the virtuous. || 163 ||”
श्लोक ( Shlok ) 164 – 165
स द्रव्यसंयमी भूत्वा “विधीर्वादशवत्सरान् । विहृत्य गुरुभिः सार्धमन्येधुरसहायकः ॥ १६४ ॥वृद्धग्रामं निजं गत्वा सुम्रतागणिनीमभि । समीक्ष्यास्मिन् किमस्त्यम्ब नागश्रीर्नाम काचन ॥ १६५ ॥
उस मूर्खने द्रव्यसंयमी होकर बारह वर्ष तक गुरुओंके साथ विहार किया। एक दिन वह अकेला ही अपनी जन्मभूमि वृद्ध ग्राम में आया और सुव्रता नामकी गणिनीके पास जाकर पूछने लगा कि हे माता ! इस नगर में क्या कोई नागश्री नामकी स्त्री रहती है ? ॥ १६४-१६५ ।।
“Having taken the vows only in external practice (Dravya-Sanyami), that foolish ascetic wandered along with his preceptors for twelve years. One day, he returned to his birthplace, the village of Vriddha, all alone. Approaching a senior nun (Ganini) named Suvrata, he began to inquire, ‘O Mother! Does a woman named Nagashri reside in this city?’ || 164-165 ||”
श्लोक ( Shlok ) 166 – 167
इति सम्प्रभयामास सा तस्येङ्गितवेदिनी । नाहं वेश्नि मुने सम्यगुदन्तं तन्निबन्धनम् ॥ १६६ ॥इत्यौदासीन्यमापन्ना गुणवत्यायिकां प्रति । संयमे तं स्थिरीकर्तुमर्थाख्यानकमब्रवीत् ॥ १६७ ॥
गणिनीने उसका अभिप्राय समझकर उत्तर दिया कि हे मुने ! मैं उसका वृत्तान्त अच्छी तरह नहीं जानती हूँ। इस प्रकार उदासीनता दिखाकर गणिनीने उस द्रव्य-लिङ्गी मुनिको संयममें स्थिर करनेके लिए गुणवती नामकी दूसरी आर्यिकासे निम्नलिखित कथा कहनी शुरू कर दी ।। १६६-१६७ ।।
“Discerning his underlying intention, the senior nun replied, ‘O Sage! I do not know her story very well.’ Displaying such detachment, and with the purpose of keeping that externally-vowed (Dravya-Lingi) sage anchored in self-restraint, the senior nun began to narrate the following story to another nun (Aryika) named Gunavati. || 166-167 ||”
श्लोक ( Shlok ) 168 – 171
वैश्यः सर्वसमृद्धाख्यस्तदासीतनयः शुचिः । दारुकाख्यः स्वमात्रास्मच्छ्रेष्ठ्युच्छिष्टाशितं त्वया ॥१६८॥भोक्तव्यमिति निर्बन्धाद्भोजितः स जुगुप्सया । वान्तवान् कंसपात्रेण ततन्मात्राहितं पुनः ॥ १६९ ॥बुभुक्षुर्मातरं भोक्तुं प्रार्थयामास दारुकः । तयापि कंसपात्रस्थं पुरस्तादुपढौकितम् ॥ १७० ॥बुभुक्षापीडितोऽप्येष नाग्रहीद्वान्तमात्मना । सोऽपि चेत्तादृशः साधुः कथं त्यक्तमभीप्सति ॥ १७१ ॥
वह कहने लगी कि एक सर्वसमृद्ध नामका वैश्य था। उसके शुद्ध हृदयवाला दारुक नामका दासी-पुत्र था। किसी एक दिन उसकी माताने उससे कहा कि तू हमारे सेठका जूठा भोजन खाया कर। इस तरह कहकर उसने जबर्दस्ती उसे जूँठा भोजन खिला दिया । वह खा तो गया परन्तु ग्लानि आनेसे उसने वह सब भोजन वमन कर दिया। उसकी माताने वह सब वमन काँसेकी थालीमें ले लिया और जब उस दारुकको भूख लगी और उसने मातासे भोजन माँगा तब उसने काँसेके पात्रमें रक्खा हुआ वही वमन उसके सामने रख दिया। दारुक यद्यपि भूखसे पीड़ित था तो भी उसने वह अपना वमन नहीं खाया। जब दासी-पुत्रने भी अपना वमन किया हुआ भोजन नहीं खाया तब मुनि छोड़े हुए पदार्थको किस तरह चाहते हैं ? ॥ १६८-१७१ ॥
“She began to narrate: ‘There was a highly prosperous merchant named Sarvasamriddha. He had a pure-hearted son of a maidservant named Daruka. One day, his mother said to him, “You must eat the leftover food of our master.” Speaking thus, she forcibly made him eat the leftovers. He ate it, but filled with deep aversion, he vomited it all out. His mother collected all that vomit in a bronze plate, and when Daruka felt hungry later and asked his mother for food, she placed the very same vomit kept in the bronze vessel right before him. Even though Daruka was afflicted with severe hunger, he did not eat his own vomit. When even a maidservant’s son refuses to consume his own vomited food, how then can a monk desire the worldly pleasures he has already renounced?’ || 168-171 ||”
श्लोक 172 से 183
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राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111
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