आलोचना पाठ – छंद 18 व 19 : अर्थ एवं व्याख्या
हा हा ! मैं दुठ अपराधी, त्रस जीवन राशि विराधी
थावर की जतन न कीनी, उर में करुणा नहि लीनी ॥18॥
शब्दार्थ
- हा हा! — अत्यंत पश्चात्ताप और खेद की अभिव्यक्ति।
- दुठ अपराधी — अत्यंत बड़ा अपराधी।
- त्रस जीव — चलने-फिरने की क्षमता रखने वाले जीव।
- जीवन राशि — जीवों का समूह।
- विराधी — हिंसा करने वाला/विरोधी।
- थावर — स्थावर जीव, जो एक इंद्रिय वाले माने जाते हैं।
- जतन — सावधानी, संरक्षण।
- उर — हृदय।
- करुणा — दया, अनुकंपा।
जीवों की हिंसा का पश्चाताप
हाहाकार है! मैं अत्यंत दुष्ट और अपराधी हूँ। मैंने त्रस जीवों (दो-इंद्रिय, तीन-इंद्रिय, चार-इंद्रिय और पंच-इंद्रिय जीव जैसे—कीड़े, चींटी, मकोड़े आदि) के समूह की भारी विराधना (हिंसा) पीड़ा पहुँचाई ,
“थावर की जतन न कीनी, उर में करुणा नहिं लीनी।” मैंने स्थावर जीवों का भी बहुत घात किया है। स्थावर जीव कौन से कहलाते हैं? जो एकेन्द्रिय जीव होते हैं, वह स्थावर कहलाते हैं। स्थावर जीव भी पाँच प्रकार के होते हैं:
- पृथ्वीकायिक
- जलकायिक
- अग्निकायिक
- वायुकायिक
- वनस्पतिकायिक
अब उनकी हिंसा का वर्णन जो है आगे किया जाएगा। तो ‘स्थावर की जतन न कीनी’, मैंने सूक्ष्म स्थावर जीवों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति कायिक जीव) की रक्षा का भी कोई यत्न (ध्यान) नहीं रखा ‘उर में करुणा नहिं लीनी’, उनके प्रति भी मैंने जो है अपने हृदय में करुणा का भाव धारण नहीं किया। अर्थात् समस्या केवल बाहरी असावधानी नहीं थी; हृदय में करुणा का अभाव भी था। अहिंसा का वास्तविक आधार करुणा है। यदि मन में जीव के प्रति दया और मैत्री का भाव उत्पन्न हो जाए तो व्यक्ति अपने प्रत्येक कार्य में अधिक सावधान होने लगता है।
करुणा → सावधानी → अहिंसा → आत्मशुद्धि
छंद 19
पृथिवी बहु खोद कराई, महलादिक जागाँ चिनाई
पुनि बिन गाल्यो जल ढोल्यो, पंखातैं पवन बिलोल्यो ॥19॥
शब्दार्थ
- पृथिवी खोद — भूमि को खोदना।
- महलादिक — महल आदि भवन।
- जागाँ — स्थान/जगह।
- बिन गाल्यो — बिना छानकर/शोधित किए।
- जल ढोल्यो — पानी बहाया/उड़ेला।
- पंखातैं — पंखे आदि से।
- पवन बिलोल्यो — हवा को तेज गति से चलाया/विक्षुब्ध किया।
पृथ्वीकायिक जीवों की हिंसा
“पृथ्वी बहु खोद कराई, महलादिक जांगा चिनाई।” यानी कुआँ आदि या हम मकान बनाते हैं, निर्माण मकान का निर्माण करते हैं, तो हम क्या करते हैं? पृथ्वी को खोदते हैं। जब पृथ्वी को खोदते हैं तो क्या होगा? पृथ्वीकायिक जीवों की हिंसा होगी। ‘महलादिक जांगा चनाई‘, मैंने मकानों को बनाने के लिए, महल आदि को बनाया। ‘ हमने अपने मकान बनवाने, निर्माण कार्य (कंस्ट्रक्शन) या नवीनीकरण (रिनोवेशन) कराने के लिए पृथ्वी की बहुत खुदाई करवाई और प्लास्टर आदि करके महल तथा विशाल भवन बनाए। इन सब कार्यों के दौरान अत्यधिक पृथ्वीकायिक जीवों की हिंसा हुई है।
अपकायिक (जलकायिक) जीवों की हिंसा
“पुनि बिन गाल्यो जल ढोल्यो…” बिना छाने जल (अंचना जल) का बेपरवाही से प्रयोग किया और उसे व्यर्थ ही बहाया या ढोला। सफाई करने, धोने या नल खुला छोड़ देने जैसी दैनिक आदतों के कारण बिना शोधन किए जल का उपयोग करके अनगिनत जलकायिक जीवों का घात किया।
वायुकायिक जीवों की हिंसा
“…पंखा ते पवन विलोल्यो।” हमने पंखा चलाकर वायु को तीव्र गति से विलोड़ित (आंदोलित) किया, जिससे असंख्य वायुकायिक जीवों की हिंसा हुई। आजकल वातानुकूलक (एसी) का अत्यधिक प्रयोग किया जाता है, जिससे अत्यधिक तीव्र हिंसा होती है। तापमान के अचानक परिवर्तन से—गर्मी के जीव ठंडक में आने पर तथा ठंडक के जीव गर्मी के संपर्क में आने पर—बहुत बड़ी संख्या में जीवों का घात हो जाता है।
यह पद मनुष्य को यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि हमारे सामान्य और आवश्यक लगने वाले कार्यों का भी जीव-जगत पर प्रभाव पड़ता है। इसका आधुनिक संदर्भ भी बहुत महत्वपूर्ण है—निर्माण, जल का अत्यधिक उपयोग, प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और पर्यावरणीय असावधानी के संदर्भ में अहिंसा और Sustaiable development की भावना विकसित की जा सकती है। अहिंसा का व्यापक अर्थ केवल जीवों को कष्ट न पहुँचाना ही नहीं, बल्कि प्रकृति, जल, भूमि और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति भी संवेदनशील एवं जिम्मेदार व्यवहार करना है। निर्माण और विकास की प्रक्रिया में संसाधनों का संयमित उपयोग, जल संरक्षण, पर्यावरणीय संतुलन और सतत निर्माण पद्धतियों को अपनाना इसी अहिंसक दृष्टिकोण का आधुनिक रूप है, जो SDGs के सतत विकास के लक्ष्य को भी साकार करता है।
पश्चाताप
इस प्रकार अनजाने में और प्रमादवश पृथ्वीकायिक, जलकायिक तथा वायुकायिक जीवों के प्रति जो भी हिंसा के दोष हमसे हुए हैं, उन सभी का स्मरण करते हुए हम हृदय से क्षमायाचना करते हैं।
छंद 20 व 21
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