भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141
श्लोक 142 से 151 सुविधि का विवाह और पुत्र
सुविधि ने मनोरमा से विवाह किया। स्वयंप्रभ (श्रीमती) उनका पुत्र केशव बना। सुविधि को पुत्र पर प्रेम था। सिंह आदि चार जीव राजपुत्र बने।
English translation of Ādi purāṇa parv 10 – Shlok 142 to 151
श्लोक ( Shlok ) 142
सोऽनुमेने यथाकालं सत्कलत्रपरिग्रहम् । उपरोधाद् गुरोः प्राप्तराज्यलक्ष्मीपरिच्छदः ॥ १४२॥
उसने यथायोग्य समय पर गुरुजनों के आग्रह से उत्तम स्त्री के साथ पाणिग्रहण कराने की अनुमति दी थी और छत्र, चमर आदि राज्य-लक्ष्मी के चिह्न भी धारण किये थे, राज्य-पद स्वीकृत किया था ।।142।।
“He had granted permission for marriage with a noble woman at the appropriate time, in accordance with the request of the elders. He had also accepted the symbols of royal prosperity, such as the umbrella and the chamara (fly-whisk), and had assumed the royal position.”
श्लोक ( Shlok ) 143
चक्रिणोऽभयघोषस्य स्वस्त्रीयोऽयं यतो युवा । ततश्चक्रिसुतानेम परिणिन्ये मनोरमा ॥१४३॥
तरुण अवस्था को धारण करने वाला वह सुविधि अभयघोष चक्रवर्ती का भानजा था इसलिए उसने उन्हीं चक्रवर्ती की पुत्री मनोरमा के साथ विवाह किया था ।।143।।
“The one who had attained youthful age was the nephew of the renowned, Abhayghosh Chakravarti. Therefore, he married Manorama, the daughter of that very emperor.”
श्लोक ( Shlok ) 144
तयानुकूलया सत्या स रेमे सुचिरं नृपः । सुशीलमनुकूलं च कलत्रं रमयेन्नरम् ॥१४४॥
सदा अनुकूल सती मनोरमा के साथ वह राजा चिरकाल तक क्रीड़ा करता रहा सो ठीक है । सुशील और अनुकूल स्त्री ही पति को प्रसन्न कर सकती है ।।144।।
“It is true that the king enjoyed playing with his ever-faithful and devoted wife, Manorama, for a long time. A virtuous and agreeable wife alone can bring happiness to her husband.”
श्लोक ( Shlok ) 145
तयोरत्यन्तसंप्रीत्या काले गच्छत्यनन्तरम् । स्वयंप्रभो दिवश्च्युत्वा केशवाख्यः सुतोऽजनि ॥१४५॥
इस प्रकार प्रीतिपूर्वक क्रीड़ा करते हुए उन दोनों का समय बीत रहा था कि स्वयंप्रभ नाम का देव (श्रीमती का जीव) स्वर्ग से च्युत होकर उन दोनों के केशव नाम का पुत्र हुआ ।।145।।
“Thus, as they spent their time joyfully in each other’s company, a celestial being named Swayamprabha (the soul of Shrimati), having fallen from heaven, was born to them as their son, Keshava.”
श्लोक ( Shlok ) 146
बज्रजङ्गभवे यासौ श्रीमती तस्य बल्लभा। सेवास्य पुत्रतां याता संसृतिस्थितिरीदृशी ॥१४६॥
वज्रजंघ पर्याय में जो इसकी श्रीमती नाम की प्यारी स्त्री थी वही इस भव में इसका पुत्र हआ है । क्या कहा जाये ? संसार की स्थिति ही ऐसी है ।।146।।
“The beloved wife named Shrimati, who was his consort in his Vajrajangha incarnation, has become his son in this life. What can be said? Such is the nature of the world.”
श्लोक ( Shlok ) 147
तस्मिन् पुत्रे नृपस्यास्य प्रोतिरासीद् गरीयसी । पुत्रमात्रं च संप्रीत्यै किमु तेष्टा ङ्गनाचरः ॥ १४७॥
उस पुत्र पर सुविधि राजा का भारी प्रेम था सों ठीक ही है । जब कि पुत्र मात्र ही प्रीति के लिए होता है तब यदि पूर्वभव का प्रेमपात्र स्त्री का जीव ही आकर पुत्र उत्पन्न हुआ हो तो फिर कहना ही क्या है उस पर तो सबसे अधिक प्रेम होता ही है ।।147।।
“The great love that King Suvidhi had for his son was only natural. After all, a son is always an object of affection. But when the soul of a beloved wife from a past life is reborn as a son, the love for him is bound to be even greater.”
श्लोक ( Shlok ) 148
शार्दूलार्यचराद्याश्च देशेऽत्रेव नृपात्मजाः । जाताः समानपुण्यत्वा दन्योऽन्य सदृशर्द्ध यः ॥१४८॥
सिंह, नकुल, वानर और शूकर के जीव जो कि भोगभूमि के बाद द्वितीय स्वर्ग में देव हुए थे वे भी वहाँ से चय कर इसी वत्सकावती देश में सुविधि के समान पुण्याधिकारी होने से उसी के समान विभूति के धारक राजपुत्र हुए ।।148।।
“The souls of a lion, a mongoose, a monkey, and a boar, who had become celestial beings in the second heaven after experiencing the Bhogabhumi (land of enjoyment), also descended from there and were reborn as royal princes in the land of Vatsakavati. Due to their meritorious deeds, they possessed glory similar to that of Suvidhi.”
श्लोक ( Shlok ) 149
विभीषणनृपात् पुत्रः प्रियदत्तोदरेऽजनि । देवश्चित्राङ्गदश्च्युत्वा वरदत्ताह्वयो दिवः ॥१४९॥
सिंह का जीव―चित्रांगद देव स्वर्ग से च्युत होकर विभीषण राजा से उसकी प्रियदत्ता नाम की पत्नी के उदर में वरदत्त नाम का पुत्र हुआ ।।149।।
“The soul of the lion, Chitrangad Deva, having fallen from heaven, was born as Varadatta, the son of King Vibhishan and his wife Priyadatta.”
श्लोक ( Shlok ) 150
नन्दिषेणनृपानन्तमत्योः सूनुरजायत । मणिकुण्डलनामासौं वरसेनसमाह्वयः ॥ १५०॥
शूकर का जीव―मणिकुंडल नाम का देव नंदिषेण राजा और अनंतमती रानी के वरसेन नाम का पुत्र हुआ ।।150।।
“The soul of the boar, who was the celestial being Manikundala, was born as Varasena, the son of King Nandishena and Queen Anantamati.”
श्लोक ( Shlok ) 151
“रतिषेणमहीभर्तुश्चन्द्रमत्यां सुतोऽजनि । मनोहरो दिवश्च्युत्वा चित्राङ्गदसमाख्यया ॥१५१॥
वानर का जीव―मनोहर नाम का देव स्वर्ग से च्युत होकर रतिषेण राजा की चंद्रमती रानी के चित्रांगद नाम का पुत्र हुआ ।।151।।
“The soul of the monkey, who was the celestial being Manohara, having fallen from heaven, was born as Chitrangada, the son of King Ratisena and Queen Chandramati.”
श्लोक 152 से 161
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141