आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 |
श्लोक 192 से 201 विषयों का दुःखदायी स्वरूप
विषय संग्रह, रक्षा, नाश से दुःख होता है। ये अतृप्तिकर, विनाशी हैं। ईंधन अग्नि, नदियाँ समुद्र, खारा जल प्यास नहीं मिटाते—विषय भी तृष्णा बढ़ाते हैं। हाथी, मछली, भौंरा, पतंग विषय लालसा से दुःख पाते हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 11 – Shlok 192 to 201
श्लोक ( Shlok ) 192
विषयानर्जयन्नेव तावद्दुःखं महद् भवेत् । तद्रक्षाचिन्तने भूयो भवेदत्यन्तमार्तधीः ॥१९२॥
प्रथम तो यह जीव विषयों के इकट्ठे करने में बड़े भारी दुःख को प्राप्त होता है और फिर इकट्ठे हो चुकने पर उनकी रक्षा की चिंता करता हुआ अत्यंत दुःखी होता है ।।192।।
“First, a being undergoes immense suffering in the pursuit of accumulating sensual pleasures. Then, after acquiring them, they become deeply distressed with the worry of safeguarding them.”
श्लोक ( Shlok ) 193
तद् वियोगे पुनर्दुःखमपारं परिवर्त्तते । पूर्वानुभूतविषयान् स्मृत्वा स्मृत्वावसीदतः ॥१९३॥
तदनंतर इन विषयों के नष्ट हो जाने से अपार दुःख होता है क्योंकि पहले भोगे हुए विषयों का बार-बार स्मरण करके यह प्राणी बहुत ही दुःखी होता है ।।193।।
“Thereafter, when these sensual pleasures are lost, immense suffering arises. This is because the being repeatedly recalls the pleasures once experienced and becomes deeply distressed.”
श्लोक ( Shlok ) 194
अनाशितं भवानेतान् विषयान् धिगपयायिनः । येषामासेवनं जन्तोर्न संतापोपशान्तये ॥१९४॥
जो अतृप्तिकर हैं, विनाशशील हैं और जिनका सेवन जीवों के संताप को दूर नहीं कर सकता ऐसे इन विषयों को धिक्कार है ।।194।।
“Condemn these sensual pleasures, which are unsatisfying, perishable, and incapable of alleviating the suffering of beings.”
श्लोक ( Shlok ) 195
वह्निरिवेन्धनैः सिन्धोः स्रोतोभिरिव सारितैः । न जातु विषयैर्जन्तोरुपभुक्तैर्वितृष्णता ॥१९५॥
जिस प्रकार ईधन से अग्नि की तृष्णा नहीं मिटती और नदियों के पूर से समुद्र की तृष्णा दूर नहीं होती उसी प्रकार भोगे हुए विषयों से कभी जीवों की तृष्णा दूर नहीं होती ।।195।।
“Just as fire is never satisfied with fuel and the ocean is never filled by the rivers, similarly, the craving of beings is never quenched by indulging in sensual pleasures.”
श्लोक ( Shlok ) 196
क्षारमम्बु यथा पीत्वा तृष्यत्यतितरां नरः । तथा विषयसंभोगैः परं संतर्षमृच्छति ॥ १९६॥
जिस प्रकार मनुष्य खारा पानी पीकर और भी अधिक प्यासा हो जाता है उसी प्रकार यह जीव, विषयों के संभोग से और भी अधिक तृष्णा को प्राप्त हो जाता है ।।196।।
“Just as a person becomes even thirstier after drinking salty water, similarly, a being’s craving only increases after indulging in sensual pleasures.”
श्लोक ( Shlok ) 197
अहो विषयिणां व्यापत्पञ्चेन्द्रियवशात्मनाम् । विषयामिषगृध्नूनामचिन्त्यं दुःखमापुषाम् ॥१९७॥
अहो, जिनकी आत्मा पंचेंद्रियों के विषयों के अधीन हो रही है जो विषयरूपी मांस की तीव्र लालसा रखते हैं और जो अचिंत्य दुःख को प्राप्त हो रहे हैं ऐसे विषयी जीवों को बड़ा भारी दुःख है ।।197।।
“Alas! Great is the suffering of those beings whose souls are enslaved by the senses, who intensely crave the flesh of sensual pleasures, and who inevitably fall into unfathomable misery.”
श्लोक ( Shlok ) 198
वने वनगजा स्तुङ्गा यूथपाः प्रोन्मदिष्णवः । अवपातेषु सोदन्ति करिणीस्पर्शमोहिताः ॥१९८॥
वनों में बड़े-बड़े जंगली हाथी जो कि अपने झुंड के अधिपति होते हैं और अत्यंत मदोन्मत्त होते हैं वे भी हथिनी के स्पर्श से मोहित होकर गड्ढों में गिरकर दुःखी होते हैं ।।198।।
“In the forests, mighty wild elephants, who are the leaders of their herds and highly intoxicated with pride, also become enchanted by the touch of a female elephant and fall into pits, suffering in distress.”
श्लोक ( Shlok ) 199
सरन् सरसि संफुल्लकह्नारस्वादुवारिणि । मत्स्यो वडिशमांसार्थी “जीवनाशं प्रणश्यति ॥१९९॥
जिसका जल फूले हुए कमलों से अत्यंत स्वादिष्ट हो रहा है ऐसे तालाब में अपने इच्छानुसार विहार करने वाली मछली वंशी में लगे हुए मांस की अभिलाषा से प्राण खो बैठती है―वंशी में फँसकर मर जाती है ।।199।।
“A fish, freely swimming in a pond filled with blooming lotuses and enjoying its sweet waters, loses its life due to its desire for the flesh attached to the fishing hook—it gets trapped and dies.”
श्लोक ( Shlok ) 200
मधुव्रतो सदामोदमाजिघ्रन् मददन्तिनाम् । मृत्युमाह्वयते गुञ्जन् कर्णतालाभिताडनैः ॥२००॥
मदोन्मत्त हाथियों के मद की वास ग्रहण करने वाला भौंरा गुंजार करता हुआ उन हाथियों के कर्णरूपी बीजनों के प्रहार से मृत्यु का आह्वान करता है ।।200।।
“The bumblebee, intoxicated by the scent of the musth of wild elephants, hums around them, only to invite its own death by the strikes of their ear-fan-like flaps.”
श्लोक ( Shlok ) 201
पतङ्गः पवनालोलदीपार्चिषि पतन् मुहुः । मृत्युमिच्छत्यनिच्छोऽपि मषिसाद्भू तविग्रहः ॥२०१॥
पतंग वायु से हिलती हुई दीपक की शिखा पर बार-बार पड़ता है जिससे उसके शरीर स्याही के समान काला हो जाता है और वह इच्छा न रखता हुआ भी मृत्यु को प्राप्त हो जाता है ।।201।।
“The moth, drawn repeatedly to the flickering flame of the lamp, darkens like ink and, despite its will, meets its demise.”
श्लोक 202 से 211
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318 आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 |