आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71
श्लोक 72 से 81 अयोध्या नगरी की रचना
देवों ने अयोध्या बनाई, जो स्वर्गपुरी समान थी। मनुष्यों को बसाया, राजमहल बनाया। यह वप्र, प्राकार, परिखा से युक्त थी। इसके नाम—साकेत, सुकोशला, विनीता—गुणों से सार्थक थे। नाभिराज-मरुदेवी ने निवास शुरू किया।
English translation of Ādi purāṇa parv 12 – Shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
स्वस्वर्गस्त्रिदशा वासः स्वल्प इत्यवमत्य तम् । परश्शतजनावासभूमिकां तां नु ते व्यधुः ॥७२॥
‘हमारा स्वर्ग बहुत ही छोटा है क्योंकि यह त्रिदशावास है अर्थात् सिर्फ त्रिदश=तीस व्यक्तियों के रहने योग्य स्थान है (पक्ष में त्रिदश=देवों के रहने योग्य स्थान है)’ ―ऐसा मानकर ही मानो उन्होंने सैकड़ों हजारों मनुष्यों के रहने योग्य उस नगरी (विस्तृत स्वर्ग) की रचना की थी ।।72।।
Believing that their own heaven was too small—being merely the abode of the thirty (Tridasha) or the gods—they seemed to have created that vast city as an expansive heaven, capable of housing hundreds of thousands of humans.
श्लोक ( Shlok ) 73
इतस्ततश्च विक्षिप्तानानीयानीय मानवान् । पुरीं निवेशयामासुर्विन्यासैर्विविधैः सुराः ॥७३॥
उस समय जो मनुष्य जहाँ-तहाँ बिखरे हुए रहते थे, देवों ने उन सबको लाकर उस नगरी में बसाया और सबके सुभीते के लिए अनेक प्रकार के उपयोगी स्थानों की रचना की ।।73।।
At that time, the gods gathered all the scattered humans and settled them in that city, creating various essential and useful places for their convenience.
श्लोक ( Shlok ) 74
नरेन्द्रभवनं चास्याः सुरैर्मध्ये निवेशितम् । सुरेन्द्रभवन स्पर्द्धिपराद्धर्या विभवान्वितम् ॥७४॥
उस नगरी के मध्य भाग में देवों ने राजमहल बनाया था वह राजमहल इंद्रपुरी के साथ स्पर्धा करने वाला था और बहुमूल्य अनेक विभूतियों से सहित था ।।74।।
In the heart of that city, the gods built a royal palace that rivaled Indra’s celestial abode, adorned with countless priceless treasures and splendors.
श्लोक ( Shlok ) 75
सुत्रामा सूत्रधारोऽस्याः शिल्पिनः कल्पजाः सुराः । “वास्तुजातं मही कृत्स्ना सोद्धा नास्तु कथं पुरी ॥७५॥
जबकि उस नगरी की रचना करनेवाले कारीगर स्वर्ग के देव थे उनका अधिकारी सूत्रधार (मेंट) इंद्र था और मकान वगैरह बनाने के लिए संपूर्ण पृथ्वी पड़ी थी तब वह नगरी प्रशंसनीय क्यों न हो ? ।।75।।
When the architects of that city were celestial gods, its chief overseer was Indra himself, and the entire earth was available for construction—how could that city be anything less than magnificent and praiseworthy?
श्लोक ( Shlok ) 76
संचस्करुश्च तां वप्रप्राकारपरिखादिभिः । अयोध्यां न परं नाम्ना गुणेनाप्यरिभिः सुराः ॥७६॥
देवों ने उस नगरी को वप्र (धूलि के बने हुए छोटे कोट), प्राकार (चार मुख्य दरवाजों से सहित, पत्थर के बने हुए मजबूत कोट) और परिखा आदि से सुशोभित किया था । उस नगरी का नाम अयोध्या था । वह केवल नाममात्र से अयोध्या नहीं थी किंतु गुणों से भी अयोध्या थी । कोई भी शत्रु उससे युद्ध नहीं कर सकते थे इसलिए उसका वह नाम सार्थक था [अरिभिः योद्धं न शक्या―अयोध्या] ।।76।।
That city was named Ayodhya, and it was not just Ayodhya in name but also in its very essence. No enemy could wage war against it, thus making its name truly meaningful—“Ayodhya”, which means “unconquerable” (अरिभिः योद्धुं न शक्या—अयोध्या).
श्लोक ( Shlok ) 77
“साकेतरूडिरप्यस्याः श्लाघ्यैव ‘स्वैर्निकेतनैः । स्वर्निकेतमिवाह्वातुं “साकूतैः केतुबाहुभिः ॥७७॥
उस नगरी का दूसरा नाम साकेत भी था क्योंकि वह अपने अच्छे-अच्छे मकानों से बड़ी ही प्रशंसनीय थी । उन मकानों पर पताकाएँ फहरा रही थीं जिससे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो स्वर्गलोक के मकानों को बुलाने के लिए अपनी पताकारूपी भुजाओं के द्वारा संकेत ही कर रहे हों । [आकेतैः गुहैः सह वर्तमाना=साकेता, ‘स+आकेता’―घरों से सहित] ।।77।।
That city was also known as Saket because it was highly praiseworthy for its splendid mansions. Flags fluttered atop these buildings, making them appear as if they were signaling to the celestial abodes—beckoning the homes of heaven with their banner-like arms.
(Saketa derives from “S + Aketā”, meaning “a city filled with grand houses”, or “Sāketa”, existing alongside divine dwellings.)The gods adorned that city with vapra (earthen ramparts), prakara (strong stone fortifications with four grand gates), and deep moats, making it an impregnable stronghold.
श्लोक ( Shlok ) 78
सुकोशलेति च ख्यातिं सा देशाभिख्यया गता । विनीतजनताकीर्णा विनीतेति च सा मता ॥७८
वह नगरी सुकोशल देश में थी इसलिए देश के नाम से ‘सुकोशला’ इस प्रसिद्धि को भी प्राप्त हुई थी । तथा वह नगरी अनेक विनीत-शिक्षित-पढ़े-लिखे विनयवान् या सभ्य मनुष्यों से व्याप्त थी इसलिए वह ‘विनीता’ भी मानी गयी थी―उसका एक नाम ‘विनीता’ भी था ।।78।।
That city was situated in the land of Sukosala, and thus, it became renowned by the same name, “Sukoshala”.
Moreover, as it was inhabited by numerous well-mannered, educated, and cultured individuals, it was also known as “Vinita”, signifying a city filled with humility, wisdom, and civility.
श्लोक ( Shlok ) 79
बभौ सुकोशला भाविविषयस्यालघीयसः । नाभिलक्ष्मीं दधानासो राजधानी सुविश्रुता ॥७९॥
वह सुकोशला नाम की राजधानी अत्यंत प्रसिद्ध थी और आगे होने वाले बड़े भारी देश की नाभि (मध्यभाग की) शोभा धारण करती हुई सुशोभित होती थी ।।79।।
The renowned capital, Sukoshala, shone brilliantly as the central jewel of the vast and prosperous land that was to flourish in the future, serving as its very navel (central hub) of grandeur and splendor.
श्लोक ( Shlok ) 80
सनृपालयमुद्वप्रं दीप्रशालं सखातिकम् । तद्वर्त्स्यन्नगरारम्भे प्रतिच्छन्दायितं पुरम् ।।८०।।
राजभवन, वप्र, कोट और खाई से सहित वह नगर ऐसा जान पड़ता था मानो आगे―कर्मभूमि के समय में होने वाले नगरों की रचना प्रारंभ करने के लिए एक प्रतिबिंब―नकशा ही बनाया गया हो ।।80।।
The city, complete with its royal palace, ramparts, fortifications, and moat, appeared as if it were a blueprint—a model reflection—for the grand cities that would later be built in the Karmabhumi (the land of human endeavor) in the ages to come.
श्लोक ( Shlok ) 81
पुण्येऽहनि मुहूर्त्ते च शुभयोगे शुभोदये । पुण्याहघोषणां तत्र सुराश्चक्रुः प्रमोदिनः ॥८१॥
अनंतर उस अयोध्या नगरी में सब देवों ने मिलकर किसी शुभ दिन, शुभ मुहूर्त, शुभ योग और शुभ लग्न में हर्षित होकर पुण्याहवाचन किया ।।81।।
Thereafter, in the city of Ayodhya, all the gods joyfully gathered and, on an auspicious day, at an auspicious moment, under a favorable celestial alignment and auspicious ascendant, performed the Punyahavachana (a sacred ritual for invoking blessings and purity).
श्लोक 82 से 91
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318 आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71