भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
श्लोक 32 से 41 वज्रनाभि की विद्या और राज्याभिषेक
वज्रनाभि ने शास्त्र और राजविद्या सीखी। लक्ष्मी-सरस्वती उस पर प्रेम करती थीं। वज्रसेन ने उसे राज्य सौंपा। पट्टबंध में वह सिंहासन पर बैठा, चमर ढुलते थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 11 – Shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok ) 32
तथापि यौवनारम्भे मदनज्वरकोपिनि । नास्याजनि मदः कोऽपि स्वभ्यस्तश्रुतसंपदः ॥३२॥
उसने शास्त्ररूपी संपत्ति का अच्छी तरह अभ्यास किया था इसलिए कामज्वर का प्रकोप बढ़ाने वाले यौवन के प्रारंभ समय में भी उसे कोई मद उत्पन्न नहीं हुआ था ।।32।।
Having thoroughly studied the wealth of scriptures, he remained unaffected by arrogance, even at the onset of youth—a time that typically intensifies the fever of desire. ( 32)
श्लोक ( Shlok ) 33
सोऽधीते स्म त्रिवर्गार्थसाधनीर्विपुलोदयाः । समन्त्रा राजविद्यास्ता लक्ष्म्याकर्षविधौ क्षमाः ॥३३॥
जो धर्म, अर्थ, काम इन तीनों पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली है, जो बड़े-बड़े फलों को देने वाली हैं और जो लक्ष्मी का आकर्षण करने में समर्थ हैं ऐसी मंत्रसहित समस्त राजविद्या उसने पढ़ ली थीं ।।33।।
He had mastered all the royal sciences along with their mantras—sciences that fulfill the three pursuits of life (Dharma, Artha, and Kama), yield great rewards, and possess the power to attract Goddess Lakshmi. ( 33)
श्लोक ( Shlok ) 34
तस्मिंल्लक्ष्मीसरस्वत्योरतिवाल्लभ्यमाश्रिते ।ईर्ष्य येवाभजत् कीर्तिदिगन्तान् विधुनिर्मला ॥३४
उस पर लक्ष्मी और सरस्वती दोनों ही अतिशय प्रेम रखती थीं इसलिए चंद्रमा के समान निर्मल कीर्ति मानो उन दोनो की ईर्ष्या से ही दशों दिशाओं के अंत तक भाग गयी थीं ।।34।।
Both Goddess Lakshmi and Goddess Saraswati held immense affection for him. As a result, his pristine fame, like the moon, spread to the ends of all ten directions—almost as if driven by their rivalry. (34)
श्लोक ( Shlok ) 35
नूनं तद्गुणसंख्यानं वेधसा संविधिस्तुना । शकाका स्थापिता व्योम्नि तारकानिकर च्छलात् ॥३५
मालूम होता है कि ब्रह्मा ने उसके गुणों की संख्या करने की इच्छा से ही आकाश में ताराओं के समूह के छल से अनेक रेखाएँ बनायी थीं ।।35।।
It seems that Brahma, wishing to count his virtues, playfully created numerous lines in the sky through the illusion of clustered stars. ( 35)
श्लोक ( Shlok ) 36
तस्य सद्रूपमाहाय सा विश्धा तच्च यौवनम् । जनानावर्जयन्ति स्म गुणैरावर्ज्यते न कः ॥३६॥
उसका वह मनोहर रूप, वह विद्या और वह यौवन, सभी कुछ लोगों को वशीभूत कर लेते थे, सो ठीक ही है । गुणों से कौन वशीभूत नहीं होता ।।36।।
His enchanting form, vast knowledge, and youthful charm naturally captivated everyone. And rightly so—who does not become enthralled by virtues? ( 36)
श्लोक ( Shlok ) 37
गुणैरस्यैव शेषाश्च कुमाराः कृतवर्णनाः । ननु चन्द्रगुणानंशैः भजत्यडुगणोऽप्ययम् ॥ ३७॥
यहाँ जो वज्रनाभि के गुणों का वर्णन किया है उसी से अन्य राजकुमारों का भी वर्णन समझ लेना चाहिए । क्योंकि जिस प्रकार तारागण कुछ अंशों में चंद्रमा के गुणों को धारण करते हैं उसी प्रकार वे शेष राजकुमार भी कुछ अंशों में वज्रनाभि के गुण धारण करते थे ।।37।।
The qualities described here for Vajranabhi should be understood as applying to the other princes as well. Just as the stars reflect some of the moon’s radiance, in the same way, the other princes possessed some portion of Vajranabhi’s virtues. ( 37)
श्लोक ( Shlok ) 38
ततोऽस्य योग्यतां मत्वा वज्रसेनमहाप्रभुः । राज्यलक्ष्मीं समग्रां स्वामस्मिन्नेव न्ययोजयत् ॥३८
तदनंतर, इसकी योग्यता जानकर वज्रसेन महाराज ने अपनी संपूर्ण राज्यलक्ष्मी इसे ही सौंप दी ।।38।।
Thereafter, recognizing his worthiness, King Vajrasena entrusted his entire royal wealth and sovereignty to him. ( 38)
श्लोक ( Shlok ) 39
“नृपोऽभिषेकमस्योच्चैः स्वसमक्षमकारयत् । पट्टवन्धं च सामात्यैः नृपै र्मंकुटधारिभिः ॥३९॥
राजा ने अपने ही सामने बड़े ठाटबाट से इसका राज्याभिषेक कराया तथा मंत्री और मुकुटबद्ध राजाओं के द्वारा उसका पट्टबंध कराया ।।39।।
In his own presence, the king grandly performed his coronation and had his enthronement ceremony conducted by ministers and crown-bearing kings. ( 39)
श्लोक ( Shlok ) 40
नृपासनस्थमेनं च वीजयन्ति स्म चामरैः । गङ्गातरङ्ग सच्छायैः भङ्गिभिर्ललिताङ्गनाः ।॥४०॥
पट्टबंध के समय वह राजसिंहासन पर बैठा हुआ था और अनेक सुंदर स्त्रियां गंगा नदी के तरंगों के समान निर्मल चमर ढोर रही थी ।।40।।
During the enthronement ceremony, as he sat on the royal throne, numerous beautiful women waved pristine white chamars (fans), resembling the pure waves of the Ganga River. ( 40)
श्लोक ( Shlok ) 41
धुन्नावानाश्चामराण्यस्य ता ममोत्प्रेक्षते मनः । जनापवादजं लक्ष्म्या रजोऽ पासितुमुद्यताः ॥४१॥
चमर ढोरती हुई उन स्त्रियों को देखकर मेरा मन यही उत्प्रेक्षा करता है कि वे मानो राज्यलक्ष्मी के संसर्ग से वज्रनाभि पर पड़ने वाली लोकापवादरूपी धूलि को ही दूर करने के लिए उद्यत हुई हों ।।41।।
Seeing those women waving the chamars, my mind imagines that they were not merely fanning him but were rather eager to sweep away the dust of public criticism that might arise from his association with royal fortune. ( 41)
श्लोक 42 से 51
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31