भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161
श्लोक 162 से 171 साधुओं की महिमा
वज्रजंघ ने सोचा कि साधु समागम पाप नष्ट करता, कल्याण बढ़ाता है। वे परोपकारी, निःस्वार्थ, और यति हैं। प्रीतिंकर ने अपार प्रीति दिखाई।
English translation of Ādi purāṇa parv 9- Shlok 162 to 171
श्लोक ( Shlok ) 162
साधवो मुक्तिमार्गस्य साधनेऽर्पिंतधीधनाः । ‘लोकानुवृतिसाध्यांशो नैषां कश्चन पुष्कलः ।।१६२।।
ये साधु पुरुष मोक्षमार्ग को सिद्ध करने में सदा दत्तचित्त रहते हैं । इन्हें सांसारिक लोगों को प्रसन्न करने का कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता ।।162।।
“These virtuous sages are always devoted to perfecting the path of liberation. They have no interest in pleasing worldly people.”
श्लोक ( Shlok ) 163
परानुग्रहबुद्धया तु केवलं मार्गदेशनाम् । कुर्वतेऽमी प्रगत्यापि निसर्गौऽयं महात्मनाम् ।।१६३।।
ये मुनिजन केवल परोपकार करने की बुद्धि से ही उनके पास जा-जाकर मोक्षमार्ग का उपदेश दिया करते हैं । वास्तव में यह महापुरुषों का स्वभाव ही है ।।163।।
“These sages approach others solely with the intention of benevolence, imparting teachings on the path of liberation. Indeed, this is the very nature of great souls.”
श्लोक ( Shlok ) 164
स्वदुःखे निर्घृणारम्भाः परदुःखेषु दुःखिताः । निर्व्यपेक्षं परार्थेषु बध्दकक्ष्या मुमुक्षवः ।।१६४।।
मोक्ष की इच्छा करने वाले ये साधुजन अपने दुःख दूर करने के लिए सदा निर्दय रहते हैं अर्थात् अपने दुःख दूर करने के लिए किसी प्रकार का कोई आरंभ नहीं करते । पर के दुःखों में सदा दुःखी रहते हैं अर्थात् उनके दुःख दूर करने के लिए सदा तत्पर रहते हैं । और दूसरों के कार्य सिद्ध करने के लिए निःस्वार्थ भाव से सदा तैयार रहते हैं ।।164।।
“These sages, desiring liberation, remain indifferent to their own suffering, never making any effort to alleviate it. However, they are always compassionate toward the sufferings of others and ever ready to help alleviate them. They selflessly remain prepared to accomplish the tasks of others.”
श्लोक ( Shlok ) 165
क्व वयं निस्पृहाः क्वेमे क्वेयं भूमिः सुखोचिता । तथाप्यनुप्रहेऽस्माकं सावधानास्तपोधनाः ॥१६५॥
कहाँ हम और कहाँ ये अत्यंत निःस्पृह साधु ? और कहाँ यह मात्र सुखों का स्थान भोगभूमि अर्थात् निःस्पृह मुनियों का भोगभूमि में जाकर वहाँ के मनुष्यों को उपदेश देना सहज कार्य नहीं है तथापि ये तपस्वी हम लोगों के उपकार में कैसे सावधान हैं ? ।।165।।
“How insignificant are we compared to these extremely detached sages! And how unlikely it is for such dispassionate ascetics to come to a land solely dedicated to pleasures (Bhogabhoomi) and give teachings to its people. Yet, how diligently these ascetics remain devoted to our welfare!”
श्लोक ( Shlok ) 166
भवन्तु सुखिनः सर्वे सत्त्वा इत्येव केवलम् । यतो यतन्ते तेनैैषां यतित्वं सन्निरुच्यते ।।१६६।।
ये साधुजन सदा यही प्रयत्न किया करते हैं कि संसार के समस्त जीव सदा सुखी रहें और इसीलिए वे यति (यतते इति यति) कहलाते हैं ।।166।।
“These sages constantly strive for the well-being of all living beings, and for this reason, they are called ‘Yati’ (those who exert effort).”
श्लोक ( Shlok ) 167
एवं नाम महीयांसः परार्थे कुर्वते रतिम् । दूरादपि समागत्य यथैतौ चारणावुभौ ।॥१६७॥
जिस प्रकार इन चारण ऋद्धिधारी पुरुषों ने दूर से आकर हम लोगों का उपकार किया उसी प्रकार महापुरुष दूसरों का उपकार करने में सदा प्रीति रखते हैं ।।167।।
“Just as these Charan Riddhidhari beings have come from afar to help us, similarly, great souls are always eager to help others.”
श्लोक ( Shlok ) 168
अद्यापि चारणौ साक्षात् पश्यामीव पुरः स्थितौ । तपस्तनूनपात्तापतनूकृततनू मुनी ।।१६८
तपरूपी अग्नि के संताप से जिनका शरीर अत्यंत कृश हो गया है ऐसे उन चारण मुनियों को मैं अब भी साक्षात् देख रहा हूँ, मानो वे अब भी मेरे सामने ही खड़े हैं ।।168।।
“I still see those Charan Munis, whose bodies have become extremely emaciated due to the torment of the fire of austerity, as if they are still standing right before me.”
श्लोक ( Shlok ) 169
चारणौ चरणद्वन्द्वे प्रणतं मृदुपाणिना । स्पृशन्तौ स्नेहनिघ्नं मां व्यधातामधिमस्तकम् ।।१६९॥
मैं उनके चरण-कमलों में प्रणाम कर रहा हूँ और वे दोनों चारणमुनि कोमल हाथ से मस्तक पर स्पर्श करते हुए मुझे स्नेह के वशीभूत कर रहे हैं ।।169।।
“I bow at their lotus feet, and those two Charan Munis, with their gentle hands, touch my forehead, overwhelming me with affection.”
श्लोक ( Shlok ) 170
अपिप्यतां च मां धर्मतृषितं दर्शनामृतम् । अपास्य भोगसंतापं निर्वृतं येन मे मनः ॥१७०॥
मुझ, धर्म के प्यासे मानव को उन्होंने सम्यग्दर्शनरूपी अमृत पिलाया है, इसीलिए मेरा मन भोगजन्य संताप को छोड़कर अत्यंत प्रसन्न हो रहा है ।।170।।
“These two sages have given me, a soul thirsty for Dharma, the nectar of right perception. For this reason, my mind, free from the pain caused by worldly pleasures, is filled with immense joy.”
श्लोक ( Shlok ) 171
सत्यं प्रीतिंकरो ज्यायान् मुनिर्योंऽस्मास्वदर्शयत् । प्रीति सर्वत्र “गप्रीतिः सन्मार्गप्रतिबोधनात् ॥१७१॥
वे प्रीतिंकर नाम के ज्येष्ठ मुनि सचमुच में प्रीतिंकर हैं क्योंकि उनकी प्रीति सर्वत्र गामी है और मार्ग का उपदेश देकर उन्होंने हम लोगों पर अपार प्रेम दर्शाया है । भावार्थ―जो, मनुष्य सब जगह जाने की सामर्थ्य होने पर भी किसी खास जगह किसी खास व्यक्ति के पास जाकर उसे उपदेश आदि देवे तो उससे उसकी अपार प्रीति का पता चलता है । यहाँ पर भी उन मुनियों में चारण ऋद्धि होने से सब जगह जाने की सामर्थ्य थी परंतु उस समय अन्य जगह न जाकर वे वज्रजंघ के जीव के पास पहुँचे इससे उसके विषय में उनकी अपार प्रीति का पता चलता है ।।171।।
“The elder monk named Preetinkar is truly one of love, for his love is all-encompassing, and by giving the teachings of the path, he has shown immense affection for us. Meaning—When a person has the ability to go anywhere but chooses to visit a specific place or individual to impart teachings, it shows their profound love. Similarly, these monks had the ability to travel everywhere due to their Charan Siddhi, yet they chose not to go elsewhere but instead reached the soul of Vajrajangha, demonstrating their deep affection for him.”
श्लोक 172 से 181
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161