राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 174 | श्लोक 175 से 184 | श्लोक 185 से 193 | श्लोक 194 से 203
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 204 to 211
श्लोक ( Shlok ) 204
‘अथातो रामरूपेण परिवृत्तो दशाननः । सीतामित्वा पुरोधृत्वा प्रहितो हरिणो मया ॥ २०४ ॥
अथानन्तर-रावण रामचन्द्रजीका रूप रखकर सीताके पास आया और कहने लगा कि मैंने उस हरिणको पकड़कर आगे भेज दिया है ।। २०४ ।।
“Thereafter, Ravana assumed the exact form and appearance of Ramachandra, approached Sita, and said to her, ‘I have captured that deer and sent it ahead.'” (204)
श्लोक ( Shlok ) 205
रामंवारुणीदिक् प्रिये पश्य बिम्बमेषांशुमालिनः । सिन्दूरतिलकं न्यस्तं बिभ्रतीव विराजते ॥ २०५ ॥
हे प्रिये ! अब सन्ध्याकाल हो चला है। देखो, यह पश्चिम दिशा सूर्य-बिम्बको धारण करती हुई ऐसी सुशोभित हो रही है मानो सिन्दूरका तिलक ही लगाये हो ।॥ २०५ ॥
“O Beloved! The hour of twilight is now upon us. Behold, the western horizon, cradling the orb of the setting sun, appears as magnificent as a beautiful woman adorned with a vermilion (Sindoor) mark upon her forehead.” (205)
श्लोक ( Shlok ) 206
आरोह शिबिकां तस्मादाशु सुन्दरि बन्धुराम् । २ पुरीगमनकालोऽयं वर्तते सुखरात्रये ॥ २०६ ॥
इसलिए हे सुन्दरि ! अब शीघ्र ही सुन्दर पालकीपर सवार होओ, सुख-पूर्वक रात्रि बितानेके लिए यह नगरीमें वापिस जानेका समय है ॥ २०६ ॥
“Therefore, O beautiful one! Step into this exquisite palanquin without delay; it is time for us to return to the city so that we may spend the night in perfect comfort.” (206)
श्लोक ( Shlok ) 207
इत्यवादीरादाकर्ण्य सा मायाशिविकाकृति । विमानं पुष्पकं मोहादारुरोह धरासुता ॥ २०७ ॥
रावणने ऐसा कहा तथा पुष्पक विमानको मायासे पालकीके आकार बना दिया। सीता भ्रान्तिवश उसपर आरूढ़ हो गई ।। २०७ ।।
“Thus spoke Ravana, and through his illusory powers (Maya), he transformed the massive Pushpaka chariot into the shape of a modest palanquin. Caught completely in this web of delusion, Sita stepped onto it.” (207)
श्लोक ( Shlok ) 208
वा तुरगारूढमात्मनं स्म प्रदर्शयन् । महीगतमिव भ्रान्ति जनयन् दुहितुर्महेः ॥ २०८ ॥
सीताको व्यामोह उत्पन्न करते हुए रावण अपने आपको ऐसा दिखाया मानो घोड़ेपर सवार पृथिवीपर रामचन्द्रजी ही चल रहे हों ।॥ २०८ ॥
“Continuing to weave this web of delusion around Sita, Ravana projected an illusion of himself appearing exactly like Ramachandra, riding upon a horse and traveling alongside her on the ground.” (208)
श्लोक ( Shlok ) 209
तां भुजङ्गीमिवानैषीदुपायेन स्वमृत्यवे । पतिव्रताग्रगां पापी मायाचुचुर्दशाननः ॥ २०९ ॥
इस प्रकार मायाचारमें निपुण पापी रावण उपाय द्वारा पतिव्रताओंमें अग्रगामिनी-श्रेष्ठ सीताको सर्पिणीके समान अपनी मृत्युके लिए ले गया ।॥ २०९ ॥
“In this manner, the sinful Ravana, a master of deceit and illusory arts (Mayachar), deployed his cunning stratagem to carry away Sita—the crown jewel among chaste and faithful women (Pativratas). In doing so, he was merely bearing away his own ultimate destruction, as if carrying a lethal, venomous serpent (Sarpini) in his hands.” (209)
श्लोक ( Shlok ) 210 – 211
क्रमालङ्कामवाप्यैनामवतार्य वनान्तरे । सद्यो मायां निराकृत्य ज्ञापितानयनक्रमम् ॥ २१० ॥इन्द्रनीलच्छवि देहं गूढार्थं शिष्यसन्ततेः । आचार्यो वा स तस्याः स्वं सुचिरात्समदर्शयत् ॥ २११ ॥
क्रम क्रमसे लङ्का पहुँचकर उसने सीताको एक बनके बीच उतारा और शीघ्र ही मायादूरकर उसके लानेका क्रम सूचित किया। जिस प्रकार कोई आचार्य अपनी शिष्य-परम्पराके लिए किसी गूढ़ अर्थको बहुत देर बाद प्रकट करता है उसी प्रकार उसने इन्द्रनील मणिके समान कान्ति वाला अपना शरीर बहुत देर बाद सीताको दिखलाया ।। २१०-२११ ।।
“Reaching Lanka in due course, Ravana lowered Sita into the heart of a forest and swiftly dissolved his illusions, revealing the true nature of her abduction. Just as a preceptor (Acharya) reveals a profound, hidden meaning to his lineage of disciples only after a long delay, Ravana—after a great length of time—finally manifested his true form, possessing a body as radiant as a dark sapphire (Indraneel Mani), before Sita’s very eyes.” (210-211)
श्लोक 212 से 221
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राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 174 | श्लोक 175 से 184 | श्लोक 185 से 193 | श्लोक 194 से 203
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