आलोचना-पाठ : अर्थ एवं व्याख्या
अपने जैन धर्म में पाप के त्याग करने की, पाप को छोड़ने के लिए अनेक उपाय बताए गए हैं। यदि भूतकाल में पाप किए हों तो उनके निषेध के लिए प्रतिक्रमण , वर्तमान में पाप किए हों तो उनके निषेध के लिए आलोचना, और भविष्य में जो पाप होने की संभावना है , उनके त्याग के लिए प्रत्याख्यान की चर्चा है। तीनों काल के पापों के त्याग करने के लिए तीनों प्रकार की व्यवस्थाएँ अपने पास हैं, जिससे हम पाप से बच सकें।
श्री जौहरीलालजी कृत यह पाठ श्रावक-श्राविकाओं द्वारा अपने दोषों (पापों) की स्वीकृति और शुद्धि हेतु भगवान (जिन) के समक्ष विनम्रतापूर्वक निवेदन के रूप में पढ़ा जाता है।
- आलोचना का स्वरूप: आलोचना का अर्थ है—अपने द्वारा वर्तमान में (दैनिक जीवन में) किए गए दोषों व पापों की निंदा करना, उनके प्रति खेद प्रकट करना और सच्चे हृदय से भगवान के समक्ष क्षमा याचना करना।
- पारंपरिक महत्त्व: उत्तर भारत (हिंदी भाषी क्षेत्रों) में बहुत पुराने समय से घरों में बुजुर्गों (दादा-दादी, माता-पिता) द्वारा प्रतिदिन ‘आलोचना-पाठ’ बोलने की परंपरा रही है, ताकि दैनिक जीवन में जाने-अनजाने हुए पापों से निवृत्ति मिल सके।
- दिगंबर एवं श्वेतांबर परंपरा: आत्म-शुद्धि के लिए दिगंबर परंपरा में ‘आलोचना-पाठ’ का विशेष महत्त्व है और श्वेतांबर परंपरा में ‘प्रतिक्रमण’ का। ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य दोषों की निवृत्ति और भावों की निर्मलता है।
संसार में स्थित प्रत्येक जीव प्रतिसमय मन, वचन और काय (शरीर) के माध्यम से कुछ न कुछ चेष्टाएँ करता रहता है। यदि इन चेष्टाओं के दौरान हुई भूलों की आलोचना और उन त्रुटियों के प्रति क्षमा का भाव जीव के हृदय में नहीं है, तो वह संसारी जीव कभी भी कर्म-बंधनों से मुक्त नहीं हो पाएगा। इसलिए जीव को अपने अपराधों का बोध होना अत्यंत अनिवार्य है। अपने ही अपराधों के प्रक्षालन (शुद्धिकरण) के लिए ‘आलोचना पाठ’ एक अत्यंत सुंदर, सरल और उच्च भावों से परिपूर्ण माध्यम हमारे सामने उपस्थित है। आइए, इसके कुछ कठिन शब्दों का अर्थ समझते हुए इसके मूल मर्म का स्पर्श करें।
छंद 1 से 4 -अर्थ
वंदो पांचो परम – गुरु, चौबिसों जिनराज
करूँ शुद्ध आलोचना, शुद्धि करन के काज ॥1॥
सुनिए जिन अरज हमारी, हम दोष किये अति भारी
तिनकी अब निवृति काजा, तुम शरण लही जिनराजा ॥2॥
इक बे ते चउ इंद्री वा, मनरहित सहित जे जीवा
तिनकी नहि करुणा धारी, निरदई हो घात विचारी ॥3॥
समरम्भ समारंभ आरम्भ, मन वच तन कीने प्रारम्भ
कृत कारित मोदन करिके, क्रोधादि चतुष्टय धरिके ॥4॥
छंद 5 से 7 – अर्थ
शत आठ जु इमि भेदनतै, अघ कीने परिछेदन तै
तिनकी कहुं कोलो कहानी, तुम जानत केवलज्ञानी ॥5॥
विपरीत एकान्त विनय के, संशय अज्ञान कुनय के
वश होय घोर अघ कीने, वचतै नहि जाय कहीने ॥6॥
कुगुरुन की सेवा किनी, केवल अदया करि भीनी
या विधि मिथ्यात भ्रमायो, चहुँ गति मधि दोष उपायों ॥7॥
छंद 8 व 9 – अर्थ
हिंसा पुनि झूठ जु चोरी, पर वनिता सो द्रग जोरी
आरम्भ परिग्रह भीनो, पन पाप जु या विधि कीनो ॥8॥
सपरस रसना घ्रानन को, द्रग कान विषय सेवन को
बहु करम किये मनमाने, कछु न्याय अन्याय न जाने ॥9॥
छंद 10 व 11 – अर्थ
फल पञ्च उदम्बर खाये, मधु मांस मद्य चित चाये
नहि अष्ट मूलगुण धारे, सेये कुव्यसन दुखकारे ॥10॥
दुइबीस अभख जिन गाये, सो भी निशदिन भुंजाये
कछु भेदाभेद न पायो, ज्यो त्यों करि उदर भरायो ॥11॥
छंद 12 व 13 – अर्थ
अनन्तानुबन्धी सो जानो, प्रत्याख्यान अप्रत्याख्यानो
संज्वलन चौकड़ी गुनिये, सब भेद जु षोडश गुनिये ॥१२॥
परिहास अरति रति शोक, भय ग्लानि त्रिवेद संयोग
पनबीस जु भेद भये इम, इनके वश पाप किये हम ॥१३॥
छंद 14 व 15 – अर्थ
निद्रावश शयन कराई, सुपने मधि दोष लगाई
फिर जागी विषय वन धायो, नाना विध विष फल खायो ॥१४॥
आहार विहार निहारा, इनमे नहि जतन विचारा
बिन देखि धरी उठाई, बिन शोधी वस्तु जु खाई ॥१५॥
छंद 16 व 17 – अर्थ
तब ही परमाद सतायो, बहुविधि विकल्प उपजायो
कछु सुधि बुधि नाहि रही है, मिथ्यामति छाय गई हैं ॥१६॥
मरजादा तुम ढिग लीनी, ताहू में दोष जु कीनी
भिन भिन अब कैसे कहिये, तुम ज्ञान विषै सब पइये ॥१७॥
छंद 18 व 19 – अर्थ
हा हा ! मैं दुठ अपराधी, त्रस जीवन राशि विराधी
थावर की जतन न कीनी, उर में करुणा नहि लीनी ॥18॥
पृथिवी बहु खोद कराई, महलादिक जागाँ चिनाई
पुनि बिन गाल्यो जल ढोल्यो, पंखातैं पवन बिलोल्यो ॥19॥
छंद 20 व 21 – अर्थ
हा हा ! मैं अदयाचारी, बहु हरित काय जु विदारी
तामधि जीवन के खंदा, हम खाए धरी आनंदा ॥२०॥
हा हा ! परमाद बसाई, बिन देखे अगनि जलाई
तामध्य जीव जे आये, ते हू परलोक सिधाये ॥२१॥
छंद 22 व 23 – अर्थ
बीध्यो अन राति पिसायो, ईंधन बिन सोधि जलायो
झाड़ू ले जागाँ बुहारी, चींटी आदिक जीव बिदारी ॥२२॥
जल छानि जिवानी कीनी, सो हू पुनि डारि जु दीनी
नहिं जल थानक पहुँचाई, किरिया बिन पाप उपाई ॥२३॥
छंद 24 व 25 – अर्थ
जल मल मोरिन गिरवायो, क्रमि कुल बहु घात करायो
नदियन बिच चीर धुवाये, कोसन के जीव मराये ॥२४॥
अन्नादिक शोध कराई, तातें जु जीव निसराई
तिनका नहिं जतन कराया, गलियारे धूप डराया ॥२५॥
छंद 26 व 27 – अर्थ
पुनि द्रव्य कमावन काजै, बहु आरम्भ हिंसा साजै
किये तिसनावश अघ भारी, करुणा नहिं रंच विचारी ॥२६॥
इत्यादिक पाप अनन्ता, हम कीने श्री भगवंता
संतति चिरकाल उपाई, वाणी तै कहिय न जाई ॥२७॥
छंद 28 व 29 – अर्थ
ताको जु उदय अब आयो, नाना विध मोहि सतायो
फल भुंजत जिय दुःख पावै, वचतै कैसे करि गावै ॥२८॥
तुम जानत केवलज्ञानी, दुःख दूर करो शिवथानी
हम तो तुम शरण लहि है, जिन तारन विरद सही हैं ॥२९॥
छंद 30 व 31 – अर्थ
इक गाँवपति जो होवे, सो भी दुखिया दुःख खोवै
तुम तीन भुवन के स्वामी, दुःख मेटहु अंतरजामी ॥३०॥
द्रोपदी को चीर बढायो, सीता प्रति कमल रचायो
अंजन से किये अकामी, दुःख मेटो अंतरजामी ॥३१॥
छंद 32 व 33 – अर्थ
मेरे अवगुन न चितारो, प्रभु अपनों विरद सम्हारो
सब दोष रहित करि स्वामी, दुःख मेटहु अंतरजामी ॥३२॥
इन्द्रादिक पद नहिं चाहूँ, विषयनि में नाहिं लुभाऊँ
रागादिक दोष हरिजे, परमातम निज पद दीजे ॥३३॥
(दोहा)
आलोचना-पाठ – छंद 1 से 4 | छंद 5 से 7 | छंद 8 व 9 | छंद 10 व 11 | छंद 12 व 13
स्वाध्याय
आलोचना पाठ – छंद 1 से 4 पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)
आलोचना-पाठ – छंद 5 से 7 पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)
मेरी भावना – छंद 1 | छंद 2 | छंद 3 | छंद 4 | छंद 5 | छंद 6 | छंद 7 | छंद 8 | छंद 9 | छंद 10 | छंद 11