नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 363 से 372 | श्लोक 373 से 382 | श्लोक 383 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 413 | श्लोक 414 से 421 | श्लोक 422 से 431
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 432 to 441
श्लोक ( Shlok ) 432 – 437
धातकीखण्डप्राङ्मन्दरापरस्थविदेहगम् । नाम्नाशोकपुरं तत्र वास्तव्यो वणिजां वरः ॥४३२॥आनन्दस्तस्य भार्यायां जातानन्दयशःश्रुतिः । दत्वा जात्वमितायुक्तिसागराय तनुस्थितिम् ॥४३३॥आश्चर्यपञ्चकं प्राप्य तत्पुण्याज्जीवितावधौ । उदक्कुरुषु सम्भूय भुक्त्वा तत्र सुखं ततः ॥४३४॥भूत्वा भवनवासीन्द्रभार्येहास्मीति सम्मदात् । ततः कदाचित्सिद्धार्थवने सागरसञ्ज्ञकम् ॥४३५॥गुरुमाश्रित्य सम्भावितोपवासा भवावधौ । देवी जाताऽऽदिमे कल्पे तन्त्र निर्वर्तितस्थितिः ॥४३६॥द्वीपेऽस्मिन्नेव कौशाम्ब्यां सुमतिश्रेष्ठिनोऽभवत् । सुभद्रायां सुता धार्मिकीति संशब्दिता जनैः ॥४३७॥
धातकीखण्ड द्वीपके पूर्व मेरुसे पश्चिमकी ओर जो विदेह क्षेत्र हैं उसमें एक अशोकपुर नामका नगर है। उसमें आनन्द नामका एक उत्तम वैश्य रहता था उसकी स्त्रीके एक आनन्दयशा नामकी पुत्री उत्पन्न हुई। किसी समय आनन्दयशाने अमितसागर मुनिगजके लिए आहार दान देकर पञ्चाश्चर्य प्राप्त किये । इस दानजन्य पुण्यके प्रभावसे वह आयु पूर्ण होनेपर उत्तरकुरुमें उत्पन्न हुई, वहांके सुख भोगनेके बाद भवनवासियोंके इन्द्रकी इन्द्राणी हुई और वहाँ से च्युत होकर यहाँ उत्पन्न हुई हूँ। इस प्रकार रानी यशस्वतीने अपने पति राजा हेमाभके लिए बड़े हर्षसे अपने पूर्वभव सुनाये । तदनन्तर, रानी यशस्वती किसी समय सिद्धार्थ नामक वनमें गई, वहाँ सागरसेन नामक मुनिराजके पास उसने उपवास ग्रहण किये । आयुके अन्त में मरकर प्रथम स्वर्गमें देवी हुई । तदनन्तर वहांकी स्थिति पूरी होनेपर इसी जम्बूद्वीपकी कौशाम्बी नगरीमें सुमति नामक सेठकी सुभद्रा नामकी स्त्रीसे धार्मिकी नामकी पुत्री हुई ॥ ४३२-४३७ ॥
“In the Videha region situated to the west of the Eastern Meru in the Dhatakikhanda continent, there is a city named Ashokapura. A noble merchant (Vaishya) named Ananda lived there, and his wife gave birth to a daughter named Anandayasha. At one time, Anandayasha offered food (Ahaar-daan) to the revered monk (Muniraj) Amitasagara, thereby attaining the five celestial wonders (Panchashcharya). By the influence of the merit born from this charity, upon completing her lifespan, she was reborn in the Uttarakuru land of enjoyment. After experiencing the pleasures there, she became the Indra-queen (Indrani) of the Lord of the Mansion-dwelling gods (Bhavanavasi Indra), and departing from there, I have been born here.”
In this manner, Queen Yashasvati narrated her past lives with great joy to her husband, King Hemabha.
Subsequently, at one point, Queen Yashasvati went to the forest named Siddhartha, where she took vows of fasting from the revered monk (Muniraj) named Sagarasena. At the end of her lifespan, she passed away and was reborn as a goddess in the first heaven. Then, upon the completion of her term there, she was born in the city of Kaushambi in this very Jambudvipa, as a pious daughter named Dharmiki to Subhadra, the wife of the merchant (Seth) named Sumati. || 432-437 ||
श्लोक ( Shlok ) 438 – 441
पुनर्जिनमतिक्षान्तिदत्तां जिनगुणादिकाम् । सम्पत्तिं साधु निर्माप्य महाशुक्रेऽभवत्सुरी ॥४३८॥चिरात्ततो विनिर्गत्य वीतशोकपुरेशिनः । महीशो मेरुचन्द्रस्य चन्द्रवत्यामजायत ॥४३९॥गौरीति रूपलावण्यकान्त्यादीनामसौ खनिः । विजयाख्यपुराधीशो विभुर्विजयनन्दनः ॥४४०॥वत्सलस्तुभ्यमानीय तामदश त्वयापि सा । पट्टे नियोजितेत्याख्यत्ततो हरिरगान्मुदम् ॥४४१॥
यहाँपर उसने जिनमति आर्यिकाके दिये हुए जिनगुणसम्पत्ति नामके व्रतका अच्छी तरह पालन किया जिसके प्रभावसे मरकर महाशुक्र स्वर्गमें देवी हुई । बहुत समय बाद वहांसे चयकर वीतशोकनगरके स्वामी राजा मेरुचन्द्रकी चन्द्रवती रानीके रूप, लावण्य और कान्ति आदिकी खान यह गौरी नामकी पुत्री हुई है। स्नेहसे भरे, विजयपुर नगरके स्वामी राजा विजयनन्दनने यह लाकर तुझे दी है और तू ने भी इसे पट्टरानी बनाया है। इस प्रकार गणधर भगवान्ने गौरीके भवान्तर कहे जिन्हें सुनकर श्रीकृष्ण हर्षको प्राप्त हुए ॥ ४३८-४४१ ।।
In that life, she meticulously observed the vow called Jinagunasampatti, which was initiated by the female ascetic (Aryika) Jinamati. By the influence of this merit, she passed away and was reborn as a goddess in the Mahashukra heaven. After a long time, departing from that celestial realm, she was born as this very daughter named Gauri—a treasure trove of beauty, grace, and radiance—to Queen Chandravati and King Meruchandra, the ruler of Vitashokanagara.
Later, filled with affection, King Vijayanandana, the ruler of Vijayapura city, brought her and presented her to you, and you too made her your chief queen (Pattrani). In this manner, Lord Ganadhara narrated the past lives of Gauri, hearing which Shri Krishna was filled with great joy. || 438-441 ||
श्लोक 442 से 459
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497
नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 257 | श्लोक 258 से 272 | श्लोक 273 से 282 | श्लोक 283 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 315 | श्लोक 316 से 324 | श्लोक 325 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 362 | श्लोक 363 से 372 | श्लोक 373 से 382 | श्लोक 383 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 413 | श्लोक 414 से 421 | श्लोक 422 से 431
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