राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका
वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 21 to 30
श्लोक ( Shlok ) 21 – 23
अन्तः क्रोधकषायानुभागोग्रस्पर्धकोदयात् । संक्लेशाध्यवसानेन वर्धमानत्रिलेश्यकः ॥ २१ ॥मन्त्र्यादिप्रतिकूलेषु हिंसाद्यखिलनिग्रहान् । ध्यायन् संरक्षणानन्दरौद्रध्यानं प्रविष्टवान् ॥ २२ ॥अतः परं मुहूर्त चेदेवमेव स्थितिं भजेत् । आयुषो नारकस्यापि प्रायोग्योऽयं भविष्यति ॥ २३ ॥
बाह्य कारणोंके मिलने-से उनके अन्तःकरणमें तीव्र अनुभागवाले क्रोध कषायके स्पर्धकोंका उदय हो रहा है। संक्लेशरूप परिणामोंसे उनके तीन अशुभलेश्याओंकी वृद्धि हो रही है। जो मन्त्री आदि प्रतिकूल हो गये हैं उनमें हिंसा आदि सर्व प्रकारके निग्रहोंका चिन्तवन करते हुए वे संरक्षणानन्द नामक रौद्र ध्यानमें प्रविष्ट हो रहे हैं। यदि अब आगे अन्तर्मुहूर्त तक उनकी ऐसी ही स्थिति रही तो वे नरक आयुका बन्ध करनेके योग्य हो जावेंगे ॥ २१-२३ ॥
“Due to the influence of these external factors, the manifestations of intense, high-intensity anger-passion (krodha kashaya) are arising within his inner consciousness. Because of these distressed and agitated thoughts (sanklesha parinama), his three inauspicious thought-colorations (ashubha leshyas) are intensifying. Meditating upon all kinds of violent acts and punishments to inflict upon the ministers and others who turned against his son, he has entered into the dark state of wrathful meditation known as Samrakshanananda Raudra Dhyana (the wrath of protection). If his state remains like this for just another antarmuhurta (within 48 minutes), he will become bound to manifest a lifespan in hell. || 21–23 ||”
श्लोक ( Shlok ) 24 – 27
ततस्त्वयाशु सम्बोध्यो ध्यानमेतस्यजाशुभम् । शमय क्रोधदुर्वह्नि मोहजालं निराकुरु ॥ २४ ॥गृहाण संयमं त्यक्तं पुनस्त्वं मुक्तिसाधनम् । दारदारकबन्ध्वादिसम्बन्धनमबन्धुरम् ॥ २५ ॥संसारवर्धनं साधो जहीहीत्येवमादिभिः । युक्तिमद्भिर्वचोभिः सप्रत्यवस्थानमाप्तवान् ॥ २६ ॥शुक्कुध्यानाग्निनिर्दग्धघातिकर्मघनाटविः । नवकेवललब्धीद्धशुद्धभावो भविष्यति ॥ २७ ॥
इसलिए हे श्रेणिक ! तू शीघ्र ही जाकर उसे समझा दे और कह दे कि हे साधो ! शीघ्र ही यह अशुभ ध्यान छोड़ो, क्रोधरूपी अग्निको शान्त करो, मोहके जालको दूर करो, मोक्षका कारणभूत जो संयम तुमने छोड़ रक्खा है उसे फिरसे ग्रहण करो, यह स्त्री-पुत्र तथा भाई आदिका सम्बन्ध अमनोज्ञ है तथा संसारका बढ़ानेवाला है । इत्यादि युक्ति पूर्ण वचनोंसे तू उनका स्थितीकरण कर। तेरे उपदेशसे वे पुनः स्वरूपमें स्थित होकर शुक्ल ध्यानरूपी अग्निके द्वारा घातिया कर्मरूपी सघन अटवी को भस्म कर देंगे और नव केवललब्धियों से देदीप्यमान शुद्ध स्वभावके धारक हो जावेंगे ।। २४-२७ ।।
“Therefore, O Shrenika! Go quickly, counsel him, and say, ‘O Holy Ascetic! Abandon this inauspicious meditation at once, extinguish the fire of anger, tear away the web of delusion, and re-embrace that self-restraint—the true path to liberation—which you have cast aside. These worldly relationships with wives, sons, and brothers are fleeting, undesirable, and only serve to prolong the cycle of transmigration.’ Restore his spiritual stability using these reasoned and wise words. Inspired by your guidance, he will re-establish himself in his true self, burn away the dense forest of destructive karmas (ghatiya karmas) with the fire of pure meditation (shukla dhyana), and manifest his pure, radiant nature, adorned with the nine supreme attainments of omniscience (nava kevala-labdhis). || 24–27 ||”
श्लोक ( Shlok ) 28
इत्यसौ च गणाधीशवचनान्मगधाधिपः । गत्वा तदुक्तमार्गेण सद्यः प्रासादयन्मुनिम् ॥ २८ ॥
गणधर महाराजके उक्त वचन सुनकर राजा श्रेणिक शीघ्र ही उन मुनिके पास गया और उनके बताये हुए मार्गसे उन्हें प्रसन्न कर आया ।। २८ ।।
“Upon hearing these words from Lord Gandhara, King Shrenika went quickly to that sage and, following the path shown to him, brought peace and joy to his heart. || 28 ||”
श्लोक ( Shlok ) 29
सोऽपि सम्प्राप्य सामग्रीं कषायक्षयक्षान्तिजाम् । द्वितीयशुक्रुध्यानेन कैवल्यमुदपादयत् ॥ २९ ॥
उक्त मुनिराजने भी कषायके भयसे उत्पन्न होनेवाली शान्तिसे उत्पन्न होनेवाली सामग्री प्राप्तकर द्वितीय शुक्ल ध्यानके द्वारा केवलज्ञान उत्पन्न कर लिया ॥ २९ ॥
“The great sage, too, having attained the mental clarity and peace born from the complete sublimation of his passions, ascended to the second stage of pure meditation (dvitiya shukla dhyana) and achieved absolute omniscience (kevalajnana). || 29 ||”
श्लोक ( Shlok ) 30
तदा पूजां समायातैः श्रेणिको वृत्रहादिभिः । सह धर्मरुचेः कृत्वा पुनवींरं समाश्रितः ॥ ३० ॥
उसी समय इन्द्र आदि देव उन धर्मरुचि केवलीकी पूजा करनेके लिए आये सो राजा श्रेणिकने भी उन सबके साथ उनकी पूजा की और फिर वह भगवान् वीरनाथके पास आया ॥ ३० ॥
“At that very moment, Indra and the other celestial gods arrived to worship the omniscient Lord Dharmaruchi (Kevali); King Shrenika also joined them in offering worship, and thereafter, he returned to the presence of Lord Veeranatha (Mahavira). || 30 ||”
श्लोक 31 से 42
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