राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन पर्व 76 – श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 271 | श्लोक 272 से 283
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 284 to 291
श्लोक ( Shlok ) 284 – 285
तं हन्तुं निर्भयो भीमं गोपुराभ्यन्तरे स्थितः । निगूढतनुराविष्कृतोन्नतिर्वसुनं दधत् ॥ २८४ ॥तस्मिन्क्षणे समागत्य समन्ताद्वीक्ष्य भीमकः । स्वविद्यां प्रेषयामास दृष्ट्वा दुष्टं जहीति तम् ॥ २८५ ॥
जो निर्भय है, जिसने अपना शरीर छिपा रक्खा है और जो देदीप्य-मान दिव्य तलवारको धारण कर रहा है ऐसा प्रीतिङ्कर भीमकको मारनेके लिए गोपुरके भीतर छिप गया । उसी समय भीमक भी आ गया, उसने सब ओर देखकर तथा यह कहकर अपनी विद्याको भेजा कि गोपुरके भीतर छिपे हुए उस दुष्ट पुरुषको देखकर मार डालो ।। २८४-२८५ ।।
Fearless, with his body concealed and wielding the dazzling, divine sword, Pritinkar hid inside the city gate (Gopura) to slay Bhimaka. Just then, Bhimaka also arrived. Looking around in all directions, he unleashed his demonic lore (Vidya), commanding, “Find that wicked man hidden inside the city gate and strike him dead!” [284-285]
श्लोक ( Shlok ) 286 – 289
सम्यग्दृष्टिरयं सप्तविधभीतिविदूरगः । चरमाङ्गो महाशूरो नाहं हन्तुमिमं क्षमा ॥ २८६ ॥इति भीत्वा तदभ्यर्णे सञ्चरन्तीमितस्ततः । विलोक्य भीमको विद्यां शक्तिहीनां व्यसर्जयत् ॥ २८७ ॥निस्साराभूर्वजेत्युक्त्वा साप्यगच्छददृश्यताम् । स्वयमेवासिमुत्खाय भीमकस्तं जिघांसुकः ॥ २८८ ॥सम्प्राप्तवान्कुमारोऽपि तर्जयन्नतिभीषणम् । तद्वातं वञ्चयित्वाहंस्तं प्राणैः सोऽप्यमुच्यत ॥ २८९ ॥
विद्या प्रीतिङ्करके पास जाते ही डर गई, वह कहने लगी कि यह सम्यग्दृष्टि है, सात भयोंसे सदा दूर रहता है, चरमशरीरी है और महाशूरवीर है; मैं इसे मारनेके लिए समर्थ नहीं हूं। इस प्रकार भयभीत होकर वह उसके पास ही इधर-उधर फिरने लगी। यह देख, भीमक समझ गया कि यह विद्या शक्तिहीन है तब उसने ‘तू सारहीन है अतः चली जा’ यह कह कर उसे छोड़ दिया और वह भी अदृश्यताको प्राप्त हो गई। विद्याके चले जानेपर प्रीतिङ्करको मारनेकी इच्छासे भीमक स्वयं तलवार उठाकर उस पर झपटा। इधर प्रीतिङ्करने भी उसे बहुत भयंकर डॉट दिखाकर तथा उसके वारको बचाकर ऐसा प्रहार किया कि उसके प्राण छूट गये ॥ २८६-२८९ ॥
As soon as the demonic lore (Vidya) approached Pritinkar, it was gripped by fear and said, “This man possesses right faith (Samyagdrishti), remains forever untouched by the seven fears, is in his final bodily incarnation (Charam-shariri), and is a great warrior. I am powerless to slay him.” Terrified in this manner, the lore began to hover aimlessly around him.
Seeing this, Bhimaka realized that his lore had lost its power. He dismissed it, saying, “You are utterly useless, begone!” and the lore instantly vanished.
Once the lore had departed, Bhimaka himself raised his sword and lunged forward with the intent to kill Pritinkar. Pritinkar, however, unleashed a terrifying roar, evaded Bhimaka’s strike, and countered with such a powerful blow that Bhimaka’s life departed on the spot. [286-289]
श्लोक ( Shlok ) 290
ततो विध्वस्य दुष्टारिमायान्तमभिवीक्ष्य सा । कुमारं कन्यकाभ्येत्य व्यधास्त्वं भद्र साहसम् ॥ २९०॥
तदनन्तर दुष्ट शत्रुको मारकर आते हुए कुमारको देखकर कन्या सामने आई और कहने लगी कि हे भद्र ! आपने बहुत बड़ा साहस किया है ॥ २९० ॥
Thereafter, seeing the prince returning after slaying the wicked enemy, the maiden came forward to meet him and said, “O noble one! You have performed an act of immense courage.” [290]
श्लोक ( Shlok ) 291
इत्यारोप्यासनं स्वर्णमयं राजगृहाङ्गणे । अभिषिच्य जलापूर्णैः कलशैः कलधौतकैः ॥ २९१ ॥
इतना कहकर उसने राजभवनके आँगनमें सुवर्ण सिंहासनपर उसे बैठाया और जलसे भरे हुए सुवर्णमय कलशोंसे उसका राज्याभिषेक किया ॥ २९१ ॥
Having said this, she seated him upon a golden throne in the courtyard of the royal palace and performed his royal consecration (Rajyabhisheka) by bathing him with water from golden pitchers. [291]
श्लोक 292 से 302
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राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 271 | श्लोक 272 से 283
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