विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 243 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 271 | श्लोक 272 से 281
English translation of Uttar Puran parv 59- shlok 282 to 291
श्लोक ( Shlok ) 282 – 284
बुद्ध्वा ततः स निर्यातो द्वीपेऽस्मिन् विजये पुरे । ऐरावते महत्यासीदयोध्या तदधीश्वरः ॥ २८२ ॥श्रीवर्माऽस्य सुसीमाख्या देवी तस्याः सुतोऽभवत् । ‘श्रीधर्मासावनन्ताख्यमुनेरादाय संयमम् ॥२८३॥ब्रह्मकल्पेऽभवद् देवो दिव्याष्टगुणभूषितः । सर्वार्थसिद्धिजः संजयन्तो वज्रायुधोऽभवत् ॥ २८४ ॥
वह प्रतिबोधको प्राप्त हुआ और वहाँ से निकलकर इसी जम्बूद्वीपके ऐरावत क्षेत्रकी अयोध्या नगरीके राजा श्रीवर्माकी सुसीमा देवीके श्रीधर्मा नामका पुत्र हुआ। और वयस्क होने पर अनन्त नामक मुनिराजसे संयम ग्रहण कर ब्रह्मस्वर्ग में आठ दिव्य गुणोंसे विभूषित देव हुआ। वज्रायुधका जीव जो सर्वार्थसिद्धिमें अहमिन्द्र हुआ था वहाँ से आकर संजयन्त हुआ ।। २८२-२८४ ।।
He attained enlightenment and, departing from that state, was born as the son named Shridharma to King Shrivarma and Queen Susima in the city of Ayodhya, located in the Airavat region of this same Jambudvipa.
Upon reaching adulthood, he accepted ascetic vows (Samyama) from the sage Anant Muniraj. Consequently, he was reborn in the Brahma-svarga (the fifth heaven) as a celestial being adorned with the eight divine virtues. Meanwhile, the soul of Vajrayudha, who had previously become an Ahamindra in Sarvarthasiddhi, descended from there and was born as Sanjayanta. [282-284]
श्लोक ( Shlok ) 285
ब्रह्मकल्पादिहागत्य त्वं जयन्तो निदानतः । मोहाद्विलुप्तसम्यक्त्वोऽजनिष्ट नागनायकः ॥ २८५ ॥
श्रीधर्माका जीव ब्रह्मस्वर्गसे आकर तू जयन्त हुआ था और निदान बाँधकर मोह-कर्म के उद्यसे धरणीन्द्र हुआ ।। २८५ ।।
The soul of Shridharma, having descended from Brahma-svarga, was born as you, Jayanta. Later, due to the binding of Nidana (a desire-driven vow) and the influence of Moha-karma (delusory karma), you became Dharanindra. [285]
श्लोक ( Shlok ) 286
प्राक्तनो नारकः प्रान्तपृथिवीतो विनिर्गतः । जघन्यायुरहिर्भूत्वा तृतीयां पृथिवीं गतः ॥ २८६ ॥
सत्यघोषका जीव सातवीं पृथिवीसे निकल कर जघन्य आयुका धारक साँप हुआ और फिर तीसरे नरक गया ।। २८६ ।।
The soul of Satyaghosha, after emerging from the seventh earth (the seventh hell), was born as a snake with a minimum lifespan, and subsequently descended to the third hell. [286]
श्लोक ( Shlok ) 287 – 289
ततो निर्गत्य तिर्यक्षु त्रसेषु स्थावरेषु च । भ्रान्त्वाऽस्मिन् भरते भूतरमणाख्यवनान्तरे ॥ २८७ ॥ ऐरावतीनदीतीरे मृगश्वङ्गसुतोऽभवत् । गोश्टङ्गतापसाधीशः शङ्खिकायां विरक्तधीः ॥ २८८ ॥ स पञ्चाग्नितपः कुर्वन् दिव्यादितिलकाधिपम् । खगं वीक्ष्यांशुमालाख्यं निदानमकरोत्कुधीः ॥ २८९ ॥
वहाँ से निकल कर त्रस स्थावर रूप तिर्यंच गतिमें भ्रमण करता रहा। एक बार भूतरमण नामक बनके मध्यमें ऐराक्ती नदीके किनारे गोशृङ्ग नामक तापसकी शङ्खिका नामक स्त्रीके मृगशृङ्ग नामका पुत्र हुआ। वह विरक्त होकर पञ्चाग्नि तप कर रहा था कि इतनेमें वहाँ से दिव्यतिलक नगरका राजा अंशुमाल नामका विद्याधर निकला उसे देखकर उस मूर्खने निदान बन्ध किया ।। २८७-२८९ ।।
After emerging from there, he continued to wander through the Tiryancha (animal/sub-human) state in both Trasa (mobile) and Sthavara (immobile) forms.
Later, in the heart of the forest known as Bhutaramana, on the banks of the Airakti River, he was born as a son named Mrigashringa to a woman named Shankhika, the wife of an ascetic named Goshringa.
In time, he became detached and began performing the Panchagni penance (the five-fire austerity). While doing so, a Vidyadhara (celestial being) named Anshumala, the king of Divyatilaka City, happened to pass by. Upon seeing him, that foolish ascetic bound a Nidana (a vow motivated by worldly desire). [287-289]
श्लोक ( Shlok ) 290 – 291
मृत्वाऽत्र खगशैलोदक्श्रेण्यां गगनवल्लभे । वज्रदंष्टखगेशस्य प्रिया विद्युत्प्रभा तयोः ॥ २९० ॥ विद्युदंष्ट्रः सुतो जातः सोऽयं वैरानुबन्धतः । बद्ध्वा कर्म चिरं दुःखमापदाप्स्यति चापरम् ॥ २९१॥
अन्तमें मर कर इसी भरतक्षेत्रके विजयार्ध पर्वतकी उत्तर श्रेणी-सम्बन्धी गगनवल्लभ नगरके राजा वज्रदंष्ट्र विद्याधरकी विद्युत्प्रभा रानीके विद्युदंष्ट्र नामका पुत्र हुआ। इसने पूर्व वैरके संस्कारसे कर्मबंध कर चिरकाल तक दुःख पाये और आगे भी पावेगा ॥ २९०-२९१ ।।
At the time of his death, he was born as the son named Vidyudanshtra to Queen Vidyutprabha, the consort of the Vidyadhara King Vajradanshtra of Gaganavallabha City, located on the northern range of Mount Vijayardha in this same Bharatkshetra.
Due to the deep-seated impressions of past animosity, he bound himself with karma and endured suffering for a long time, and is destined to suffer further in the future. [290-291]
श्लोक 292 से 301
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