नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71
श्लोक 1 से 11 : कंस-वध के बाद जरासन्ध का प्रतिशोध और कालयवन का प्रस्थान
कंस-वध के उपरान्त श्रीकृष्ण ने उग्रसेन को बन्धनमुक्त कर राज्य की व्यवस्था स्थापित की तथा नन्द आदि गोपालों का सम्मानपूर्वक सत्कार कर उन्हें विदा किया। इसी बीच कंस की रानी जीवद्यशा अपने पति की मृत्यु से दुःखी होकर मगधराज जरासन्ध के पास पहुँची और सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाया। यह समाचार सुनकर क्रोधित जरासन्ध ने पहले अपने पुत्रों को यादवों पर आक्रमण के लिए भेजा, किन्तु वे पराजित हो गये। तत्पश्चात् उसने अपराजित नामक पुत्र को विशाल सेना सहित भेजा, परन्तु वह भी अनेक युद्धों के बाद सफलता प्राप्त न कर सका। अन्ततः कालयवन ने यादवों को जीतने का दृढ़ संकल्प लेकर युद्ध के लिए प्रस्थान किया।
श्लोक 12 से 21 : कालयवन का भ्रम और द्वारावती की स्थापना की भूमिका
कालयवन के आक्रमण की सूचना मिलने पर यादवों ने शौर्यपुर, हस्तिनापुर और मथुरा का परित्याग कर दिया। उनके कुलदेवता ने वृद्धा का रूप धारण कर अग्नि प्रज्वलित की और कालयवन को यह विश्वास दिलाया कि यादव उसके भय से अग्नि में जलकर नष्ट हो गये हैं। इस भ्रम में पड़कर कालयवन विजयी होने का मिथ्या अभिमान लेकर लौट गया। उधर यादव समुद्रतट पर पहुँचे। वहाँ श्रीकृष्ण ने तप और मन्त्र-जाप के साथ अष्टोपवास किया। नैगम देव ने घोड़े के रूप में प्रकट होकर उन्हें समुद्र के भीतर उपयुक्त स्थान तक पहुँचाया, जहाँ भविष्य में एक महान नगरी की स्थापना होने वाली थी।
श्लोक 22 से 32: द्वारावती नगरी की रचना और नेमिनाथ के गर्भकल्याणक
नैगम देव के निर्देशानुसार श्रीकृष्ण समुद्र के भीतर पहुँचे। उसी समय श्रीकृष्ण और भावी तीर्थंकर नेमिनाथ के पुण्य के प्रभाव से इन्द्र की आज्ञा पाकर कुबेर ने समुद्र के मध्य भव्य द्वारावती नगरी का निर्माण किया। उसमें सर्वप्रथम एक विशाल जिनमन्दिर तथा दुर्ग, प्राकार, गोपुर और अट्टालिकाओं से युक्त अद्भुत नगर बनाया गया। श्रीकृष्ण, बलराम और वसुदेव सहित समस्त यादव वहाँ निवास करने लगे। इसी काल में नेमिनाथ भगवान् के जीव ने जयन्त विमान से अवतीर्ण होकर राजा समुद्रविजय की रानी शिवदेवी के गर्भ में प्रवेश किया। रानी ने शुभ सोलह स्वप्नों तथा दिव्य हाथी के दर्शन कर तीर्थंकर गर्भावतरण का संकेत प्राप्त किया।
श्लोक 33 से 51 : नेमिनाथ भगवान् का जन्म और अभिषेक महोत्सव
प्रातःकाल रानी शिवदेवी ने अपने स्वप्नों का फल राजा समुद्रविजय से पूछा। राजा ने आगमज्ञान के आधार पर बताया कि उनके गर्भ में भावी तीर्थंकर अवतीर्ण हुए हैं। यह सुनकर रानी अत्यन्त प्रसन्न हुई। देवों ने गर्भकल्याणक का महोत्सव मनाया। समय आने पर श्रावण शुक्ल षष्ठी को भगवान् नेमिनाथ का जन्म हुआ। इन्द्रों ने मेरु पर्वत पर ले जाकर उनका दिव्य अभिषेक किया और उन्हें “नेमि” नाम प्रदान किया। तत्पश्चात् भगवान् को पुनः माता-पिता को सौंप दिया गया। नेमिनाथ एक हजार वर्ष की आयु वाले, दश धनुष ऊँचे, उत्तम संहनन एवं संस्थान से युक्त, तीनों लोकों द्वारा पूजित महापुरुष थे और द्वारावती में दीर्घकाल तक विराजमान रहे।
श्लोक 52 से 64 : वैश्य-पुत्रों द्वारा द्वारावती का वैभव वर्णन
समय बीतने पर समुद्री व्यापार करने वाले कुछ वैश्य-पुत्र मार्ग भटककर द्वारावती पहुँच गये। वहाँ के अद्भुत वैभव और समृद्धि को देखकर वे चकित रह गये तथा बहुमूल्य रत्न लेकर मगध लौटे। जब उन्होंने राजा जरासन्ध को वे रत्न भेंट किये, तब उसके पूछने पर उन्होंने समुद्र के मध्य स्थित द्वारावती नगरी का विस्तृत वर्णन किया। उन्होंने बताया कि यह नगरी अत्यन्त सुरक्षित, वैभवशाली, रत्नसमृद्ध तथा श्रीकृष्ण के प्रताप से आलोकित है। साथ ही यह भगवान् नेमिनाथ की जन्मभूमि होने से विशेष गौरवशाली है।
श्लोक 65 से 81 : जरासन्ध का आक्रमण और महायुद्ध की तैयारी
द्वारावती के वैभव का वर्णन सुनकर अहंकारी जरासन्ध क्रोध से भर उठा और यादवों के विनाश के लिए विशाल सेना लेकर चल पड़ा। नारद ने यह समाचार श्रीकृष्ण को दिया। श्रीकृष्ण ने बिना विचलित हुए नेमिकुमार से द्वारावती की रक्षा का अनुरोध किया। नेमिनाथ ने अपनी दिव्य दृष्टि से यादवों की विजय निश्चित जानकर मौन स्वीकृति प्रदान की। इसके बाद श्रीकृष्ण, बलराम, पाण्डवों तथा अनेक मित्र-राजाओं के साथ युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र पहुँचे। दूसरी ओर जरासन्ध भी भीष्म, कर्ण, द्रोण, अश्वत्थामा, दुर्योधन तथा अन्य राजाओं के साथ वहाँ उपस्थित हुआ। दोनों पक्षों की सेनाएँ आमने-सामने आ खड़ी हुईं और रणभेरियों की गूँज से युद्धभूमि उत्साह और वीररस से भर उठी।
श्लोक 82 से 93 : युद्धपूर्व वातावरण और श्रीकृष्ण की जिनपूजा
युद्ध के नगाड़े सुनकर अनेक राजाओं ने देवपूजा, व्रतग्रहण और धार्मिक कृत्य आरम्भ किये। अनेक योद्धा अपने सेवकों को शस्त्र, रथ, हाथी और घोड़े तैयार करने की आज्ञा देने लगे। विभिन्न प्रेरणाओं—स्वामीभक्ति, पराक्रम, यश, ईर्ष्या और कुलगौरव—से प्रेरित होकर वे युद्ध के लिए प्रस्तुत हुए। श्रीकृष्ण भी पूर्ण युद्ध-वेश में अलंकृत होकर रणभूमि के लिए तैयार हुए। उन्होंने पहले आचमन कर श्रद्धापूर्वक जिनेन्द्र भगवान् की पूजा-अर्चना की और नमस्कार किया। तत्पश्चात् गुरुजनों, सामन्तों और सहयोगियों से घिरे हुए वे शत्रु-संघार के उद्देश्य से युद्धभूमि की ओर अग्रसर हुए।
श्लोक 94 से 101 : सेनाओं की व्यूह-रचना और युद्ध का प्रारम्भ
श्रीकृष्ण के आदेश से उनकी सेना का सुव्यवस्थित व्यूह बनाया गया। दूसरी ओर जरासन्ध ने भी अपने सेनापतियों द्वारा सेना की योजना करवाई। दोनों पक्षों की व्यूह-रचना पूर्ण होते ही युद्ध के नगाड़े बज उठे। धनुर्धरों के बाणों से आकाश ढक गया और रणभूमि में ऐसा अन्धकार छा गया कि योद्धा एक-दूसरे को देख नहीं सकते थे। हाथियों के दाँतों की टक्कर से उत्पन्न अग्नि के प्रकाश में युद्ध पुनः तीव्र गति से चलने लगा। वीरों ने रक्त की नदियाँ बहा दीं और असंख्य योद्धा तथा घोड़े युद्ध में घायल होकर धराशायी होने लगे। इस प्रकार महाभयंकर संग्राम का आरम्भ हुआ।
श्लोक 102 से 111: भीषण युद्ध का विकराल स्वरूप
कुरुक्षेत्र का युद्ध अत्यन्त भयंकर रूप धारण कर चुका था। कटे हुए पैरों वाले हाथी विशाल पर्वतों के समान भूमि पर गिरे पड़े थे और वीरगति को प्राप्त योद्धाओं के मुखमण्डल अभी भी प्रसन्नता से शोभायमान थे। योद्धा अपनी युद्धकुशलता से एक-दूसरे के शस्त्र तोड़ रहे थे, किन्तु उनके टूटे हुए टुकड़े भी अनेक लोगों के प्राण ले रहे थे। कुछ वीर न तो क्रोध, ईर्ष्या अथवा यश-लाभ की इच्छा से, बल्कि कर्तव्य और न्याय की भावना से युद्ध कर रहे थे। अनेक योद्धा घोर घावों से आहत होकर हाथियों से लटक गये थे। दीर्घकाल तक चले इस युद्ध में असंख्य प्राणियों का विनाश हुआ और अन्ततः शत्रु-सेना ने श्रीकृष्ण की सेना को दबाना प्रारम्भ कर दिया।
श्लोक 112 से 121 : जरासन्ध-वध और श्रीकृष्ण की दिग्विजय
जब अपनी सेना को संकट में देखा तो श्रीकृष्ण सिंह के समान क्रोधपूर्वक शत्रु-सेना पर टूट पड़े। उनके पराक्रम से शत्रु-दल विचलित हो गया। यह देखकर स्वयं जरासन्ध युद्धभूमि में आया और अपने चक्ररत्न का प्रयोग श्रीकृष्ण के विरुद्ध किया। किन्तु वह चक्र श्रीकृष्ण की प्रदक्षिणा कर उनकी भुजा पर आकर ठहर गया। तब उसी चक्र से श्रीकृष्ण ने जरासन्ध का मस्तक काट दिया। विजय के उपलक्ष्य में देवों ने पुष्पवृष्टि की और विजय-नगाड़े बज उठे। इसके पश्चात् श्रीकृष्ण ने दिग्विजय आरम्भ की, अनेक देवों, विद्याधरों और म्लेच्छ राजाओं को अपने अधीन किया तथा आधे भरतक्षेत्र के अधिपति बनकर पुनः द्वारावती लौटे।
श्लोक 122 से 130 : चक्रवर्ती श्रीकृष्ण का वैभव और जलक्रीड़ा
द्वारावती पहुँचने पर देवों और विद्याधरों ने श्रीकृष्ण का चक्रवर्ती के रूप में राज्याभिषेक किया। उनका शरीर नीलकमल के समान कान्तिमान था और वे सात महान् रत्नों के स्वामी थे। बलराम भी अपने विशिष्ट महारत्नों से विभूषित थे। श्रीकृष्ण की प्रमुख आठ पटरानियाँ थीं तथा कुल मिलाकर उनकी सोलह हजार रानियाँ थीं। बलराम की भी आठ हजार रानियाँ थीं। दोनों भाई दिव्य सुखों का उपभोग करते हुए जीवन व्यतीत कर रहे थे। एक बार शरद् ऋतु में अन्तःपुर सहित जलविहार करते समय नेमिकुमार और सत्यभामा के मध्य विनोदपूर्ण वार्तालाप हुआ, जिसने आगे की घटनाओं की भूमिका तैयार की।
श्लोक 131 से 141: नेमिकुमार का पराक्रम और विवाह का विचार
सत्यभामा के विनोदी कटाक्षों से प्रेरित होकर नेमिकुमार ने अपने सामर्थ्य का परिचय देने का निश्चय किया। वे आयुधशाला में गये, नागशय्या पर चढ़े, महान् धनुष को सहजता से चढ़ाया और दिव्य शंख बजाकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया। इस कार्य से उनमें क्षणिक गौरव और उत्साह का भाव उत्पन्न हुआ। जब यह समाचार श्रीकृष्ण तक पहुँचा तो वे अत्यन्त आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने विचार किया कि नेमिकुमार अब यौवनावस्था को प्राप्त हो चुके हैं और उनके लिए विवाह का समय उपयुक्त है।
श्लोक 142 से 151 : राजीमती के साथ विवाह की तैयारी
श्रीकृष्ण ने यह अनुमान लगाया कि नेमिकुमार के मन में सांसारिक अनुराग का उदय हुआ है, इसलिए उनका विवाह कर देना चाहिए। उन्होंने राजा उग्रसेन की रूपवती एवं गुणवती पुत्री राजीमती को नेमिकुमार के लिए उपयुक्त वधू माना। स्वयं उग्रसेन के पास जाकर उन्होंने विवाह का प्रस्ताव रखा। उग्रसेन ने अत्यन्त सम्मानपूर्वक इसे स्वीकार कर लिया। तत्पश्चात् भव्य विवाहोत्सव की तैयारियाँ प्रारम्भ हुईं। रत्नों से निर्मित मण्डप, सुशोभित वेदिका और सुवर्ण चौकी से युक्त अत्यन्त मनोहर विवाह व्यवस्था की गई तथा नेमिकुमार और राजीमती ने विवाह-पूर्व की विधियाँ सम्पन्न कीं।
श्लोक 152 से 162 : वैराग्य का कारण और पशुओं की करुण दशा
विवाह के अगले दिन श्रीकृष्ण के मन में यह आशंका उत्पन्न हुई कि कहीं भविष्य में नेमिकुमार राज्य पर अधिकार न कर लें। उन्होंने विचार किया कि यदि वैराग्य का कोई कारण उपस्थित हो जाए तो नेमिकुमार स्वयं संसार त्याग देंगे। इस उद्देश्य से उन्होंने अनेक पशुओं और मृगों को विवाह-भोज के लिए एकत्र कर बाड़े में बन्द करवा दिया और रक्षकों को निर्देश दिया कि यदि नेमिकुमार पूछें तो सत्य बता देना। जब नेमिकुमार विवाह-यात्रा के पूर्व नगर-दर्शन के लिए निकले, तब उन्होंने भयभीत, प्यासे और करुण स्वर में रोते हुए उन पशुओं को देखा और उनके विषय में पूछताछ की।
श्लोक 163 से 171 : नेमिनाथ का वैराग्य और दीक्षा
रक्षकों से यह सुनकर कि इन निर्दोष पशुओं का वध उनके विवाहोत्सव के लिए किया जाएगा, नेमिकुमार का हृदय करुणा से भर उठा। उन्होंने विचार किया कि जो प्राणी किसी का अहित नहीं करते, उन्हें केवल भोग-विलास के लिए मारना अत्यन्त निन्दनीय है। उन्होंने श्रीकृष्ण की योजना को भी समझ लिया और संसार की नश्वरता तथा हिंसा के दुःख का गहन अनुभव किया। उसी क्षण उनके भीतर वैराग्य जागृत हो गया। लौकान्तिक देवों ने आकर उन्हें संयम के लिए प्रेरित किया। श्रावण शुक्ल षष्ठी के दिन उन्होंने एक हजार राजाओं के साथ दीक्षा ग्रहण की और मनःपर्यय ज्ञान प्राप्त किया।
श्लोक 172 से 181 : राजीमती का त्याग, आहारदान और केवलज्ञान
नेमिकुमार के संयम ग्रहण करने पर राजीमती ने भी उनके मार्ग का अनुसरण करने का निश्चय किया। यह आदर्श पतिव्रता के त्याग और निष्ठा का उत्कृष्ट उदाहरण था। देवों और राजाओं ने भगवान् की स्तुति कर उन्हें प्रणाम किया। बाद में द्वारावती में राजा वरदत्त ने नवधा भक्ति सहित उन्हें शुद्ध आहार प्रदान किया, जिसके फलस्वरूप अनेक दिव्य आश्चर्य प्रकट हुए। छप्पन दिन की तपस्या के उपरान्त रैवतक (गिरनार) पर्वत पर भगवान् नेमिनाथ को केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। देवों ने केवलज्ञान कल्याणक का भव्य उत्सव मनाया।
श्लोक 182 से 190 : धर्मसभा और श्रीकृष्ण का आगमन
केवलज्ञान प्राप्त होने के बाद भगवान् नेमिनाथ की विशाल धर्मसभा स्थापित हुई, जिसमें असंख्य मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक, श्राविकाएँ, देव और तिर्यंच उपस्थित रहते थे। भगवान् अपने धर्मोपदेश से भव्य जीवों को सम्यक् मार्ग की ओर प्रेरित करते हुए विभिन्न प्रदेशों में विहार करते रहे। अन्ततः वे द्वारावती के समीप रैवतक पर्वत के उद्यान में विराजमान हुए। जब श्रीकृष्ण और बलराम को यह समाचार मिला, तब वे अपनी समस्त विभूति सहित भगवान् के दर्शनार्थ पहुँचे, वन्दना की और धर्मोपदेश सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुए।
श्लोक 191 से 200 : जीवतत्त्व का उपदेश और देवकी का प्रश्न
भगवान् नेमिनाथ के समक्ष श्रीकृष्ण ने जीव के स्वरूप के विषय में विभिन्न दार्शनिक मतों से उत्पन्न अपने संशय को प्रकट किया। उत्तर में भगवान् ने स्पष्ट किया कि जीव न तो केवल नित्य है, न क्षणिक, न सर्वव्यापी और न ही निराकार कल्पना मात्र। जीव उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य से युक्त चेतन सत्ता है, जो कर्मों का भोक्ता और ज्ञाता है। वह शरीर के अनुरूप विस्तार वाला है, अनादिकाल से कर्मबन्धन में बँधा हुआ संसार में भ्रमण करता है और सम्यक्त्व तथा कर्मक्षय के द्वारा मोक्ष प्राप्त कर सकता है। भगवान् के इस तत्त्वज्ञान को सुनकर भव्य जीवों ने उसे स्वीकार किया, जबकि अभव्य जीव मिथ्यात्ववश संशय में बने रहे। इसी प्रसंग में देवकी ने गणधर वरदत्त से उन छह मुनियों के प्रति अपने विशेष स्नेह का कारण पूछा, जिन्होंने पूर्व में उनके घर भिक्षा ग्रहण की थी।
श्लोक 201 से 213 : भानुदत्त के सात पुत्र और मंगी की विषदुर्घटना
गणधर ने देवकी के प्रश्न का उत्तर देते हुए एक प्राचीन कथा का वर्णन किया। मथुरा में भानुदत्त सेठ और यमुनादत्ता के सात पुत्र थे। माता-पिता ने वैराग्य ग्रहण कर दीक्षा ले ली, किन्तु उनके पुत्र दुर्व्यसनों में पड़कर धन और प्रतिष्ठा खो बैठे तथा राज्य से निष्कासित कर दिए गए। वे उज्जयिनी पहुँचे। उसी समय वहाँ वज्रमुष्टि की पत्नी मंगी को उसकी ईर्ष्यालु सास वप्रश्री ने षड्यन्त्रपूर्वक विषैले सर्प से डसवा दिया, जिससे वह अचेत होकर मृत्यु-समान अवस्था में पहुँच गई।
श्लोक 214 से 221 : मंगी का पुनर्जीवन और शूरसेन का परीक्षण
वप्रश्री मंगी को श्मशान में छोड़ आई। जब वज्रमुष्टि को यह ज्ञात हुआ तो वह उसे खोजते हुए श्मशान पहुँचा। वहाँ योगस्थ वरधर्म मुनिराज के दर्शन कर उसने अपनी पत्नी के मिलने पर सहस्रदल कमलों से पूजा करने का संकल्प लिया। उसे मंगी मिल गई और वह उसे मुनिराज के पास ले आया। मुनिराज के चरण-स्पर्श के प्रभाव से मंगी विषमुक्त होकर जीवित हो गई। वज्रमुष्टि कमल लाने चला गया, जबकि शूरसेन यह सम्पूर्ण घटना छिपकर देख रहा था।
श्लोक 222 से 231 : मंगी की चंचलता और शूरसेन का वैराग्य
शूरसेन ने मंगी की परीक्षा लेने के लिए उससे मधुर वार्तालाप किया। मंगी शीघ्र ही उसके प्रति आसक्त हो गई और उसके साथ चलने की इच्छा व्यक्त करने लगी। इसी बीच वज्रमुष्टि लौट आया। उसने श्रद्धापूर्वक मुनिराज की पूजा करनी चाही, तब मंगी ने तलवार से उस पर प्रहार करने का प्रयास किया। शूरसेन ने समय रहते तलवार रोक ली, किन्तु उसकी अपनी अंगुलियाँ कट गईं। बाद में जब उसके भाई चोरी का धन लेकर आए, तब शूरसेन ने संसार की नश्वरता और छलपूर्ण प्रवृत्तियों से विरक्त होकर संयम ग्रहण करने का निश्चय किया।
श्लोक 232 से 241 : संसार से विरक्ति का उदय
शूरसेन के अनुभव को सुनकर उसके बड़े भाई सुभानु ने संसारिक आसक्ति, विषय-विकार और मोह की तीव्र निन्दा की। उसने बताया कि बाह्य आकर्षण और क्षणिक सुख मनुष्य को पतन की ओर ले जाते हैं तथा विवेक को नष्ट कर देते हैं। इस घटना ने सभी भाइयों के मन में संसार के प्रति गहन वैराग्य उत्पन्न कर दिया और उन्होंने आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने का निश्चय किया।
श्लोक 242 से 257 : दीक्षा, देवगति और पुनर्जन्मों की श्रृंखला
सुभानु और उसके छहों भाइयों ने वरधर्म मुनिराज से दीक्षा ग्रहण कर ली तथा उनकी पत्नियों ने भी आर्यिका दीक्षा स्वीकार कर ली। वज्रमुष्टि और मंगी ने भी धर्ममार्ग अपनाया। तप और आराधना के उपरान्त सातों भाई प्रथम स्वर्ग में देव हुए। वहाँ से च्युत होकर वे धातकीखण्ड द्वीप में चन्द्रचूल राजा के पुत्रों के रूप में जन्मे। आगे चलकर विभिन्न घटनाओं और संसार की अनित्यता को देखकर उन्होंने पुनः वैराग्य धारण किया और भूतानन्द तीर्थंकर के चरणों में संयम स्वीकार किया। पुनः देवगति प्राप्त करने के बाद वे हस्तिनापुर में शङ्ख तथा गंगदेव के छह पुत्रों के रूप में जन्मे।
श्लोक 258 से 272 : निर्नामक की कथा और पूर्वकर्म का रहस्य
राजा गंगदेव की रानी नन्दयशा अपने सातवें पुत्र से किसी अज्ञात कारण से विरक्त हो गई और उसे धाय रेवती के माध्यम से अपनी बहन बन्धुमती को दे दिया। उस बालक का नाम निर्नामक रखा गया। एक अवसर पर नन्दयशा ने उसे अपमानित किया, जिससे शङ्ख और निर्नामक दोनों दुःखी हुए। बाद में अवधिज्ञानी द्रुमसेन मुनि से कारण पूछने पर उन्होंने पूर्वजन्म की कथा सुनाई, जिसमें एक मांसाहारी रसोइए, राजा चित्ररथ और सुधर्म मुनि से संबंधित कर्मबन्ध का वर्णन किया गया।
श्लोक 273 से 282 : रसोइए का पाप और निरनुकम्प की क्रूरता
द्रुमसेन मुनि ने बताया कि राजा चित्ररथ के वैराग्य ग्रहण करने से क्रोधित रसोइए ने द्वेषवश मुनि को कष्ट पहुँचाया और घोर पापकर्म बाँध लिया। अनेक जन्मों के बाद वही जीव यक्षदत्त के घर निरनुकम्प नामक पुत्र हुआ। उसका छोटा भाई सानुकम्प दयालु था। एक दिन मार्ग में बैठे अन्धे साँप को बचाने का प्रयास करने पर भी निरनुकम्प ने उसे गाड़ी से कुचल दिया। यह हिंसात्मक कर्म उसके भावी दुःखों का कारण बना।
श्लोक 283 से 292 : कर्मफल, दीक्षा और देवकी का पूर्वजन्म
वही साँप अगले जन्म में नन्दयशा बना और निरनुकम्प आगे चलकर निर्नामक के रूप में जन्मा। पूर्वकर्मों के प्रभाव से नन्दयशा को निर्नामक के प्रति अकारण क्रोध उत्पन्न होता था। यह रहस्य जानकर शङ्ख, निर्नामक और अन्य राजकुमारों ने दीक्षा ग्रहण कर ली। नन्दयशा और रेवती ने भी संयम धारण किया, किन्तु पुत्र-स्नेहवश भविष्य में पुनः सम्बन्ध प्राप्त करने का निदान कर लिया। तपस्या के बाद वे सभी महाशुक्र स्वर्ग में देव हुए। वहाँ से च्युत होकर शङ्ख का जीव बलदेव और नन्दयशा का जीव देवकी के रूप में उत्पन्न हुआ। इस प्रकार देवकी के वर्तमान जीवन का कर्म-संबंध स्पष्ट किया गया।
श्लोक 293 से 301 : देवकी के पुत्रों का रहस्य और सत्यभामा का प्रश्न
गणधर ने आगे बताया कि रेवती का जीव अलका सेठानी बनी, जिसके यहाँ देवकी के छह पुत्रों का पालन-पोषण हुआ। ये छहों पुत्र आगे चलकर मोक्षमार्ग के अधिकारी बने। देवकी को उनके प्रति जो विशेष स्नेह था, वह पूर्वजन्म के मातृत्व-संबंध का परिणाम था। पूर्वजन्म का निर्नामक ही आगे चलकर श्रीकृष्ण बना, जिसने स्वयंभू नारायण के ऐश्वर्य की इच्छा का निदान किया था। गणधर ने निष्कर्ष रूप में कहा कि कर्म का उदय अत्यन्त विचित्र और गहन है, जिसे समझना सरल नहीं है। यह कथा सुनकर देवकी ने श्रद्धापूर्वक गणधर को वन्दना की। इसके पश्चात् सत्यभामा ने भी अपने पूर्वभवों का वृत्तान्त जानने की इच्छा से गणधर भगवान् से प्रश्न किया।
श्लोक 302 से 315 : सत्यभामा के पूर्वभव का वर्णन
गणधर भगवान् ने सत्यभामा को उनके पूर्वजन्मों का वृत्तांत सुनाया। शीतलनाथ भगवान् के तीर्थ के विच्छेदकाल में मुण्डशालायन नामक एक विद्वान् ब्राह्मण तप और संयम का विरोध करता था तथा लोगों को केवल दान और भोगों का महत्त्व बताता था। उसके मिथ्योपदेश के कारण उसे नरक और तिर्यंच योनियों में अनेक दुःख भोगने पड़े। बाद में वह काल नामक भील बना और वरधर्म मुनिराज के उपदेश से कुछ सदाचार ग्रहण किया। उसके पुण्य के प्रभाव से वह हरिबल नामक राजकुमार बना, जिसने संयम धारण किया और स्वर्ग में देव हुआ। वहीं से च्युत होकर वह सत्यभामा के रूप में उत्पन्न हुई। एक निमित्तज्ञानी ने उसके पिता को बताया था कि वह भविष्य में अर्धचक्रवर्ती श्रीकृष्ण की महादेवी बनेगी। यह सुनकर सत्यभामा अत्यन्त प्रसन्न हुई।
श्लोक 316 से 324 : लक्ष्मीमति के पाप और दुःखद पुनर्जन्म
रुक्मिणी के पूर्वभव का वर्णन करते हुए गणधर ने बताया कि लक्ष्मीमति नामक ब्राह्मणी ने समाधिगुप्त मुनि की घोर निन्दा की थी। मुनि-निन्दा के फलस्वरूप उसे भयंकर कुष्ठरोग हुआ और समाज में अपमान सहना पड़ा। मृत्यु के बाद वह दुर्गन्धयुक्त कुतिया, फिर साँप, गधा, अन्धा साँप और अन्धा सुअर जैसी अनेक दुःखद योनियों में जन्म लेती रही। प्रत्येक जन्म में उसे अपने पूर्व पापों के कारण कष्ट और तिरस्कार का सामना करना पड़ा।
श्लोक 325 से 341 : पूतिका का धर्ममार्ग और रुक्मिणी के रूप में जन्म
अनेक दुःखद जन्मों के बाद वही जीव पूतिका नामक कन्या के रूप में उत्पन्न हुई। संयोगवश उसे पुनः समाधिगुप्त मुनिराज के दर्शन हुए और उनके प्रति श्रद्धा उत्पन्न हुई। उसने मुनिराज की सेवा की, धर्मोपदेश सुना, उपवास तथा सदाचार का पालन किया और आर्यिकाओं के मार्गदर्शन में धर्ममय जीवन व्यतीत किया। एक श्राविका ने उसे पूर्वकर्मों के फल और धर्म के महत्त्व का बोध कराया। अंत में समाधिमरण करके वह अच्युत स्वर्ग में देवी बनी और वहाँ से च्युत होकर विदर्भ देश में राजा वासव और रानी श्रीमती की पुत्री रुक्मिणी के रूप में जन्मी।
श्लोक 342 से 351 : शिशुपाल के जन्म और भविष्यवाणी
कोशल देश के राजा भेषज और रानी मद्री के यहाँ तीन नेत्रों वाला शिशुपाल उत्पन्न हुआ। ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की कि जिस व्यक्ति को देखकर उसका तीसरा नेत्र लुप्त हो जाएगा, वही उसके वध का कारण बनेगा। बाद में जब वह श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए द्वारावती पहुँचा, तो उसका तीसरा नेत्र तत्काल अदृश्य हो गया। यह देखकर मद्री भयभीत हो गई और उसने कृष्ण से अपने पुत्र की रक्षा की याचना की। कृष्ण ने वचन दिया कि शिशुपाल के सौ अपराध पूर्ण होने तक वे उसका वध नहीं करेंगे। कालांतर में शिशुपाल अत्यन्त पराक्रमी, अभिमानी और क्रूर शासक बन गया।
श्लोक 352 से 362 : शिशुपाल-वध और रुक्मिणी का विवाह
अहंकार से प्रेरित होकर शिशुपाल ने बार-बार श्रीकृष्ण का अपमान किया और उनके विरुद्ध शत्रुता बढ़ाई। उसके सौ अपराध पूर्ण होने पर उसका विनाश निश्चित हो गया। इसी समय रुक्मिणी के पिता उसका विवाह शिशुपाल से करने के लिए तैयार हुए। नारद ने यह समाचार श्रीकृष्ण को दिया। तब श्रीकृष्ण ने सेना सहित जाकर शिशुपाल का वध किया और रुक्मिणी को अपने साथ लाकर महादेवी के पद पर प्रतिष्ठित किया। अपने पूर्वभवों का यह वृत्तांत सुनकर रुक्मिणी अत्यन्त हर्षित हुई।
श्लोक 363 से 372 : जाम्बवती के पूर्वजन्म और आध्यात्मिक उन्नति
जाम्बवती के पूर्वभव का वर्णन करते हुए गणधर ने बताया कि वह पहले देविला नामक कन्या थी, जिसने वैधव्य के पश्चात् व्रत ग्रहण किए और व्यंतर देवी बनी। अगले जन्म में वह बन्धुयशा बनी और धर्मानुष्ठानों के प्रभाव से स्वर्ग में देवांगना हुई। पुनः सुमति नामक कन्या बनकर उसने आर्यिका और मुनियों की सेवा की, दान दिया तथा कठिन उपवास किए। इन पुण्यकर्मों के फलस्वरूप वह अनेक उच्च गतियों को प्राप्त करती हुई अंततः विजयार्ध पर्वत के राजा जाम्बव की पुत्री जाम्बवती बनी।
श्लोक 373 से 382 : जाम्बवती का कृष्ण से विवाह
जाम्बवती के सौन्दर्य पर मोहित होकर नमि नामक विद्याधर उसे प्राप्त करना चाहता था, परन्तु उसके प्रयास विफल हो गए। नारद ने जाम्बवती के रूप और गुणों का वर्णन श्रीकृष्ण से किया। तब कृष्ण ने उसे प्राप्त करने का निश्चय किया। कठिन परिस्थिति देखकर उन्होंने विशेष विद्याओं की साधना की। पूर्वभव के पुण्य के प्रभाव से उन्हें दिव्य विद्याएँ सिद्ध हुईं। उन विद्याओं की सहायता से उन्होंने युद्ध में जाम्बव को पराजित किया और जाम्बवती को द्वारावती लाकर महादेवी के पद पर प्रतिष्ठित किया।
श्लोक 383 से 391 : सुसीमा के प्रारम्भिक पूर्वभव
इसके बाद सुसीमा ने अपने पूर्वजन्मों का विवरण पूछा। गणधर ने बताया कि पूर्व विदेह क्षेत्र में विश्वदेव नामक राजा की रानी अनुन्दरी पति-वियोग के शोक में अग्नि में प्रवेश कर व्यंतर देवी बनी। अनेक जन्मों के बाद वही जीव यक्षदेवी नामक कन्या के रूप में उत्पन्न हुई। उसने धर्मसेन मुनि से व्रत ग्रहण किए और तपस्वी मुनि को आहारदान देकर महान् पुण्य अर्जित किया।
श्लोक 392 से 403 : सुसीमा और लक्ष्मणा के पूर्वभव
यक्षदेवी आगे चलकर अनेक शुभ जन्मों में धर्म, तप और उपवास का पालन करती रही। कनकावली जैसे कठिन व्रतों के प्रभाव से वह माहेन्द्र स्वर्ग में देवी बनी और वहाँ से च्युत होकर सुराष्ट्रवर्धन राजा की पुत्री सुसीमा बनी, जो बाद में श्रीकृष्ण की पट्टरानी हुई। इसके पश्चात् गणधर ने लक्ष्मणा के पूर्वभव का वर्णन आरम्भ किया। पूर्व विदेह क्षेत्र में वसुमती नामक रानी पुत्र-मोह के कारण संयम ग्रहण न कर सकी और भीलनी बनी। बाद में उसने श्रावक धर्म अपनाया, स्वर्ग में देवांगना हुई और पुनः कनकमाला नामक राजकुमारी के रूप में जन्म लेकर पुण्य और धर्म के मार्ग पर अग्रसर हुई।
श्लोक 404 से 413 : लक्ष्मणा का पूर्वभव और श्रीकृष्ण से विवाह
कनकमाला ने पूर्वजन्मों का स्मरण प्राप्त कर मुक्तावली उपवास किया, जिसके प्रभाव से वह तृतीय स्वर्ग में इन्द्राणी बनी। वहाँ से च्युत होकर वह राजा शम्बर और रानी श्रीमती की पुत्री लक्ष्मणा के रूप में उत्पन्न हुई। लक्ष्मणा रूप, गुण और शुभ लक्षणों से सम्पन्न थी। पवनवेग विद्याधर ने उसके सौन्दर्य और योग्यता का वर्णन श्रीकृष्ण से किया। कृष्ण की आज्ञा से वह लक्ष्मणा को उसके माता-पिता की स्वीकृति सहित द्वारावती ले आया और कृष्ण को समर्पित कर दिया। इस प्रकार लक्ष्मणा का विवाह श्रीकृष्ण से हुआ।
श्लोक 414 से 421 : लक्ष्मणा का सम्मान और गान्धारी के पूर्वभव का आरम्भ
श्रीकृष्ण ने लक्ष्मणा को महादेवी का पद देकर सम्मानित किया। अपने पूर्वजन्मों का वृत्तांत सुनकर लक्ष्मणा अत्यन्त प्रसन्न हुई। इसके बाद कृष्ण ने गान्धारी, गौरी और पद्मावती के पूर्वभव जानने की इच्छा प्रकट की। गणधर भगवान् ने गान्धारी की कथा आरम्भ करते हुए बताया कि अयोध्या के राजा रुद्र की रानी विनयश्री ने एक मुनिराज को श्रद्धापूर्वक आहारदान दिया था। उस पुण्य के प्रभाव से वह उत्तम गतियों को प्राप्त करती हुई आगे अनेक शुभ जन्मों में उत्पन्न हुई।
श्लोक 422 से 431 : गान्धारी के पूर्वजन्म और विवाह
सुरूपा और उसके पति महेन्द्रविक्रम ने सुमेरु पर्वत पर चारण ऋद्धिधारी मुनियों का धर्मोपदेश सुना। उसके प्रभाव से राजा ने दीक्षा धारण कर ली और रानी ने आर्यिका के समीप संयम ग्रहण किया। संयम और पुण्य के प्रभाव से वह सौधर्म स्वर्ग में देवी बनी तथा बाद में गान्धार देश के राजा इन्द्रगिरि की पुत्री गान्धारी के रूप में जन्मी। जब उसके विवाह का अन्यत्र निर्णय हुआ, तब नारद ने यह समाचार श्रीकृष्ण को दिया। कृष्ण ने युद्ध में इन्द्रगिरि और उसके सहयोगियों को पराजित कर गान्धारी को प्राप्त किया और उसे पट्टरानी बनाया।
श्लोक 432 से 441 : गौरी के पूर्वभव और पुण्य का प्रभाव
गौरी के पूर्वभव का वर्णन करते हुए गणधर ने बताया कि पूर्वजन्म में वह आनन्दयशा नामक वैश्यकन्या थी, जिसने मुनिराज को आहारदान देकर महान् पुण्य अर्जित किया। उसके फलस्वरूप वह उत्तरकुरु और देवगति में जन्मी। बाद में यशस्वती रानी के रूप में उत्पन्न होकर उसने पुनः मुनियों के प्रति श्रद्धा रखी, उपवास और धर्माचरण किया। आगे चलकर वह कौशाम्बी में धार्मिकी नामक कन्या बनी और जिनगुणसम्पत्ति व्रत का पालन किया। इन पुण्यों के प्रभाव से वह महाशुक्र स्वर्ग में देवी बनी और अंततः वीतशोक नगर के राजा मेरुचन्द्र की पुत्री गौरी के रूप में जन्मी। बाद में वह श्रीकृष्ण की पट्टरानी बनी।
श्लोक 442 से 459 : पद्मावती के पूर्वभव और आध्यात्मिक साधना
पद्मावती के पूर्वजन्मों का वर्णन करते हुए गणधर ने बताया कि वह पहले विनयश्री नामक राजकुमारी थी, जिसने समाधिगुप्त मुनिराज को आहारदान दिया था। इसके फलस्वरूप उसने अनेक शुभ गतियाँ प्राप्त कीं। बाद में पद्मदेवी नामक कन्या के रूप में उसने यह दृढ़ व्रत लिया कि संकट में भी अनजाना फल ग्रहण नहीं करेगी। भीलों के आक्रमण के समय जब अन्य लोगों ने विषैले फल खाकर प्राण त्याग दिए, तब भी उसने अपने व्रत का उल्लंघन नहीं किया और उपवासपूर्वक मृत्यु को प्राप्त हुई। इस महान् धर्मनिष्ठा के कारण वह उच्च भोगभूमियों, देवगति और पुनः मनुष्य जन्मों को प्राप्त करती रही। आगे चलकर विमलश्री के रूप में उसने संयम ग्रहण किया और कठोर तप किए। इन पुण्यों के प्रभाव से वह सहस्त्रार स्वर्ग में देवी बनी तथा अंततः अरिष्टपुर के राजा हिरण्यवर्मा की पुत्री पद्मावती के रूप में जन्मी। स्वयंवर में उसने श्रीकृष्ण का वरण किया और महादेवी का पद प्राप्त किया।
श्लोक 460 से 462 : धर्म की महिमा और नेमिनाथ के उपदेश की स्वीकृति
गणधर भगवान् ने श्रीकृष्ण की आठों रानियों के पूर्वभवों का विस्तृत और स्पष्ट वर्णन किया। इन कथाओं को सुनकर श्रीकृष्ण तथा उनकी रानियाँ अपने कर्मों के प्रभाव, पुण्य और पाप के परिणाम तथा धर्म की महत्ता को भलीभाँति समझ सके। सभी रानियों ने गणधर के उपदेशों को हृदयंगम किया और अर्हन्त भगवान् के कल्याणकारी धर्म में अपनी दृढ़ श्रद्धा स्थापित की। सभा में उपस्थित सभी जनों ने भी यह स्वीकार किया कि संसार में धर्म से बढ़कर कोई कल्याणकारी साधन नहीं है। इस प्रकार सभी ने भगवान् नेमिनाथ द्वारा प्रतिपादित धर्म को श्रद्धापूर्वक अंगीकार किया और भवान्तरों के इस उपदेश से आत्मकल्याण का मार्ग ग्रहण किया।
पर्व 70 – श्लोक 456 से 471 | श्लोक 472 से 481 | श्लोक 482 से 491 | श्लोक 492 से 497
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1
अथ कंसवधूमुक्तलोचनाम्भः प्रपायिनः । ‘भूभूरूहात्समुत्पन्नाः समन्तादुत्सवाङ्कराः ॥ १ ॥
अथानन्तर- कंसकी स्त्रियों द्वारा छोड़े हुए अश्रुजलका पान कर पृथ्वी रूपी वृत्तसे चारों ओर उत्सव रूपी अङ्कुर प्रकट होने लगे ।। १ ।।
“Thereafter, drinking the tears shed by Kansa’s wives, the earth-tree began to sprout celebrations all around.”1
श्लोक ( Shlok ) 2 – 6
वसुदेवमहीशस्य किलैष कृतिनः सुतः । ब्रजे कंसभयाद् वृद्धिं शूरः प्रच्छन्नमाप्तवान् ॥ २ ॥वृद्धिरस्य स्वपक्षस्य वृद्धये नैव केवलम् । जगतश्च तुषारांशोरिव वृद्धिश्चिता क्रमात् ॥ ३ ॥ इत्यभिष्ट्यमानस्य पौरतडेशवासिभिः । विपाशितोग्रसेनाख्यमहीशस्य महात्मनः ॥ ४ ॥ विसर्जितवतो नन्दगोपांश्चापूज्य सद्धनैः । प्रविश्य बन्धुभिः सङ्गत्तस्य शौर्यपुरं हरेः ॥ ५ ॥ काले सुखेन यात्येवं देवी जीवद्यशास्ततः । दुःखिता मरणात्पत्युर्जरासन्धमुपेत्य सा ॥ ६ ॥
‘यह शूरवीर, पुण्यात्मा वसुदेव राजाका पुत्र है, कंसके भयप्ते छिप कर व्रजमें वृद्धिको प्राप्त हो रहा था, अनुक्रमसे होनेवाली वृद्धि, न केवल इनके पक्षकी ही वृद्धिके लिए है अपितु चन्द्रमाके समान समस्त संसारकी वृद्धिके लिए है’ इस प्रकार नगरवासी तथा देशवासी लोग जिनकी स्तुति करते थे, जिन्होंने राजा उग्रसेनको बन्धन-मुक्त कर दिया था, नो महात्मा थे, जिन्होंने उत्तम धनके द्वारा नन्द आदि गोपालोंकी पूजा कर उन्हें विदा किया था, और जो भाई-बन्धुओंके साथ मिलकर शौर्यपुर नगर में प्रविष्ट हुए थे ऐसे श्रीकृष्णका समय सुखसे बीत रहा था कि एक दिन कंसकी रानी जीवद्यशा पतिकी मृत्युसे दुःखी होकर जरासंधके पास गई । उसने मथुरापुरीमें जो वृत्तान्त हुआ था वह सब जरासन्धको बतला दिया ॥ २-६ ॥
“This heroic and pious soul is the son of King Vasudeva. Out of fear of Kansa, he was secretly growing up in Vraja. His sequential growth is not merely for the prosperity of his own clan, but, like the moon, it is for the elevation and prosperity of the entire world.”
In this manner, the citizens of the city and the countryside sang his praises. He was the high-souled Mahatma who had liberated King Ugrasena from bondage, and who had honored Nanda and the other cowherds with excellent wealth before bidding them farewell. Thus, having entered the city of Shouryapura alongside his brothers and kinsmen, Krishna was spending his time in peace and happiness.
Then, one day, Kansa’s queen, Jivadyasha, overwhelmed with grief over her husband’s death, went to Jarasandha. She related to him the entire sequence of events that had transpired in Mathurapuri. || 2-6 ||
श्लोक ( Shlok ) 7
तत्र प्रवृत्तवृत्तान्तमशेषं तमबूबुधत् । श्रुत्वाऽसौ च रुषा पुत्रानादिशद्यादवान् प्रति ॥ ७ ॥
उस वृत्तान्तको सुनकर जरासंधने क्रोधवश पुत्रोंको यादवोंके प्रति चढ़ाई करनेकी आज्ञा दी ॥ ७ ॥
“Upon hearing that account, Jarasandha, consumed by rage, ordered his sons to march and wage war against the Yadavas. || 7 ||”
श्लोक ( Shlok ) 8
तेऽपि सन्नाह्य सैन्यं स्वं गत्वा युध्वा रणाङ्गणे । भङ्गमापन्नके वापुर्दैवं वैमुख्यमीयुषि ॥ ८ ॥
वे पुत्र अपनी सेना सजाकर गये और युद्धके आंगनमें पराजित हो गये सो ठीक ही है क्योंकि भाग्यके प्रतिकूल होनेपर कौन पराजयको प्राप्त नहीं होते ? ॥ ८ ॥
“Those sons, having arrayed their armies, marched to war but were utterly defeated on the battlefield. And rightly so—for when fortune is adverse, who does not suffer defeat? || 8 ||”
श्लोक ( Shlok ) 9
प्राहिणोत्स पुनः कोपात्तनूजमपराजितम् । मत्वैवान्वर्थनामानं तद्विषामन्तकोपमम् ॥ ९ ॥
अबकी बार जरासंधने कुपित होकर अपना अपराजित नामका पुत्र भेजा क्योंकि वह उसे सार्थक नामवाला तथा शत्रुओंके लिए यमराजके समान समझता था ॥ ९ ॥
“This time, Jarasandha, filled with wrath, sent his son named Aparajita; for he considered him truly worthy of his name (‘Invincible’) and looked upon him as Yamaraja (the God of Death) himself for his enemies. || 9 ||”
श्लोक ( Shlok ) 10
शतत्रयं उसषट्चत्वारिंशत्सोऽपि महाबलः । चिरं विधाय युद्धानां विपुण्योऽभूत्पराङ्मुखः ॥ १० ॥
बड़ी भारी सेना लेकर अपराजित गया और चिरकाल तक उसने तीन-सौ छयालीस बार युद्ध किया परन्तु पुण्य क्षीण हो जानेसे उसे भी पराङ्मुख होना पड़ा ।। १० ।।
“Leading a massive army, Aparajita marched forth and waged war for a very long time—a total of three hundred and forty-six times. Yet, because his store of merit (punya) was exhausted, he too was forced to turn his back in defeat. || 10 ||”
श्लोक ( Shlok ) 11
पुनः पितृनिदेशेन प्रस्थानमकृतोद्यमी । यादवानुद्धरामीति तुक्कालयवनाभिधः ॥ ११ ॥
तदनन्तर ‘मैं पिताकी आज्ञासे यादवोंको अवश्य जीतूंगा’ ऐसा संकल्प कर उसके उद्यमी कालयवन नामक पुत्रने प्रस्थान किया ।। ११ ।।
“Thereafter, resolving with firm determination, ‘By my father’s command, I shall surely conquer the Yadavas,’ his industrious son named Kalayavana set forth. || 11 ||”
श्लोक 12 से 21
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92
नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 94 | श्लोक 95 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 131 | श्लोक 132 से 144 | श्लोक 145 से 153 | श्लोक 154 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 243 | श्लोक 244 से 252 | श्लोक 253 से 273 | श्लोक 274 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 375 | श्लोक 376 से 392 | श्लोक 393 से 402 | श्लोक 403 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 431 | श्लोक 432 से 441 | श्लोक 442 से 455 | श्लोक 456 से 471 | श्लोक 472 से 481 | श्लोक 482 से 491 | श्लोक 492 से 497
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