नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 46 | श्लोक 47 से 61
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 72- shlok 62 to 71
श्लोक ( Shlok ) 62
इतः सुवियोगेन रुक्मिणी शोकवह्निना । दह्यमाना स्थलाम्भोजवल्लीव वनवह्निना ॥ ६२ ॥
इधर जिस प्रकार दावानलसे गुलाबकी बेल जलने लगती है उसी प्रकार पुत्र-विरह के कारण रुक्मिणी शोकाग्निसे जलने लगी ॥ ६२ ॥
Meanwhile, just as a rose creeper begins to burn in a forest fire, Rukmini began to burn in the fire of grief due to separation from her son. ॥ 62 ॥
श्लोक ( Shlok ) 63 – 64
सम्पत्तिर्वा चरित्रस्य दयाभावविवर्जिता । कार्याकार्यविचारेषु मन्दमन्देव शेमुषी ॥ ६३ ॥मेधमालेव कालेन निर्गलज्जलसंचया । नाबभासे ‘गते प्राणे क्क भवेत्सुप्रभा तनोः ॥ ६४ ॥
जिस प्रकार चारित्रहीन मनुष्यकी दयाभावसे रहित सम्पत्ति शोभा नहीं देती, अथवा जिस प्रकार कार्य और अकार्यके विचारमें शिथिल बुद्धि सुशोभित नहीं होती और जिस प्रकार काल पाकर जिसका पानी बरस चुका है ऐसी मेघमाला सुशोभित नहीं होती उसी प्रकार वह रुक्मिणी भी सुशोभित नहीं हो रही थी सो ठीक ही है क्योंकि प्राण निकल जानेपर शरीरकी शोभा कहाँ रहती है ? ॥ ६३-६४ ।।
Just as the wealth of a characterless person—devoid of compassion—lacks grace; or just as an intellect that has grown lax in distinguishing between proper and improper actions does not shine; and just as a cluster of clouds whose rain has been spent over time no longer looks beautiful; in that very same manner, Rukmini no longer appeared beautiful. And this is truly fitting, for once the life-force has departed, where remains the beauty of the body? ॥ 63-64 ॥
श्लोक ( Shlok ) 65
तथैव वासुदेवोऽपि तद्वियोगादगाच्छुचम् । पृथक्तरुलतायोगे न वज्रपरिताडनम् ॥ ६५॥
रुक्मिणीकी भांति श्रीकृष्ण भी पुत्रके वियोगसे शोकको प्राप्त हुए सो ठीक ही है क्योंकि जब वृक्ष और लताका संयोग रहता है तब उन्हें नष्ट करनेके लिए अलगअलग वज्रपातकी आवश्यकता नहीं रहती ।॥ ६५ ॥
Just like Rukmini, Shri Krishna too was struck with deep grief due to the separation from his son. This is truly fitting, because when a tree and a creeper grow entwined together, there is no need for separate lightning strikes to destroy them both. ॥ 65 ॥
श्लोक ( Shlok ) 66
जलाशयस्तृषार्तस्य केकिनो जलदागमः । यथा तथास्य सन्तृप्त्यै सन्निधिं नारदोऽगमत् ॥ ६६ ॥
जिस प्रकार प्याससे पीड़ित मनुष्यके लिए जलाशयका मिलना सुखदायक होता है और मयूरके लिए मेघका आना सुखदायी होता है उसी प्रकार श्रीकृष्णको सुख देनेके लिए नारद उनके पास आया ॥ ६६ ॥
Just as finding a reservoir of water is joyful for a person afflicted with thirst, and just as the arrival of a rain cloud is delightful for a peacock, in that very same manner, Narada came to Shri Krishna to bring him solace and joy. ॥ 66 ॥
श्लोक ( Shlok ) 67
तं वीक्ष्य बालवृत्तान्तं हरिरुक्त्वाभ्यधादिदम् । त्वया केनाप्युपायेन कापि सोऽन्विष्यतामिति ॥ ६७ ॥
उसे देखते ही श्रीकृष्णने बालकका सब वृत्तान्त सुनाकर कहा कि जिस किसी भी उपायसे जहाँ कहों भी संभव हो आप उस बालकी खोज कीजिये ।। ६७ ।।
The moment Shri Krishna saw him, he related the entire account of the child and said, “By whatever means possible and wherever it might be, please search for that boy.” ॥ 67 ॥
श्लोक ( Shlok ) 68 – 70
नारदस्तत्समाकर्ण्य शृणु पूर्वविदेहजे । नगरे पुण्डरीकिण्यां मया तीर्थकृतो गिरा ॥ ६८ ॥स्वयंप्रभस्य ज्ञातानि वार्ता बालस्य पृच्छता । भवान्तराणि तदृद्धिस्थानं लाभो महानपि ॥ ६९ ॥सहयोगो युवाभ्याञ्च तस्य षोडशवत्सरैः । इत्यसौ वासुदेवञ्च रुक्मिणीञ्च यथाश्रुतम् ॥ ७० ॥
यह सुनकर नारद कहने लगा कि सुनो ‘पूर्व-बिदेह क्षेत्रकी पुण्डरीकिणी नगरीमें स्वयंप्रभ तीर्थकरसे मैंने बालककी बात पूछी थी । अपने प्रश्नके उत्तरमें मैंने उनकी वाणीसे बालकके पूर्व भव जान लिये हैं, वह वृद्धिका स्थान है अर्थात् सब प्रकारसे बढ़ेगा, उसे बड़ा लाभ होगा और सोलह वर्ष बाद उसका आप दोनोंके साथ समागम हो जावेगा’ । इस प्रकार नारदने जैसा सुना था वैसा श्रीकृष्ण तथा रुक्मिणीको समझा दिया ॥ ६८-७० ॥
Hearing this, Narada began to speak, “Listen, in the city of Pundarikini within the Purva-Videha region, I asked the Tirthankara Svayamprabha about the child. In response to my question, I learned of the child’s past lives through his divine speech. The boy is in a state of growth—meaning he will prosper in every possible way and achieve great fortunes—and after sixteen years, his reunion with both of you will take place.” In this manner, Narada explained to Shri Krishna and Rukmini everything exactly as he had heard it. ॥ 68-70 ॥
श्लोक ( Shlok ) 71
प्राबोधयत्तयोस्तस्मात्सुरसेनानृलोकयोः । प्रादुर्भावाज्जिनस्येव प्रमोदः परमोऽभवत् ॥ ७१ ॥
जिस प्रकार जिनेन्द्र भगवान्का जन्म होते ही देवोंकी सेना तथा मनुष्य लोकमें परम हर्ष उत्पन्न होता है उसी प्रकार नारदके वचन सुनते ही रुक्मिणी तथा श्रीकृष्णको परम हर्ष उत्पन्न हुआ ।॥ ७१ ॥
Just as supreme joy arises within the armies of the celestial beings and the mortal world the very moment a Jinendra Lord is born, in that very same manner, supreme joy arose in Rukmini and Shri Krishna the moment they heard the words of Narada. ॥ 71 ॥
श्लोक 72 से 81
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नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 46 | श्लोक 47 से 61
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