अनन्तनाथ तीर्थंकर, सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायणके पुराणका वर्णन पर्व 60 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 61
English translation of Uttar Puran parv 60- shlok 62 to 71
श्लोक ( Shlok ) 62
संन्यस्यन्ति सहस्त्रारं प्राप्याष्टादशसागर । स्थिति भोगांश्चिरं भुक्त्वा तदन्ते शान्तमानसः ॥ ६२ ॥
अन्तमें संन्यास धारण कर अठारह सागरकी स्थितिवाले सहस्त्रार स्वर्गमें उत्पन्न हुआ । वहाँ चिरकाल तक भोग भोगता रहा। जब अन्तिम समय आया तब शान्तचित्त होकर मरा ॥ ६२ ॥
“In the end, adopting the vows of holy fasting (Sanyasa), he was reborn in the Sahasrara heaven, which has a lifespan of eighteen Sagaras. There, he enjoyed celestial pleasures for a very long time. When his final hour arrived, he passed away with a peaceful mind. || 62 ||”
श्लोक ( Shlok ) 63
अथेह भारते द्वारवत्यां सोमप्रभप्रभोः । जयवत्यामभूत्सूनुः सुरूपः सुप्रभाह्वयः ॥ ६३ ॥
और इसी जम्बूद्वीप सम्बन्धी भरत क्षेत्रकी द्वार-वती नगरके स्वामी राजा सोमप्रभकी रानी जयवन्तीके सुप्रभ नामका सुन्दर पुत्र हुआ ॥ ६३ ॥
“And in this very same Jambudvipa, in the Bharata region, a beautiful son named Suprabha was born to Jayavanti, the queen of King Somaprabha, who was the ruler of the city of Dvaravati. || 63 ||”
श्लोक ( Shlok ) 64
महायतिः समुत्तुङ्गः सुरविद्याधराश्रयः । श्वेतिमानं दधत् सोऽभाद् विजयार्द्ध इवापरः ॥ ६४ ॥
वह सुप्रभ दूसरे विजयार्धके समान सुशोभित हो रहा था क्योंकि जिस प्रकार विजयार्ध महायति -बहुत लम्बा है उसी प्रकार सुप्रभ भी महायति – उत्तम भविष्यसे सहित था, जिस प्रकार विजयार्ध समुतुङ्ग – ऊँचा है उसी प्रकार सुप्रभ भी समुतुङ्ग – उदार प्रकृति का था, जिस प्रकार विजयार्ध देव और विद्याधरोंका आश्रय- आधार – रहनेका स्थान है उसी प्रकार सुप्रभ भी देव और विद्याधरोंका आश्रय-रक्षक था और जिस प्रकार विजयार्ध श्वेतिमा – शुक्लवर्णको धारण करता है उसी प्रकार सुप्रभ भी श्वेतिमा शुक्लवर्ण अथवा कीर्ति सम्बन्धी शुक्तताको धारण करता था ॥ ६४ ॥
“That Suprabha was resplendent like a second Vijayardha mountain; because just as Mount Vijayardha is Mahayati (vastly elongated), Suprabha too was Mahayati (endowed with a great and glorious future); just as Vijayardha is Samutunga (lofty and high), Suprabha too was Samutunga (of a noble and lofty disposition); just as Vijayardha is the Aashraya (abode/shelter) for gods and Vidyadharas, Suprabha too was the Aashraya (protector/refuge) for deities and scholars; and just as Vijayardha possesses Shvetima (a brilliant white complexion), Suprabha too possessed Shvetima (pure white radiance or a spotless, pure white reputation). || 64 ||”
श्लोक ( Shlok ) 65
कलङ्कविकलः कान्तः सन्ततं सर्वचित्तहृत् । पद्मानन्दविधायीत्थमतिशेते विधुं च सः ॥ ६५ ॥
यही नहीं, वह सुप्रभ चन्द्रमाको भी पराजित करता था क्योंकि चन्द्रमा कलङ्कसहित है परन्तु सुप्रभकलङ्करहित था, चन्द्रमा केवल रात्रिके समय ही कान्त – सुन्दर दिखता है परन्तु सुप्रभ रात्रिदिन सदा ही सुन्दर दिखता था, चन्द्रमा सबके चित्तको हरण नहीं करता – चकवा आदिको प्रिय नहीं लगता परन्तु सुप्रभ सबके चित्तको हरण करता था- सर्वप्रिय था, और चन्द्रमा पद्मानन्दविधायी नहीं है-कमलोंको विकसित नहीं करता परन्तु सुप्रभ पद्मानन्दविधायी था- लक्ष्मीको आनन्दित करनेवाला था ।। ६५ ।।
“Not only this, but Suprabha also surpassed the moon; because the moon is possessed of a blemish (Kalanka), but Suprabha was unblemished. The moon appears radiant (Kanta) only during the night, but Suprabha appeared radiant day and night, at all times. The moon does not captivate the hearts of everyone—as it is not dear to the Chakvaka birds—but Suprabha captivated the hearts of all and was universally beloved. And while the moon is not Padmanandavidhayi—as it does not cause the day-lotuses to bloom—Suprabha was truly Padmanandavidhayi, for he brought supreme joy to the Goddess of Wealth, Lakshmi. || 65 ||”
श्लोक ( Shlok ) 66
तस्यैव सुषेणाख्यः सीतायां पुरुषोत्तमः । तोकोऽजनि जनानन्दविधायी विविधैर्गुणैः ॥ ६६ ॥
उसी राजाकी सीता नामकी रानीके वसुषेणका जीव पुरुषोत्तम नामका पुत्र हुआ जो कि अनेक गुणोंसे मनुष्योंको आनन्दित करने वाला था ।॥ ६६ ॥
“To the same king’s queen, named Sita, was born a son named Purushottama—who was the soul of King Vasushena reborn. He delighted all people with his numerous virtues. || 66 ||”
श्लोक ( Shlok ) 67
सेव्यस्तेजस्विभिः सर्वैरविलङ्घयमहोन्नतिः । महारत्नसमुद्भासी सुमेरुरिव सुन्दरः ॥ ६७ ॥
वह पुरुषोत्तम सुमेरु-पर्वतके समान सुन्दर था क्योंकि जिस प्रकार सुमेरुपर्वत समस्त तेजस्वियों- सूर्य चन्द्रमा आदि देवोंके द्वारा सेव्यमान है उसी प्रकार पुरुषोत्तम भी समस्त तेजस्वियों – प्रतापी मनुष्योंके द्वारा सेव्यमान था, जिस प्रकार सुमेरु पर्वतकी महोन्नत्ति – भारी ऊँचाईका कोई भी उल्लंघन नहीं कर सकता उसी प्रकार पुरुषोत्तमकी महोन्नति – भारी श्रेष्ठता अथवा उदारताका कोई भी उल्लंघन नहीं कर सकता और जिस प्रकार सुमेरु पर्वत महारत्नों-बड़े-बड़े रत्नोंते सुशोभित है उसी प्रकार पुरुषोत्तम भी महारत्नों – बहुमूल्य रत्नों अथवा श्रेष्ठ पुरुषोंसे सुशोभित था ॥ ६७ ॥
“That Purushottama was resplendent like Mount Sumeru; because just as Mount Sumeru is revered and frequented (Sevyamana) by all luminous celestial bodies—such as the sun, the moon, and the gods—Purushottama too was revered and served (Sevyamana) by all illustrious and powerful men. Just as no one can surpass the Mahonnati (immense height) of Mount Sumeru, no one could transgress or match the Mahonnati (great loftiness, nobility, or generosity) of Purushottama. And just as Mount Sumeru is adorned with Maharatnas (magnificent, large gemstones), Purushottama too was adorned with Maharatnas (valuable jewels and exceptionally noble or excellent men). || 67 ||”
श्लोक ( Shlok ) 68
शुक्लकृष्णत्विषौ लोकव्यवहारप्रवर्तकौ । पक्षाविव विभातः स्म युक्तौ तौ रामकेशवौ ॥ ६८ ॥
वे बलभद्र और नारायण क्रमशः शुक्ल और कृष्ण कान्तिके धारक थे, तथा समस्त लोक-व्यवहारके प्रवर्तक थे अतः शुक्लपक्ष और कृष्णपक्षके समान सुशोभित होते थे ॥ ६८ ॥
“Those two, Balabhadra (Suprabha) and Narayana (Purushottama), possessed a bright and dark radiance respectively, and were the originators of all worldly conduct; thus, they shone beautifully like the bright fortnight (Shukla-paksha) and the dark fortnight (Krishna-paksha) of the lunar month. || 68 ||”
श्लोक ( Shlok ) 69
पञ्चाशद्धनुरुच्छ्रायौ त्रिंशलक्षसमायुषौ । समं समसुखौ कालं समजीगमतां चिरम् ॥ ६९ ॥
उन दोनोंका पचास धनुष ऊँचा शरीर था, तीस लाख वर्षकी दोनोंकी आयु थी और एक समान दोनोंको सुख था अतः साथ ही साथ सुखोपभोग करते हुए उन्होंने बहुत-सा समय बिता दिया ।। ६९ ।।
“Both of them possessed a stature that was fifty Dhanushas (bow-lengths) tall, their lifespan was thirty lakh (three million) years, and they experienced equal happiness; thus, enjoying worldly pleasures together, they spent a vast amount of time. || 69 ||”
श्लोक ( Shlok ) 70 – 71
अथ आन्त्वा भवे दीर्घ प्राक्तनश्चण्डशासनः । चण्डांशुरिव चण्डोऽभूद्दण्डितारातिमण्डलः ॥ ७० ॥काशिदेशे नृपो वाराणसीनगरनायकः । मधुसूदनशब्दाख्यो विख्यातबलविक्रमः ॥ ७१ ॥
अथानन्तर – पहले जिस चण्डशासनका वर्णन कर आये हैं वह अनेक भवोंमें घूमकर काशी देशकी वाराणसी नगरीका स्वामी मधुसूदन नामका राजा हुआ। वह सूर्यके समान अत्यन्त तेजस्वी था, उसने समस्त शत्रुओंके समूहको दण्डित कर दिया था तथा उसका बल और पराक्रम बहुत ही प्रसिद्ध था ।। ७०-७१ ॥
“Thereafter, the previously described Chandashasana, after wandering through numerous lifetimes, was reborn as a king named Madhusudana, the ruler of the city of Varanasi in the Kashi country. He was exceedingly radiant like the sun, had subdued the entire multitude of his enemies, and his strength and valor were immensely renowned. || 70-71 ||”
श्लोक 72 से 81
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