नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 274 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 352 to 363
श्लोक ( Shlok ) 352 – 360
अतोऽन्यत्प्रकृतं ब्रूमो जरासन्धमहीपतिः । निर्जिताशेषभूपालः कदाचित्कार्यशेषवान् ॥३५२॥सुरम्यविषयान्तःस्थपौदनाख्यपुराधिपम् । रिपुं सिंहरथं जित्वा बलाद्युद्धे ममान्तिकम् ॥३५३॥बध्वानीतवते देशस्यार्धं मत्पुत्रिकामपिं । कलिन्दसेनासम्भूतां सतीं जीवद्यशोभिधाम् ॥३५४॥दास्यामीत्यभिभूपालान्प्राहिणोत्पत्रमालिकाः । वसुदेवकुमारस्तत्परिगृह्य प्रतापवान् ॥३५५॥वाजिनः सिंहमूत्रेण भावयित्वा रथं स तैः । वाह्यमारुह्य संग्रामे जित्वा सिंहरथं पृथुम् ॥३५६॥कंसेन निजभृत्येन बन्धयित्वा महीपतेः । स्वयं समर्पयामास सोऽपि तुष्ट्वा सुतां निजाम् ॥३५७॥देशार्थेन समं तस्मै प्रतिपन्नां’ प्रदत्तवान् । वसुदेवोऽपि तां दुष्टलक्षणां वीक्ष्य नो मया ॥३५८॥बद्धः सिंहरथः कर्म कंसेनानेन तत्कृतम् । कन्या प्रदीयतामस्मै भवत्प्रेषणकारिणे ॥३५९॥इत्याह तद्वचः श्रुत्वा जरासन्धनरेश्वरः । कुलं कंसस्य विज्ञातुं दूतं मण्डोदरीं प्रति ॥ ३६०॥
अब इसीसे सम्बन्ध रखनेवाली एक अन्य कथा कहते हैं और वह इस प्रकार है- यद्यपि राजा जरासन्धने सब राजाओंको जीत लिया था तो भी किसी समय उसका कुछ कार्य बाकी रह गया था। उसकी पूर्तिके लिए जरासन्धने सब राजाओंके पास इस आशयके पत्र भेजे कि जो राजा सुरम्य देशके मध्यमें स्थित पोदनपुरके स्वामी हमारे शत्रु सिंहरथको युद्धमें अपने बलसे जीतकर तथा बाँधकर हमारे पास लावेगा उसे मैं आधा देश तथा कलिन्दसेना रानीसे उत्पन्न हुई जीवद्यशा नामकी अपनी पतिव्रता पुत्री दूंगा। प्रतापी राजा वसुदेवने जब यह पत्र पाया तो उन्होंने सिंहका मूत्र मॅगाकर घोड़ोंके शरीर पर लगवाया, उन्हें रथमें जोता और तदनन्तर ऐसे रथपर आरूढ़ होकर चल पड़े। वहाँ जाकर उन्होंने संग्राममें उस भारी राजा सिंहरथको जीत लिया और अपने सेवक कंसके द्वारा उसे बँधवा कर स्वयं राजा जरासन्धको सौंप दिया। राजा जरासन्ध भी सन्तुष्ट होकर वसुदेवके लिए आधे देशके साथ अपनी पूर्व प्रतिज्ञात पुत्री देने लगा। उस समय वसुदेवने देखा कि उस पुत्रीके लक्षण अच्छे नहीं हैं अतः कह दिया कि सिंहरथको मैंने नहीं बाँधा है यह कार्य इस कंसने किया है इसलिए इसी आज्ञाकारीके लिए यह कन्या दी जावे । वसुदेवके वचन सुनकर राजा जरासन्धने कंसका कुल जाननेके लिए मण्डोदरीके पास अपना दूत भेजा ॥ ३५२-३६०।।
“Now, another related story is told, which goes as follows:
Although King Jarasandha had conquered all other kings, there was still a certain task left unaccomplished. To achieve this, Jarasandha sent letters to all the kings with this message: ‘Whosoever among the kings shall conquer our enemy Simharatha—the lord of Podanpur situated in the midst of the beautiful Suramya country—by his own might, bind him, and bring him to me, I shall grant him half of my kingdom and give him the hand of my devoted daughter, Jivadyasha, born of Queen Kalindasena.’
Upon receiving this letter, the glorious King Vasudeva procured the urine of a lion and had it smeared over the bodies of his horses. He then yoked them to his chariot and set forth, riding upon it. Arriving there, he vanquished the mighty King Simharatha in battle. He then had Simharatha bound by his servant, Kansa, and personally delivered him to King Jarasandha.
Highly pleased, King Jarasandha prepared to bestow half the kingdom along with his previously promised daughter upon Vasudeva. At that moment, Vasudeva observed that the princess possessed inauspicious physical traits (Lakshanas). Therefore, he declared, ‘I did not bind Simharatha myself; this feat was performed by this Kansa. Thus, let this maiden be given to this obedient servant.’
Upon hearing Vasudeva’s words, King Jarasandha dispatched his messenger to Mandodari to ascertain Kansa’s true lineage.”352 – 360
श्लोक ( Shlok ) 361 – 363
प्रेषयामास तं दृष्ट्वा किं तत्राप्यपराधवान् । मत्पुत्र इति भीत्वाऽसौ समञ्जूषाऽगमत्स्वयम् ॥ ३६१॥आगत्य नृपतेरग्रे माताऽस्येयमिति क्षितौ । निक्षिप्य कंसमञ्जूषां प्रणिपत्यैवमब्रवीत् ॥३६२॥आगतः कंसमञ्जूषामधिष्ठायायमर्भकः । जले कलिन्दकन्याया मयादायाभिवर्धितः ॥३६३॥
दूतको देखकर मण्डोदरी डर गई और सोचने लगी कि क्या मेरे पुत्रने वहाँ भी अपराध किया है ? इसी भयसे वह सन्दूक साथ लेकर स्वयं राजा जरासन्धके पास गई। वहाँ जाकर उसने ‘यह सन्दूक ही इसकी माता है’ यह कहते हुए पहले वह कांसकी सन्दूक राजाके आगे जमीन पर रख दी। तदनन्तर नमस्कार कर कहने लगी कि ‘यह बालक कांसकी सन्दूकमें रखा हुआ यमुनाके जलमें बहा आ रहा था मैंने लेकर इसका पालन मात्र किया है ॥ ३६१-३६३ ॥
“Upon seeing the messenger, Mandodari grew terrified and began to anxiously think, ‘Has my son committed some offense there as well?’ Driven by this very fear, she took the casket with her and personally went to King Jarasandha.
Arriving there, she first placed the bell-metal (Kansa) casket on the ground before the King, declaring, ‘This very casket is his mother.’ Then, bowing respectfully, she said, ‘This boy was floating down the waters of the Yamuna River, placed inside this bell-metal casket; I have merely retrieved him and raised him.'” 361 – 363
श्लोक 364 से 375
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