नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 375 | श्लोक 376 से 392
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 393 to 402
श्लोक ( Shlok ) 393 – 397
सद्यस्तदास्य बालस्य चरणस्पर्शसङ्गमात् । उद्घाटितकबाटं तद्वभूव पुरगोपुरम् ॥३९३॥उग्रसेनस्तदालोक्य बन्धनस्थः समब्रवीत् । कवाटोद्घाटनं कोऽत्र करोतीत्यतिसम्भ्रमात् ॥३९४॥तदाकण्यैष बन्धात्त्वामचिरान्मोचयिष्यति । तूष्णीमुपविशेत्युक्तो बलेन मधुराधिपः ॥ ३९५॥तथास्त्विति तमाशीभिः प्रतोषादभ्यनन्दयत् । तौ च तस्माद्विनिर्गत्य यमुनां प्रापतुर्निशि ॥ ३९६॥भावि चक्रिप्रभावेन दत्तमार्गा द्विधाभवत् । सा सवर्णाश्रितः को वा नार्द्धात्मा बन्धुतां व्रजेत् ॥ ३९७॥
गोपुरके किवाड़ बन्द थे परन्तु पुत्रके चरणोंका स्पर्श होते ही खुल गये। यह देख बन्धनमें पड़े हुए उग्रसेनने बड़े क्षोभके साथ कहा कि इस समय किवाड़ कौन खोल रहा है? यह सुनकर बलभद्रने कहा कि आप चुप बैठिये यह बालक शीघ्र ही आपको बन्धनसे मुक्त करेगा। मथुराके राजा उग्रसेनने सन्तुष्ट होकर ‘ऐसा ही हो’ कहकर आशीर्वाद दिया। बलभद्र और वसुदेव बहाँ से निकल कर रात्रिमें ही यमुना नदीके किनारे पहुँचे। होनहार चक्रवर्तीके प्रभावसे यमुनाने भी दो भागोंमें विभक्त होकर उन्हें मार्ग दे दिया सो ठीक ही है क्योंकि ऐसा कौन आर्द्रात्मा (जल स्वरूप पक्ष में दयालु) होगा जो अपने समान वर्णवालेसे आश्रित होता हुआ भाईचारेको प्राप्त नहीं हो ॥ ३९३-३९७ ।।
“The gates of the city tower (gopura) were locked shut, but the moment they were touched by the infant’s feet, they swung wide open. Seeing this, Ugraṣena, who was held there in captivity, called out with great anxiety: ‘Who is opening the gates at this hour?’ Hearing his voice, Balabhadra replied: ‘Keep quiet; this child will very soon liberate you from your bonds.’ Satisfied by these words, King Ugraṣena of Mathura blessed them, saying, ‘May it be so.’
Departing from there, Balabhadra and Vasudeva reached the banks of the Yamuna River that very night. Influenced by the divine power of the future Sovereign (Chakravartin), the Yamuna split into two halves and granted them a passage. And this is only natural—for who could be so fluid/tender-hearted (ārdra-ātmā) that they would not extend brotherly support to someone of their own color (varna) seeking their refuge?” (393–397)
श्लोक ( Shlok ) 398 – 402
“सविस्मयौ विलक्ष्यैनां गच्छन्तौ नन्दगोपतिम् । उद्धृत्य बालिकां यत्नेनागच्छ ‘न्तमदर्शताम् ॥३९८॥दृष्ट्वा ताभ्यां कुतो भद्र रात्रावागमनं तव । निःसखस्येति सम्पृष्टः सः प्रणत्याभ्यभाषत ॥३९९॥मत्प्रिया पुत्रलाभार्थं भवतोः परिचारिका । गन्धादिभिः समभ्यर्च्य श्रद्धानाद् भूतदेवताः ॥४००॥आशास्य स्त्रीत्ववद्रात्रावद्यापत्यमवाप्य सा । सशोका दीयतामेतत्ताभ्य एवेति माब्रवीत् ॥४०१॥तदर्पयितुमायासो ममायं स्वामिनाविति । तद्वचः सम्यगाकर्ण्य सिद्धमस्मत्प्रयोजनम् ॥४०२॥
इधर बड़े आश्चर्यसे यमुनाको पार कर बलभद्र और वसुदेव नन्दगोपालके पास जा रहे थे इधर वह भी एक बालिकाको लेकर आ रहा था। बलदेव और वसुदेवने उसे देखते ही पूछा कि हे भद्र ! रात्रिकेसमय अकेले ही तुम्हारा आना क्यों हो रहा है? इस प्रकार पूछे जाने पर नन्दगोप ने प्रणाम कर कहा कि ‘आपकी सेवा करनेवाली मेरी स्त्रीने पुत्र-प्राप्तिके लिए श्रद्धाके साथ किन्हीं भूत देवताओं की गन्ध आदिसे पूजाकर उनसे आशीर्वाद चाहा था। आज रात्रिको उसने यह कन्या रूप सन्तान पाई है। कन्या देखकर वह शोक करती हुई मुझसे कहने लगी कि ले जाओ यह कन्या उन्हीं भूत देवताओंको दे आओ-मुझे नहीं चाहिए। सो हे नाथ! मैं यह कन्या उन्हीं भूत देवताओंको देनेके लिए जा रहा हूं’ । उसकी बात सुनकर बलदेव और वसुदेवने कहा कि ‘हमारा मनोरथ सिद्ध हो गया’ ॥ ३९८-४०२ ॥
“Meanwhile, having crossed the Yamuna River with great astonishment, Balabhadra and Vasudeva were heading toward Nandagopal (Nanda), who happened to be coming from the opposite direction carrying a baby girl. As soon as Balabhadra and Vasudeva saw him, they asked, ‘O gentle soul! What brings you out here alone at this hour of the night?’
Being questioned in this manner, Nandagopa bowed respectfully and replied, ‘My wife, who lives to serve you, had faithfully worshipped certain spirits and deities (bhuta-devatas) with incense and offerings to bless her with a son. Tonight, she gave birth to this child—a daughter. Seeing it was a girl, she fell into deep grief and told me, “Take this girl away and return her to those very spirits; I do not want her.” Therefore, O masters, I am going to offer this baby girl back to those deities.’ Hearing his words, Baladev and Vasudeva said to each other, ‘Our deep desire has been fulfilled.'” (398–402)
श्लोक 403 से 411
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