विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181
English translation of Uttar Puran parv 59- shlok 182 to 191
श्लोक ( Shlok ) 182
द्वयेन तेन बध्नाति दुरायुर्दुष्टचेष्टया । दुर्गतौ तब्धिरं दुःखं दुरन्तं ह्यनुभावयेत् ॥ १८२ ॥
यह जीव दोनों प्रकारकी चोरियोंसे अशुभआयुका बन्ध करता है और अपनी दुष्ट चेष्टासे दुर्गतिमें चिरकाल तक भारी दुःख सहन करता है ।। १८२ ।।
Through both types of theft, this soul binds itself to an inauspicious life span (Ashubha-ayu). Furthermore, due to such wicked actions, it endures intense suffering in an unfortunate state of existence (Durgati) for a very long period of time. [182]
श्लोक ( Shlok ) 183
सौजन्यं हन्यते भ्र’शो विश्रम्भस्य धनादिषु । विपत्तिः प्राणपर्यन्ता मित्रबन्ध्वादिभिः सह ॥ १८३ ॥
चोरी करनेवालेकी सज्जनता नष्ट हो जाती है, धनादिके विषयमें उसका विश्वास चला जाता है, और मित्र तथा भाई-बन्धुओंके साथ उसे प्राणान्त विपत्ति उठानी पड़ती है ।।१८३ ।।
The nobility of one who steals is utterly destroyed; they lose all credibility regarding wealth and financial matters, and they are forced to endure life-threatening calamities alongside their friends and kinsmen. [183]
श्लोक ( Shlok ) 184
गुणप्रसवसन्दृब्धा कीर्तिरम्लानमालिका । लतेव दावसंश्लिष्टा सद्यश्चौर्येण हन्यते ॥ १८४ ॥
जिस प्रकार दावानलसे छुई हुई लता शीघ्र ही नष्ट हो जाती है उसी प्रकार गुणरूपी फूलोंसे गुंथी हुई कीर्तिरूपी ताजी माला चोरीसे शीघ्र ही नष्ट हो जाती है ॥ १८४ ।
Just as a creeper scorched by a forest fire is swiftly destroyed, the fresh garland of fame—woven with the flowers of one’s virtues—is quickly ruined by the act of theft. [184]
श्लोक ( Shlok ) 185
इतीदं जानता सर्व सत्यघोषेण दुधिया । आद्यांशकेन चौर्येण साहसं तदनुष्ठितम् ॥ १८५ ॥
यह सब जानते हुए भी मूर्ख सत्यघोष (श्रीभूति) ने पहली नैसर्गिक चोरीके द्वारा यह साहस कर डाला ॥ १८५ ॥
Despite knowing this, the foolish Minister Satyaghosha (Shribhuti), driven by his innate habit of stealing, committed this act and brought about his own ruin. [185]
श्लोक ( Shlok ) 186
सद्यो मन्त्रिपदाद् भ्रष्टो निग्रहं तादृशं गतः । दुर्गतिं च पुनः प्राप्तो महापापानुबन्धिनीत् ॥ १८६ ॥
इस चोरीके कारण ही वह मंत्री पदसे शीघ्र ही भ्रष्ट कर दिया गया, उसे पूर्वोक्त कठिन तीन दण्ड भोगने पड़े तथा बड़े भारी पापसे बँधी हुई दुर्गतिमें जाना पड़ा ।। १८६ ॥
Due to this act of theft, he was quickly stripped of his ministerial position, forced to endure the three aforementioned severe punishments, and ultimately relegated to an unfortunate state of existence bound by heavy sins. [186]
श्लोक ( Shlok ) 187
इत्यमात्यस्य दुर्वृत्तं राजाऽऽत्मनि विचिन्तयन् । धर्मिलाख्याय विप्राय तत्साचिव्यपदं ददौ ॥ १८७ ॥
इस प्रकार अपने हृदयमें मंत्रीके दुराचारका चिन्तवन करते हुए राजा सिंहसेनने उसका मंत्रीपद धर्मिल नामक ब्राह्मणके लिए दे दिया ।। १८७ ।।
Reflecting thus in his heart upon the minister’s misconduct, King Singhsen bestowed the ministerial position upon a Brahmin named Dharmil. [187]
श्लोक ( Shlok ) 188 – 190
काले गच्छति सत्येवमन्येयुरसनाटवी । पर्यन्तविमलायुक्तिक्रान्तारक्ष्माभृति स्थितम् ॥ १८८ ॥ वरधर्मयतिं प्राप्य भद्रमित्रवणिग्वरः । श्रुत्वा धर्म धनं दाने त्यजन्तमतिमात्रया ॥ १८९ ॥ तस्य माता सुमित्राख्यासहमानातिकोपिनी । काले मृत्वासनाटव्यां ‘शार्दूलीभूयमागता ॥ १९० ॥
इस प्रकार समय व्यतीत होने पर किसी दिन असना नाम के वनमें विमलकान्तार नामके पर्वत पर विराजमान वरधर्म नामके मुनिराजके पास जाकर सेठ भद्रमित्रने धर्मका स्वरूप सुना और अपना बहुत-सा धन दानमें दे दिया। उसकी माता सुमित्रा इसके इतने दानको न सह सकी अतः अत्यन्त क्रुद्ध हुई और अन्त में मरकर उसी असना नामके वनमें व्याघ्री हुई ॥१८८-१९०।।
In the course of time, one day on the Vimalakantara mountain within the Asana forest, Seth Bhadramitra approached the sage Vardharma. After listening to the nature of true religion from the Muniraj, he gave away a vast portion of his wealth in charity. His mother, Sumitra, could not bear such immense generosity; consumed by intense anger, she eventually died and was reborn as a tigress in that very same Asana forest. [188–190]
श्लोक ( Shlok ) 191
यदृच्छया वनं यातमवलोक्य दुराशया । साऽखादत्स्वसुर्त कोपाञ्चित्रं किं नाश्यमङ्गिनाम् ॥ १९१ ॥
एक दिन भद्र मित्र अपनी इच्छासे असना वनमें गया था उसे देखकर दुष्ट अभिप्राय वाली व्याघ्रीने उस अपने ही पुत्रको खा लिया सो ठीक ही है क्योंकि क्रोधसे जीवों का क्या भक्ष्य नहीं हो जाता ? ॥ १९१ ॥
One day, Bhadramitra entered the Asana forest of his own accord. Upon seeing him, the tigress, harboring wicked intentions, devoured her very own son. This is hardly surprising, for what is there that living beings will not consume when consumed by rage? [191]
श्लोक 192 से 201
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