राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 |
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 31 to 42
श्लोक ( Shlok ) 31 – 34
प्रत्युद्यातौ महीरोन जनकेनानुरागिणा । प्राग्जन्मसञ्चितामेयस्वपुण्यपरिपाकतः ॥ ३१ ॥रूपादिगुणसम्पत्त्या सत्यमेतौ गतोपमौ । इति पौरैः प्रशंसद्भिः प्रेक्ष्यमाणौ समं ततः ॥ ३२ ॥पुरं प्रविश्य भूपोक्त स्थाने न्यवसतां सुखम् । दिनैः कतिपयैरेव नृपमण्डलसन्निधौ ॥ ३३ ॥ निर्वर्त्याभिमतं यज्ञविधानं तदनन्तरम् । महाविभूतिभिः सीतां ददौ रामाय भूपतिः ॥ ३४ ॥
अनुरागसे भरे हुए राजा जनकने उन दोनोंकी अगवानी की। ‘पूर्व जन्ममें संचित अपने अपरिमिति पुण्यके उदय से जो इन्हें रूप आदि गुणोंकी सम्पदा प्राप्त हुई है उससे ये सचमुच ही अनुपम हैं- उपमा रहित हैं’ इस प्रकार प्रशंसा करते हुए नगरके लोग जिन्हें देख रहे हैं ऐसे दोनों भाई साथ ही साथ नगरमें प्रवेश कर राजा जनकके द्वारा बतलाये हुए स्थान पर सुखसे ठहर गये । कुछ दिनोंके बाद जब अनेक राजाओंका समूह आ गया तब उनके सन्निधानमें राजा जनकने अपने इष्ट यज्ञकी विधि पूरी की और बड़े वैभवके साथ रामचन्द्रके लिए सीता प्रदान की ॥३१-३४॥
“Filled with deep affection, King Janaka went forward to welcome both of them. Praised by the citizens who gazed upon them, saying, ‘By the rise of their boundless merits accumulated in previous births, they have attained such a wealth of beauty and virtues that they are truly matchless—beyond all comparison,’ the two brothers entered the city together. They then stayed comfortably in the residence designated for them by King Janaka.
After a few days, when a large assembly of various kings had arrived, King Janaka completed the rites of his desired Yajna (sacred ritual) in their presence and, with grand opulence, bestowed Sita upon Ramachandra.”31 – 34
श्लोक ( Shlok ) 35
दिनानि कानिचित्तत्र सीतयेव श्रिया समम् । नवप्रेमसमुद्भूतं सुखं रामोऽन्वभूद् भृशम् ॥ ३५ ॥
रामचन्द्रजीने कुछ दिन तक लक्ष्मीके समान सीताके साथ वहीं जनकपुरमें नये प्रेमसे उत्पन्न हुए सातिशय सुखका उपभोग किया ।। ३५ ॥
“For a few days, Ramachandraji remained right there in Janakapura, enjoying the supreme, transcendent happiness born of new love with Sita, who was like the goddess Lakshmi herself.”35
श्लोक ( Shlok ) 36 – 38
तदा दशरथाभ्यर्णादायातसचिवोक्तिभिः । जनकानुमतः शुद्धतिथौ परिजनान्वितः ॥ ३६ ॥अभ्ययोध्यां पुरीं सीतासमेतो जातसम्मदः । लक्ष्मणेन च गत्वाशु स्वानुजाभ्यां स्वबन्धुभिः ॥ ३७ ॥परिवारैश्च स प्रत्यग्गम्यमानो निजां पुरीम् । विभूत्या दिविजेन्द्रो वा विनीतां प्राविशज्जयी ॥ ३८॥
तदनन्तर राजा दशरथके पाससे आये हुए मन्त्रियोंके कहनेसे रामचन्द्रजीने राजा जनककी आज्ञा ले शुद्ध तिथिमें परिवारके लोग, सीता तथा लक्ष्मणके साथ बड़े हर्षसे अयोध्याकी ओर प्रस्थान किया और शीघ्र ही वहाँ पहुँच गये। वहाँ पहुँचने पर दोनों छोटे भाई भरत और शत्रुघ्न्नने, बन्धुओं तथा परिवारके लोगोंने उनकी अगवानी की। जिस प्रकार इन्द्र बड़े वैभवके साथ अपनी नगरी अमरावतीमें प्रवेश करता है उसी प्रकार विजयी राम-चन्द्रजीने बड़े वैभवके साथ अयोध्यापुरी में प्रवेश किया ।। ३६-३८ ॥
“Thereafter, following the request of the ministers sent by King Dasharatha, Ramachandraji took leave of King Janaka. On an auspicious date, he set out for Ayodhya with great joy, accompanied by his family, Sita, and Lakshmana, and reached there quickly.
Upon their arrival, the two younger brothers, Bharata and Shatrughna, along with kinsmen and family members, came forward to welcome them. Just as Indra enters his celestial city, Amaravati, with immense grandeur, the victorious Ramachandraji entered the city of Ayodhya with magnificent splendor.” 36 – 38
श्लोक ( Shlok ) 39
दृष्ट्वा यथोचितं प्रीत्या पितरौ प्रीतचेतसौ । तस्थौ प्रवर्द्धमानश्रीः सत्रियः सानुजः सुखम् ॥ ३९ ॥
वहाँ उन्होंने प्रसन्न चित्तके धारक माता-पिताके दर्शन यथायोग्य प्रेमसे किये । तदनन्तर जिनकी लक्ष्मी उत्तरोत्तर बढ़ रही है ऐसे रामचन्द्रजी सीता तथा छोटे भाइयोंके साथ सुखसे रहने लगे ॥ ३९ ॥
“There, with appropriate love and reverence, they paid their respects to their deeply pleased parents. Thereafter, Ramachandraji—whose prosperity and glory were increasing day by day—began to live happily alongside Sita and his younger brothers.” 39
श्लोक ( Shlok ) 40 – 42
तदा तदुत्सवं भूयो वर्द्धयन्नात्मना मधुः । कोकिलालिकु’ लालापडिण्डिमो मण्डयन् दिशः ॥ ४० ॥सन्धि तपोधनैः सार्द्धं विग्रहं शिथिलव्रतैः । प्रकुर्वाणस्य कामस्य सामवायिकतां बहन् ॥ ४१ ॥कामिनां खण्डयन्मानं वियुक्तान् दण्डयन् भृशम्। संयुक्तान् पिण्डितान् कुर्वन् प्रचण्डः प्राविशजगत् ॥ ४२॥
उसी समय अपने द्वारा उनके उत्सवको बढ़ाता हुआ वसन्त ऋतु आ पहुँचा। कोयलों और भ्रमरोंके समूह जो मनोहर शब्द कर रहे थे वही मानो उसके नगाड़े थे, वह समस्त दिशाओंको सुशोभित कर रहा था। जो कामदेव, तपोधन-साधुओंके साथ सन्धि करता है और शिथिल व्रतों–शिथिलाचारियोंके साथ विग्रह रखता है उस कामदेवके साथ वह वसन्त ऋतु अपना खास सम्बन्ध रखता था। वह वसन्त कामी मनुष्योंका मान खण्डित करता था, विरही मनुष्योंको अत्यन्त दण्ड देता था, और संयुक्त मनुष्योंको परस्परमें सम्बद्ध करता था। इस प्रचण्ड शक्तिवाले वसन्त ऋतुने संसारमें प्रवेश किया ॥ ४०-४२ ॥
“At that very moment, enhancing their celebration through its presence, the spring season arrived. The delightful cooing of cuckoo flocks and the humming of swarms of bees served as its ceremonial kettledrums, as it adorned and beautified all directions.
This spring season maintained a unique and intimate alliance with Kamadeva (the god of love)—the deity who makes peace with holy sages of severe penance, yet wages war against those who are loose in their vows and conduct. Breaking the pride of arrogant lovers, severely punishing those separated from their beloveds, and deeply bonding those who were together, this extraordinarily powerful spring season made its grand entry into the world.”40 – 42
श्लोक 43 से 50
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