मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 254 | श्लोक 255 से 273 | श्लोक 274 से 281
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 282 to 292
श्लोक ( Shlok ) 282 – 284
तस्थावेवं प्रयात्यस्य काले पर्वतनारदौ । समित्पुष्पार्थमभ्येत्य वनं नद्याः प्रवाहजम् ॥२८२॥ जलं पीत्वा मयूराणां गतानां मार्गदर्शनात् । बभाषे नारदस्तत्र हे पर्वत शिखावलः ॥२८३॥ तेष्वेकोऽस्ति स्त्रियः सप्तैवेति तच्छ्रवणादसौ । मृषेत्यसोढा चित्तेव व्यधात् पणितबन्धनम् ॥२८४॥
इस प्रकार इधर राजा वसुका समय बीत रहा था उधर एक दिन पर्वत और नारद, समिधा तथा पुष्प लानेके लिए वनमें गये थे। वहाँ वे क्या देखते हैं कि कुछ मयूर नदीके प्रवाहका पानी पीकर गये हुए हैं। उनका मार्ग देखकर नारदने पर्वतसे कहा कि हे पर्वत ! ये जो मयूर गये हुए हैं उनमें एक तो पुरुष है और बाकी सात स्त्रियाँ हैं। नारदकी बात सुनकर पर्वतने कहा कि तुम्हारा कहना झूठ है, उसे मनमें यह बात सह्य नहीं हुई अतः उसने कोई शर्त बाँध ली ।॥ २८२-२८४ ॥
Thus, while King Vasu’s time was passing in this manner, one day Parvata and Narada went into the forest to gather sacrificial firewood (Samidha) and flowers. There, they noticed that some peacocks had just left after drinking water from the river’s current. Observing their tracks, Narada said to Parvata, “O Parvata! Among the peacocks that have passed by, one is a male and the remaining seven are females.” Hearing Narada’s words, Parvata replied, “What you say is false.” Unable to accept this in his mind, he challenged him to a wager. || 282-284 ||
श्लोक ( Shlok ) 285 – 286
ततोऽन्तरं किञ्चित् सद्भूतं नारदोदितम् । विदित्वा विस्मयं सोऽगान्मनागस्मात्पुरोगतः ॥२८५॥ ‘करेणुमार्गमालोक्य सस्मितं नारदोऽवदत् । अन्धवामेक्षणा हस्तिवशैकात्राधुना गता ॥२८६॥
तदनन्तर कुछ आगे जाकर जब उसे इस बातका पता चला कि नारदका कहा सच है तो वह आश्चर्यको प्राप्त हुआ । वे दोनों वहाँसे कुछ और आगे बढ़े तो नारद हाथियोंका मार्ग देखकर मुसकराता हुआ बोला कि यहाँ से जो अभी हस्तिनी गई है उसका बाँया नेत्र अन्धा है ॥ २८५-२८६ ।।
Thereafter, moving a little further ahead, when he discovered that what Narada had said was indeed true, he was filled with astonishment. As the two of them advanced a bit further from there, Narada, looking at the tracks of some elephants, smiled and said, “The female elephant that has just passed through here is blind in her left eye.” || 285-286 ||
श्लोक ( Shlok ) 287 – 288
अन्धसर्पविलायानमिव ते पूर्वभाषितम् । आसीद्यादृच्छिकं सत्यमिदं तु परिहास्यताम् ॥२८७॥प्रयाति तव विज्ञानं मया विदितमस्ति किम् । इति स्मितं स सासूयं चित्ते विस्मयमाप्तवान् ॥२८८॥
पर्वतने कहा कि तुम्हारा पहला कहना अन्धे साँपका बिलमें पहुंच जानेके समान यों ही सच निकल आया यह ठीक है परन्तु तुम्हारा यह विज्ञान हँसीको प्राप्त होता है। मैं क्या समझू ? इस तरह हँसते हुए ईर्ष्याके साथ उसने कहा और चित्तमें आश्चर्य प्राप्त किया ।। २८७-२८८ ॥
Parvata replied, “Your previous statement just happened to turn out true, much like a blind snake accidentally finding its way into a hole. However, this scientific claim of yours is bound to be laughed at. What am I supposed to believe?” He spoke this way, laughing with a tinge of envy, yet in his heart, he was filled with wonder. || 287-288 ||
श्लोक ( Shlok ) 289
तमसत्यं पुनः कर्तुं करिणीगमनानुगः । पुराऽन्तर्नारदोद्दिष्टमुपलभ्य तथैव तत् ॥२८९॥
तदनन्तर नारदको झूठा सिद्ध करनेके लिए वह हस्तिनीके मार्गका अनुसरण करता हुआ आगे बढ़ा और नगरतक पहुँचनेके पहले ही उसे इस बातका पता चल गया कि नारदने जो कहा था वह सच है ।॥ २८९ ॥
Thereafter, in order to prove Narada wrong, he moved forward, tracking the path of the female elephant. Before even reaching the city, he discovered that what Narada had said was entirely true. || 289 ||
श्लोक ( Shlok ) 290 – 292
सशोको गृहमागत्य नारदोक्तं सविस्मयः । मातरं बोधयित्वाह नारदस्येव मे पिता ॥२९०॥ नावोचच्छास्त्रयाथात्म्यमस्ति मय्यस्य नादरः । इति पुत्रवचस्तस्या हृदयं निशितास्त्रवत् ॥२९१॥ विदार्य प्राविशत्यायाद्विपरीतावमर्शनात् । ब्राह्मणी तद्वचश्चित्तेनावधार्य शुचं गता ॥ २९२॥
अब तो पर्वतके शोकका पार नहीं रहा। वह शोक करता हुआ बड़े आश्चर्यसे घर आया और नारदकी कही हुई सब बात मातासे कहकर कहने लगा कि पिताजी जिस प्रकार नारदको शास्त्रकी यथार्थ बात बतलाते हैं उस प्रकार मुझे नहीं बतलाते हैं। ये सदा मेरा अनादर करते हैं। इसतरह पापोदयसे विपरीत विचार करनेके कारण पुत्रके वचन, तीक्ष्णशस्त्रके समान उसके हृदयको चीरकर भीतर घुस गये। ब्राह्मणी पुत्रके वचनोंका विचारकर हृदयसे शोक करने लगी ॥ २९०-२९२ ।।
Now, there were no bounds to Parvata’s grief. Mourning deeply and filled with great astonishment, he returned home. Relating everything Narada had said to his mother, he began to say, “The way Father teaches the true essence of the scriptures to Narada, he does not teach me. He always disregards me.”
Due to the awakening of his past sins (Papodaya), he harbored such distorted thoughts. His words pierced through his mother’s heart like a sharp weapon. Pondering over her son’s words, the Brahmin woman began to grieve from the depths of her heart. || 290-292 ||
श्लोक 293 से 304
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