राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 235 | श्लोक 236 से 252 | श्लोक 253 से 262
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 263 to 276
श्लोक ( Shlok ) 263
शशस्य सिंहपोतेन किं विरोधेऽस्ति जीविका । सत्यमासन्नमृत्यूनां सद्यो विध्वंसनं मतेः ॥ २६३ ॥
सिंहके बच्चेके साथ विरोध करनेपर क्या खरगोशका जीवन बच सकता है ? सच है कि जिनकी मृत्यु निकट आ जाती है उनकी बुद्धि शीघ्र ही नष्ट हो जाती है ।॥ २६३ ।।
“Can a rabbit’s life ever be saved after inviting enmity with a lion’s cub? It is truly said that those whose death draws near, their intellect is destroyed instantly. || 263 ||”
श्लोक ( Shlok ) 264 – 265
इत्युद्धतोदितैः कोपमाविश्चक्रेऽथ लक्ष्मणः । जनको भरतः शत्रुम्नश्च तद्वृत्तकश्रुतेः ॥ २६४ ॥सम्प्राप्य राघवं सोपचारमालोक्य युक्तिमद् । वाक्यैः शोकं समं नेतु ं तदैवं ते समब्रुवन् ॥ २६५ ॥
इस प्रकार रोष भरे शब्दों द्वारा रामचन्द्रने क्रोध प्रकट किया। तदनन्तर-लक्ष्मण, जनक, भरत और शत्रुघ्न्न यह समाचार सुनकर रामचन्द्रजीके पास आये और बड़ी विनय सहित उनसे मिलकर युक्तिपूर्ण शब्दों द्वारा उनका शोक दूर करनेके लिए सब एक साथ इस प्रकार कहने लगे ॥ २६४-२६५ ॥
“In this manner, Ramachandra expressed his wrath through words filled with indignation. Thereafter, upon hearing this news, Lakshmana, Janaka, Bharata, and Shatrughna came to Ramachandraji. Meeting him with great humility, they all began to speak together in the following manner, using rational and consoling words to dispel his grief: || 264-265 ||”
श्लोक ( Shlok ) 266 – 267
चौर्येण रावणस्यैव परदारापहारिणः । पराभवः परिद्रोग्धा दुरात्माऽधर्मवर्तनः ॥ २६६ ॥ सीताशापेन दाह्योऽसौ निर्विचार्यमकार्यकृत् । महापापकृतां पापमस्मिन्नेव फलिष्यति ॥ २६७ ॥
उन्होंने कहा कि रावण चोरीसे परस्त्री हर कर ले गया है इससे उसीका तिरस्कार हुआ है। वह द्रोह करने वाला है, दुष्ट है और अधर्मकी प्रवृत्ति चलानेवाला है। उसने चूंकि बिना विचार किये ही यह अकार्य किया है अतः वह सीताके शापसे जलने योग्य है। महापाप करनेवालोंका पाप इसी लोकमें फल देता है ।॥ २६६-२६७ ॥
“They said, ‘Ravana has deceitfully abducted another man’s wife, and through this act, he has only brought disgrace upon himself. He is a traitor, a villain, and a promoter of unrighteousness. Since he has committed this misdeed without any forethought, he is fit to be consumed by the curse of Sita. The sin of those who commit heinous crimes bears fruit in this very world.’ || 266-267 ||”
श्लोक ( Shlok ) 268
उपायश्चिन्त्यतां कोऽपि सीताप्रत्ययनं प्रति । इति तैर्बोधितो रामः सुप्तोत्थित इवाभवत् ॥ २६८ ॥
अब सीताको वापिस लानेका कोई उपाय सोचना चाहिए । इस प्रकार उन सबके द्वारा समझाये जानेपर रामचन्द्रजी सोयेसे उठे हुएके समान सावधान होगये ॥ २६८ ॥
“‘Now, we must devise a strategy to bring Sita back.’ Being thus counselled by all of them, Ramachandra became alert, like one awakening from a deep sleep. || 268 ||”
श्लोक ( Shlok ) 269
तत्काले खेश्वरद्वन्द्वं दौवारिकनिवेदितम् । नृपानुगतमागत्य यथोचितम’ लोकत ॥ २६९ ॥
उसी समय द्वारपालोंने दो विद्याधरोंके आनेका समाचार कहा। राजा रामचन्द्रने उन्हें भीतर बुलाया और उन्होंने योग्य विनयके साथ उनके दर्शन किये ॥ २६९ ॥
“At that very moment, the doorkeepers announced the arrival of two Vidyadharas. King Ramachandra summoned them inside, and they beheld him with all due humility and reverence. || 269 ||”
श्लोक ( Shlok ) 270 – 276
भविष्यद्वलदेवोऽपि कृततद्योगसम्पदः । एतदागमनं कस्मात्कौ भवन्तौ कुमारकौ ॥ २७० ॥इत्यन्वयुक्त सुग्रीवस्तत्रेदं सम्यगब्रवीत् । खगाद्रिदक्षिणश्रेण्यां पुरं किलकिलाह्वयम् ॥ २७१ ॥ तदधीशो बलीन्द्राख्यो विख्यातः खचरेष्वसौ । प्रियङ्गुसुन्दरी तस्य प्रिया तस्यां तनूद्भवौ ॥ २७२ ॥बालिसुग्रीवनामानावजायावहि भूभुजाम् । पितर्युपरतेऽजायताग्रजस्याधिराजता ॥ २७३ ॥ ममापि युवराजत्वमजनिष्ट क्रमागत्तम् । एवं गच्छति तत्स्थानमपहृत्य मदग्रजः ॥ २७४ ॥लोभाक्रान्ताशयो देशात् स निर्वासयति स्म माम् । एषोऽपि दक्षिणश्रेण्यां विद्युत्कान्तापुरेशिनः ॥२७५॥प्रभञ्जनखगाधीशस्तनूजोऽमिततेजवाक् । त्रिधाविद्योऽञ्जनादेव्यामव्याहतपराक्रमः ॥ २७६ ॥
होनहार बलभद्र रामचन्द्र भी उनके संयोगसे हर्षित हुए और पूछने लगे कि आप दोनों कुमार यहाँ कहाँ से आये हैं ? और आप कौन हैं? इसके उत्तरमें सुग्रीव कहने लगा कि विजयार्ध पर्वतकी दक्षिण श्रेणी में एक किलकिल नामका नगर है। विद्याधरों में अतिशय प्रसिद्ध बलीन्द्र नामका विद्याधर उस नगरका स्वामी था। उसकी प्रियङ्गुसुन्दरी नामकी स्त्री थी। उन दोनोंके हम बाली और सुग्रीव नामके दो पुत्र उत्पन्न हुए । जब पिताका देहान्त हो गया तब बड़े भाई बालीको राज्य प्राप्त हुआ और मुझे क्रमप्राप्त युवराज पद मिला। इस प्रकार कुछ समय व्यतीत होने पर मेरे बड़े भाई बालीके हृदयको लोभने धर दबाया इसलिए उसने मेरा स्थान छीनकर मुझे देशसे बाहर निकाल दिया । यह तो मेरा परिचय हुआ अब रहा यह साथी। सो यह भी दक्षिण श्रेणीके विद्युत्कान्त नगरके स्वामी प्रभञ्जन विद्याधरका अमिततेज नामका पुत्र है। यह तीनों प्रकारकी विद्याएँ जानता है, अञ्जना देवीमें उत्पन्न हुआ है, और अखण्ड पराक्रमका धारक है ।। २७०-२७६ ॥
“The promising Balabhadra Ramachandra also rejoiced at their arrival and began to ask, ‘From where have you two princes come here? And who are you?’
In reply to this, Sugriva began to say, ‘On the southern ridge of the Vijayardha mountain, there is a city named Kilkila. A Vidyadhara named Balindra, exceptionally renowned among his kind, was the lord of that city. He had a wife named Priyangusundari. To them, we two sons—named Vali and Sugriva—were born. When our father passed away, my elder brother Vali obtained the kingdom, and I received the succession to the position of crown prince. After some time had passed in this manner, greed overcame the heart of my elder brother Vali; therefore, usurping my position, he exiled me from the land. This is my introduction. As for this companion of mine, he is Amitateja, the son of the Vidyadhara Prabhanjana, the lord of Vidyutkanta city on the southern ridge. He is proficient in all three types of mystical sciences (vidyas), was born to Queen Anjana, and is the possessor of unbroken valor.’ || 270-276 ||”
श्लोक 277 से 291
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