Summary of Uttar Puran Parv 64 by Acharya Gunabhadra
उत्तरपुराण पर्व 64 (श्लोक 1–55) का संक्षिप्त सारांश
इस पर्व में सत्रहवें तीर्थंकर भगवान् कुन्थुनाथ के पूर्वभव, गर्भ, जन्म, राज्य, वैराग्य, दीक्षा, केवलज्ञान और मोक्ष का वर्णन किया गया है। पूर्वभव में वे पूर्वविदेह क्षेत्र के सुसीमा नगर के राजा सिंहरथ थे। उल्कापात देखकर उन्हें संसार की अनित्यता का बोध हुआ। उन्होंने यतिवृषभ मुनि से धर्मोपदेश सुनकर राज्य त्याग दिया, संयम धारण किया और सोलह कारण भावनाओं के प्रभाव से तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध किया। समाधिमरण के पश्चात् वे सर्वार्थसिद्धि विमान में देव हुए।
आयु पूर्ण होने पर उनका जीव हस्तिनापुर के राजा सूरसेन की रानी श्रीकान्ता के गर्भ में अवतीर्ण हुआ। रानी ने सोलह शुभ स्वप्न देखे और देवों ने गर्भकल्याणक का उत्सव मनाया। वैशाख शुक्ल प्रतिपदा को भगवान् कुन्थुनाथ का जन्म हुआ। इन्द्र सहित देवों ने सुमेरु पर्वत पर उनका जन्माभिषेक किया और उनका नाम ‘कुन्थु’ रखा। कुमारकाल के पश्चात् वे राजा बने और आगे चलकर चक्रवर्ती पद को प्राप्त हुए।
एक दिन तपस्वी मुनि को देखकर उनके मन में वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने परिग्रह को संसार का कारण बताकर राज्य का त्याग किया और एक हजार राजाओं के साथ दीक्षा ग्रहण कर ली। दीक्षा के समय उन्हें मनःपर्ययज्ञान प्राप्त हुआ। सोलह वर्षों तक कठोर तप करने के बाद चैत्र शुक्ल तृतीया को तिलक वृक्ष के नीचे उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ। देवों ने चतुर्थ कल्याणक की पूजा की और उनके विशाल धर्मसंघ की स्थापना हुई।
भगवान् कुन्थुनाथ ने दिव्यध्वनि द्वारा असंख्य जीवों को धर्मोपदेश दिया और दीर्घकाल तक विहार किया। आयु का अन्त निकट आने पर वे एक हजार मुनियों के साथ सम्मेदशिखर पहुँचे। वहाँ प्रतिमायोग धारण कर वैशाख शुक्ल प्रतिपदा के दिन समस्त कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त किया। देवों ने उनके निर्वाण कल्याणक का महोत्सव मनाया। अंत में आचार्य गुणभद्र भगवान् कुन्थुनाथ की महिमा का स्तवन करते हुए उन्हें मोक्षमार्ग का प्रदर्शक और अनन्त गुणों का भण्डार बताते हैं।
श्लोक 1 से 11 : पूर्वभव में राजा सिंहरथ और तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध
कुन्थुनाथ भगवान् की स्तुति के साथ वर्णन आरम्भ होता है। पूर्वविदेह क्षेत्र के वत्स देश में सुसीमा नगर के राजा सिंहरथ न्यायप्रिय, पराक्रमी और धर्मनिष्ठ शासक थे। एक दिन उल्कापात देखकर उन्हें संसार की अनित्यता का बोध हुआ। उन्होंने यतिवृषभ मुनि से धर्मश्रवण किया और मोह त्यागकर राज्य पुत्र को सौंप दिया। अनेक राजाओं के साथ संयम ग्रहण कर उन्होंने ग्यारह अंगों का ज्ञान प्राप्त किया तथा सोलह कारण भावनाओं द्वारा तीर्थंकर-नामकर्म का बन्ध किया। अन्त में समाधिमरण कर वे सर्वार्थसिद्धि अनुत्तर विमान में देव हुए और वहाँ वीतरागता से उत्पन्न दिव्य सुख का अनुभव करने लगे।
श्लोक 12 से 21 : श्रीकान्ता के शुभ स्वप्न और गर्भकल्याणक
भरतक्षेत्र के हस्तिनापुर में राजा सूरसेन और उनकी रानी श्रीकान्ता राज्य करते थे। सर्वार्थसिद्धि के देव का जीव आयु पूर्ण होने पर रानी श्रीकान्ता के गर्भ में अवतीर्ण हुआ। गर्भधारण के समय रानी ने सोलह शुभ स्वप्न देखे। प्रातःकाल उन्होंने राजा को स्वप्न सुनाए और उनके मंगलकारी फल जानकर अत्यन्त प्रसन्न हुईं। उसी समय देवों ने गर्भकल्याणक का उत्सव मनाकर राजा और रानी का अभिषेक तथा पूजन किया। गर्भधारण के पश्चात् रानी श्रीकान्ता की शोभा अत्यन्त बढ़ गई।
श्लोक 22 से 31 : जन्मकल्याणक और कुमारकाल
नव मास पूर्ण होने पर वैशाख शुक्ल प्रतिपदा के दिन रानी श्रीकान्ता ने दिव्य पुत्र को जन्म दिया। इन्द्र सहित देवगण बालक को सुमेरु पर्वत पर ले गए, क्षीरसागर के जल से जन्माभिषेक किया, उसका नाम ‘कुन्थु’ रखा और पुनः माता-पिता को सौंप दिया। भगवान् शान्तिनाथ के निर्वाण के आधे पल्य बाद कुन्थुनाथ का अवतार हुआ। उनकी आयु पचानवे हजार वर्ष, शरीर की ऊँचाई पैंतीस धनुष तथा वर्ण तप्त सुवर्ण के समान था। कुमारकाल पूर्ण होने पर उन्हें राज्य प्राप्त हुआ और आगे चलकर चक्रवर्ती पद की भी प्राप्ति हुई। वे अपार वैभव और दस प्रकार के भोगों का उपभोग करते हुए सुखपूर्वक राज्य करने लगे।
श्लोक 32 से 41 : वैराग्य, दीक्षा और तपश्चर्या
वन-विहार से लौटते समय कुन्थुनाथ ने एक मुनि को कठोर तप करते देखा। मंत्री के प्रश्न पर उन्होंने बताया कि ऐसे मुनि कर्मक्षय कर इसी जन्म में मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं अथवा देव और चक्रवर्ती पद का सुख भोगकर अन्ततः मोक्ष प्राप्त करेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि परिग्रह ही संसार का कारण है और उसका त्याग मोक्ष का मार्ग है। पूर्वभव का स्मरण होने पर उनके भीतर वैराग्य जागृत हुआ। लौकान्तिक देवों ने उनकी स्तुति की। उन्होंने पुत्र को राज्य सौंपकर वैशाख शुक्ल प्रतिपदा के दिन एक हजार राजाओं के साथ दीक्षा ग्रहण की। उसी समय उन्हें मनःपर्ययज्ञान प्राप्त हुआ। अगले दिन धर्ममित्र राजा ने उन्हें आहारदान दिया। इसके बाद उन्होंने सोलह वर्षों तक कठोर तपश्चर्या की।
श्लोक 42 से 50 : केवलज्ञान और धर्मसंघ की स्थापना
सोलह वर्ष की तपस्या के पश्चात् भगवान् कुन्थुनाथ तिलक वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ हुए। चैत्र शुक्ल तृतीया के दिन उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ। देवों ने आकर चतुर्थ कल्याणक का महोत्सव मनाया। उनके पैंतीस गणधर हुए तथा विशाल मुनिसंघ और आर्यिकासंघ उनकी शरण में रहा। हजारों अवधिज्ञानी, मनःपर्ययज्ञानी, केवलज्ञानी और ऋद्धिधारी साधु उनके संघ में थे। तीन लाख श्राविकाएँ, दो लाख श्रावक तथा असंख्य देव-देवियाँ उनके उपदेश से लाभान्वित होते थे। भगवान् दिव्यध्वनि द्वारा समस्त जीवों को धर्मोपदेश देते हुए विहार करते रहे।
श्लोक 51 से 55 : निर्वाण और मंगलाशंसाएँ
आयु का केवल एक मास शेष रहने पर भगवान् कुन्थुनाथ एक हजार मुनियों के साथ सम्मेदशिखर पहुँचे। वहाँ प्रतिमायोग धारण कर वैशाख शुक्ल प्रतिपदा की रात्रि में कृत्तिका नक्षत्र के समय उन्होंने समस्त कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त किया। देवों ने उनके निर्वाण कल्याणक का उत्सव मनाया। ग्रन्थकार उनकी महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि पूर्वभव में सिंहरथ राजा, फिर सर्वार्थसिद्धि के देव, तत्पश्चात् तीर्थंकर और चक्रवर्ती बने भगवान् कुन्थुनाथ समस्त जीवों को अविनाशी मोक्षलक्ष्मी प्रदान करें। उनकी ज्ञानज्योति अज्ञानरूपी अन्धकार को नष्ट करने वाली है और वे मोक्ष के निश्चय तथा व्यवहार मार्ग के महान् प्रदर्शक हैं।
पर्व 65
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय उत्तरपुराण
उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63
उत्तरपुराण सारांश
पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47
आदिपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47