मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 136 से 152 | श्लोक 153 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 182 to 192
श्लोक ( Shlok ) 182
अयोध्येशोऽपि लेखार्थ दूतोक्त’ चावधारयन् । तत्प्रयोजननिश्चित्यै मन्त्रिणं पृच्छति स्म सः ॥ १८२ ॥
अयोध्याके स्वामी राजा दशरथने भी पत्रमें लिखा अर्थ समझा, दूतका कहा समाचार सुना और इस सबका प्रयोजन निश्चित करनेके लिए मन्त्रीसे पूछा ।। १८२ ।।
“King Dasharatha, the sovereign lord of Ayodhya, also comprehended the meaning written in the letter, listened to the news delivered by the messenger, and consulted his minister to determine the true purpose behind all of this.” 182
श्लोक ( Shlok ) 183 – 184
जैनकोक्त निवेद्यात्र किं कार्य क्रियतामिति । इदमागमसाराख्यो मन्त्र्यवोचद्वचोऽ ‘शुभम् ॥ १८३ ॥निरन्तरायसंसिद्धौ यागस्योभयलोकजम्। हितं कृतं भवेत्तस्माद्गतिरस्त्वनयोरिति ॥ १८४ ॥
उन्होंने राजा जनकका कहा हुआ सब मन्त्रियोंको सुनाया और पूछा कि क्या कार्य करना चाहिये ? इसके उत्तरमें आगमसार मन्त्री निम्न्नाङ्कित अशुभवचन कहने लगा कि यज्ञके निर्विघ्न्न समाप्त होनेपर दोनों लोकोंमें उत्पन्न होनेवाला हित होगा और उससे इन दोनों कुमारोंकी उत्तम गति होगी ॥ १८३-१८४ ॥
“He related everything stated by King Janaka to all his ministers and asked, ‘What course of action should be taken?’ In response to this, the minister named Agamasara spoke the following grave words: ‘Upon the unobstructed completion of the sacrifice (Yajna), welfare will be generated in both the worlds (this life and the next), and through that, an excellent destiny (Uttama Gati) will be attained by both of these princes.'”183 – 184
श्लोक ( Shlok ) 185 – 186
वचस्यवसिते तस्य तदुक्तमवधार्य सः । प्रजल्पति स्मातिशयमत्याख्यो मन्त्रिणां मतः १८५ ॥धर्मो यागोऽयमित्येतत्प्रमाणपदवीं वचः । न प्रामोत्यत एवात्र न वर्तन्ते मनीषिणः ॥ १८६॥
आगमसारके वचन समाप्त होनेपर उसके कहे हुएका निश्चयकर अतिशयमति नामका श्रेष्ठ मन्त्री कहने लगा कि यज्ञ करना धर्म है यह वचन प्रमाणकोटिको प्राप्त नहीं है इसीलिए बुद्धिमान् पुरुष इस कार्य में प्रवृत्त नहीं होते हैं ।। १८५-१८६ ।।
“As soon as Agamasara finished speaking, having carefully analyzed what had been said, the eminent minister named Atishayamati began to speak, ‘The assertion that performing a sacrifice (Yajna) constitutes righteousness (Dharma) does not stand the test of valid proof (Pramana). For this very reason, wise and intelligent men do not engage themselves in such actions.'”185 – 186
श्लोक ( Shlok ) 187 – 192
प्रमाणभूयं वाक्यस्य वक्तृप्रामाण्यतो भवेत् । सर्वप्राणिवधाशंसियज्ञागमविधायिनः ॥ १८७ ॥कथमुन्मत्तकस्येव प्रामाण्यं विप्रवादिनः । विरुद्धालपितासिद्धानेति चेद्वेदवादिनः ॥ १८८ ॥सिद्धे वैकत्र घातोक्त रन्यत्रैतन्निषेधनात् । स्वयंभूत्वाददोषोऽस्य विरोधे सत्यपीत्यसत् ॥ १८९ ॥प्रष्टव्योऽसि स्वयम्भूत्वं कीदृशं तु तदुच्यताम् । बुद्धिमत्कारणस्पन्दसम्बन्धनिरपेक्षणम् ॥ १९० ॥स्वयम्भूत्वं भवेन्मेघभेकादीनां च सा गतिः । ततः सर्वज्ञनिर्दिष्टं सर्वप्राणिहितात्मकम् ॥ १९१ ॥ज्ञेयमागमशब्दाख्यं सर्वदोषविवर्जितम् । वर्तते यज्ञशब्दश्च दानदेवर्षिपूजयोः ॥ १९२ ॥
वचनकी प्रमाणता वक्ताकी प्रमाणतासे होती है। जिनमें समस्त प्राणियोंकी हिंसाका निरूपण है ऐसे यज्ञप्रवर्तक आगमका उपदेश करनेवाले विरुद्धवादी मनुष्यके वचन पागल पुरुषके वचनके समान प्रामाणिक कैसे हो सकते हैं। यदि वेदका निरूपण करनेवाले परस्पर विरुद्धभाषी न हों तो उसमें एक जगह हिंसाका विधान और दूसरी जगह उसका निषेध ऐसे दोनों प्रकारके वाक्य क्यों मिलते ? कदाचित् यह कहो कि वेद स्वयंभू है, अपने आप बना हुआ है अतः परस्पर विरोध होनेपर भी दोष नहीं है। तो यह कहना ठीक नहीं है क्योंकि आपसे यह पूछा जा सकता है कि स्वयंभूपना कैसा है- इसका क्या अर्थ है ? यह तो कहिये। यदि बुद्धिमान् मनुष्यरूपी कारणके हलन-चलनरूपी सम्बन्धसे निरपेक्ष रहना अर्थात् किसी भी बुद्धिमान् मनुष्यके हलन-चलनरूपी व्यापारके बिना ही वेद रचा गया है अतः स्वयंभू है। स्वयंभूपनका उक्त अर्थ यदि आप लेते हैं तो मेघोंकी गर्जना और मेंढकोंकी टरेटर इनमें भी स्वयंभूपन आ जावेगा क्योंकि ये सब भी तो अपने आप ही उत्पन्न होते हैं। इसलिए आगम वही है – शास्त्र वही है जो सर्वज्ञके द्वारा कहा हुआ हो, समस्त प्राणियोंका हित करनेवाला हो और सब दोषोंसे रहित हो। यज्ञ शब्द, दान देना तथा देव और ऋषियोंकी पूजा करने अर्थमें आता है ।। १८७-१९२ ॥
“The validity of a statement depends entirely on the credibility of the speaker. How can the words of a contradictory person—who preaches a sacrificial scripture (Agama) that prescribes the slaughter of all living beings—be considered authoritative, any more than the words of a madman? If those who expounded the Vedas were not self-contradictory, then why do we find two entirely conflicting types of statements within them—prescribing violence in one place and prohibiting it in another? Lest you argue that the Veda is Swayambhu (self-existent and uncreated) and therefore free from fault despite these internal contradictions, that too is untenable. For you must be asked: what exactly is the nature of this ‘self-existence’? Pray, tell us its meaning. If by ‘self-existence’ you mean being completely independent of the actions or physical movements of an intelligent human agent—implying that the Veda was composed without the active formulation of any wise individual—then the rumbling of clouds and the croaking of frogs would also have to be considered self-existent, as they too occur spontaneously. Therefore, a true scripture (Agama) is only that which is spoken by an Omniscient Being (Sarvajna), which promotes the welfare of all living creatures, and which is utterly devoid of all flaws. The word ‘Sacrifice’ (Yajna) actually signifies the acts of giving charity (Dana) and offering reverence to deities and sages.”187 – 192
श्लोक 193 से 203
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मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 135 | श्लोक 136 से 152 | श्लोक 153 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181
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