Summary of Uttar Puran Parv 62 by Acharya Gunabhadra
उत्तरपुराण पर्व 62 (श्लोक 1–513) का संक्षिप्त सारांश
उत्तरपुराण के बासठवें पर्व में भावी सोलहवें तीर्थंकर भगवान धर्मनाथ के पूर्वभवों, उनके कर्मों, आध्यात्मिक उत्कर्ष तथा उनसे सम्बद्ध अनेक चरित्रों का विस्तृत वर्णन किया गया है। प्रारम्भ में जीव के संसार-भ्रमण, कर्मबन्ध के कारणों, मिथ्यात्व, असंयम, प्रमाद, कषाय और योग के स्वरूप का निरूपण किया गया है। बताया गया है कि जीव इन्हीं कारणों से कर्मों का बन्ध करता हुआ अनादिकाल से जन्म-मरण के चक्र में भटकता रहता है, किन्तु सम्यग्दर्शन, व्रत, संयम और शुक्लध्यान के द्वारा मोक्षमार्ग प्राप्त कर सकता है।
विद्याधरों के राजा अमिततेज ने जिनेन्द्र भगवान के उपदेश से सम्यग्दर्शन प्राप्त किया और अपने पूर्वभवों तथा कर्मों का रहस्य जाना। भगवान ने कपिल, सत्यभामा, श्रीषेण, इन्द्रसेन, उपेन्द्रसेन तथा अन्य पात्रों के पूर्वजन्मों का वर्णन कर कर्मफल की अद्भुत व्यवस्था स्पष्ट की। अनेक पात्र पुण्य और पाप के अनुसार स्वर्ग, मनुष्य अथवा दुर्गति में जन्म लेते हैं और सत्संग तथा धर्म के प्रभाव से वैराग्य प्राप्त कर मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होते हैं।
अमिततेज ने धर्म, दान, पूजा, व्रत और संयम का पालन करते हुए अनेक विद्याओं को सिद्ध किया तथा विद्याधरों का चक्रवर्ती बना। बाद में वैराग्य धारण कर उसने प्रायोपगमन संन्यास लिया और उत्तम देवगति को प्राप्त हुआ। उसके साथ श्रीविजय ने भी धर्माराधना कर उच्च देवगति प्राप्त की।
अगले भव में वही जीव अपराजित और अनन्तवीर्य नामक दो राजकुमारों के रूप में जन्मे। दोनों भाई रूप, नीति, पराक्रम और धर्म में अद्वितीय थे। उनके पिता ने राज्य त्यागकर संयम धारण किया और दोनों को राज्यभार सौंप दिया। इसी बीच नारद के कारण राजा दमितारि और दोनों भाइयों के बीच संघर्ष की भूमिका बनी। दमितारि की पुत्री कनकश्री, अनन्तवीर्य के गुणों से प्रभावित होकर उससे अनुरक्त हुई और अंततः दोनों भाइयों द्वारा अपने साथ ले जाई गई।
इस घटना से उत्पन्न युद्ध में अपराजित और अनन्तवीर्य ने असाधारण वीरता दिखाई। दमितारि की विशाल सेना पराजित हुई और अन्ततः अनन्तवीर्य ने उसी के चक्र से उसका वध कर दिया। युद्ध के पश्चात दोनों भाइयों को केवलज्ञानी जिनेन्द्र का दर्शन हुआ। वहाँ कनकश्री ने अपना पूर्वभव पूछा और ज्ञात किया कि पूर्वजन्म में साध्वी के प्रति घृणा करने के कारण उसे वर्तमान जीवन में दुःख भोगना पड़ा। इस उपदेश से उसे वैराग्य उत्पन्न हुआ, उसने दीक्षा ग्रहण की और आगे चलकर देवगति प्राप्त की।
अपराजित ने विद्याधरों का अधिपति तथा बलभद्र पद प्राप्त किया और अनन्तवीर्य महान् नारायण के रूप में प्रसिद्ध हुआ। दोनों ने धर्म, नीति और पराक्रम से राज्य का संचालन किया तथा लोककल्याण में जीवन लगाया। भगवान ने यह भी भविष्यवाणी की कि यही जीव आगे चलकर नवम भव में चक्रवर्ती तथा तत्पश्चात सोलहवें तीर्थंकर भगवान धर्मनाथ के रूप में जन्म लेकर अनन्त जीवों का कल्याण करेंगे।
इस प्रकार पर्व 62 का मुख्य प्रतिपाद्य कर्मसिद्धान्त, सम्यग्दर्शन की महिमा, सत्संग का प्रभाव, वैराग्य की उत्पत्ति तथा भगवान धर्मनाथ के पूर्वभवों की गौरवपूर्ण आध्यात्मिक यात्रा का वर्णन है।
श्लोक 1 से 10 : वक्ता और श्रोता के लक्षण
भगवान शान्तिनाथ की स्तुति के साथ इस पर्व का आरम्भ होता है। इसके बाद धर्मकथा के वक्ता और श्रोता के गुणों का वर्णन किया गया है। योग्य वक्ता को विद्वान, चारित्रवान, दयालु, बुद्धिमान तथा लोकव्यवहार का ज्ञाता होना चाहिए। योग्य श्रोता वह है जो विवेकशील, गुरुभक्त, क्षमाशील, धर्मग्राही तथा सत्य को ग्रहण करने में तत्पर हो।
श्लोक 11 से 21 : धर्मकथा का स्वरूप और भरत क्षेत्र का वर्णन
धर्मकथा वह है जिसमें जीव-अजीव, बन्ध-मोक्ष, दान, शील, तप, दया और वैराग्य का यथार्थ निरूपण किया जाता है। इसके पश्चात् शान्तिनाथ भगवान के चरित्र का प्रारम्भ करते हुए जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र का वर्णन किया गया है, जिसे तीर्थंकरों, चक्रवर्तियों और मोक्षमार्ग की उपलब्धि के कारण अत्यन्त श्रेष्ठ कहा गया है। उसी क्षेत्र में विजयार्ध पर्वत स्थित है।
श्लोक 22 से 31 : विजयार्ध पर्वत और रथनूपुर नगरी
विजयार्ध पर्वत की भव्यता, उसकी नदियों तथा देव-विद्याधरों से युक्त महिमा का वर्णन किया गया है। उसकी दक्षिण श्रेणी में रथनूपुर चक्रवाल नामक समृद्ध नगरी थी, जहाँ धर्म, अर्थ और काम की वृद्धि होती थी। वहाँ के राजा ज्वलनजटी पराक्रमी, नीतिज्ञ और प्रजावत्सल शासक थे।
श्लोक 32 से 41 : ज्वलनजटी और वायुवेगा
राजा ज्वलनजटी का राज्य निरन्तर उन्नति कर रहा था। दूसरी ओर द्युतिलक नगर के राजा चन्द्राभ और रानी सुभद्रा की पुत्री वायुवेगा अपने गुण, रूप और विद्याओं के कारण प्रसिद्ध थी। ज्वलनजटी और वायुवेगा का विवाह हुआ। दोनों में गहरा प्रेम था तथा वे आदर्श दाम्पत्य जीवन व्यतीत कर रहे थे।
श्लोक 42 से 52 : अर्ककीर्ति और स्वयंप्रभा का जन्म
ज्वलनजटी और वायुवेगा के यहाँ अर्ककीर्ति नामक पुत्र तथा स्वयंप्रभा नामक अत्यन्त रूपवती पुत्री उत्पन्न हुई। स्वयंप्रभा यौवन प्राप्त कर असाधारण सौन्दर्य से युक्त हुई। इसी बीच दो चारण ऋद्धिधारी मुनि उद्यान में पधारे। राजा ने उनके उपदेश से सम्यग्दर्शन, दान और व्रतों को ग्रहण किया तथा धर्ममार्ग में प्रवृत्त हुआ।
श्लोक 53 से 61 : स्वयंप्रभा का धर्मानुराग और विवाह-चिन्ता
स्वयंप्रभा ने भी धर्म को स्वीकार किया और उपवास तथा पूजा द्वारा अपनी श्रद्धा प्रकट की। उसकी भक्ति और सौन्दर्य देखकर राजा ज्वलनजटी उसके योग्य वर के विषय में चिंतित हुआ। उसने मंत्रियों को बुलाकर स्वयंप्रभा के विवाह के लिए उपयुक्त वर का चयन करने का विचार किया।
श्लोक 62 से 72 : योग्य वर की खोज
मंत्रियों ने विभिन्न विद्याधर राजाओं का विचार प्रस्तुत किया। किसी ने अश्वग्रीव को योग्य वर बताया तो किसी ने अन्य राजाओं का नाम सुझाया। अंततः श्रुतसागर मंत्री ने सुरेन्द्रकान्तार नगर के राजा मेघवाहन के पुत्र विद्युत्प्रभ को गुण, कुल, आयु और भविष्य की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ वर बताया तथा उसकी बहन ज्योतिर्माला का विवाह अर्ककीर्ति से करने का सुझाव दिया।
श्लोक 73 से 82 : विद्युत्प्रभ का पूर्वभव और स्वयंवर का निर्णय
श्रुतसागर मंत्री ने अवधिज्ञानी मुनि से सुनी हुई विद्युत्प्रभ की पूर्वभव कथा सुनाई। पूर्वजन्म में वह विजयभद्र नामक राजकुमार था, जिसने वैराग्य लेकर संयम धारण किया था और देवगति प्राप्त की थी। वर्तमान जन्म में भी वह मोक्ष का अधिकारी बताया गया। फिर भी अनेक राजाओं की संभावित शत्रुता से बचने के लिए मंत्री सुमति ने स्वयंवर आयोजित करने की सलाह दी, जिसे सभी ने स्वीकार कर लिया।
श्लोक 83 से 92 : निमित्तज्ञानी की भविष्यवाणी
राजा ने निमित्तज्ञानी से पूछा कि स्वयंप्रभा का वास्तविक पति कौन होगा। उसने भगवान ऋषभदेव द्वारा कही गई एक प्राचीन कथा का उल्लेख किया। उसमें पुरूरवा भील, उसके पुण्यफल तथा आगे चलकर त्रिपृष्ठ के जन्म की भविष्यवाणी का वर्णन किया गया। साथ ही बताया गया कि विजय और त्रिपृष्ठ आगे चलकर प्रथम बलभद्र और प्रथम नारायण बनेंगे तथा त्रिपृष्ठ का भविष्य अत्यन्त महान होगा।
श्लोक 93 से 101 : स्वयंप्रभा का त्रिपृष्ठ से संबंध
निमित्तज्ञानी ने बताया कि स्वयंप्रभा का विवाह भविष्य के महान पुरुष त्रिपृष्ठ से होना निश्चित है। यह संबंध दोनों कुलों के लिए गौरव और कल्याणकारी होगा। राजा ज्वलनजटी ने इस भविष्यवाणी को स्वीकार कर प्रसन्नतापूर्वक दूत को प्रजापति महाराज के पास भेजा। प्रजापति पहले से ही इस संबंध के विषय में अवगत थे, इसलिए उन्होंने दूत का आदरपूर्वक स्वागत किया और विवाह प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार करने की भावना व्यक्त की।
श्लोक 102 से 112 : विवाह सम्पन्न होना और स्वयंप्रभा का त्रिपृष्ठ को वरण
दूत द्वारा विवाह-संदेश सुनाए जाने पर प्रजापति महाराज अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने सम्मानपूर्वक दूत को विदा किया। ज्वलनजटी स्वयंप्रभा को लेकर पोदनपुर पहुँचे, जहाँ बड़े उत्सव के साथ विवाह सम्पन्न हुआ। स्वयंप्रभा का विवाह त्रिपृष्ठ से किया गया तथा ज्वलनजटी ने सिंहवाहिनी और गरुड़वाहिनी नामक विद्याएँ भी प्रदान कीं। इस प्रकार दोनों कुलों में आनन्द और समृद्धि का विस्तार हुआ।
श्लोक 113 से 122 : अश्वग्रीव के लिए अशुभ संकेत और त्रिपृष्ठ के प्रति शत्रुता
उधर अश्वग्रीव प्रतिनारायण के राज्य में अनेक अशुभ उत्पात प्रकट होने लगे। निमित्तज्ञानी शतबिन्दु ने बताया कि ये उत्पात त्रिपृष्ठ के कारण उत्पन्न होने वाले संकट के सूचक हैं। उसने त्रिपृष्ठ के बढ़ते प्रभाव और पराक्रम की ओर संकेत किया। यह सुनकर अश्वग्रीव चिंतित और क्रोधित हो उठा तथा उसने त्रिपृष्ठ को अपना शत्रु मान लिया।
श्लोक 123 से 131 : दूतों का आगमन और त्रिपृष्ठ का उत्तर
अश्वग्रीव ने त्रिपृष्ठ की भावना जानने के लिए दूत भेजे। दूतों ने आकर अश्वग्रीव की आज्ञा सुनाई और त्रिपृष्ठ को उसके पास चलने का आदेश दिया। त्रिपृष्ठ ने इसे अस्वीकार कर दिया और अश्वग्रीव के प्रति सम्मान प्रकट करने से भी इंकार कर दिया। दूतों ने उसे समझाने का प्रयास किया, किन्तु वह अपने निर्णय पर अडिग रहा।
श्लोक 132 से 141 : युद्ध की घोषणा और सेनाओं का संघर्ष
दूतों ने लौटकर त्रिपृष्ठ के उत्तर का समाचार अश्वग्रीव को सुनाया। इससे वह अत्यन्त क्रोधित हो गया और युद्ध की घोषणा कर दी। दोनों पक्षों की विशाल सेनाएँ आमने-सामने आ गईं। भयंकर युद्ध आरम्भ हुआ और दोनों ओर भारी विनाश होने लगा। सैनिकों की निरर्थक हानि देखकर अंततः त्रिपृष्ठ स्वयं अश्वग्रीव के सम्मुख युद्ध के लिए उपस्थित हुआ।
श्लोक 142 से 151 : अश्वग्रीव का वध और नारायण पद की प्राप्ति
द्वन्द्व युद्ध में दोनों वीरों ने अत्यन्त पराक्रम दिखाया। जब सामान्य युद्ध से निर्णय नहीं हुआ तो मायायुद्ध और दिव्य अस्त्रों का प्रयोग हुआ। अंत में अश्वग्रीव ने चक्र चलाया, किन्तु त्रिपृष्ठ ने उसी चक्र से उसका वध कर दिया। इस विजय के बाद त्रिपृष्ठ प्रथम नारायण और विजय प्रथम बलभद्र के रूप में प्रतिष्ठित हुए। ज्वलनजटी को दोनों श्रेणियों का आधिपत्य मिला तथा अर्ककीर्ति का विवाह ज्योतिर्माला से सम्पन्न हुआ।
श्लोक 152 से 161 : वंशवृद्धि, वैराग्य और मोक्षमार्ग
अर्ककीर्ति और ज्योतिर्माला के यहाँ अमिततेज और सुतारा का जन्म हुआ। त्रिपृष्ठ और स्वयंप्रभा के यहाँ श्रीविजय, विजयभद्र तथा ज्योतिप्रभा नामक सन्तानें उत्पन्न हुईं। इसी समय प्रजापति महाराज को वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने राज्य त्यागकर संयम धारण किया, तपस्या की और अंततः मोक्ष प्राप्त किया। बाद में ज्वलनजटी ने भी राज्य अर्ककीर्ति को सौंपकर दीक्षा ग्रहण कर ली।
श्लोक 162 से 171 : पारिवारिक सम्बन्ध और बलभद्र का संयम
त्रिपृष्ठ ने अपनी पुत्री ज्योतिप्रभा का विवाह अमिततेज से कराया तथा सुतारा का विवाह श्रीविजय के साथ सम्पन्न हुआ। दोनों कुलों के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित हुए। कालान्तर में त्रिपृष्ठ की मृत्यु के बाद वह सातवें नरक में गया, जबकि विजय बलभद्र ने वैराग्य ग्रहण कर सात हजार राजाओं के साथ संयम धारण किया, केवलज्ञान प्राप्त किया और मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर हुए। अर्ककीर्ति ने भी राज्य त्यागकर तपस्वी जीवन अपना लिया।
श्लोक 172 से 181 : भविष्यवाणी और अष्टाङ्ग निमित्त का परिचय
एक निमित्तज्ञानी ने श्रीविजय को चेतावनी दी कि सातवें दिन उसके मस्तक पर महावज्र गिरेगा। युवराज ने उसकी परीक्षा ली और उसके ज्ञान का आधार पूछा। तब निमित्तज्ञानी ने अपने अध्ययन और अनुभव का परिचय देते हुए अष्टाङ्ग निमित्तों—अन्तरिक्ष, भौम, अङ्ग, स्वर, व्यञ्जन, लक्षण, छिन्न और स्वप्न—का उल्लेख किया तथा उनके विषय में बताने का आरम्भ किया।
श्लोक 182 से 191 : अष्टाङ्ग निमित्तों का विवेचन
निमित्तज्ञानी ने विभिन्न निमित्तों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया। उसने ग्रह-नक्षत्रों से सम्बन्धित अन्तरिक्ष निमित्त, पृथ्वी से सम्बन्धित भौम निमित्त, शरीर के चिह्नों से सम्बन्धित अङ्ग और व्यञ्जन निमित्त, स्वर और लक्षण निमित्त तथा छिन्न और स्वप्न निमित्तों का अर्थ समझाया। इन सबके माध्यम से शुभ-अशुभ घटनाओं का अनुमान किया जाता है।
श्लोक 192 से 201 : निमित्तज्ञानी का जीवनवृत्त और उपाय-विचार
निमित्तज्ञानी ने अपना पूर्व जीवन सुनाया। वह पहले मुनि था, किन्तु परिषहों को सहन न कर पाने के कारण गृहस्थ जीवन में लौट आया। अध्ययन और निमित्तज्ञान के बल पर उसने भविष्यवाणी की सिद्धि प्राप्त की। उसके युक्तिपूर्ण कथन से श्रीविजय और उसके मंत्री चिंतित हो गए। राजा की रक्षा के लिए विभिन्न उपाय सुझाए गए। किसी ने समुद्र के भीतर लोहे के सन्दूक में रखने का सुझाव दिया, तो किसी ने विजयार्ध पर्वत की गुफा में सुरक्षित रखने का। अंत में बुद्धिसागर मंत्री ने एक प्राचीन कथा सुनाने का निश्चय किया, जिससे आगे का प्रसंग आरम्भ होता है।
श्लोक 202 से 211 : सोम परिव्राजक का पतन और कुम्भ की नरभक्षी प्रवृत्ति
मिथ्यादृष्टि सोम परिव्राजक जिनदास से शास्त्रार्थ में पराजित होकर मृत्यु के बाद भैंसा और फिर राक्षस बना। उसी समय सिंहपुर का राजा कुम्भ नरमांस का स्वाद लग जाने से नरभक्षी बन गया। उसकी क्रूरता से प्रजा भयभीत होकर नगर छोड़कर कारकट नगर चली गई, किन्तु कुम्भ वहाँ भी लोगों को खाने लगा और समस्त जनसमुदाय आतंकित हो उठा।
श्लोक 212 से 221 : बुद्धिमानी से वज्र-भय का निवारण
कुम्भकारकटपुर में प्रतिदिन एक मनुष्य कुम्भ को दिया जाने लगा। इस कथा को सुनाकर बुद्धिसागर मंत्री ने विजयार्ध की गुफा में राजा को छिपाने की योजना का विरोध किया। तब मतिसागर मंत्री ने सुझाव दिया कि चूँकि भविष्यवाणी पोदनपुर के राजा पर वज्र गिरने की थी, इसलिए अस्थायी रूप से यक्ष-प्रतिमा को राजा घोषित कर दिया जाए। सबने यह उपाय स्वीकार किया और श्रीविजय धर्माराधना में प्रवृत्त हो गया।
श्लोक 222 से 231 : भविष्यवाणी की सिद्धि और सुतारा का अपहरण
सातवें दिन वज्र यक्ष-प्रतिमा पर गिरा और भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई। नगर में उत्सव मनाया गया तथा निमित्तज्ञानी का सम्मान किया गया। इसके बाद श्रीविजय आकाशगामिनी विद्या सिद्ध कर सुतारा के साथ विहार करने गया। वहीं चमरचंचपुर के राजकुमार अशनिघोष ने सुतारा को देखकर उस पर आसक्त होकर छलपूर्वक उसका अपहरण करने की योजना बनाई।
श्लोक 232 से 240 : अशनिघोष का छल और वैताली का भेद खुलना
अशनिघोष ने कृत्रिम मृग के बहाने श्रीविजय को अलग किया और उसका रूप धारण कर सुतारा को विमान में बैठाकर ले गया। दूसरी ओर वैताली विद्या सुतारा का रूप बनाकर श्रीविजय के पास रही। जब वह कृत्रिम सुतारा मृत्यु का अभिनय करने लगी तो शोकाकुल श्रीविजय उसके साथ चिता पर चढ़ने को तैयार हो गया। तभी एक विद्याधर ने वैताली का वास्तविक रूप प्रकट कर दिया और सारा छल उजागर हो गया।
श्लोक 241 से 252 : सुतारा का समाचार और सहायता का आश्वासन
संभिन्न नामक विद्याधर राजा ने श्रीविजय को बताया कि सुतारा जीवित है और अशनिघोष उसे बलपूर्वक ले जा रहा है। उसने यह भी कहा कि स्वयं सुतारा ने उसे श्रीविजय तक समाचार पहुँचाने के लिए भेजा है। यह सुनकर श्रीविजय को संतोष हुआ और उसने संभिन्न को धन्यवाद देकर अपने परिवार को सूचना पहुँचाने की व्यवस्था की।
श्लोक 253 से 261 : स्वयंप्रभा का शोक और पुत्र से मिलन
पोदनपुर में उत्पात देखकर निमित्तज्ञानी लोगों को धैर्य बँधाते रहे। दीपशिख विद्याधर ने आकर श्रीविजय की कुशलता और सुतारा के अपहरण का समाचार दिया। यह सुनकर स्वयंप्रभा अत्यन्त दुःखी हुई और तत्काल पुत्र से मिलने के लिए निकल पड़ी। वन में पहुँचकर उसने श्रीविजय को सकुशल देखा और अत्यन्त हर्ष अनुभव किया।
श्लोक 262 से 271 : अशनिघोष के विरुद्ध युद्ध की तैयारी
श्रीविजय ने माता को सम्पूर्ण घटना सुनाई और संभिन्न विद्याधर के उपकार की प्रशंसा की। स्वयंप्रभा उसे लेकर रथनूपुर पहुँची, जहाँ अमिततेज ने उनका भव्य स्वागत किया। जब अशनिघोष ने दूत के माध्यम से भी सुतारा को लौटाने से इन्कार कर दिया, तब अमिततेज ने युद्ध का निश्चय किया और श्रीविजय को विशेष विद्याएँ तथा सैन्य सहायता प्रदान की।
श्लोक 272 से 283 : अशनिघोष के साथ युद्ध और समवसरण में शांति
श्रीविजय विशाल सेना के साथ युद्ध के लिए गया। अशनिघोष के पुत्र पराजित हुए, तब वह स्वयं युद्धभूमि में उतरा और मायावी विद्याओं से अनेक रूप धारण कर लिया। इसी समय अमिततेज महाज्वाला विद्या सिद्ध कर युद्ध में पहुँचा। अशनिघोष पराजित होकर विजय तीर्थंकर के समवसरण में शरण लेने गया। उसके पीछे पहुँचे सभी योद्धाओं का क्रोध मानस्तम्भ के प्रभाव से शांत हो गया और वे भगवान के समक्ष विनम्र होकर बैठ गए।
श्लोक 284 से 292 : जिनेन्द्र की महिमा और सद्धर्म की जिज्ञासा
अशनिघोष की माता आसुरी देवी सुतारा को लेकर समवसरण में आई और क्षमा याचना की। वहाँ यह प्रतिपादित किया गया कि जिनेन्द्र भगवान की उपस्थिति में घोर वैर भी समाप्त हो जाता है तथा कर्मबंधन शिथिल पड़ जाते हैं। इस प्रभाव को देखकर अमिततेज ने भगवान से सद्धर्म का स्वरूप पूछते हुए संसार-सागर से पार होने का उपाय जानने की प्रार्थना की।
श्लोक 293 से 301 : मिथ्यात्व का स्वरूप
भगवान ने दिव्यध्वनि द्वारा उपदेश देते हुए कहा कि संसार का मूल कारण कर्म है और कर्म का मूल कारण मिथ्यात्व तथा असंयम हैं। मिथ्यात्व ज्ञान को विपरीत बना देता है और बन्ध का कारण बनता है। इसके अज्ञान, संशय, एकान्त, विपरीत और विनय—ये पाँच भेद बताए गए। भगवान ने समझाया कि तत्त्वों के यथार्थ स्वरूप को न समझना ही मिथ्यात्व है और यही जीव को संसार में बाँधे रखता है।
श्लोक 302 से 311 : मिथ्यात्व, असंयम, प्रमाद, कषाय और योग
भगवान ने कर्मबन्ध के प्रमुख कारणों का वर्णन करते हुए बताया कि सभी देवों और मतों को समान रूप से मोक्षमार्ग मानना विनय-मिथ्यात्व कहलाता है। व्रतरहित मन-वचन-काय की प्रवृत्ति असंयम है, जो जीव और इन्द्रिय-असंयम के रूप में दो प्रकार का होता है। छठे गुणस्थान तक प्रमाद तथा सातवें से दसवें गुणस्थान तक कषाय कर्मबन्ध के कारण बनते हैं। ग्यारहवें से तेरहवें गुणस्थान तक योग बन्ध का कारण रहता है। इन्हीं पाँच कारणों से जीव विविध कर्मों का बन्ध करता हुआ संसार में भ्रमण करता रहता है।
श्लोक 312 से 321 : जीव की आध्यात्मिक उन्नति और मोक्षमार्ग
जीव अनादिकाल से जन्म, जरा, रोग और मरण के चक्र में भटकता रहता है। जब उसे अनुकूल लब्धियाँ प्राप्त होती हैं तब वह मिथ्यात्व का उपशम कर सम्यग्दर्शन प्राप्त करता है, व्रत धारण करता है और क्रमशः चारित्र की शुद्धि करता हुआ केवलज्ञान को प्राप्त करता है। अंत में शुक्लध्यान के प्रभाव से समस्त कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त कर लेता है। भगवान के इस उपदेश को सुनकर अमिततेज अत्यन्त प्रसन्न हुआ।
श्लोक 322 से 331 : अमिततेज का प्रश्न और कपिल की कथा का आरम्भ
सम्यग्दर्शन और श्रावकव्रत ग्रहण करने के बाद अमिततेज ने भगवान से पूछा कि अशनिघोष ने उसके प्रभाव को जानते हुए भी सुतारा का हरण क्यों किया। उत्तर में भगवान ने पूर्वजन्म की कथा सुनानी आरम्भ की। मगध देश के अचल ग्राम में धरणीजट नामक ब्राह्मण रहता था, जिसके पुत्र इन्द्रभूति, अग्निभूति और दासीपुत्र कपिल थे। कपिल अत्यन्त बुद्धिमान था, किन्तु तिरस्कार के कारण घर छोड़कर रत्नपुर चला गया और वहीं प्रतिष्ठित विद्वान बन गया।
श्लोक 332 से 341 : कपिल का छल और राजपरिवार का परिचय
कपिल के पिता दरिद्र होकर उसके पास पहुँचे। कपिल ने सम्मानपूर्वक उनका सत्कार किया, परन्तु अपने जन्म का रहस्य छिपाए रखा। बाद में सत्यभामा ने धन देकर सत्य जानना चाहा और ब्राह्मण ने सब भेद खोल दिया। इसी प्रसंग में राजा श्रीषेण, उनकी रानियाँ सिंहनन्दिता और अनिन्दिता तथा उनके पुत्र इन्द्रसेन और उपेन्द्रसेन का परिचय दिया गया, जो गुणवान और प्रिय राजकुमार थे।
श्लोक 342 से 351 : कपिल का निर्वासन और पुण्य का संचय
सत्यभामा अपने पति के दुश्चरित्र से विरक्त होकर राजा की शरण में गई। राजा ने कपिल के आचरण को अनुचित मानकर उसे राज्य से निकाल दिया। कुछ समय बाद राजा श्रीषेण ने चारण ऋद्धिधारी मुनियों को आहारदान दिया और महान पुण्य अर्जित किया। उनकी रानियों तथा सत्यभामा ने भी अनुमोदना द्वारा श्रेष्ठ भव का बन्ध किया। इसी बीच कौशाम्बी के राजा महाबल की पुत्री श्रीकान्ता का विवाह इन्द्रसेन के साथ हुआ।
श्लोक 352 से 363 भाइयों का विवाद और पूर्वजन्म का रहस्य
श्रीकान्ता के साथ आई अनन्तमति के कारण इन्द्रसेन और उपेन्द्रसेन में विवाद उत्पन्न हो गया। दोनों युद्ध के लिए तैयार हो गए और इस दुःख से राजा तथा रानियों की मृत्यु हो गई। बाद में एक विद्याधर ने आकर दोनों भाइयों को बताया कि अनन्तमति वास्तव में उनके पूर्वजन्मों से सम्बद्ध जीव है और उसके कारण युद्ध करना अनुचित है। इसके समर्थन में उसने अपने पूर्वभव का वृत्तांत सुनाया।
श्लोक 364 से 371 : पूर्वभवों का विस्तृत वर्णन
विद्याधर ने बताया कि पूर्वजन्म में कनकमालिका और उसकी पुत्रियाँ धर्मश्रवण के प्रभाव से देवगति को प्राप्त हुई थीं, जबकि पद्मावती कामासक्ति के कारण अप्सरा बनी थी। आगे चलकर वही जीव विभिन्न रूपों में जन्म लेकर वर्तमान जीवन में आए। अनन्तमति और दोनों राजकुमारों के बीच का संबंध भी इन्हीं पूर्वभवों का परिणाम था। इस सत्य को जानकर दोनों भाइयों का मोह दूर हुआ।
श्लोक 372 से 382 : वैराग्य, स्वर्गगमन और अशनिघोष का कारण
पूर्वभव का रहस्य सुनकर दोनों भाइयों में वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने दीक्षा ग्रहण की और अंततः मोक्षमार्ग पर अग्रसर हुए। अनन्तमति ने भी श्रावकधर्म धारण कर स्वर्गगति प्राप्त की। आगे भगवान ने बताया कि राजा श्रीषेण, उनकी रानियाँ तथा सत्यभामा विभिन्न दिव्य भवों में जन्म लेकर वर्तमान पात्रों के रूप में उत्पन्न हुए। पूर्वजन्म का दुष्ट कपिल अनेक दुर्गतियों में भटकने के बाद अशनिघोष बना और पूर्व संस्कारों के कारण उसने सुतारा का हरण किया।
श्लोक 383 से 390 : अमिततेज का भविष्य और धर्मनिष्ठ शासन
भगवान ने भविष्यवाणी की कि अमिततेज आगे चलकर पाँचवाँ चक्रवर्ती और सोलहवें तीर्थंकर भगवान शान्तिनाथ होगा। यह सुनकर अमिततेज का हृदय धर्मभाव से भर गया। उसी समय अशनिघोष, स्वयंप्रभा, सुतारा तथा अन्य अनेक व्यक्तियों ने संयम धारण किया। अमिततेज ने धर्म, दान, पूजा, व्रत और धर्मोपदेश में निरन्तर प्रवृत्त रहकर आदर्श शासन किया।
श्लोक 391 से 401 : विद्याओं की सिद्धि और विद्याधर चक्रवर्ती पद
अमिततेज ने अनेक दिव्य विद्याओं की सिद्धि प्राप्त की और उन सबमें पारंगत हो गया। उसके प्रभाव, ज्ञान और सामर्थ्य के कारण समस्त विद्याधर उसके अधीन हो गए। इस प्रकार वह दोनों श्रेणियों का अधिपति और विद्याधरों का चक्रवर्ती बनकर दीर्घकाल तक ऐश्वर्य एवं वैभव का उपभोग करता रहा।
श्लोक 402 से 411 : वैराग्य, संन्यास और देवगति
अमिततेज ने चारण ऋद्धिधारी मुनियों को आहारदान देकर महान पुण्य अर्जित किया। बाद में अमिततेज और श्रीविजय ने श्रेष्ठ मुनियों से धर्मोपदेश सुना तथा अपने पूर्वभवों का ज्ञान प्राप्त किया। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि उनकी आयु केवल एक मास शेष है, तब उन्होंने अपने पुत्रों को राज्य सौंप दिया, आष्टाह्निक पूजा की और प्रायोपगमन संन्यास धारण कर लिया। समाधिमरण के पश्चात् अमिततेज तेरहवें स्वर्ग में रविचूल देव और श्रीविजय मणिचूल देव के रूप में उत्पन्न हुए। इस प्रकार उनका जीवन धर्म, वैराग्य और उत्कृष्ट आध्यात्मिक साधना का आदर्श बन गया।
श्लोक 412 से 421 : अपराजित और अनन्तवीर्य का जन्म एवं गुणवैभव
तेरहवें स्वर्ग से च्युत होकर रविचूल देव राजा स्तिमितसागर और रानी वसुन्धरा के पुत्र अपराजित के रूप में तथा मणिचूल देव रानी अनुमति के पुत्र अनन्तवीर्य के रूप में जन्मे। दोनों भाई रूप, तेज, नीति, दया और कलाओं से सम्पन्न थे। वे चन्द्रमा और बालसूर्य के समान लोक को आनन्द देने वाले, अज्ञान का नाश करने वाले तथा प्रजा के हितकारी शासक थे। उनके यश, सदाचार और सौम्यता के कारण शत्रु भी उनसे मैत्री स्थापित करने को उत्सुक रहते थे।
श्लोक 422 से 433 : राज्यारोहण और नारद का क्रोध
राजा स्तिमितसागर ने पुत्रों को योग्य समझकर अपराजित को राज्य और अनन्तवीर्य को युवराज पद देकर स्वयं संयम धारण कर लिया। बाद में धरणेन्द्र की विभूति देखकर निदान-बन्ध के कारण वे धरणेन्द्र पद को प्राप्त हुए। दोनों भाई नीति और वैभव से राज्य का विकास करने लगे। एक अवसर पर वे नृत्यांगनाओं बर्बरी और चिलातिका का नृत्य देख रहे थे, तभी नारद आए। उचित सम्मान न मिलने से नारद क्रोधित होकर वहाँ से चले गए और प्रतिशोध की भावना से शिवमन्दिरनगर के राजा दमितारि के पास पहुँचे।
श्लोक 434 से 442 : नारद द्वारा दमितारि को उकसाना
राजा दमितारि ने आदरपूर्वक नारद का स्वागत किया। नारद ने उसे बताया कि अपराजित और अनन्तवीर्य के पास दो अद्वितीय नर्तकियाँ हैं जो उसके योग्य हैं। उन्होंने दोनों भाइयों को भोगासक्त, प्रमादी और सरलता से पराजित किए जाने योग्य बताकर दमितारि को उन नर्तकियों को प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया। नारद की बातों में आकर दमितारि ने उन्हें माँगने हेतु दूत भेज दिया।
श्लोक 443 से 451 : दमितारि का संदेश
दमितारि का दूत प्रभाकरीपुरी पहुँचा, जहाँ दोनों भाई प्रोषधोपवास में स्थित थे। उसने दमितारि के पराक्रम, प्रताप और विजयश्री का वर्णन करते हुए कहा कि अनेक राजा उसके अधीन हैं और उसकी आज्ञा का सम्मान करते हैं। उसने दोनों नर्तकियों को दमितारि को सौंप देने का अनुरोध किया ताकि आपसी मैत्री और अधिक सुदृढ़ हो सके।
श्लोक 452 से 462 : विद्यादेवियों का आगमन और योजना
दूत का संदेश सुनकर दोनों भाइयों ने मंत्रियों से विचार-विमर्श किया। उसी समय उनके पुण्य के प्रभाव से विद्यादेवियाँ प्रकट हुईं और सहायता का आश्वासन दिया। तब अपराजित और अनन्तवीर्य ने स्वयं नर्तकियों का वेश धारण किया और दूत के साथ शिवमन्दिरनगर पहुँच गए। वे गुप्त रूप से राजमहल में प्रवेश कर अवसर की प्रतीक्षा करने लगे।
श्लोक 463 से 472 : कनकश्री का अनुराग
दमितारि ने अपनी पुत्री कनकश्री को नृत्य सिखाने का कार्य उन दोनों के सुपुर्द कर दिया। एक दिन उन्होंने भावी नारायण अनन्तवीर्य के गुणों का वर्णन करने वाला गीत गाया। गीत सुनकर कनकश्री अनन्तवीर्य के प्रति आकर्षित हो गई और उसके विषय में पूछने लगी। तब दोनों भाइयों ने उसके रूप, वैभव और महिमा का वर्णन किया तथा अन्ततः उसे अनन्तवीर्य का वास्तविक स्वरूप दिखा दिया, जिससे कनकश्री अत्यन्त अनुरक्त हो गई।
श्लोक 473 से 481 : युद्ध का प्रारम्भ
कनकश्री को साथ लेकर दोनों भाई आकाशमार्ग से निकल गए। यह समाचार सुनकर दमितारि ने सैनिक भेजे। अपराजित ने कनकश्री और अनन्तवीर्य को सुरक्षित भेजकर अकेले ही शत्रु सेना से युद्ध किया और अनेक योद्धाओं का संहार कर दिया। तब दमितारि स्वयं विशाल सेना लेकर युद्ध के लिए निकला, किन्तु अपराजित ने उसके सैनिकों को भी परास्त कर दिया।
श्लोक 482 से 491 : दमितारि का वध और केवलज्ञानी जिनेन्द्र का दर्शन
अनन्तवीर्य ने स्वयं दमितारि से युद्ध कर उसे पराजित कर दिया। दमितारि द्वारा छोड़ा गया चक्र अनन्तवीर्य की प्रदक्षिणा कर उसके दाहिने कंधे के समीप ठहर गया। उसी चक्र से अनन्तवीर्य ने दमितारि का वध किया। युद्ध के बाद दोनों भाइयों का विमान एक केवलज्ञानी जिनेन्द्र के समीप रुक गया। वे उतरे, जिनेन्द्र की वंदना की, धर्मश्रवण किया और अपने पापों का क्षय करने वाले उपदेश सुनकर वहाँ विनम्रतापूर्वक बैठ गए।
श्लोक 492 से 501: कनकश्री का पूर्वभव
कनकश्री ने जिनेन्द्र से अपना पूर्वभव पूछा। भगवान् ने बताया कि पूर्वजन्म में वह श्रीदत्ता नाम की धर्मनिष्ठ कन्या थी जिसने अहिंसा-व्रत और उपवास जैसे पुण्यकर्म किए थे। किन्तु एक आर्यिका के प्रति घृणा भाव रखने के कारण उसे वर्तमान जीवन में दुःख भोगना पड़ा। उसी पुण्य के प्रभाव से वह स्वर्ग में देवी बनी और वहाँ से कनकश्री के रूप में जन्मी। भगवान् ने उपदेश दिया कि साधुओं के प्रति कभी घृणा नहीं करनी चाहिए।
श्लोक 502 से 513 : कनकश्री की दीक्षा और दोनों भाइयों का वैभव
कनकश्री ने अपने भाइयों के बन्धन और उनके दुःख को देखकर संसार से विरक्ति ग्रहण की। उसने बलभद्र और नारायण से अपने भाइयों को मुक्त करवाया, तीर्थंकर स्वयंप्रभ के उपदेश सुने और सुप्रभ गणिनी के पास दीक्षा धारण कर ली। मृत्यु के बाद वह सौधर्म स्वर्ग में देवी बनी। उधर अपराजित ने विद्याधरों का अधिपति तथा बलभद्र पद प्राप्त किया और अपने नाम को सार्थक किया। अनन्तवीर्य ने दमितारि को पराजित कर तीन खण्डों का राज्य प्राप्त किया तथा महान् नारायण के रूप में प्रसिद्ध हुआ। दोनों भाई धर्म, नीति, पराक्रम और यश से विभूषित होकर दीर्घकाल तक लोककल्याण करते रहे।
पर्व 62 का उपसंहार
इस प्रकार उत्तरपुराण के बासठवें पर्व में भावी बलभद्र अपराजित और नारायण अनन्तवीर्य के उदय, पराक्रम, धर्मनिष्ठा, कनकश्री के वैराग्य तथा उनके गौरवपूर्ण जीवन का वर्णन पूर्ण होता है।
पर्व 63
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