मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 274 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 304
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 305 to 321
श्लोक ( Shlok ) 305 – 307
तदा पर्वतमातापि प्रसन्नाभूत्पुनश्च सः । तस्यास्तन्मुनिवाक्यार्थसम्प्रत्ययविधित्सुकः ॥३०५॥स्वपुत्रछात्रयोर्भावपरीक्षायै द्विजाग्रणीः । स्थित्वा सजानिरेकान्ते कृत्वा पिष्टेन वस्तकौ ॥३०६॥देशेऽचित्वा परादृश्ये गन्धमाल्यादिमङ्गलैः । कर्णच्छेदं विधायैतावद्यैवानयतं युवाम् ॥३०७॥
उस समय पर्वतकी माता भी यह सब सुनकर बहुत प्रसन्न हुई थी। तदनन्तर उस ब्राह्मणने पर्वतकी माताको उन मुनियोंके वचनोंका विश्वास दिलानेकी इच्छा की। वह अपने पुत्र पर्वत और विद्यार्थी नारदके भावोंकी परीक्षा करनेके लिए स्त्रीसहित एकान्तमें बैठा। उसने आटेके दो बकरे बनाकर पर्वत और नारदको सौंपते हुए कहा कि जहाँ कोई देख न सके ऐसे स्थानमें ले जाकर चन्दन तथा माला आदि माङ्गलिक पदार्थोंसे इनकी पूजा करो और फिर कान काटकर इन्हें आज ही यहाँ ले आओ ।। ३०५-३०७ ॥
At that time, hearing all of this, Parvata’s mother also felt very pleased. Thereafter, that Brahmin desired to make Parvata’s mother fully trust the words of those sages. In order to test the inner dispositions of his son Parvata and his student Narada, he sat down in a secluded place with his wife. Making two goats out of flour and handing them over to Parvata and Narada, he said, “Take these to a place where no one can see you, worship them with auspicious items such as sandalwood paste and garlands, and then, cutting off their ears, bring them back here this very day.” || 305-307 ||
श्लोक ( Shlok ) 308 – 309
इत्यवादीचतः पापी पर्वतोऽस्ति न कश्चन । वनेऽस्मिन्निति विच्छिद्य कौं पितरमागतः ॥३०८॥ त्वया पूज्य ‘यथोद्दिष्टं तत्तथैव मया कृतम् । इति वीतघृणो हर्षास्वप्रेषणमबुबुधत् ॥३०९॥
तदनन्तर पापी पर्वतने सोचा कि इस वनमें कोई नहीं है इसलिए वह एक बकरेके दोनों कान काटकर पिताके पास वापस आ गया और कहने लगा कि हे पूज्य ! आपने जैसा कहा था मैंने वैसा ही किया है। इसप्रकार दयाहीन पर्वतने बड़े हर्षसे अपना कार्य पूर्ण करनेकी सूचना पिताको दी ॥३०८-३०९।॥
Thereafter, the sinful Parvata thought that there was no one around in this forest. Therefore, cutting off both ears of one of the flour goats, he returned to his father and said, “O revered father! I have done exactly as you commanded.” In this manner, the merciless Parvata joyfully informed his father that he had completed the task. || 308-309 ||
श्लोक ( Shlok ) 310 – 313
नारदोऽपि वनं यातोऽदृश्यदेशेऽस्य कर्णयोः । कर्तव्यश्च्छेद इत्युक्तं गुरुणा चन्द्रभास्करौ ॥३१०॥ नक्षत्राणि ग्रहास्तारकाश्च पश्यन्ति देवताः । सदा सन्निहिता सन्ति पक्षिणो मृगजातयः ॥३११॥ नैते शक्त्या निराकर्तुमित्येत्य गुरुसन्निधिम् । भव्यात्माऽदृष्टदेशस्य वने केनाप्यसम्भवात् ॥३१२॥ नामादिचतुरर्थेषु पापापख्यातिकारण । क्रियायामविधेयत्वाच्चाहमानीतवानिमम् ॥३१३॥
नारद भी वनमें गया और सोचने लगा कि ‘अदृश्य स्थानमें जाकर इसके कान काटना है’ ऐसा गुरुजीने कहा था परन्तु यहाँ अदृश्य स्थान है ही कहाँ ? देखो न, चन्द्रमा, सूर्य, नक्षत्र, ग्रह और तारे आदि देवता सब ओरसे देख रहे हैं। पक्षी तथा हरिण आदि अनेक जङ्गली जीव सदा पास ही रह रहे हैं। ये किसी भी तरह यहाँ से दूर नहीं किये जा सकते । ऐसा विचारकर वह भव्यात्मा गुरुके पास वापिस आ गया और कहने लगा कि वनमें ऐसा स्थान मिलना असम्भव है जिसे किसीने नहीं देखा हो । इसके सिवाय दूसरी बात यह है कि नाम स्थापना द्रव्य और भाव इन चारों पदार्थोंमें पाप तथा निन्दा उत्पन्न करनेवाली क्रियाएँ करनेका विधान नहीं इसलिए मैं इस बकरा को ऐसा ही लेता आया हूँ ।। ३१०-३१३ ॥
Narada also went into the forest and began to ponder, “The Guru said that I must go to an unobserved place and cut off its ears, but where exactly is there a place that is unseen? Look, the deities like the moon, the sun, the constellations, the planets, and the stars are watching from all directions. Moreover, numerous wild creatures such as birds and deer are always living close by; they cannot be removed from here by any means.”
Reflecting thus, that noble soul (Bhavyatma) returned to his guru and said, “It is impossible to find a place in the forest that is witnessed by no one. Besides, there is another matter: within the four-fold classification of existence—Name (Nama), Representation (Sthapana), Substance (Dravya), and Actual State (Bhava)—it is forbidden to perform actions that engender sin and reproach. Therefore, I have brought this goat back exactly as it was.” || 310-313 ||
श्लोक ( Shlok ) 314 – 318
इत्याह तद्वचः श्रुत्वा स्वसुतस्य जडात्मताम् । विचिन्त्यैकान्तवाद्युक्तं सर्वथा कारणानुगम् ॥३१४॥ कार्यमित्येतदेकान्तमन्तं कुमतमेव तत् । कारणानुमतं कार्य कचित्तत्कचिदन्यया ॥३१५॥ इति स्याद्वादसन्दृष्टं सत्यमित्यभितुष्टवान् । शिष्यस्य योग्यतां चित्ते निधाय बुधसत्तमः ॥३१६॥ हे नारद त्वमेवात्र सूक्ष्मप्रज्ञो यथार्थवित् । इतः प्रभृत्युपाध्यापपदे त्वं स्थापितो मया ॥३१७॥ व्याख्येयानि त्वया सर्वशास्त्राणीति प्रपूज्य तम् । प्रावर्द्धयद् गुणैरेव प्रीतिः सर्वत्र धीमताम् ॥३१८॥
नारद के वचन सुनकर उसे ब्राह्मणने अपने पुत्रकी मूर्खताका विचार किया और कहा कि जो एकान्तवादी कारणके अनुसार कार्य मानते हैं वह एकान्तवाद है और मिथ्यामत है, कहीं तो कारणके अनुसार कार्य होता है और कहीं इसके विपरीत भी होता है। ऐसा जो स्याद्वादका कहना है वही सत्य है। देखो मेरे परिणाम सदा दयासे आर्द्र रहते हैं परन्तु मुझसे जो पुत्र हुआ उसके परिणाम अत्यन्त निर्दय हैं। यहाँ कारणके अनुसार कार्य कहाँ हुआ ? इस प्रकार वह श्रेष्ठ विद्वान् बहुत ही सन्तुष्ट हुआ और शिष्यकी योग्यता का हृदयमें विचार कर कहने लगा कि हे नारद ! तू ही सूक्ष्मबुद्धिवाला और पदार्थको यथार्थ जाननेवाला है इसलिए आजसे लेकर मैं तुझे उपाध्यायके पदपर नियुक्त करता हूं। आजसे तू ही समस्त शास्त्रोंका व्याख्यान करना। इस प्रकार उसीका सत्कार कर उसे बढ़ावा दिया सो ठीक ही है क्योंकि सब जगह विद्वानोंकी प्रीति गुणोंसे ही होती है ।। ३१४-३१८ ॥
Hearing Narada’s words, that Brahmin reflected upon his son’s foolishness and said, “The absolutist view (Ekantavada) holding that an effect must always exactly mirror its cause is a rigid, one-sided doctrine and a false belief. In some instances, an effect corresponds directly to its cause, while in others, it turns out to be quite the opposite. The principle of conditional predication (Syadvada), which asserts this nuanced reality, is alone the truth. Look at me—my inner disposition is always tender with compassion, yet the son born of me possesses an exceedingly cruel disposition. Where did the effect mirror the cause in this case?”
In this manner, that eminent scholar felt deeply satisfied. Evaluating the capability of his disciple in his heart, he said, “O Narada! You alone possess a subtle intellect and a true understanding of the nature of reality. Therefore, from this day forward, I appoint you to the position of Upadhyaya (Preceptor/Teacher). From today, you alone shall expound and lecture upon all the scriptures.”
Thus honoring him, he elevated his status, which was entirely fitting—for everywhere, the affection of the wise is earned solely through virtues. || 314-318 ||
श्लोक ( Shlok ) 319 – 321
निजाभिमुखमासीनं तनूजं चैवमब्रवीत् । विनाङ्गत्वं विवेकेन “व्यधाद्येतद्विरूपकम् ॥३१९॥ कार्याकार्यविवेकस्ते न श्रुतादपि विद्यते । कथं जीवसि मध्च्चक्षुःपरोक्षे गतधीरिति ॥३२०॥ एवं पित्रा सशोकेन कृतशिक्षोऽविचक्षणः । नारदे बद्धवैरोऽभूत्कुधियामीदृशी गतिः ॥३२१॥
नारदसे इतना कहनेके बाद उसने सामने बैठे हुए पुत्रसे इस प्रकार कहा- हे पुत्र ! तूने विवेकके बिना ही यह विरुद्ध कार्य किया है। देख, शास्त्र पढ़ने पर भी तुझे कार्य और अकार्यका विवेक नहीं हुआ । तू निर्बुद्धि है अतः मेरी आँखोंके ओझल होने पर कैसे जीवित रह सकेगा ? इस प्रकार शोकसे भरे हुए पिताने पर्वतको शिक्षा दी परन्तु उस मूर्ख पर उसका कुछ भी असर नहीं हुआ। वह उसके विपरीत नारदसे वैर रखने लगा सो ठीक ही है क्योंकि दुर्बुद्धि मनुष्योंकी ऐसी ही दशा होती है ।। ३१९-३२१ ।।
After saying this to Narada, he spoke to his son, who was sitting in front of him, in this manner: “O son! You have committed this contradictory and wrong act entirely without discernment. Look, despite studying the scriptures, you have not gained the wisdom to distinguish between what ought to be done (Karya) and what ought not to be done (Akarya). You are devoid of intellect; therefore, once I am no longer before your eyes, how will you survive?”
In this manner, the grief-stricken father admonished Parvata, but it had absolutely no effect on that fool. On the contrary, he began to harbor deep enmity toward Narada—which is only natural, for such is the tragic state of wicked-minded men. || 319-321 ||
श्लोक 322 से 332
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