मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 83
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 84 to 92
श्लोक ( Shlok ) 84 – 87
दत्त्वा राज्यं सतां पुज्यो महासेनाय सूनवे । तत्प्रार्थितेन सन्तप्यं दीनानाथवनीपकान् ॥ ८४ ॥श्रीनागजिनमासाद्य सीमन्ताचलसुस्थितम् । यथोक्तविधिना त्यक्त्वा सङ्ग व्यङ्गमनङ्गजित् ॥ ८५ ॥’बहुभिः सह सम्प्राप्य संयमं शमसाधनम् । क्रमेण “प्राप्तबद्धदिरायुरन्ते चतुर्विधाम् ॥ ८६ ॥आराधनां समाराध्य प्रायोपगमनं श्रितः । क्षीणपापः कृपामूर्तिरापान्तिममनुत्तरम् ॥ ८७ ॥
सत्पुरुषोंके द्वारा पूजनीय हरिषेणने अपने महासेन नामक पुत्रके लिए राज्य दिया, मनोवाञ्छित पदार्थ देकर दीन अनाथ तथा याचकोंको संतुष्ट किया । तदनन्तर कामको जीतने वाले उसने सीमन्त पर्वतपर स्थित श्रीनाग नामक मुनिराजके पास जाकर विविध प्रकारके परिग्रहका विधिपूर्वक त्याग कर दिया। उसने अनेक राजाओंके साथ शान्ति प्राप्त करनेका साधनभूत संयम धारण कर लिया, क्रम-क्रमसे अनेक ऋद्धियाँ प्राप्त कीं और-आयुके अन्तमें चार प्रकारकी आराधनाएं आराध कर प्रायोपगमन नामक संन्यास धारण कर लिया। जिसके समस्त पाप क्षीण हो गये हैं तथा जो दयाकी मूर्ति स्वरूप हैं ऐसा वह चक्रवर्ती अन्तिम अनुत्तर विमान – सर्वार्थसिद्धिमें उत्पन्न हुआ ॥ ८४-८७ ।।
“Harishena, who was deeply revered by virtuous men, handed over the kingdom to his son named Mahasena. He fully satisfied the poor, the helpless, and the seekers by granting them their desired wealth and resources.
Thereafter, having completely conquered his worldly desires (kama), he approached the great sage Shrinaga on Mount Seemanta and formally renounced all forms of worldly possessions (parigraha) according to scriptural rites. Along with numerous other kings, he embraced spiritual self-restraint (sanyama)—the sole means of attaining ultimate peace—and gradually acquired various supernatural spiritual powers (riddhis).
At the end of his lifespan, having perfectly accomplished the four types of spiritual adoration (aradhanas), he embraced the ultimate vow of ascetic death known as prayopagamana-sannyasa. Having washed away all his sins, and living as the very embodiment of compassion, that Chakravartin was reborn in the highest and final Anuttara celestial vehicle—Sarvarthasiddhi.”84 – 87
श्लोक ( Shlok ) 88
भूपः कोऽपि पुरा श्रिया श्रितवपुः पापोपलेशाद् भृशं बिभ्यत्प्राप्य तपो भवस्य शरणं मत्वा तृतीयेऽभवत् । कल्पेऽन्ते भुवमेत्य चक्रिपदवीं सम्प्राप्य भुक्त्वा सुर्ख स श्रीमान् हरिषेणराजवृषभः सर्वार्थसिद्धि ययौ ॥ ८८ ॥
श्रीमान् हरिषेण चक्रवर्तीका जीव पहले जिसका शरीर राजलक्ष्मीसे आलिंगित था ऐसा कोई राजा था, फिर पापसे अत्यन्त भयभीत हो उसने संसारका शरण मानकर तप धारण कर लिया जिससे तृतीय स्वर्गमें देव हुआ, फिर आयुके अन्त में वहाँसे पृथिवीपर आकर हरिषेण चक्रवर्ती हुआ और सुख भोगकर सर्वार्थ-सिद्धिमें अहमिन्द्र हुआ ॥ ८८ ॥
“The soul of the illustrious Chakravartin Harishena was initially a king whose body was warmly embraced by royal fortune (Rajalaxmi). Later, becoming deeply terrified of committing sins and recognizing the true nature of worldly existence, he embraced severe austerities, by virtue of which he was reborn as a celestial being (Deva) in the third heaven. At the end of his celestial lifespan, he descended from there back to Earth to become the Chakravartin Harishena, and after enjoying worldly pleasures, he has now become an Ahamindra in the supreme realm of Sarvarthasiddhi.”88
श्लोक ( Shlok ) 89
तीर्थेऽस्मिन्नेव सम्भूतावष्टमौ रामकेशवौ । रामलक्ष्मणनामानौ तत्पुराणं निगद्यते ॥ ८९ ॥
अथानन्तर- इन्हीं मुनिसुव्रतनाथ तीर्थकरके तीर्थमें राम और लक्ष्मण नामके आठवें बल-भद्र और नारायण हुए हैं इसलिए यहाँ उनका पुराण कहा जाता है ॥ ८९ ॥
“Thereafter, during the spiritual reign of this very Tirthankara, Lord Munisuvratanatha, there arose Rama and Lakshmana, who were the eighth Balabhadra and Narayana (Vasudeva) respectively. Therefore, their ancient epic history (Purana) is narrated here.”89
श्लोक ( Shlok ) 90
इहैव भारते क्षेत्रे राष्ट्रे मलयनामनि । प्रजापतिमहाराजोऽजनि रत्नपुराधिपः ॥ ९० ॥
उसी भरतक्षेत्रके मलय नामक राष्ट्रमें रत्नपुर नामका एक नगर है। उसमें प्रजापति महाराज राज्य करते थे ॥ ९० ॥
“In that very same Bharatakshetra, in the kingdom named Malaya, there was a city called Ratnapura. King Prajapati used to rule over it.”90
श्लोक ( Shlok ) 91 – 92
तुक् तस्य गुणकान्तायां चन्द्रचूलसमाह्वयः । विजयाख्येन तस्यासीत्सम्प्रीतिर्मन्त्रिसूनुना ॥ ९१ ॥पितृसल्लालितौ बालौ कुलादिमदचोदितौ । अभूतां दुष्टचारित्रौ दन्तिनौ वा निवर्तिनौ ॥ ९२ ॥
उनकी गुणकान्ता नामकी स्त्रीसे चन्द्रचूल नामका पुत्र हुआ था। उन्हीं प्रजापति महाराजके मंत्रीका एक विजय नामका पुत्र था। चन्द्रचूल और विजयमें बहुत भारी स्नेह था। ये दोनों ही पुत्र अपने-अपने पिताओंको अत्यन्त प्रिय थे, बड़े लाड़से उनका लालन-पालन होता था और कुल आदिका घमंड सदा उन्हें प्रेरित करता रहता था इसलिए वे दुर्दान्त हाथियोंके समान दुराचारी हो गये थे ॥९१-९२।।
“A son named Chandrachula was born to King Prajapati from his queen named Gunakanta. In that same kingdom, the prime minister of King Prajapati had a son named Vijaya. There was an immense bond of affection between Chandrachula and Vijaya. Both sons were deeply cherished by their respective fathers and were brought up with extreme indulgence and luxury. Driven constantly by the sheer arrogance of their noble lineage and status, they grew unruly and wicked, behaving just like untamed wild elephants.”91 – 92
श्लोक 93 से 101
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मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 83
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