अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 202 to 211
श्लोक ( Shlok ) 202
दुःशास्नश्रुतिदर्पिष्ठः सोमः सिंहपुरे वसन् । परिव्राट् स विवादार्थे जिनदासेन निर्जितः ॥ २०२ ॥
इस भरत क्षेत्रके सिंहपुर नगर में मिध्याशास्त्रोंके सुननेसे अत्यन्त घमण्डी सोम नामका परिव्राजक रहता था। उसने जिनदासके साथ वादविवाद किया परन्तु वह हार गया ।॥ २०२ ॥
“In this Bharat Kshetra (region of Bharat), in the city of Singhpur, there lived a wandering ascetic (Parivrajaka) named Soma, who was extremely arrogant due to his listening to heretical/false scriptures. He engaged in a debate with Jindas, but was defeated. || 202 ||”
श्लोक ( Shlok ) 203
मृत्वा ‘तत्रैव कालान्ते सम्भूय महिषो महान् । वणिग्लवणदुर्भारचिरवाहवशीकृतः ॥ २०३ ॥
आयुके अन्तमें मर कर उसी नगर में एक बड़ा भारी भैंसा हुआ। उसपर एक वैश्य चिरकाल तक नमकका बहुत भारी बोझ लादता रहा ।। २०३ ।।
“At the end of his lifespan, he died and was reborn in that very same city as a massive, heavy buffalo. For a long time, a merchant (Vaishya) kept loading an exceedingly heavy burden of salt onto him. || 203 ||”
श्लोक ( Shlok ) 204 – 206
प्राकू पोषयद्भिनिःशक्तिरिति पश्चादुपेक्षितः । जातिस्मरः पुरे बद्धवैरोऽप्यपगतासुकः ॥ २०४ ॥श्मशाने राक्षसः पापी तस्मिन्नेवोपपद्यत । तत्पुराधीशिनौ कुम्भभीभौ कुम्भस्य पाचकः ॥ २०५ ॥रसायनादिपाकाख्यस्तद्भोग्यपिशितेऽसति । शिशोर्व्यसोस्तदा मांसं स कुम्भस्य न्ययोजयत् ॥ २०६ ॥
जब वह बोझ ढोनेमें असमर्थ हो गया तब उसकेपालकोंने उसकी उपेक्षा कर दी – खाना-पीना देना भी बन्द कर दिया। कारण वश उसे जाति-स्मरण हो गया और वह नगर भरके साथ बैंर करने लगा। अन्तमें मर कर वहीं के श्मशानमें पापी राक्षस हुआ। उस नगरके कुम्भ और भीम नाम के दो अधिपति थे। कुम्भके रसोइयाका नाम रसायनपाक था, राजा कुम्भ मांसभोजी था, एक दिन मांस नहीं था इसलिए रसोइयाने कुम्भको मरे हुए बच्चेका मांस खिला दिया ।। २०४-२०६ ॥
“When he became incapable of carrying the burden, his caretakers neglected him—even stopping his food and water. Due to some cause, he attained Jati-Smaran (recollection of his past lives) and began harboring intense hostility toward the entire city. In the end, he died and became a sinful Rakshasa (demon) in the cemetery of that very place. That city had two rulers named Kumbha and Bhima. Kumbha’s cook was named Rasayanpak. King Kumbha was a meat-eater; one day, since no other meat was available, the cook fed Kumbha the flesh of a dead child. || 204-206 ||”
श्लोक ( Shlok ) 207
तत्स्वादलोलुपः पापी तदाप्रभृति खादितुम् । मनुष्यमांसमारब्ध सम्प्रेप्सुर्नारकीं गतिम् ॥ २०७ ॥
वह पापी उसके स्वादसे लुभा गया इसलिए उसी समयसे उसने मनुष्यका मांस खाना शुरू कर दिया, वह वास्तवमें नरक गति प्राप्त करनेका उत्सुक था ।। २०७ ।।
“Enticed by its taste, that sinful king began eating human flesh from that very moment onward; he was, in reality, eagerly heading toward a rebirth in hell (Narak Gati). || 207 ||”
श्लोक ( Shlok ) 208
प्रजानां पालको राजा तावत्तिष्ठतु पालने । खादत्ययमिति त्यक्तः स त्याज्यः सचिवादिभिः २०८ ॥
राजा प्रजाका रक्षक है इसलिए जब तक प्रजाकी रक्षा करनेमें समर्थ है तभी तक राजा रहता है परन्तु यह तो मनुष्योंको खाने लगा है अतः त्याज्य है ऐसा विचार कर मन्त्रियोंने उस राजाको छोड़ दिया ।॥ २०८ ॥
“The king is the protector of his subjects; therefore, he remains king only as long as he is capable of protecting them. However, since this king has started eating humans, he must be abandoned. Thinking thus, the ministers deserted that king. || 208 ||”
श्लोक ( Shlok ) 209
तन्मांसजीवितः क्रूरः कदाचिन्निजपाचकम् । हत्वा साधिततद्विद्यः संक्रान्तप्रोक्तराक्षसः ॥ २०९ ॥
उसका रसोइया उसे नर-मांस देकर जीवित रखता था परन्तु किसी समय उस दुष्टने अपने रसोइयाको ही मारकर विद्या सिद्ध कर ली और उस राक्षसको वश कर लिया ।। २०९ ।।
“His cook used to keep him alive by providing him with human flesh. However, at some point, that wicked king killed his own cook, mastered a mystical lore (Vidya), and brought that Rakshasa (the demon from the cemetery) under his control. || 209 ||”
श्लोक ( Shlok ) 210 – 211
प्रजाः स भक्षायामस प्रत्यहं परितो भ्रमन् । ततः सर्वेऽपि सन्त्रस्ताः पौराः सन्त्यज्य तत्पुरम् ॥ २१० ॥नगरं प्राविशन् कारकटं नाम महाभिया । तत्राप्यागत्य पापिष्ठः कुम्भाख्योऽभक्षयत्तराम् ॥ २११ ॥
अब वह राजा प्रतिदिन चारों ओर घूमता हुआ प्रजाको खाने लगा जिससे समस्त नगरवासी भयभीत हो उस नगरको छोड़कर बहुत भारी भयके साथ कारकट नामक नगर में जा पहुँचे परन्तु अत्यन्त पापी कुम्भ राजा उस नगरमें भी आकर प्रजाको खाने लगा ॥२१०-२११।।
“Now, that king roamed around everywhere daily and began devouring the subjects. Terrified by this, all the townspeople fled that city in absolute panic and reached a city named Karakat. However, the exceedingly sinful King Kumbha arrived in that city as well and began devouring the people there too. || 210-211 ||”
श्लोक 212 से 221
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