शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 |श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . english translation of Uttar Puran parv 63- shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
वज्रायुधकुमारस्य कृत्वा राज्याभिषेचनम् । प्राप्तलौकान्तिकस्तोत्रः परिनिष्क्रम्य गेहतः ॥ ७२ ॥
वज्रायुधकुमारका राज्याभिषेक किया, लौकान्तिक देवोंके द्वारा स्तुति प्राप्त की और घरसे निकल कर दीक्षा धारण कर ली ।। ७२ ॥
performed the coronation of prince Vajrayudha, received praise from the Laukantika Devas (celestial beings), and leaving his home, accepted initiation (Diksha).72
श्लोक ( Shlok ) 73 – 75
अनावरणमस्थानमप्रमादमनुक्रमम् । असङ्गमकृताहारम ‘नाहार्यमनेकधा ॥ ७३ ॥अकषायमनारम्भमनवद्यमखण्डितम् । अनारतश्रुताभ्यासं प्रकुर्वन् स तपश्चिरम् ॥ ७४ ॥निर्ममं निरहङ्कारं निःशाख्यं निजितेन्द्रियाम् । निःक्रोधं निश्चलं चित्तं निर्वृत्त्यै निर्मलं व्यधात् ॥७५॥
उन्होंने निरन्तर शास्त्रका अभ्यास करते हुए चिरकाल तक अनेक प्रकारका तपश्चरण किया। वे तप-श्चरण करते समय किसी प्रकारका आवरण नहीं रखते थे, किसी स्थान पर नियमित निवास नहीं करते थे, कभी प्रमाद नहीं करते थे, कभी शास्त्रविहित क्रमका उल्लंघन नहीं करते थे, कोई परिग्रह पास नहीं रखते थे, लम्बे-लम्बे उपवास रखकर आहारका त्याग कर देते थे, किसी प्रकारका आभू-षण नहीं पहिनते थे, कभी कषाय नहीं करते थे, कोई प्रकारका आरम्भ नहीं रखते थे, कोई पाप नहीं करते थे, और गृहीत प्रतिज्ञाओंको कभी खण्डित नहीं करते थे, उन्होंने निर्वाण प्राप्त करनेके लिए अपना चित्त ममतारहित, अहंकाररहित, शठतारहित, जितेन्द्रिय, क्रोधरहित, चञ्चलतारहित, और निर्मल बना लिया था ॥ ७३-७५ ॥
“Constantly studying the scriptures, he practiced various forms of penance for a very long time. While practicing these penances, he maintained no covering (or shelter), had no fixed abode, never indulged in carelessness, and never violated the order prescribed by the scriptures.
He kept no worldly possessions with him, renounced food by observing long fasts, wore no ornaments of any kind, never harbored passions (anger, pride, deceit, or greed), engaged in no worldly undertakings, committed no sins, and never broke his vows.
To attain Nirvana (liberation), he had made his mind free from attachment, free from ego, free from deceit, free from anger, and free from restlessness—keeping his senses completely controlled and his heart utterly pure.”73 – 75
श्लोक ( Shlok ) 76
क्रमात्कैवलमप्याप्य व्याहूतपुरुहूतकम् । गणान् द्वादश वाऽऽत्मीयान् वाग्विसर्गादतीतृपत् ॥ ७६ ॥
क्रम-क्रम से उन्होंने केवलज्ञान भी प्राप्त कर लिया, इन्द्र आदि देवता उनके ज्ञान-कल्याणकके उत्सवमें आये और दिव्यध्वनिके द्वारा उन्होंने अपनी बारहों सभाओंको संतुष्ट कर दिया ।। ७६ ।।
“Gradually, he attained Kevalajnana (omniscience). Indra and the other deities arrived to celebrate the auspicious festival of his Jnana-Kalyanaka (the celebration of attaining supreme knowledge), and through his Divyadhvani (divine speech), he completely satisfied all twelve assemblies.”76
श्लोक ( Shlok ) 77 – 79
वज्रायुधेऽथ भूनाथे सुपुण्यफलितां महीम् । पात्यागमन्मधुर्मासो मदनोन्माददीपनः ॥ ७७ ॥ कोकिलानां कलालापो ध्वनिश्च मधुरोऽलिनाम् । अहरत्काममन्त्रो वा प्राणान् प्रोषितयोषिताम् ॥७८॥बनान्यपि मनोजाय त्रिजगद्विजिगीषवे । यस्मिन् पुष्पकरे स्वैरं ददुः सर्वस्वमात्मनः ॥७९॥
इधर राजा वज्रायुध उत्तम पुण्यसे फली हुई पृथिवीका पालन करने लगे। धीरे-धीरे कामके उन्मादको बढ़ाने वाला चैतका महीना आया। कोयलोंका मनोहर आलाप और भ्रमरोंका मधुर शब्द कामदेवके मंत्रके समान विरहिणी स्त्रियोंके प्राण हरण करने लगा। समस्त प्रकारके फूलउत्पन्न करनेवाले उस चैत्रके महीनेमें फूलोंसे लदे हुए वन ऐसे जान पड़ते थे मानो त्रिजगद्विजयी कामदेवके लिए अपना सर्वस्व ही दे रहे हों ।॥ ७७-७९ ॥
“Meanwhile, King Vajrayudha began to rule the earth, which was flourishing due to his supreme merit (Punya). Gradually, the month of Chaitra (spring) arrived, which heightens the intoxication of love.
The captivating song of the cuckoos and the sweet buzzing of the bumblebees began to steal away the very life-breaths of separated women, acting like the powerful mantras of Kamadeva (the God of Love).
In that month of Chaitra, which gives birth to all kinds of blossoms, the forests laden with flowers appeared as though they were offering their entire wealth to Kamadeva, the conqueror of the three worlds.”77 – 79
श्लोक ( Shlok ) 80 – 81
तस्मिन् काले बने रन्तुं ‘स्वदेवरमणे मतिम् । ज्ञात्वा सुदर्शनावक्त्राद्धारिण्याद्यात्मयोषिताम् ॥८०॥औत्सुक्यात्तद्वनं गत्वा सुदर्शनसरोवरे । जलक्रीडां स्वदेवीभिः प्रवर्तयति भूभुजि २ ॥ ८१ ॥
उस समय उसने सुदर्शना रानीके मुखसे तथा धारिणी आदि अपनी स्त्रियोंकी उत्सुकतासे यह जान लिया कि इस समय इनकी अपने देव-रमण नामक वनमें क्रीड़ा करनेकी इच्छा है इसलिए वह उस वनमें जाकर सुदर्शन नामक सरोवरमें अपनी रानियोंके साथ जलक्रीड़ा करने लगा ॥ ८०-८१ ॥
“At that time, perceiving the desire from the face of Queen Sudarshana and observing the eagerness of his other wives like Dharini, the king understood that they wished to play in their pleasure-grove named Deva-Ramana. Therefore, he went to that forest and began to enjoy water-sports with his queens in the lake named Sudarshana.”80 – 81
श्लोक 82 से 92
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130
अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 |श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 371 | श्लोक 372 से 382 | श्लोक 383 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 433 | श्लोक 434 से 442 | श्लोक 443 से 451 | श्लोक 452 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 481 | श्लोक 482 से 491 | श्लोक 492 से 501 | श्लोक 502 से 513
शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 |श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71
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