भगवत् जिनेन्द्र महा अर्चना महोत्सव एवं विश्व शान्ति महायज्ञ चतुर्थ दिवस | जयपुर | 28 जनवरी 2026
आकिंचन्य महाव्रत पूजा एवं रात्रि भोजन त्याग पूजा
चतुर्थ दिवस के विधान में आकिंचन्य महाव्रत पूजा विशेष श्रद्धा और गंभीरता के साथ संपन्न हुई। श्रावक-श्राविकाओं ने अष्ट द्रव्यों से 216 अर्घ्य अर्पित करते हुए मंडल पर धर्म-ध्वजाएं चढ़ाईं।
यह दृश्य त्याग, वैराग्य औरअपरिग्रह के आदर्श को सजीव करता हुआ प्रतीत हो रहा था। धर्म-ध्वजाएं मानो यह संदेश दे रही थीं कि— जिस जीवन में मेरा-तेरा कम होता है, उसी जीवन में धर्म की ऊँचाई अधिक होती है।
पूज्य अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज ने प्रवचन में अपरिग्रह और रात्रि भोजन त्याग के आध्यात्मिक, मानसिक और स्वास्थ्यगत लाभों को अत्यंत सरल शब्दों में समझाया।
आचार्य श्री का ओजस्वी संदेश: “मरने से पहले एक व्रत जरूर करना”
आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी ने अपने प्रवचन में जीवन की नश्वरता और व्रतों की महत्ता पर कड़ा लेकिन व्यावहारिक संदेश दिया:
- संकल्प की शक्ति: उन्होंने कहा कि जयपुर वासियों, जीवन में कुछ करो या न करो, पर मरने से पहले कोई एक व्रत जरूर पालना। चाहे वह एक दिन का हो या 32 दिन का, या फिर किसी मंत्र का जाप।
- कर्मों का बंधन: आचार्य श्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जिनका ‘खोटी गति’ का बंद हो चुका है, उनसे रात्रि भोजन भी नहीं छूट पाएगा, व्रत तो बहुत दूर की बात है।
- अनुशासन का उदाहरण: उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उदाहरण देते हुए कहा कि जब वे अमेरिका जैसे देश में रहकर भी नवरात्रि के उपवास और मर्यादा का पालन कर सकते हैं, तो हम अपनों की शादी-पार्टी में अपना नियम क्यों तोड़ देते हैं? हम नियम लेने में जितनी जल्दी करते हैं, उसे तोड़ने का बहाना खोजने में उससे भी तेज हैं।
उन्होंने कहा—
- अपरिग्रह केवल वस्तुओं का त्याग नहीं, आसक्ति का त्याग है
- जितना कम संग्रह, उतना कम भय और चिंता
- रात्रि भोजन त्याग आत्मसंयम का प्रथम और सहज सोपान है
आचार्यश्री ने स्पष्ट किया कि—
“रात्रि भोजन त्याग केवल शरीर के लिए नहीं, आत्मा की जागृति के लिए आवश्यक है।”
उन्होंने यह भी बताया कि जो व्यक्ति रात्रि भोजन त्याग को अपने जीवन में उतार लेता है, उसके लिए व्रत, तप और संयम स्वतः सरल हो जाते हैं।
परिग्रह क्या है? (Understanding Parigraha)
जैन धर्म में केवल वस्तुओं का संग्रह ही परिग्रह नहीं है, बल्कि उन वस्तुओं के प्रति ‘मूर्च्छा’ (Attachment) ही असली परिग्रह है। “मूर्च्छा परिग्रहः” – अर्थात वस्तुओं में ममत्व भाव रखना ही बंधन है।
परिग्रह कम करने के व्यावहारिक सूत्र
1. परिग्रह परिमाण व्रत (Limit Your Possessions)
एक गृहस्थ के लिए पूर्ण त्याग कठिन है, इसलिए ‘सीमा’ निर्धारित करें।
- वस्त्र और गैजेट्स: संकल्प लें कि मेरे पास 10 या 15 जोड़ी से अधिक वस्त्र नहीं होंगे।
- भोजन: उतनी ही सामग्री घर में लाएं जितनी आवश्यकता हो। संग्रह (Hoarding) की वृत्ति मन में बेचैनी पैदा करती है।
2. ‘जरूरत’ और ‘चाहत’ के बीच अंतर (Need vs. Want)
खरीददारी करने से पहले स्वयं से पूछें— “क्या मुझे इसकी जरूरत है, या मैं इसे दूसरों को दिखाने के लिए खरीद रहा हूँ?”
- आचार्य श्री के अनुसार, आज का प्रदर्शन (Show-off) ही मानसिक अशांति का सबसे बड़ा कारण है।
3. दान की संस्कृति (The Power of Charity)
अपनी आय का एक निश्चित हिस्सा (जैसे 10% या अपनी क्षमतानुसार) परोपकार, शिक्षा या जीव-दया में लगाएँ।
- जब आप देना सीखते हैं, तो पकड़ने (Accumulating) की वृत्ति स्वतः कम होने लगती है। यह आपके संचित धन को ‘शुद्ध’ करने की प्रक्रिया है।
4. डिजिटल परिग्रह का त्याग (Digital Detox)
जैसा कि आचार्य श्री ने पिछले दिनों में मोबाइल के ‘पाप’ का उल्लेख किया था:
- अनावश्यक ऐप्स, अनचाही फाइल्स और सोशल मीडिया पर बिताए जाने वाले फालतू समय को कम करना भी ‘आधुनिक परिग्रह त्याग’ है।
विधान के दौरान आचार्य श्री ने बताया कि “परिग्रह केवल बाहर नहीं, भीतर भी है।” क्रोध, मान, माया और लोभ—ये भीतर के परिग्रह हैं। जब तक भीतर की सफाई नहीं होगी, बाहर की सादगी नहीं आएगी।
गृहस्थों के लिए मंत्र: “जितनी कम वस्तुएं, उतना अधिक सुख।”
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दैनिक भास्कर जयपुर | 29 Jan 2026 | Page 12
भगवत जिनेन्द्र महाअर्चना महोत्सव चारित्र शुद्धि महामंडल विधान में उमड़े 5700 श्रद्धालु
जैन संतों ने माह में एक दिन उपवास और रात्रि भोजन त्यागने का दिलाया संकल्प

धर्म करना सरल है पर निभाना बड़ा कठिन है। नियम लेना सरल है, लेकिन उसे निभाना बहुत मुश्किल है। मायाचार जीवन के लिए बड़ा दुखदायी है। ये उदगार आचार्य प्रसन्न सागर ने बुधवार को मानसरोवर वीटी रोड, शिप्रा पथ स्थित हाउसिंग बोर्ड ग्राउंड में आयोजित आठ दिवसीय भगवत जिनेन्द्र महा अर्चना महोत्सव में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि ज्यादातर मनुष्य धर्म दबाव में या प्रभाव कर रहे हैं। स्वभाव में कोई नहीं कर रहा है। धर्म मन के भीतर की खुशी से करना चाहिए। त्याग योगी बनके करो रोगी बनके नहीं। जैन संतों ने महीने में एक दिन पूर्ण उपवास और रात्रि भोजन त्यागने का संकल्प दिलाया। उपाध्याय पीयूष सागर ने कहा कि वाणी और व्यवहार को संभाल कर रखना चाहिए। आचार्य प्रसन्न सागर के पाद पक्षालन वीरचंद-उषा, गजेन्द्र, प्रवीण, विकास, प्रिया, मेनका व बड़जात्या परिवार ने किया।
सुबह श्रीजी अभिषेक, शांतिधारा, नव देवता व समुच्चय पूजा हुई। आकिंचन्य महाव्रत पूजा करते हुए अष्ट द्रव्य से 216 अर्घ्य के साथ मंडल पर धर्म ध्वजाएं चढ़ाई।
आचार्यश्री ने अपरिग्रह एवं रात्रि भोजन त्याग के फायदे गिनाए। सौधर्म इन्द्र अशोक शकुंतला चांदवाड़, कुबेर इन्द्र विनय-स्नेहलता सोगानी, महायज्ञ नायक राजेश-अनिता समेत श्रद्धालुओं ने भक्ति नृत्य किया।
विवाह अणुव्रत संस्कार में शामिल होंगे नवविवाहित से लेकर 25 साल तक गृहस्थ जीवन जीने वाले
: कोषाध्यक्ष कैलाश चन्द छाबड़ा ने बताया कि आचार्य संघ के सान्निध्य में रविवार को विवाह अणुव्रत संस्कार का आयोजन होगा। इसमें नवविवाहित से लेकर जिनके विवाह को 25 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं वे वैवाहिक आचरण के बारे में बताएंगे।

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Day 5 – 29 जनवरी 2026
भगवत जिनेन्द्र महा अर्चना महोत्सव
द्वितीय दिवस – 26 जनवरी 2026 | तृतीय दिवस – 27 जनवरी 2026 | चतुर्थ दिवस – 28 जनवरी 2026 | पंचम दिवस – 29 जनवरी 2026 | षष्ठ दिवस– 30 जनवरी 2026 | सप्तम दिवस – 31 जनवरी 2026


