अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 65 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 64 | श्लोक 65 से 83
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 65- shlok 84 to 92
श्लोक ( Shlok ) 84
निजागमनवृत्तान्तं महीपतिमजीगमत् । तदाकर्ण्य नृपः खेदाद्धिग्धिगज्ञानमित्यमुम् ॥ ८४ ॥
उसने अपने आनेका वृत्तान्त राजाके लिए बतलाया । उसे सुनकर राजा पारत बड़े खेदसे कहने लगा कि इस अज्ञानको धिक्कार हो, धिक्कार हो ।॥ ८४ ॥
“He explained the reason for his arrival to the king. Hearing it, King Parata said with great sorrow and regret: ‘Fie upon this ignorance! Shame on it!'” 84
श्लोक ( Shlok ) 85 – 86
कन्याशतं ममास्त्यत्र या त्वामिच्छति साऽस्तु ते । इत्यवोच्चदसौ चांगात्कन्यकास्तं निरीक्ष्य ताः ॥८५॥ अर्द्धदग्धशवं मत्वा तपोदग्धशरीरकम् । जुगुप्सयाऽपलायन्त काश्चित्काश्चिद्भयाहिताः ॥ ८६ ॥
फिर राजाने कहा कि मेरे सौ पुत्रियाँ हैं इनमेंसे जो तुझे चाहेगी वह तेरी हो जायगी । राजाके ऐसा कहनेपर जमदग्नि कन्याओंके पास गया। उनमेंसे कितनी ही कन्याएँ जिसका शरीर तपसे जल रहा है ऐसे जमदग्निको अधजला मुर्दा मानकर ग्लानिसे भाग गई और कितनी ही भयसे पीड़ित होकर चली गई ॥ ८५-८६ ।।
“Then the king said: ‘I have a hundred daughters; whichever among them chooses you shall be yours.’ Upon the king saying this, Jamadagni went to the princesses. Seeing him—his body completely scorched by severe penances—several of the princesses fled in sheer disgust, mistaking him for a half-burnt corpse, while many others left, overcome with fear.” 85 – 86
श्लोक ( Shlok ) 87 – 89
ब्रीडया पीडितः सोऽपि तास्त्यक्त्वा बालिकां सुताम् । तस्यैवालोक्य मूढात्मा पांसुक्रीडापरायणाम् ॥८७॥कदलीफलमादर्थ्य प्राह मामिच्छतीति ताम् । वाल्छामीत्यब्रुवत्सा च मामियं वाम्छतीति ताम् ॥८८॥नृपं निवेद्य संगृह्य समायासीद्वनं प्रति । पदं प्रति जनैनिन्द्यमानो दीनतमो जडः ॥ ८९ ॥
लज्जासे पीड़ित हुआ वह मूर्ख तापस उन सब कन्याओंको छोड़कर धूलिमें खेलनेवाली एक छोटी-सी लड़कीके पास गया और केलाका फल दिखाकर कहने लगा कि क्या तू मुझे चाहती है ? लड़कीने कहा कि हाँ चाहती हूँ। तापसने जाकर राजासे कहा कि यह लड़की मुझे चाहती है। इस प्रकार वह लड़कीको लेकर वनकी ओर चला गया । पद-पद पर लोग उसकी निन्दा करते थे, वह अत्यन्त दीन तथा मूर्ख था ॥ ८७-८९ ॥
“Overcome with shame, that foolish ascetic left all those older princesses and approached a very young girl playing in the dust. Showing her a banana, he asked: ‘Do you want me?’ The little girl replied: ‘Yes, I want you.’ The ascetic went back to the king and said: ‘This girl wants me.’
In this manner, taking the little girl with him, he set off toward the forest. At every step along the way, people condemned and mocked him; he had become utterly miserable and foolish.” 87 – 89
श्लोक ( Shlok ) 90
‘रेणुकीत्यभिधां तस्या विधाय स्वीचकार सः । प्रवृत्तिर्धर्म इत्येषा तदा प्रभृति वागभूत् ॥ ॥ ९० ॥
जमदग्निने उस लड़कीका रेणुकी नाम रखकर उसके साथ विवाह कर लिया। उसी समयसे ऐसी प्रवृत्ति-स्त्रियोंके साथ तपश्चरण करना ही धर्म है यह कहावत प्रसिद्ध हुई है ॥९०॥
“Jamadagni named that girl Renuki and married her. From that very time, the tradition and saying—’To perform penances alongside women is true religion’—became widely known and established.”90
श्लोक ( Shlok ) 91 – 92
‘बोधौ श्रद्धा विशेषस्य भेदौ वा तपसो यतेः । बाह्याभ्यन्तरनामानौ तावभूतां सुतौ स्तुतौ ॥ ९१ ॥इन्द्रः श्वेतश्च रामान्तौ चन्द्रादित्यसमत्विषौ । कामार्थों वा जनाभीष्टौ युक्तौ वा नयविक्रमौ ॥ ९२ ॥
जिस प्रकार श्रद्धा विशेषके मतिज्ञान और श्रुतज्ञान ये दो ज्ञान उत्पन्न होते हैं अथवा किसी मुनिराजके तपके बाह्यतप और आभ्यन्तर तप ये दो भेद प्रकट होते हैं उसी प्रकार जमनिके इन्द्र और श्वेतराम नामके दो स्तुत्य पुत्र उत्पन्न हुए। ये दोनों ही पुत्र ऐसे जान पड़ते थे मानो लोगोंको प्रिय काम और अर्थ ही हों अथवा मिले हुए नय और पराक्रम ही हों ॥ ९१-९२॥
“Just as the two forms of knowledge—Mati-jnana (sensory knowledge) and Shruta-jnana (scriptural knowledge)—arise from a specific, deep right-faith; or just as a revered monk’s austerities manifest in two distinct categories: external penance (bahya-tapa) and internal penance (abhyantara-tapa); in the exact same manner, two praiseworthy sons named Indra and Shvetarama were born to Jamadagni.
Both these sons appeared as though they were personified Kama (pleasure/desire) and Artha (wealth/prosperity) so dear to worldly people, or like the perfect union of strategic policy (Naya) and heroic valor (Parakrama).”91 – 92
श्लोक 93 से 104
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