शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 115 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 63- shlok 172 to 182
श्लोक ( Shlok ) 172
सुवर्णतिलका सार्द्ध विहर्तु भवता वनम् । वष्टीति नृपतिं चञ्चत्कान्त्यादितिलकोऽवदत् ॥१७२॥
एकदिन चञ्चत्कान्ति-तिलका नामकी दासी आकर राजासे कहने लगी कि रानी सुवर्णतिलका आपके साथ वनमें विहार करना चाहती हैं ।। १७२ ॥
“One day, a maid named Chanchatkanti-tilaka approached the king and said: ‘Queen Suvarnatilaka wishes to enjoy a stroll in the forest with you.'” [172]
श्लोक ( Shlok ) 173
तच्चेटिकावचः श्रुत्वा तदेप्सुमभिधाय तम् । पृथिवीतिलका रम्यं वनमत्रैव दर्शये ॥१७३॥
चेटीके वचन सुनकर राजा वहाँ जाना चाहता था परन्तु पृथिवीतिलका राजासे मनोहर वचन बोली और कहने लगी कि वह यहीं दिखलाये देती हूँ ॥ १७३ ॥
“Upon hearing the words of the maidservant, the king wished to go there, but Prithivitilaka spoke charming words to the king and said: ‘I shall make her appear right here.'” [173]
श्लोक ( Shlok ) 174 – 175
इति तत्कालजं सर्व वनवस्तु प्रदर्य सा । तेन शक्नुवती रोढुं मानभङ्गेन पीडिता ॥१७४॥सुमतिं गणिनीं प्राप्य प्रव्रज्यामाददे सती । हेतुरासन्नभव्यानां मानश्च हितसिद्धये ॥ १७५॥
ऐसा कह कर उसने उस समयमें होनेवाली वनकी सब वस्तुएँ दिखला दीं और इस कारण वह राजाको रोकने-में समर्थ हो सकी। रानी सुवर्णतिलका इस मानभङ्गसे बहुत दुःखी हुई। अन्तमें उस सतीने सुमति नामक आर्यिकाके पास दीक्षा ले ली सो ठीक ही है क्योंकि निकट भव्यजीवोंका मानहित सिद्धिका कारण हो जाता है ।। १७४-१७५ ॥
“Saying this, she conjured and displayed everything that was present in the forest at that time, and by doing so, she succeeded in detaining the king. Queen Suvarnatilaka was deeply grieved by this blow to her honor. Ultimately, that chaste lady took initiation (diksha) under an Aryika (nun) named Sumati. This was indeed fitting, for the shattering of pride becomes the cause of salvation for noble, liberation-capable souls (bhavya-jeevas).” [174-175]
श्लोक ( Shlok ) 176
भक्त्या दमवराख्याय दत्वा दानं महीपतिः । आश्चर्यपञ्चकं प्राप्य कदाचिदभयाह्वयः ॥१७६॥
अभयघोष राजाने किसी दिन दमवर नामक मुनिराजके लिए भक्ति-पूर्वक दान देकर पञ्चाश्चर्य प्राप्त किये ।। १७६ ॥
“One day, after offering food-alms (daana) with deep devotion to the great sage Damavara, King Abhayaghosha was blessed with the manifestation of the five celestial wonders (Panchashcharya).” [176]
श्लोक ( Shlok ) 177
अवाप्य सह सूनुभ्यामनन्तगुरुसन्निधिम् । लब्धबोधिः समादत्त दुस्सहं स महाव्रतम् ॥ १७७॥
वह एक दिन अपने दोनों पुत्रोंके साथ अनन्त नामक गुरुके समीप गया था वहाँ उसे आत्मज्ञान हो गया जिससे उसने कठिन महाव्रत धारण कर लिये ॥ १७७ ।।
“One day, accompanied by both of his sons, he approached the preceptor named Ananta. There, he attained self-realization (atma-jnana), owing to which he initiated himself into the rigorous Mahavratas (the great vows of an ascetic).” [177]
श्लोक ( Shlok ) 178
कारणं तीर्थकृन्नाम्नो भावयित्वाऽऽयुषोऽवधौ । सम्यगाराध्य पुत्राभ्यामच्युतं कल्पमात्मवान् ॥१७८॥
तीर्थंकर नामकर्मके बन्धमें कारणभूत सोलह कारण भावनाओंका चिन्तवन किया और आयुके अन्त में समाधिमरण कर अपने दोनों पुत्रोंके साथ अच्युतस्वर्गमें देव हुआ ।॥ १७८ ॥
“He contemplated upon the Sixteen Auspicious Reflections (Solah Kaaran Bhaavana), which are the causal factors for binding the Tirthankara Nama-karma (the karma that determines birth as a Tirthankara). At the end of his lifespan, practicing Samadhimarana (peaceful ritual death), he was reborn as a celestial being (deva) in the Achyuta-svarga (the sixteenth heaven) along with both of his sons.” [178]
श्लोक ( Shlok ) 179
द्वाविंशत्यब्धिमानायुर्भुक्त्वा भोगांश्च तौ ततः । जीवितान्ते भवन्तौ तौ जातौ नृपकुमारकौ ॥१७९॥
बाईस सागरकी आयु पाकर वे तीनों वहाँ मनोवान्छित भोग भोगते रहे। आयुके अन्तमें वहाँ से च्युत होकर दोनों ही विजय और जयन्त राजकुमारके जीव तुम दोनों उत्पन्न हुए हो ।। १७९ ॥
“Attaining a lifespan of twenty-two Sagaras (an immense cosmic time-measure), all three of them continued to enjoy their desired celestial pleasures there. At the end of that lifespan, departing from that heavenly realm, you two—the souls of Prince Vijaya and Prince Jayanta—have been reborn here as the two of you.” [179]
श्लोक ( Shlok ) 180
यह सब अच्छी तरह सुनकर वे दोनों ही फिर पूछने लगे – कि हे भगवन् ! हमारे पिता कहाँ हैं ? ऐसा पूछे जानेपर वे पिताकी कथा इस प्रकार कहने लगे – ॥ १८० ॥
“Having heard all of this clearly, they both asked again: ‘O Blessed One! Where is our father?’ Upon being asked this, the sage began to narrate the story of their father in this manner:” [180]
श्लोक ( Shlok ) 181 – 182
ततः प्रच्युत्य कल्पान्ताद् हेमाङ्गदमहीपतेः । सुतोऽभून्मेघमालिन्यां देव्यां घनरथाह्वयः ॥ १८१ ॥इदानीं पुण्डरीकिण्यां युद्धं कुक्कुटयोरसौ । “प्रेक्षमाणः स्थितः श्रीमान् देवीसुतसमन्वितः ॥ १८२ ॥
उन्होंने कहा कि तुम्हारे पिता-का जीव अच्युतस्वर्गसे च्युत होकर हेमाङ्गद राजाकी मेघमालिनी नामकी रानीके घनरथ नामका पुत्र हुआ है वह श्रीमान् इस समय रानियों तथा पुत्रोंके साथ पुण्डरीकिणी नगरी में मुर्गोंका युद्धदेखता हुआ बैठा है ।॥ १८१-१८२ ॥
“The sage said: ‘Departing from the Achyuta-svarga (heaven), the soul of your father was reborn as the son named Ghanaratha to Queen Meghamalini, the wife of King Hemangada. That glorious king is currently seated in the city of Pundarikini with his queens and sons, watching a fight between roosters.'” [181-182]
श्लोक 183 से 192
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