अनन्तनाथ तीर्थंकर, सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायणके पुराणका वर्णन पर्व 60 – श्लोक 1 से 11
English translation of Uttar Puran parv 60- shlok 12 to 21
श्लोक ( Shlok ) 12
प्रान्ते स्वाराधनां प्राप्य परित्यक्तशरीरकः । अभूत् पर्यन्तकल्पेन्द्रः पुष्पोत्तरविमानजः ॥ १२ ॥
अन्तमें सल्लेखना धारण कर शरीर छोड़ा और अच्युत स्वर्गके पुष्पोत्तर विमानमें इन्द्रपद प्राप्त किया ॥ १२ ॥
“In the end, having observed Sallekhana, he relinquished his mortal body and attained the status of an Indra within the Pushpottara celestial vehicle of the Achyuta Heaven.” 12
श्लोक ( Shlok ) 13-15
द्वाविंशत्यब्धिमानायुर्हस्ताद्धनिधनुस्तनुः । शुक्कुलेश्यः श्वसन्नेकादशमासैस्तु सङ्ख्यया ॥ १३ ॥खत्रयायनपक्षोक्तवषैराहारमाहरत् । सुखी मनःप्रवीचारात्तमसः प्राग्गतावधिः ॥ १४ ॥तत्माणबलस्तेजोविक्रियाभ्यां च तत्प्रभः । चिरं तत्र सुखं भुक्त्वा तस्मिन्नत्रागमिष्यति ॥ १५ ॥
वहाँ उसकी आयु बाईस सागर थी, शरीर साढ़े तीन हाथका था, शुक्तलेश्या थी, वह ग्यारह माहमें एक बार श्वास लेता था, बाईस हजार वर्ष बाद आहार ग्रहण करता था, मानसिक प्रवीचारसे सुखी रहता था, तमःप्रभा नामक छठवीं पृथिवी तक उसका अवधिज्ञान था और वहीं तक उसका बल, विक्रिया और तेज था। इस प्रकार चिरकाल तक सुख भोगकर वह इस मध्यम लोकमें आनेके लिए समुम्ख हुआ ॥ १३-१५ ॥
“There, his lifespan was twenty-two Sagara; his height was three and a half hands; and he possessed Shukla-leshya (the purest thought-coloration). He drew breath but once every eleven months and partook of ‘mental food’ once every twenty-two thousand years. Contented through mental pleasure alone, his clairvoyant knowledge (Avadhijnana) extended down to the sixth hellish earth, known as Tamahprabha—as did his divine strength, transformative power, and brilliance. After experiencing these celestial joys for a vast duration, he prepared to descend to this Middle World (Madhyaloka).”13-15
श्लोक ( Shlok ) 16
द्वीपेऽस्मिन् दक्षिणे भागे साकेतनगरेश्वरः । इक्ष्वाकुः काश्यपः सिंहसेनो नाम महानृपः ॥१६ ॥
उस समय इस जम्बूद्वीपके दक्षिण भरतक्षेत्रकी अयोध्यानगरी में इक्ष्वाकुवंशी काश्यपगोत्री महाराज सिंहसेन राज्य करते थे ।।१६।।
“At that time, in the city of Ayodhya within the Bharat-kshetra (southern region) of this Jambudvipa, ruled a monarch named King Sinhasena—a scion of the Ikshvaku dynasty and the Kashyapa clan (Gotra).”16
श्लोक ( Shlok ) 17
जयश्यामा महादेवी तस्यास्या वेश्मनः पुरः । वसुधारां सुराः सारां मासषट्कीमपीपतन् ॥ १७ ॥
उनकी महारानीका नाम जयश्यामा था। देवोंने उसके घरके आगे छह माह तक रत्नो की श्रेष्ठ धारा बरसाई ॥ १७ ॥
“The name of his Queen Consort was Jayashyama. For six months leading up to the conception, the celestial gods rained down a magnificent shower of precious gems before her palace.”17
श्लोक ( Shlok ) 18
कार्तिके मासि रेवत्यां प्रभातेऽह्नि तदादिमे । निरीक्ष्य षोडश स्वप्नान् विशन्तं वाऽऽननं गजम् ॥ १८ ॥
कार्तिक कृष्णा प्रतिपदा के दिन प्रातःकालके समय रेवती नक्षत्रमें उसने सोलह स्वप्न देखनेके बाद मुँहमें प्रवेश करता हुआ हाथी देखा ॥ १८ ॥
“On the morning of the first day of the dark fortnight of the month of Kartika (Kartika Krishna Pratipada), under the Revati constellation, after witnessing the sixteen auspicious dreams, she saw a magnificent elephant entering her mouth.”18
श्लोक ( Shlok ) 19
अवगम्य फलं तेर्षा भूभुजोऽवधिलोचनात् । गर्भस्थिताच्युतेन्द्रासौ परितोषमगात्परम् ॥ १९ ॥
अवधिज्ञानी राजासे उन स्वप्नोंका फल जाना। उसी समय वह अच्युतेन्द्र उसके गर्भमें आकर स्थित हुआ जिससे वह बहुत भारी सन्तोषको प्राप्त हुई ॥ १९ ॥
“She learned the significance of those dreams from the King, who possessed Avadhijnana (clairvoyant knowledge). At that very moment, the Indra of the Achyuta Heaven descended and established himself within her womb, bringing her a sense of profound and immense contentment.”19
श्लोक ( Shlok ) 20
ततः स्वर्गावतरणकल्याणाभिषवं सुराः । सम्पाद्य वस्त्रमाल्योरुभूषणैस्तावपूजयन् ॥ २० ॥
तदनन्तर देवोंने गर्भकल्याणकका अभिषेक कर वस्त्र, माला और बड़े-बड़े आभूषणोंसे महाराज सिंहसेन और रानी जयश्यामाकी पूजा की ।। २० ।।
“Thereafter, the celestial gods performed the Garbha-kalyanak consecration ceremony; they honored King Sinhasena and Queen Jayashyama by presenting them with divine garments, garlands, and magnificent ornaments.”20
श्लोक ( Shlok ) 21
सुखगर्भा जयश्यामा ज्येष्ठमास्यसिते सुतम् । द्वादश्यां ‘पूषयोगेऽसौ सपुण्यमुदपादयत् ॥ २१ ॥
जयश्यामाका गर्भ सुखसे बढ़ने लगा। नव माह व्यतीत होने पर उसने ज्येष्ठ कृष्णा द्वादशीके दिन पूषायोगमें पुण्यवान् पुत्र उत्पन्न किया ॥ २१ ॥
“The womb of Jayashyama grew with ease and comfort. When nine months had passed, on the twelfth day of the dark fortnight of the month of Jyeshtha (Jyeshtha Krishna Dwadashi), under the auspicious Pushya constellation, she gave birth to a highly meritorious son.”21
श्लोक 22 से 32
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