अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 212 to 221
श्लोक ( Shlok ) 212 – 214
‘ततः प्रभृति तत्प्राहुः कुम्भकारकर्ट पुरम् । यथादृष्टनुभक्षित्वाद्भीत्वैकशकटौदनम् ॥ २१२ ॥खादैकमानुषं चेति प्रजास्तस्य स्थितिं व्यधुः । तत्रैव नगरे चण्डकौशिको नाम विप्रकः ॥ २१३ ॥सोमश्रीस्तत्प्रिया भूतसमुपासनतश्चिरम् । मौण्डकौशिकनामानं तनयं ताववापतुः ॥ २१४ ॥
उसी समयसे लोग उस नगरको कुम्भकारकटपुर कहने लगे। मनुष्योंने देखा कि यह नरभक्षी है इसलिए डर कर उन्होंने उसकी व्यवस्था बना दी कि तुम प्रति दिन एक गाड़ी भात और एक मनुष्यको खाया करो । उसी नगरमें एक चण्डकौशिक नामका ब्राह्मण रहता था। सोमश्री उसकी स्त्री थी, चिरकाल तक भूतोंकी उपासना करनेके बाद उन दोनोंने मौण्डकौशिक नामका पुत्र प्राप्त किया ।। २१२-२१४ ।।
“From that very time, people began calling that city ‘Kumbha-Karakatpur’. Seeing that he was a cannibal, the people grew terrified and made an arrangement for him, saying, ‘You shall consume one cartload of cooked rice and one human being every day.’ In that same city, there lived a Brahmin named Chanda-Kaushika. Somashri was his wife. After worshipping spirits (Bhutas) for a very long time, the couple obtained a son named Maunda-Kaushika. || 212-214 ||”
श्लोक ( Shlok ) 215 – 216
कुम्भाहाराय यातं तं कदाचिन्मुण्डकौशिकम् । शकटस्योपरि क्षिप्तं नीत्वा भूतैः प्रयायिभिः ॥ २१५ ॥कुम्भेनानुयता दण्डहस्तेनाक्रम्य तजितैः । भयाद्विले विनिक्षिप्तं जगाराजगरो द्विजम् ॥ २१६ ॥
किसी एक दिन कुम्भके आहारके लिए मौण्डकौशिककी बारी आई। लोग उसे गाड़ी पर डाल कर ले जा रहे थे कि कुछ भूत उसे ले भागे, कुम्भने हाथमें दण्ड लेकर उन भूतोंका पीछा किया, भूत उसके आक्रमणसे डर गये, इसलिए उन्होंने मुण्डकौशिकको भयसे एक बिलमें डाल दिया परन्तु एक अजगरने वहाँ उस ब्राह्मणको निगल लिया ।। २१५-२१६ ।।
“One day, it was Maunda-Kaushika’s turn to become Kumbha’s meal. As the people were carrying him away on a cart, some spirits (Bhutas) snatched him and fled. Armed with a staff in his hand, Kumbha chased after those spirits. Terrified by his assault, the spirits dropped Maunda-Kaushika into a pit out of fear; however, a python was waiting there and swallowed the Brahmin boy. || 215-216 ||”
श्लोक ( Shlok ) 217 – 218
विजयार्द्धगुहायां तन्निक्षेपणमयुक्तकम् । पथ्यं तद्वचनं श्रुत्वा सूक्ष्मधीर्मतिसागरः ॥ २१७ ॥भूपतेरशनेः पातो नोक्तो नैमित्तिकेन तत् । पोदनाधिपतिः कश्चिदन्योऽवस्थाप्यतामिति ॥ २१८ ॥
इसलिए महाराजको विजयार्धकी गुहामें रखना ठीक नहीं है। बुद्धिसागरके ये हितकारी वचन सुनकर सूक्ष्म बुद्धिका धारी मतिसागर मंत्री कहने लगा कि निमित्तज्ञानीने यह तो कहा नहीं है कि महाराज के ऊपर ही वज्र गिरेगा। उसका तो कहना है कि जो पोदनपुरका राजा होगा उस पर वज्र गिरेगा इसलिए किसी दूसरे मनुष्यको पोदनपुरका राजा बना देनाचाहिये ।। २१७-२१८ ॥
“Therefore, it is not proper to keep the Great King in the cave of Vijayardha Mountain. Hearing these beneficial words of Buddhisagar, the minister Matisagar, who possessed sharp and subtle intellect, began to say, ‘The astrologer (seer of omens) did not explicitly state that the thunderbolt would fall precisely upon our Great King. His prediction is that the thunderbolt will fall upon whoever happens to be the King of Podanpur. Therefore, we should temporarily appoint some other man as the King of Podanpur.’ || 217-218 ||”
श्लोक ( Shlok ) 219 – 221
जगाद भवता प्रोक्त’ युक्तमित्यभ्युपेत्य ते । सम्भूय मन्त्रिणो यक्षप्रतिविम्बं नृपासने ॥ २१९ ॥निवेश्य पोदनाधीशस्त्वमित्येनमपूजयत् । महीशोऽपि परित्यक्तराज्यभोगोपभोगकः ॥ २२० ॥प्रारब्धपूजादानादिनिजप्रकृतिमण्डलः । जिनचैत्यालये शान्तिकर्म कुर्वन्नुपाविशत् ॥ २२१ ॥
उसकी यह बात सबने मान ली और कहा कि आपका कहना ठीक है। अनन्तर सब मन्त्रियोंने मिलकर राजके सिंहासन पर एक यक्षका प्रतिबिम्ब रख दिया और ‘तुम्हीं पोदनपुरके राजा हो’ यह कहकर उसकी पूजा की। इधर राजाने राज्यके भोग उपभोग सब छोड़ दिये, पूजा दान आदि सत्कार्य प्रारम्भ कर दिये और अपने स्वभाव वाली मण्डलीको साथ लेकर जिन-चैत्यालयमें शान्ति कर्म करता हुआ बैठ गया ॥ २१९ -२२१ ॥
“Everyone agreed with his proposal and said, ‘What you say is correct.’ Thereafter, all the ministers gathered and placed an image (idol) of a Yaksha upon the royal throne, worshipping it while proclaiming, ‘You alone are the King of Podanpur.’ Meanwhile, the actual king renounced all royal pleasures and enjoyments, initiated virtuous deeds such as worship and charity, and, accompanied by a group of like-minded companions, sat down in the Jain temple (Jin-Chaityalaya) performing rituals for peace. || 219-221 ||”
श्लोक 222 से 231
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