Hindi Translation of Adi purana Parv 45
श्लोक 1 से 11 युद्धोपरांत शान्ति और सुलोचना का सत्कार
अथानन्तर-प्रसिद्ध पराक्रमका धारक और शत्रुओंके मिथ्या अभिमानको नष्ट करने वाला जयकुमार अपने विशाल निवासस्थानमें जाकर ठहर गया ।।१।। इधर महाराज अकंपन ने स्वयं संचित किये हुए पाप नष्ट करनेके लिये श्री जिनेन्द्रदेवकी स्तुति की और फिर जिसने युद्ध समाप्त होनेतक आहारके त्याग करनेका नियम ले रक्खा है, माता सुप्रभा जिसके समीप बैठी हुई है, जो कायोत्सर्गसे खड़ी हुई है, स्थिरचित्तसे सब प्रकारकी शान्ति करनेवाला धर्म-ध्यान कर रही है, एकाग्र मनसे निश्चल है और आनन्दसे जिनेन्द्रदेवके सन्मुख खड़ी है ऐसी सुलोचनाको देखकर उसका सत्कार किया, आश्वासन देकर उसके गुणोंकी अनेक बार प्रशंसा की तथा इस प्रकार शब्द कहे हे ‘पुत्रि, तुम्हारे माहात्म्यसे सब अमंगल शान्त हो गये हैं, सब प्रकारके पाप नष्ट हो गये हैं, अब तू अपने नियमोंका संकोच कर ।’ ऐसा कहकर उन्होंने हाथ जोड़कर खड़ी हुई सुलोचनाको आगे किया और राजपुत्रों तथा रानी सुप्रभाके साथ साथ राज-भवनमें प्रवेश किया। फिर ‘हे पुत्रि ! तू अपने महलमें जा’ ऐसा कहकर सुलोचनाको बिदा किया ॥२-७।। पुनः यह कार्य अन्य प्रकार सोचा गया था और दैवने अन्य प्रकार कर दिया अब क्या करना चाहिये इस विषयमें मूढताको प्राप्त हुए अतिशय बुद्धिमान् महाराज अकंपनने औत्पत्तिकी आदि ज्ञानके भेदोंके समान सुश्रुत आदि उत्तम मंत्रियोंके साथ विचारकर विद्याधर राजाओंको छोड़ दिया। फिर कार्यको जाननेवाले उन्हीं अकंपनने बड़ी शान्तिसे उनके योग्य कहे हुए वचनोंसे उन सबको आश्वासन देकर स्नान, वस्त्र, आसन आदिसे सबका अच्छी तरह सत्कार किया ॥८-१०।। तथा अर्ककीर्तिसे कहा कि ‘हे कुमार ! हमारे नाथवंश और सोम-वंश दोनों ही आपके द्वारा बनाये गये हैं और आपके द्वारा ही बढ़ रहे हैं। विषका वृक्ष भी जिससे उत्पन्न होता है उससे फिर नाशको प्राप्त नहीं होता ॥११॥
श्लोक 12 से 21 अकम्पन द्वारा अर्ककीर्ति को क्षमा और समझाना
महात्मा लोग पुत्र, बन्धु तथा पियादे लोगोंके सैकड़ों अपराध क्षमा कर देते हैं क्योंकि उनकी शोभा इसी में है ।।१२।। औरों-की बात जाने दीजिये जो देवके भी अधीन होकर स्वामीका अपराध करते हैं उनका अपयश कल्पान्त कालतक बना रहता है और उनका यह पाप भी अनेक दोषोंका बढ़ानेवाला होता है ।।१३।। हम मूर्बोने आपका यह एक अपराध किया है। चूंकि हम लोग आपके भाइयों और भृत्यों में से हैं इसलिये हे कुमार, यह अपराध क्षमा कर देने योग्य है ।।१४।। यह हमारी अपकीति और पाप आपके प्रसादसे शान्त हो सकता है क्योंकि आप शाप देने तथा उपकार करने-दोनोंमें समर्थ हैं इसलिये हम लोगोंकी शुद्धता अवश्य कर दीजिये ॥१५॥ प्रकाशको रोकनेवाला संसारका अन्धकार सूर्यके द्वारा नष्ट किया जाता है परन्तु हमारे लिये तो आप ही सूर्य हैं इसलिये हमारे अन्तःकरणके अन्धकारको आप ही नष्ट कर सकते हैं ।॥१६॥ पूर्वजन्मके पाप कर्मोंके विशेष उदयसे हम लोगोंके लिये जो आपका यह विरोध उपस्थित हुआ है वह मानो पुत्रके लिये माताके दूधका विरोध उपस्थित हुआ है। भावार्थ – जिस प्रकार माताके दूबके बिना पुत्र नहीं जीवित रह सकता है उसी प्रकार आपकी अनुकूलताके बिना हम लोग जीवित नहीं रह सकते हैं ।॥१७॥ समस्त पृथिवीको आनन्दित करनेवाला बादल यदि कदाचित् किसी एकपर वज्र पटक देता है तो इसमें बादलका दोष नहीं है किन्तु जिसपर पड़ा है उसीके अशुभकर्मका उदय होता है ।॥ १८॥ चढ़ना कठिन होनेसे जिस प्रकार घोड़ा किसीको गिरा देता है उसी प्रकार जयकुमारने आपको गिरा दिया है परन्तु वह तो आपका सेवक है इसमें बुरा मानने-का कारण ही क्या है ? ॥१९॥ सुलोचना, यह कितनी सी बात है ? हमारा जो सर्वस्व है वह आपका ही है। यदि आप पहले ही रोक देते तो स्वयंवर ही क्यों किया जाता ? ॥२०॥ जिसका दूसरा नाम अक्षमाला है ऐसी मेरी दूसरी पुत्री लक्ष्मीमतीको आप ग्रहण कीजिये । यह लक्ष्मीमती यशकी मालाके समान निर्मल है, पाषाण (रत्नों) की मालासे आपको क्या प्रयो-जन है ? ॥२१॥
श्लोक 22 से 31 : संधि, विवाह और विदाई
आज यह आपका विकार आहारके विकारके समान है, क्या आपके बिना हम लोगोंकी जीविका रह सकती है ? इसलिये हे प्रभो, हम लोगोंपर प्रसन्न हूजिये । भावार्थ-जिस प्रकार भोजनके बिना कोई जीवित नहीं रह सकता उसी प्रकार आपकी प्रसन्नताके बिना हम लोग जीवित नहीं रह सकते इसलिये हम लोगोंपर अवश्य ही प्रसन्न हूजिये ॥२२॥ हम लोग तो इधर उधर भेजने योग्य सेवक हैं और आप जिसका निवारण न हो सके ऐसे समुद्रके समान हैं। हे नाथ, आपके मर्यादा छोड़नेपर भी जो हम लोग जीवित बच सके हैं सो आपके पुण्यसे ही बच सके हैं ।॥ २३॥ आप पानी के समान सबको जीवित करनेवाले हैं जिस प्रकार अग्नि पानीको गर्म कर देती है उसी प्रकार किसीने हम लोगोंके प्रति आपको भी गर्म अर्थात् क्रोधित कर दिया है इसलिये अब आप पानीके समान ही शीतल हो जाइये ।।२४।। यदि आप शान्त नहीं होना चाहते हैं तो इन पुत्रों और स्त्रियोंको स्वीकार कीजिये, इनकी रक्षा कीजिये, में हम आप दोनों के आश्रय श्रीवृषभदेवके चरणरूपी वृक्षोंके समीप जाता हूँ ।।२५।। इस प्रकार भूमिगोचरी और विद्याधरोंसे घिरे हुए अर्ककीतिको प्रसन्न कर, संतुष्ट कर और उत्तम हाथीपर सवार कराकर सबसे आगे किया तथा सब पापोंकी शान्तिके लिये आठ दिन तक बड़ी विभूतिके साथ महाभिषेक होने पर्यन्त शान्तिपूजा की । मेलमिलापकी विधिको जाननेवाले अकंपनने जयकुमारको भी वहां बुलाया और उसी समय संधि कराकर दोनोंमें अत्यन्त प्रेम उत्पन्न करा दिया तथा कभी न नष्ट होनेवाली एकता करा दी । तदनन्तर अर्ककीतिको बड़े वैभव और सब प्रकारकी धनरूप सम्पदाओंके साथ साथ अक्षमाला नामकी कन्या दी, अच्छा आदर-सत्कार किया और उनकी योग्यताके अनुसार थोड़ी दूर तक साथ जाकर उन्हें बिदा किया । इसी प्रकार अच्छे अच्छे रत्न, हाथी और घोड़े देकर अन्य भूमिगोचरी और विद्याधर राजाओंका सन्मान कर उन्हें भी शीघ्र ही बिदा किया ॥ २६-३०।। अपने अन्यायके कारण उत्पन्न हुई लज्जासे जिनका वैर दूर हो गया है ऐसे वे सब लोग अपने अपने नगरको चले गये, सो ठीक ही है क्योंकि बुद्धि वही है जो भाग्यवश हुए अपराधका शीघ्र ही प्रतिकार कर लेती
है ॥३१॥
श्लोक 32 से 41 : जयकुमार-सुलोचना विवाह और दूत प्रेषण
उसी समय पहले कहे हुए देवने आकर बड़े वैभवके साथ सुलोचनाके विवाहका उत्सव सम्पन्न किया ॥३२॥ सबके प्यारे जयकुमारने भी अपने छोटे भाइयोंके साथ साथ मेघप्रभ सुकेतु आदि अच्छे अच्छे सब सहायकों को धन द्वारा संतुष्ट कर बिदा किया ॥३३॥
तदनन्तर नाथवंशके शिरोमणि अतिशय बुद्धिमान् अकंपनने अपने जमाई जयकुमार-के साथ सलाह की और अपने घरके अच्छे अच्छे रत्न भेंट में देने के लिये बांधकर सुमुख नामक दूतको यह कहकर चक्रवर्ती के पास भेजा कि तू वर्तमानका सब समाचार जानता ही है, चक्रवर्ती जिस प्रकार हम लोगोंपर प्रसन्न हों वही काम कर ॥ ३४-३५॥ उस दूतने शीघ्र ही जाकर पहले अपने आने की खबर भेजी फिर चक्रवर्ती के दर्शन कर पृथिवीपर अपना शरीर डाल प्रणाम किया और फिर हाथ जोड़कर साथमें लाई हुई भेंट देकर कहा कि हे देव, अकंपन नामका राजा आपका अनुचर है वह प्रणाम कर भयसे आपसे इस प्रकार प्रार्थना करता है सो प्रसन्नता कीजिये और उसे सुन लीजिये ॥३६-३७॥ उसने कहा है कि सुलोचना नामकी मेरी एक उत्तम कन्या थी वह मैंने स्वयंवर-विधिसे आपने ही जिसकी लक्ष्मी अथवा शोभा बढ़ाई है ऐसे जयकुमारके लिये दी थी ॥३८॥ कुमार अर्ककीर्तिने भी उस स्वयंवरमें पधारकर पहले सब बात स्त्रीकार कर ली थी और वे प्रसन्न हुए विद्याधर राजाओंके साथ साथ वहां विराजमान थे ॥३९॥ तदनन्तर जिस प्रकार कोई दुष्ट शुभ ग्रहके साथ ठहरकर उसे भी दुष्ट कर देता है उसी प्रकार किसी दुष्टने जबर्दस्ती हम लोगोंपर व्यर्थ ही उन्हें क्रोधित कर दिया ॥४०॥ इसके बाद वहां जो कुछ भी हुआ था वह सब समाचार आपको विदित ही है क्योंकि गुप्तचर रूप नेत्रोंको धारण करनेवाला साधारण राजा भी जब यह सब जान लेता है तब फिर भला आप तो अवधिज्ञानी हैं, आपका क्या कहना है ? ॥४१॥
श्लोक 42 से 51 : दूत द्वारा चक्रवर्ती को विस्तृत संदेश
कुमार तो अभी कुमार (लड़का) ही है इसमें उनका कुछ भी दोष नहीं है, प्रमाद करनेवाले केवल हम लोग ही उसमें सदोष हैं ॥४२॥ ‘तुम इस कन्याको ग्रहण करो’ ऐसा कहकर तो मैंने जयकुमारके लिये दी नहीं थी, तथापि देवता जो कुपित हो जाते हैं उसमें देवताका नहीं किन्तु आराधना करनेवाले हीका दोष समझा जाता है ॥४३॥ ये सब वंश मेरे ही बनाये हुए हैं, मेरे ही बढ़ाये हुए हैं, मेरे ही भाई हैं और मुझते ही सदा स्नेह रखते हैं इसलिये इनका निग्रह कैसे करूं ऐसा आप मत मानिये क्योंकि यदि आपका पुत्र भी दोषी हो तो उसे भी आप दण्ड दते हैं, इस न्यायका प्रारम्भ आपसे ही हुआ है। इसलिये हे प्रभो, आज्ञा दीजिये कि इस अपराधके लिये हम लोगोंको तीनों प्रकार के दण्डों में से कौन सा दण्ड मिलने योग्य है ? क्या फांसी ? क्या शरीरका क्लेश अथवा क्या धन हरण कर लेना ? ॥४४-४६॥ हे देव, आपकी आज्ञा पालन करनेसे ही हम लोग इस लोक तथा परलोक में अत्यन्त धन्य हो सकेंगे इसलिये आप अपराधके अनुसार हमें अवश्य दण्ड दीजिये ।॥४७॥ इस प्रकार नम्रतासे भरे हुए और हृदयको प्रिय लगनेवाले वचन कहकर वह सुमुख दूत राजराजेश्वर-चक्रवर्ती के हाथ के इशारेसे चूप हो गया ।॥४८॥ जब कि सज्जन पुरुषों के वचन राक्षसों के भी चित्तको मोहित कर लेते हैं तब सबको समान दृष्टि-से देखनेवाले भरत जैसे महापुरुषों के शान्तिपूर्ण चित्तकी तो बात ही क्या है ? ॥४९।। जिनका मुखरूपी कमल प्रफुल्लित हो रहा है ऐसे चक्रवर्तीने ‘यहां आओ’ इस प्रकार प्रसन्नताभरे वचनों-से उस दूतको अपने सिंहासन के निकट बैठाकर उससे इस प्रकार कहना प्रारम्भ किया कि ‘महाराज अरुंपनने इस प्रकार कहकर आपको क्यों भेजा है ? वे तो हमारे पिता के तुल्य हैं और इस समय हम सभी में ज्येष्ठ हैं ।॥ ५०-५१॥
श्लोक 52 से 61 : चक्रवर्ती भरत का उत्तर
गृहस्थाश्रममें तो मेरे वे ही पूज्य हैं, उन्हींसे में भाईबन्धुबाला हूं, औरकी क्या बात ? अन्यायमार्ग में प्रवृत्ति करनेपर वे मुझे भी रोकने वाले हैं ।॥५२॥ इस युगमें मोक्षमार्ग चलाने के लिये जिस प्रकार भगवान् वृषभदेव गुरु हैं, दानकी परम्परा चलानेके लिये राजा श्रेयांस गुरु हैं और चक्रतियोंकी वृत्ति चलानेमें में मुख्य हूं उसी प्रकार स्वयंवरकी विधि चलाने के लिये वे ही गुरु हैं। यदि ये अकंपन महाराज नहीं होते तो इस स्वयंवर मार्गका चलानेवाला दूसरा कौन था ? यह मार्ग अनादि कालका है ॥५३-५४।। इस युग में भोगभूमिसे छिपे हुए प्राचीन मार्गोको जो नवीन कर देते हैं वे सत्पुरुष ही सज्जनों द्वारा पूज्य माने जाते हैं ।॥५५॥ मेरा यह प्रसिद्ध चक्रवर्तीपना न तो चक्ररत्नसे मिला है, न शेष अन्य रत्नोंसे मिला है, न निधियोंसे मिला है, न छह अंगोंवाली सेनासे मिला है, न पुत्रोंसे मिला है और न मुझसे ही मिला है, किन्तु केवल एक जयकुमारसे मिला है क्योंकि शूर वीरताके सभी कार्यों में मेरी जीत उसीसे हुई है ॥५६-५७॥ म्लेच्छ राजाओंको जीतकर नाभि पर्वतपर मेरा कीर्तिमय नाम उसीने स्थापित किया था, इस विषयमें और किसीने क्या किया है ? ॥५८॥ इस अर्ककीतिने तो अकीतियों में गिनने योग्य तथा स्याही और उड़दके समान काली मेरी अक्रीति जब तक चन्द्रमा है तब तक के लिये संसारभरमें फैला दी ॥५९॥ इसने अन्याय का मार्ग चलाया है केवल इतना ही नहीं है। किन्तु संसारसें दण्ड देने योग्य लोगों में अपने आपको मुख्य बना लिया है ॥६०॥ जिस प्रकार दीपकसे काजल उत्पन्न होता है उसी प्रकार यह अकीर्तिरूप मुझसे उत्पन्न हुआ है, यह अर्ककीति नहीं है किन्तु साक्षात् अयशस्कोति है ।।६१।।
श्लोक 62 से 72 चक्रवर्ती का न्यायपूर्ण निर्णय
मेरी आज्ञासे जयकुमार ही अन्यायमें प्रवृत्ति करनेवाले इस प्रकारके लोगोंको दण्ड देता है इसलिये इसने युद्धमें जो उसे दण्ड दिया है वह अच्छा ही किया है ।।६२।। और की क्या बात ? यदि बड़ा पुत्र भी अपराधी हो तो राजाको उसे भी दण्ड देना चाहिये यह नीतिका मार्ग अर्ककीर्तिपर चलाने के लिये आज में तैयार बैठा हूं ।॥६३॥ आप लोगोंने विचार किये बिना ही उस अभिमानी के लिये अक्षमाला नामकी कन्या दे दी यह बुरा किया है ।।६४।। अथवा उस प्रसिद्ध अक्षमाला कन्याकी भेंट देकर आपने उस अर्ककीतिको भी पूज्यता प्राप्त करा दी है सो ठीक ही है क्योंकि यह कलंकसहित है यह समझकर क्या चन्द्रमाकी मूर्ति छोड़ी जाती है ? ॥६५॥ परन्तु चक्रवर्तीने अपराध करनेपर भी अपने पुत्रकी उपेक्षा कर दी-उसे दण्ड नहीं दिया इस मेरे अपयशको महाराज अकंपनने स्थायी बना दिया है ॥६६।। इस प्रकार सबके स्वामी महाराज भरतने सुमुख नामके दूतको संतुष्ट कर उसका मुख प्रसन्न किया और ज्येष्ठ पुत्रको छोड़कर न्यायको ही अपना औरस पुत्र बनाया । भावार्थ-न्यायके सामने बड़े पुत्रका भी पक्ष नहीं किया ॥६७॥ उसी समय चक्रवर्तीकी दयाका भार वहन करनेके लिये मानो असमर्थ हुआ सुमुख कहने लगा कि ‘हे देव’ जिन्हें आपका प्रसाद प्राप्त हो चुका है ऐसे जयकुमार और अकंपन दोनों ही आपके चरणोंको नमस्कार करते हैं, ऐसा कहकर उस दूतने अपने समस्त अंग पृथ्वीपर डालकर चक्रवर्तीको प्रणाम किया और जिसका मुखरूपी कमल विकसित हो रहा है तथा जिसने हाथ जोड़ रखे हैं ऐसा वह दूत खड़ा होकर फिर कहने लगा कि “जिस प्रकार दो चातक वर्षा ऋतुके पहले बादलसे वर्षा होनेकी इच्छा करते हैं उसी प्रकार जयकुमार और अकंपन आपके समीपसे मेरे आनेकी इच्छा करते हुए इसी ओर उन्मुख होकर बैठे होंगे” ऐसा निवेदन कर जिसने चक्रवर्तीसे आज्ञा प्राप्त की है ऐसे उस दूतने बड़ी शीघ्रतासे जाकर आदरके साथ महाराज अकंपन और जयकुमारको नमस्कार किया तथा वचनोंके द्वारा अनुराग करनेवाले चक्रवर्तीकी प्रसन्नता प्रकट कर उन दोनोंके मुखकमल इस प्रकार प्रफुल्लित कर दिये जिस प्रकार कि दिनका प्रारम्भ समय (प्रातः-काल) किरणोंके द्वारा लाल सूर्यकी प्रसन्नता प्रकटकर कमलोंको प्रफुल्लित कर देता है ॥६८-७२।।
श्लोक 73 से 81 जयकुमार का ससुराल में सुख
उस समय उन दोनों राजाओंने धन्यवाद, दान और सम्मानके द्वारा उस दूतको अत्यन्त प्रसन्न किया था सो ठीक ही है क्योंकि राजा लोग किये हुए उपकार माननेवाले होते हैं ।॥७३॥ इस प्रकार विचारातीत वैभवकी प्राप्तिसे जिसके शुभ कर्मका उदय प्रकट हो रहा है ऐसा वह श्रीमान् जयकुमार सुखसे श्वसुरके घर रहने लगा ॥७४।। जिसके नेत्र सुलोचनाके मुखरूपी कमलपर भ्रमरके समान आचरण करते थे और जिसका शरीर कामदेवके बड़े बड़े बाण रखने-के लिये तरकसके समान हो रहा था ऐसा वह जयकुमार युद्ध होनेपर लोहे के वाणोंसे उस प्रकार घायल नहीं हुआ था जिस प्रकार कि अत्यन्त कोमल कामदेवके इन फूलोंके बाणोंसे घायल हो गया था सो ठीक ही है क्योंकि दैवलीला बड़ी विचित्र होती है ॥७५-७६।। वह जयकुमार मुस्कुराहटसे रहित सुलोचनाको मुस्कुराहटसे युक्त करता था, न हंसनेपर जोरसे हंसाता था, भययुक्त होनेपर निर्भय करता था, आकुल होनेपर निराकुल करता था, वार्तालाप न करनेपर उससे वार्तालाप करता था, अपनी ओर देखनेपर उसे देखता था, और स्पर्श न करनेपर उसका स्पर्श करता था । इस प्रकार यह सब करते हुए जयकुमारने सुलोचनाकी लज्जा दूर की थी ।।७७-७८।। पूर्व पर्याय में बंधे हुए स्नेहरूनी बलसे शोभमान कामदेवने इच्छानुसार जयकुमार-को सुलोचनाका सेवक बना लिया था ॥७९॥ रागरूपी चन्द्रमाके सम्बन्धसे बढ़ी हुई, कामदेव नामक महासागरकी वेलाके समान सुलोचनाके मनकी वृत्ति क्रम क्रमसे चंचल हो रही थी ।॥८०॥ सब शरीरमें घुसे हुए कामदेवरूपी पिशाचके द्वारा बिना कुछ बोले ही जिसकी सूचना हो रही है ऐसे विकासने सुलोचनाके मुखरूपी मुकुलपर धीरे धीरे अपना स्थान जमा लिया था ॥८१॥
श्लोक 82 से 91 सुलोचना और जयकुमार का प्रेमालाप
कामरूपी पिशाचको ग्रहण करनेवाली सुलोचना सखियोंके मुख देखकर दिशाओंसे बातचीत कर अर्थात् निरर्थक वचन बोलकर इच्छानुसार हंसने लगी ॥८२॥ उस समय भय और लज्जा सहित सुलोचना कामदेवको जीतनेवाले जयकुमारको न देखने योग्य समयमें मानो ठगनेकी इच्छासे ही कामदेवको अपना सहायक बनाकर सफेद काले इन दोनों रंगोंसे मिले हुए चंचल कटाक्षोंसे भरी हुई दृष्टिरूपी अनेक तोमर नामके हथियारोंसे धीरे धीरे मार रही थी ।।८३।। जब जयकुमार उसकी ओर नहीं देखता था उस समय भी वह सफेद, काले और चंचल कटाक्षोंसे भरी दृष्टिसे उसे देखती रहती थी और उससे ऐसा मालूम होता था मानो यह उसे ठगना ही चाहती है ॥८४॥ उस समय उसे न तो सर्पने काटा था, न उसने मद्य ही पिया था, और न परिश्रमसे ही वह आक्रान्त थी तथापि वह पसीनेसे तर हो रही थी ॥८५॥ उसके मधुर भाषण स्खलित हो रहे थे, हृदय अत्यन्त कँप रहा था, दृष्टि चंचल हो रही थी और वह ऐसी जान पड़ती थी मानो अपने वशमें ही न हो ।। ८६ ।। सुन्दर दांतोंवाली सुलोचनाकी लज्जा इस प्रकार नष्ट हो गई थी मानो उसके पसीनारूपी जलसे धुल ही गई हो और कामदेवरूपी विचित्र अग्नि वचनरूपी ईंधनसे ही मानो खूब प्रज्वलित हो रही थी ॥८७॥ जबतक कामदेवरूपी ज्वर नहीं बढ़ता है तबतक ही लज्जा रहती है तबतक ही भय रहता है, तब तक ही करने योग्य कार्यका विचार रहता है और तब तक ही धैर्य रहता है ।॥८८॥वे दोनों दम्पती परस्पर पृथक् पृथक् सब इन्द्रियोंक विषयोंका सेवनकर परम आनन्दको प्राप्त हो रहे थे ।।८९।। अत्यन्त आसक्तिके कारण, क्रम क्रमसे एक एक विषयको ग्रहण करनेवाली इन्द्रियोंसे वे संतुष्ट नहीं होते थे इसलिये सब इन्द्रियोंको एक इन्द्रियरूप न करनेवाले विधाता-की वे निन्दा करते रहते थे । भावार्थ-उन दोनोंकी विषयासक्ति इतनी बढ़ी हुई थी कि वे एक साथ ही सब इन्द्रियोंके विषय ग्रहण करना चाहते थे परन्तु इन्द्रियां अपने प्राकृतिक नियम के अनुसार एक समयमें एक ही विषयको ग्रहण कर पाती थीं अतः वे असंतुष्ट होकर सब इन्द्रियों को एक इन्द्रियरूप न बनानेवाले नामकर्मरूपौ ब्रह्माकी सदा निन्दा करते रहते थे ॥९०॥ उन दोनोंने सब साधारण लोगों को मिलनेवाला परस्परका सुख छोड़कर आत्माका वह उत्कृष्ट सुख प्राप्त किया था जो कि अन्य छोटे-छोटे लोगोंको दुष्प्राप्य था ।।९१॥
श्लोक 92 से 103 जयकुमार की वापसी
जिनके भावोंका अन्त आ चुका है ऐसे वे दोनों ही एक साथ उत्पन्न हुई अपनी क्रियाओंके उद्रेकसे उत्पन्न होनेवाले एक सुखको छोड़कर और कुछ नहीं जानते थे ॥९२॥ संभोग क्रीड़ाके अन्तमें अशक्त हुए तथा गाढ़ उत्कंठाके कारण परस्पर एक दूसरेको देखते हुए उनके नेत्रोंकी पुतलियां एक दूसरेके नेत्रोंकी पुतलियोंके समान ही सुशोभित हो रही थीं। (यहां अनन्वयालंकार होनेसे उपमेय ही उपमान हो गया है) ॥९३॥ सुलोचनाने जयकुमारसे जो सुख प्राप्त किया था और जय-कुमारने सुलोचनासे जो सुख पाया था उन दोनोंका उपमानोपमेय भाव परस्पर-उन्हीं दोनोंमें था ।।९४।। परमात्माने सबके स्वामी होकर जिस सुखका अनुभव किया था उन दोनोंका वह सुख परस्परमें विभक्त होनेपर भी उससे कहीं अधिक था । भावार्थ-यद्यपि उन दोनोंका सुख एक दूसरेके संयोगसे उत्पन्न होनेके कारण परस्परमें विभक्त था, तथापि परिमाणकी अपेक्षा परमात्माके पूर्ण सुखसे भी कहीं अधिक था। (यहां ऐसा अतिशयोक्ति अलंकारसे कहा गया है वास्तवमें तो वह परमात्माके सुखका अनन्तवां भाग भी नहीं था) ॥९५॥ इस प्रकार परस्परमें उत्पन्न होनेवाले प्रेमामृतरूपी जलसे भरे हुए कामरूप समुद्रमें डूबकर वे दोनों चिरकालतक इच्छानुसार क्रीड़ा करते रहे ॥ ९६।। उसी समय एक दिन जो अपने मंत्रीके द्वाराभेजे हुए पत्रके गूढ़ अर्थसे प्रेरित हो रहा है, बुद्धिमान् है, और शीघ्रसे शीघ्र अपने स्थानपर पहुं-चनेकी इच्छा कर रहा है ऐसे जयकुमारने मामा (श्वसुर) के पास जाकर अपने जानेकी सूचना दी कि हे माम, आपने जिसका ऐश्वर्य बढ़ाया है ऐसे मुझे मेरी प्रजा देखना चाहती है । ।।९७-९८।। यह जानकर नाथवंशका स्वामी अकंपन कुछ घबड़ाया सो ठीक ही है क्योंकि अपनेसे जय (जयकुमार अथवा विजय) के जानेकी इच्छा करनेपर किसका मन व्याकुल नहीं होता है ? ॥९९॥ तदनन्तर कार्योंका पूर्वापर विचारकर राजा अकंपनने जयकुमारसे ‘तथास्तु’ कहा सो ठीक ही है क्योंकि बुद्धिमान् मनुष्य दीपिकाके समान स्नेह (तेल अथवा प्रेम) का अनुवर्तन करनेवाली बुद्धिको नहीं प्राप्त होते हैं। भावार्थ-बुद्धिमान् मनुष्य स्नेहके पीछे बुद्धिको नहीं छोड़ते हैं ।॥१००॥ यद्यपि महाराज अकंपन, सुलोचनाको देकर पहले ही जयकुमार-को सब कुछ दे चुके थे तथापि लौकिक व्यवहार पालन करनेके लिये अपने प्रेमके अनुसार खजाना आदि सब कुछ देकर उन्होंने किसी शुभ दिनमें वधू-वरको बिदा किया । सब मनुष्योंमें श्रेष्ठ महाराज अकंपन अपनी पत्नी सहित कुछ दूरतक तो स्वयं उन दोनोंके साथ साथ गये फिर जिस किसी तरह छोड़कर शोक करते हुए वहांसे वापिस लौट आये सो ठीक ही है क्योंकि संतान-का वियोग बड़े दुःखसे सहा जाता है ।।१०१-१०३॥
श्लोक 104 से 113 जयकुमार का गंगा तट पर पड़ाव और अयोध्या प्रस्थान
जयकुमार भी सुलोचना सहित विजयार्ध नामके हाथीपर सवार होकर अन्य अन्य हाथियोंपर बैठे हुए विजय आदि अपने सब छोटे भाइयों तथा लघु सहोदरोंसे युक्त हेमाङ्गदकुमार के साथ बड़े उत्सवसे मार्गमें कहने योग्य हंसी विनोद-की मनोहर कथाएं कहता हुआ और पृथिवीको हिलाता हुआ नक्षत्रोंसे घिरे हुए चन्द्रमा की तरह गंगाके किनारे धीरे धीरे इस प्रकार चला जिस प्रकार कि पहले दिग्विजयके समय सेनाके साथ साथ चला था ।।१०४-१०६।। शास्त्रोंके जाननेवाले और सबपर शासन करनेवाले जयकुमारने उस समय गंगाके किनारे यथायोग्य स्थानपर घासवाली जमीन देखकर सेनाके डेरे कराये ।। १०७।। देदीप्यमान कपड़ों के करोड़ों तम्बुओंके समीप ही जिसमें आने जानेका मार्ग बनाया गया है ऐसा वह सेनाका आवास (पड़ाव) इस प्रकार सुशोभित हो रहा था मानो स्वर्गका दूसरा आवास ही हो ।॥ १०८॥ जयकुमारने अपने डेरेके पास जाकर उसके बड़े दरवाजेके समीप ही अपना हाथी रोका, वहीं सब राजाओंको विदा किया फिर ऊंचे तम्बूके भीतर प्रवेश कर हाथी को बैठाया-स्वयं उतरे, अपनी भुजाओंका सहारा लेनेवाली सुलोचनाको भी उतारा और अपने योग्य स्थानमें कोमल शय्यातलपर सुखसे विराजमान हुए । फिर उस समयके योग्य समाचारोंको जाननेवाले जयकुमारने स्नान, भोजन, वार्तालाप, बाजे, गीत, नृत्य आदि मनोहर विनोदोंसे सुलोचनाको संतुष्ट किया, रात्रि वहीं सुखसे बिताई, वहां ठहरनेका कारण बतलाया, उसे समझा बुझाकर वहीं पर रक्खा, हेमांगद आदि सुलोचनाके भाइयोंको भी वह रक्खा, अपने सब छोटे भाइयों को अच्छी तरह सेनाकी रक्षा करनेसें नियुक्त किया और फिर कुछ आप्त पुरुषोंके साथ अयोध्याकी ओर गमन किया ।॥१-०९-११३॥
श्लोक 114 से 123 अयोध्या में प्रवेश और चक्रवर्ती से मिलन
अयोध्या पहुंचने पर अर्ककीति आदि अच्छे अच्छे पुरुषोंने सामने आकर जिसका स्वागत किया है, तथा जो बड़े स्नेह और आदरके साथ अर्ककीर्तिसे वार्तालाप कर रहा है ऐसे राजा जयकुमारने अनुराग करनेवालोंके साथ साथ बड़े प्रेमसे अयोध्यापुरी में प्रवेश किया सो ठीक ही है क्योंकि अन्य ऐसे पुरुष कौन हैं जो राजमान्य पुरुषकी पूजा न करें ॥११४-११५।। जिस प्रकार इन्द्र सम-वसरणके बाह्य दरवाजेपर पहुंचकर हाथीसे उतरता है उसी प्रकार जयकुमार भी राजभवन-के बाह्य दरवाजेपर पहुंचकर हाथीसे उतरा और सभागृहमें पहुंचा। उस सभागृहकी जमीन मणियोंसें जड़ी हुई थी. उसके मध्यमें एक रत्नमण्डप था जो कि देदीप्यमान रत्नोंसे जड़े हुए खंभोंसे भरा हुआ था, अनेक प्रकारके रेशमी वस्त्रोंके तने हुए चंदेवोंसे सुशोभित था, मणियों और मोतियोंसे गुथे हुए लम्बे लम्बे फन्नूस रूप आभूषणोंसे युक्त था, और बहुमूल्य रत्नोंकी कान्तिके जालसे व्याप्त था । जिस प्रकार उदयाचलपर सूर्य सुशोभित होता है उसी प्रकार उस रन्नमण्डपमें ऊंचे सिंहासनपर बैठे हुए महाराज भरत सुशोभित हो रहे थे । जिस प्रकार ज्योतिषी देवोंके समूहसे चन्द्रमा सुशोभित होता है उसी प्रकार महाराज भरत भी अनेक राजाओं से सुशोभित हो रहे थे, उनपर अपनी कीर्तितके समान निर्मल चमर ढुलाये जा रहे थे, इन्द्रकेधनुषके समान अनेक प्रकारके आभरणोंकी कान्तिसे वेष्टित थे अतएव ऐसे जान पड़ते थे मानो कान्तिसे ही उनका शरीर बनाया गया हो, और चारों प्रकारके (शुभायु, शुभनाम, शुभगोत्र और सातावेदनीय) पुण्योंसे पूज्य थे। इस प्रकार राजराजेश्वर महाराज भरतको देखकर भक्तिसे भरे हुए जयकुमारने तीर्थ करकी तरह आठों अंगोंसे जमीनको छूकर अनेक बार प्रणाम किया । महाराज भरतने भी हाथ फैलाकर उसका सन्मान किया तथा अपने हाथसे बतलाये हुए अपने निकटवर्ती आसनपर बैठाकर प्रसन्न दृष्टिसे अलंकृत किया । इस प्रकार संतुष्ट हुआ जयकुमार सभाके बीच एक विलक्षण तेजसे बहुत ही अधिक सुशोभित हो रहा था । ॥११६-१२३।।
श्लोक 124 से 131 चक्रवर्ती का प्रेमपूर्ण वार्तालाप
तदनन्तर महाराज भरत अपने प्रसन्न मुखरूपी चन्द्रमासे निकलते हुए और सबको आनन्दित करनेवाले बचनरूपी किरणोंसे सबको प्रसन्न करते हुए इस प्रकार कहने लगे कि क्यों जयकुमार, तुम बहूको क्यों नहीं लाये ? हम तो उसे देखनेके लिये बड़े उत्सुक थे, इस नवीन विवाहके उत्सवमें तुमने हम लोगोंको क्यों नहीं बुलाया ? महाराज अकंपनने अपने भाई-बन्धुओंसे हमको अलग कर दिया क्या यह ठीक किया ? अरे, मैं तो तुम्हारे पिताके तुल्य था तुम्हें मुझे आगे कर सुलोचनाके साथ विवाह करना चाहिये था, परन्तु तुम यह सब भूल गये इस प्रकार चक्रवर्तीके द्वारा स्वाभाविक शान्त वचनोंसे संतुष्ट किया हुआ जयकुमार उस समय अपनी भक्तिको प्रकट करता हुआ नमस्कार कर अपराधीके समान अपना मुँह मणियोंसे जड़ी हुई जमीनमें देखने लगा। फिर महाराज भरतसे दया प्राप्तकर हाथ जोड़कर खड़ा हुआ और राजाधिराज चक्रवर्तीसे इस प्रकार निवेदन करने लगा ॥१२४-१२८।। हे देव, आपके आज्ञाकारी काशीनरेशने विवाहविधिके सब भेदोंमें एक स्वयंवरकी विधि भी पहलेसे चली आ रही है इस प्रकार शास्त्रोंको जाननेवाले सब मंत्रियोंके साथ सलाह कर यह उत्सव प्रारम्भ किया था परन्तु दैवने उसे उलटा कर दिया ॥ १२९-१३०॥ मेरा मूल-सहित नाश करनेवाला वह युद्ध शान्त हो गया इसलिये ही यह सेवक आपके चरणोंमें आया है ।।१३१॥
श्लोक 132 से 141 जयकुमार की विनम्रता और भरत का सत्कार
हे चक्रक्रे द्वारा समस्त दिशाओंपर आक्रमण करनेवाले महाराज, अनेक देव, विद्याधर और राजा आपके चरणकमलोंके भ्रमर होकर सेवक बन रहे हैं फिर भला में उन सबम कान हू ? मेरी गिनता हा क्या ह ? ॥१३२॥ ह दव, जो दूसर साधारण पुरुषौको न प्राप्त हो सके ऐसा मेरा सन्मान करते हुए आपने मुझे ऋणी बना लिया है सो क्या सैकड़ों भत्रोंमें भी कभी इस ऋणसे छूट सकता हूं ? ॥ १३३॥ हे स्वामिन्, ये नाथवंश और चन्द्र वंशरूपी अंकुर भगवान् आदिनाथके द्वारा उत्पन्न किये गये थे और आपके द्वारा वर्धित तथा पालित होकर जबतक पृथिवी है तबतक के लिये स्थिर कर दिये गये हैं ।॥१३४ ।। आदर सत्कार को जाननेवाले महाराज भरत इस प्रकार विनयसे भरी हुई जयकुमारकी वाणी सुनकर बहुत ही संतुष्ट हुए, उन्होंने वस्त्र, आभूषण तथा सवारी आदिके द्वारा जयकुमारका सत्कार किया तथा सुलोचनाके लिये भी उसके योग्य वस्त्र, आभूषण आदि देकर उसे विदा किया । जय-कुमारने भी प्रियाके समान पृथिवीका आलिंगनकर महाराज भरतको प्रणाम किया और फिर वहांसे चल दिया । इसलिये कहना पड़ता है कि पुण्य सम्पादन करनेवाले पुरुषोंकी संपदाएं सम्पदाओंको बढ़ाती हैं। इस प्रकार नगरनिवासी लोग और याचकों के समूह जिसके साहसकी प्रशंसा कर रहे हैं ऐसा वह जयकुमार हाथीपर सवार होकर नगरसे बाहर निकला और अपनी हृदयवल्लभाको प्राप्त करनेकी इच्छा करता हुआ अपने मनके वेगसे प्रेरित हो शीघ्र ही गंगाके किनारे आ गया ।।१३५-१३८॥ वहांपर सूखे वृक्षकी डालीके अग्रभागपर सूर्यकी ओर मुँह कर रोते हुए कौएको देखकर वह कुमार प्रियाके भयकी आशंका करता हुआ वैसा शूरवीर होनेपर भी प्रेमके वश मूच्छित हो गया। आचार्य कहते हैं कि ऐसे रागसे उत्पन्न हुए सुखको भी विक्कार है। चेष्टासे हृदयकी बातको समझनेवाले और शकुनको जाननेवाले पुरोहितने उसी समय अनेक उपायोंसे सचेतकर आश्वासन दिया और कहा कि सुलोचना तो अच्छी तरह है। इस शकुनसे यही सूचित होता है कि हम लोगोंको जलसे कुछ भय होगा इस प्रकार कहकर पुरोहितने जयकुमारको शान्त किया ॥१३९-१४१॥
श्लोक 142 से 152 गंगा में संकट और गंगादेवी की रक्षा
उस पुरोहितके वचनोंको प्राणोंका सहारा मानकर वह जयकुमार शीघ्र ही आगे चला और भूलसे उसने अघाटमें ही हाथी चला दिया सो ठीक ही है, क्योंकि विचारहीन कामी पुरुषोंको हेय उपादेयका ज्ञान कहां होता है ? वह हाथी पानीमें चलने लगा, उस समय उसकी सूंड़का अग्रभाग ऊंचा उठा हुआ था, दांत चमक रहे थे, गंडस्थल पानी के ऊपर था और आकार मगरके समान जान पड़ता था, इस प्रकार तैरता हुआ हाथी एक गढ़ेके बीच जा पहुंचा । उसी समय दूसरे सर्पके साथ समागम करते समय जिस सर्पिणीको पहले जयकुमारके सेवकोंने मारा था और जो मरकर काली देवी हुई थी उसने मगरका रूप धरकर जहां सरयू गंगा नदीसे मिलती है उस हाथीको पकड़ लिया सो ठीक ही है क्योंकि अपने देशमें रहनेवाला क्षुद्र भी बड़ों बड़ोंसे बलवान् हो जाता है। हाथी को डूबता हुआ देखकर कितने ही लोग लौटकर किनारेपर खड़े हो गये परन्तु हेमाङ्गद आदि घत्रड़ाकर उसी गढेमें एक साथ घुसने लगे । सुलोचनाने भी उन सबको गढ़ेमें घुसते देख पंच नमस्कार मंत्रका स्मरण किया, उसने मन्त्रकी मूर्तिस्वरूप अर्हन्त भगवान्को बड़ी भक्तिसे अपने हृदयमें धारण किया और उपसर्गकी समाप्ति तक आहार तथा शरीरका त्याग कर दिया ॥१४२-१४७॥ सुलोचना भी अनेक सखियोंके साथ गंगामें घुस रही थी और उस समय ऐसी जान पड़ती थी मानो गङ्गादेत्री ही अनेक सखियोंके साथ गंगा नदीमें प्रवेश कर रही हो। इतने में ही गंगाप्रपात कुण्डके गंगाकूटपर रहनेवाली गंगादेवीने आसन कंपायमान होनेसे सब समाचार जान लिया और किये हुए उपकारको माननेवाली वह देवी बहुत शीघ्र आकर दुष्ट कालिका देत्रीको डाँटकर उन सबको किनारेपर ले आई ॥१४८-१४९।। सो ठीक ही है क्योंकि इस संसारमें ऐसे कौन हैं जो पुण्य करनेवालोंकी स्वयं आकर रक्षा न करें । तदनन्तर उस देवीने गंगा नदी के किनारेपर बहुत शीघ्र अपनी विक्रिया द्वारा सब सम्पदाओंसे सुशोभित एक भवन बनाया, उसमें मणिमय सिंहासनपर सुलोचनाको बैठाकर उसकी पूजा की और कहा कि तुम्हारे दिये हुए नमस्कार मंत्रसे ही में गंगाकी अधिष्ठात्री देवी हुई हूं, और सौधर्मेन्द्रकी नियोगिनी भी हूं, यह सब तेरे ही प्रसादसे हुआ है। गंगादेवी के इतना कह चुकनेपर जयकुमारने भी सुलोचनासे पूछा कि यह क्या बात है ? ॥१५०-१५२॥
श्लोक 153 से 160 सुलोचना की पूर्व कथा और गंगादेवी का परिचय
सुलोचना कहने लगी कि विन्ध्याचल पर्वतके समीर विन्ध्यपुरी नामकी नगरी में विन्ध्यकेतु नामका एक प्रसिद्धराजा रहता था। उसकी स्त्रीका नाम प्रियङगुश्री था। उन दोनोंके विन्ध्यश्री नामकी पुत्री थी। उसके पिताने मुझपर प्रेम होनेसे मेरे साथ सब गुण सीखनेके लिये उसे महाराज अकंपनको सौंप दिया ।।१५३-१५४॥ वह विन्ध्यश्री किसी एक दिन उपवनमें क्रीड़ा कर रही थी, वहींपर उसे किसी सांपने काट लिया जिससे मेरे द्वारा दिये हुए पंच नमस्कार मन्त्रका चिन्तवन करती हुई मरकर यह देवी हुई है और मुझपर स्नेह होनेके कारण यहां आई है यह जानकर जयकुमारने संतुष्टचित्त हो शान्तिमय वचन कहकर गंगादेवीको विदा किया । तदनन्तर अपनी प्रिया सुलोचना और इष्ट-बन्धुओंके साथ साथ, फहराती हुई पताकाओंके द्वारा अपने आपको बगुलाओंसे सहित करते हुएके समान जान पड़नेवाले अपने ऊंचे डेरेमें प्रवेश किया । बड़े स्नेहसे महाराज भरतके कहे वचन सबको सुनाये, उनकी दी हुई भेंट सबको अलग अलग दी । सुलोचनाको अत्यन्त प्रसन्न किया, वह रात्रि वहीं बिताई और सबेरा होते ही उठकर अपने में अनुराग रखनेवाले लोगोंके भोजनके लिये सूर्यके समान समस्त दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ वह कुरुवंशियोंका प्यारा जयकुमार सुलोचनाके प्रेमसे गंगा नदीके किनारे किनारे चलने लगा ॥१५५-१६०।।
श्लोक 161 से 181 गंगा तट पर यात्रा और हस्तिनागपुरी प्रवेश
वह जाते समय मनोहर वचनोंसे सुलोचनाको बहुत ही संतुष्ट करता जाता था । वह कहता था कि हे प्रिये, देखो यह गंगा नदी अपने अनुरूप समुद्ररूपी पति-के पास बड़ी शीघ्रतासे जा रही है, यह अपनी नाभिरूपी भौंर दिखला रही है, दोनों किनारे ही इसके नितम्ब हैं, चंचल और उज्वल मछलियां ही नेत्र हैं, यह क्रीड़ा अथवा पतिके लिये सन्मुख है, तरंगरूपी भुजाओंके द्वारा गाढ़ आलिंगनके लिये उत्कण्ठित सी जान पड़ती है, स्वभावसे सुन्दर है, अपने स्वच्छतारूपी गुणोंसे सबका हृदय हरनेवाली है, दोनों किनारोंपर वनके फूले हुए पुष्पोंकी माला धारण कर रही है, इसका रस अथवा पानी सब ओरसे बढ़ रहा है और अपना वेग नहीं संभाल सक रही है ।।१६१-१६४।। सो ठीक ही है क्योंकि कामदेवके बिना रतिकी इच्छा नहीं होती है, उत्तम पुरुषोंकी इच्छाएं नीच पदार्थोंपर नहीं होती हैं, यह नदी समुद्रमें जाकर समुद्ररूप ही हो गई हैं सो ठीक ही है क्योंकि प्रेम ऐसा ही होता है, इसके समागमसे ही समुद्रका लावण्य (सौन्दर्य अथवा खारापन) सदा सफल होता है ॥ १६५॥ इस गंगा नदीकी उत्पत्ति पर्वतों के पति-हिमवान् पर्वतसे है, पृथिवीपर यह बढ़ी है और समुद्र ही इसका पति है इसलिये ही यह संसारमें पापोंका नाश करनेवाली हुई है ।।१६६।। यह सफेद है, धर्मात्मा लोगोंके द्वारा मान्य है, सतियोंको इसकी उपमा दी जाती है और सब कवीश्वर यदि गुगीजनोंकी स्तुति न करें तो फिर कौन किसकी स्तुति करेगा ? इस प्रकार सुननेके योग्य गङ्गा सम्बन्धी तथा अन्य अत्यन्त मनोहर कथाओं द्वारा मार्ग तय किया । ॥१६७-१६८।। तदनन्तर कुछ ही पड़ावों द्वारा कुरुजांगल देश पहुंचकर उसके वर्णनके बहानेसे सुलोचनाको आनन्दित करते हुए जयकुमारने अपनी उस हस्तिनागपुरी नामकी राजधानीमें प्रवेश किया जो कि देशके प्रधान प्रधान पुरुषों द्वारा लाये हुए फल पुष्प आदिकी भेंट तथा खिले हुए नील कमल और सफेद कमलोंसे अत्यन्त सुशोभित सरोवररूपी नेत्रोंसे ‘ऐसी जान पड़ती थी मानो आगे आकर वधू वरको देख ही रही हो। उत्तम धूलीसाल ही जिसका विस्तृत जघन प्रदेश था, बावड़ी और कुएं ही जिसकी विशाल नाभि थी, चारों ओर खड़ा हुआ सुवर्णका ऊंचा परकोटा ही जिसकी करवनी थी, सजी हुई बड़ी बड़ी गलियां ही जिसकी सुशोभित बाहुलताएं थीं, राजभवन ही जिसके ऊंचे कुच थे, देदीप्यमान गोपुररूपी मुखसे जो सुशोभित हो रही थी, केशर, अगुरु और कपूरके विलेपनसे जिसका शरीर गीला हो रहा था, जो अनेक प्रकारके फूलोंसे गुँथी हुई मालारूपी केशपाशको धारण कर रही थी, तोरणों में बांधी गई रत्न आदिकी मालाओंसे जिसका शरीर सुशोभित हो रहा था, जो ऊपर नीचे उड़ती हुई पताकाओंके अग्रभागरूपी हाथों-से बुलाती हुई सी जान पड़ती थी, खुले हुए दरवाजे ही जिसके विश्वासपूर्ण नेत्र थे, जो घर-घर होनेवाले उत्सवोंसे उत्कण्ठित सी जान पड़ती थी और इस प्रकार जो दूसरी सुलोचनाके समान सुशोभित हो रही थी। महाराज के दर्शन करनेके लिये उत्कण्ठित हो आशीर्वाद देने- वाले पुरोहित, सौभाग्यवती स्त्रियां, मंत्री और प्रसिद्ध प्रसिद्ध सेठ लोग सामने खड़े होकर जिसे शेजाक्षत दे रहे हैं ऐसे उस जयकुमारने तुरही आदि माङ्गलिक बाजों के शब्दोंके साथ साथ दूसरे इन्द्रके समान अपनी उस हस्तिनागपुरी में प्रवेश कर अनेक प्रकारकी विभूतियोंसे बहुत भारी आनन्द देनेवाले तथा उस नगरीके हृदयके समान अपने राजभवनमें प्रिया सुलोचनाके साथ साथ बड़े आनन्दसे निवास किया ।।१७०-१७८।।
तदनन्तर बड़े भारी अभ्युदयको धारण करनेवाले महाराज जयकुमारने शुद्ध तिथि, शुद्ध नक्षत्र आदि पांचों बातोंसे निर्दोष लग्नमें बड़ा भारी उत्सव कराकर सबको संतुष्ट किया और फिर जिनपूजापूर्वक सब मंगल-संपदाओंके साथ साथ हेमांगद आदि भाइयोंके सामने ही अपने योग्य आसनपर बैठी हुई सुलोचनाको बड़े हर्षसे पट्टबन्ध बांधा अर्थात् पट्टरानी बनाया सो ठीक ही है क्योंकि पुण्यसंचय करनेवाली स्त्रियोंमें पतिका ऐसा ही प्रेम होता है ।।१७९-१८१॥
श्लोक 182 से 191 सुलोचना का पट्टबन्ध और विदाई
उसके बाद कुशल जयकुमारने स्वयं आगे होकर पाहुनोंके योग्य सब प्रकारके भोगोप-भोगोंसे, नृत्य, गीत और सुख देनेवाले वचनोंसे, हाथी आदिकी सवारीसे, वन, वापिका, तालाब . आदिकी क्रीड़ाओंसे और गेंद आदिके खेलोंसे प्रसन्नतापूर्वक हेमाङ्गद और उनके भाइयोंकी सेवा की, कुछ दिन तक उन्हें बड़े सुखसे रक्खा और फिर उनको अच्छे लगनेवाले हाथी, घोड़े, अस्त्र, गणिका तथा आभूषण आदि देकर उनके परिवारके लोगोंको यथायोग्य संतुष्ट किया और फिर रत्न, सोना, चांदी तथा रुपये-पैसे आदि चारों प्रकारका खजाना साथ देकर उन्हें उनके नगर बनारसको विदा किया । ।१८२-१८५॥ सुखपूर्वक कितने ही पड़ाव चलकर वे हेमांगद आदि बनारस पहुंचे और माता सुप्रभाके साथ राजा अकंपनके दर्शन कर उन्हें प्रणाम किया और जयकुमार तथा सुलोचनाकी बातचीतसे माता-पिताको आनन्दित करते हुए रहने लगे ॥१८६॥
इस प्रकार सुखपूर्वक बहुत सा समय व्यतीत होनेपर एक दिन महाराज अकंपन काम-भोगोंसे विरक्त होकर इस प्रकार सोचने लगे ॥ १८७॥ कि मुझ प्रमादीने विषयोंसे अन्धा होकर इतने दिन तक शरीर, संसार और भोगोंकी असारता नहीं देखी यह बड़े खेदकी बात है ॥१८८॥ प्रथम तो यह शरीर अपवित्र उपादानों (माता-पिताके रज वीर्य) से बना है, फिर इसके सब अवयव अपवित्र हैं, यह सबको अपवित्र करनेवाला है, पापरूप है और दुःख देनेवाली खोटी खोटी चेष्टाओंका घर है ।।१८९॥ इसके नौ द्वारोंसे सदा मल-मूत्र बहा करता है और अन्त में यह विनश्वर शरीर कीड़ोंका समूह, चिताकी राख तथा विष्ठा बनकर नष्ट हो जाने-वाला है ।।१९०।। ऐसे शरीरमें रहकर यह मूर्ख प्राणी, जिनमें संसारके सब पदार्थ ईंधन रूप हैं ऐसी पांचों इन्द्रियोंकी अग्नियोंसे तपाया जाकर कुलिंगी जीवके समान फिरसे नीच गतियों में पहुंचता है ॥१९१।।
श्लोक 192 से 201 अकम्पन का वैराग्य और दीक्षा
जिसमें यह सारा संसार एक परमाणुके समान है ऐसा वह प्रसिद्ध आशारूपी गढ़ा इसी शरीरमें है, इसी आशारूपी गढ़ेको मैं आज थोडेसे धनसे पूरा करना चाहता हूं ॥ १९२॥ जिस शरीरको लेकर यह जीव जन्म धारण करता है-संसारी बन जाता है और जिसे छोड़कर यह जीव मुक्त हो जाता है इस प्रकार शरीरकी वास्तविकता जानकर भी बुद्धिमान् लोग न जाने क्यों उसका भरण-पोषण करते हैं ॥ १९३॥ हे जीव, खेद है कि तू मोहकर्म के द्वारा चिरकालसे ठगा गया है, क्योंकि तुझे आजतक भी अपने शरीरकी अपवित्रताका ज्ञान नहीं हो रहा है, जब यह बात है तब अत्यन्त दुर्लभ उसका त्याग भला कहाँ मिल सकता है ॥१९४।॥ इस संसारमें जो दुःखी हैं वे सुखी हो जाते हैं, जो सुखी हैं वे दुखी हो जाते हैं और कितने ही दुखी दुखी ही बने रहते हैं इसी प्रकार धनी निर्धन हो जाते हैं, निर्धन धनी हो जाते हैं और कितने ही निर्धन सदा निर्धन ही बने रहते हैं। इस तरह यह जीव जो सुखी है वह सुत्री ही रहे और जो धनी है वह धनी ही बना रहे यह चौथा भंग नहीं पाकर केवल ऊपर कहे हुए तीन तरहके भंगोंसे ही संसाररूपी समुद्रमें चिरकाल तक भ्रमण करता रहता है । ॥१९५-१९६।। यह पुरुष जिस स्त्रीको चाहता है वह स्त्री किसी दूसरे पुरुषको चाहती है, जिसको वह चाहती है वह भी किसी अन्य स्त्रीको चाहता है इस प्रकार यह इष्ट अनिष्टकी परंपरा बहुत ही दुःख देनेवाली है ।। १९७।। जो इष्ट है वह अनिष्ट हो जाता है और जो अनिष्ट है वह इष्ट हो जाता है, इस प्रकार संसारमें इष्ट अनिष्टकी स्थिति किसी एक स्थानपर निय-मित नहीं रहती ? ॥१९८॥ आजका पुरुष अगले जन्ममें स्त्री हो जाता है, स्त्री नपुंसक हो जाती है, नपुंसक स्त्री हो जाता है, वही स्त्री फिर पुरुष हो जाता है, वह पुरुष भी नपुंसक हो जाता है, वह नपुंसक फिर पुरुष हो जाता है अथवा नपुंसक नपुंसक ही बना रहता है, इस प्रकार इस चक्रों बड़ा टेढ़ा संक्रमण करना पड़ता है ।॥ १९९॥ इसलिये श्रीजिनेन्द्रदेवके कहे हुए वचनोंका चिन्तवन कर में अवश्य ही इस संसारका अन्त करूंगा क्योंकि निरन्तर संसाररूपी वनके भीतर परिभ्रमण करनेमें मैं अब यमराजसे डर गया हूं ॥ २००॥ भोग करनेवाले मनुष्यों के ये भोग ठीक सर्प के फणाके समान हैं और भोगनेवाले जीवको भोगी” नाम देनेवाले हैं । तथा इतना सब होनेपर भी उन भोगों में से एक भोग भी हमारा नहीं है यह निश्चय है ।॥२०१॥
श्लोक 202 से 211 जयकुमार-सुलोचना का प्रेम सुख
जिसका भोग किया जाता है उसे भोग कहते हैं अथवा उपभोग किया जाना भोग कहलाता है वे दोनों प्रकारके भोग नरक में भी हैं इसलिये उन भोगोंमें क्या प्रेम करना है ? ॥२०२॥ जिस प्रकार औषवसे पेटकी अग्नि प्रदीप्त हो जाती है उसी प्रकार इन भोगोंसे भी तृष्णारूपी अग्नि प्रदीप्त हो उठती है अतः इन भोगोंसे बढ़ी हुई तृष्णारूपी अग्निकी शान्तिके लिये कोई दूसरा ही उपाय सोचना चाहिये ॥ २०३॥ इस प्रकार तृष्णारूपी विषको उगल देनेवाले बुद्धि-मान् राजा अकम्पनने बहुत शीघ्र हेमाङ्गदको बुलाकर पूज्य-परमेष्ठियोंकी पूजापूर्वक उसका राज्याभिषेक किया, लक्ष्मी को चंचल समझ पट्टबन्धसे बांधकर उसे अचल बनाया और हेमांगद-को सौंपकर श्रीभगवान् वृषभदेवके समीप जाकर अनेक राजाओं और रानी सुप्रभाके साथ दीक्षा धारण की तथा अनुक्रमसे श्रेणियां चढ़कर केवलज्ञान उत्पन्न किया ॥२०४-२०६।।
अथानन्तर अन्य जन्मसे आये हुए बहुत भारी स्नेहसे भरा हुआ जयकुमार खुले हुए नीलकमलों के समान सुशोभित होनेवाले अपने नेत्रोंसे सुलोचनाके मुखरूपी आनन्ददायी चन्द्रमासे झरते हुए अमृतको पीता था, सुलोचनाके वचन और गीतरूपी रसायनको अपने कानरूपी पात्रोंसे भरता था, हाथीकी सूँड़के समान आकारवाले हाथोंके आलिंगनसे युक्त हो स्पर्शन इन्द्रियसे जानने योग्य उसके शरीररूपी कुइँयाके भीतर रहनेवाले रसको ग्रहण करता था, बिम्बी फलके समान सुशोभित उसके ओठोंमें रहनेवाले अमृतका आस्वाद लेनेमें सदा उत्सुक रहता था, उसके मुखरूपी कमलकी सुगन्धिसे रातदिन अत्यन्त हर्षित होता रहता था और ‘स्त्री समागम मुझे इसी भवमें है अन्यभवमें नहीं है, ऐसा मानकर ही मानो सुलोचना के द्वारा अपनी चक्षु आदि इन्द्रियोंको संतुष्ट करता रहता था ।।२०७-२११।।
श्लोक 212 से 219 : संभोग सुख की सीमा और पर्व समापन
चूँकि प्रमाण, काल और भावसे इन दोनोंके प्रेममें समानता थी इसलिये ही वे दोनों संभोग शृङ्गाररूपी समुद्रके अन्त तक पहुंच गये थे ।। २१२।। खूब बढ़े हुए प्रेमसे जिसने विलेपन आदि छोड़ दिया है ऐसा वह जयकुमार सुलोचनाकी सब इन्द्रियोंका विषय रहता था और सुलोचना भी जय-कुमारके हित करनेवाले विषयोंमें तत्पर रहती थी, इस प्रकार ये दोनों ही समान प्रीति करना ही जिनका सारभाग है ऐसे सुखोंका उपभोग करते थे ॥ २१३॥ पृथक् पृथक् उत्पन्न हुए परि-णामोंसे खूब मिले हुए उन दोनोंने अपने मनमें कामदेवका सुख नहीं पाया था किन्तु इन्द्रियोंसे उत्पन्न हुए उन उन सुखोंसे उनके मन प्रीतिको अवश्य प्राप्त हुए थे सो ठीक ही है क्योंकि दूसरे-के द्वारा उत्पन्न हुआ सुख क्या कहीं उत्तम तृप्तिके लिये हो सकता है ? ॥ २१४।। अपने श्वासो-च्छ्वाससे उत्पन्न हुए शीतल सुगन्धित और मन्द पवनसे, कोमल और मधुर वचनोंसे, स्वाद
लेने योग्य अधर आदि प्रदेशोंसे और कोमलताकी एक खान स्वरूप सुन्दर शरीररूपी लतासे वे दोनों अपनी इन्द्रियोंको समस्त सुख पहुंचाते थे ॥ २१५॥ जिसने कमलका सार भाग हरण कर लिया है, जो प्रिय दासके समान आचरण करता है, निरन्तर संभोगका साधन रहता है, झरोखेके मार्गसे आता है और अत्यन्त कोमल (मान्द) तथा शीतल है ऐसे पवनसे वे दोनों ही संभोग के बाद उत्पन्न हुए पसीना सूखनेका सुख प्राप्त करते थे ।। २१६॥ जयकुमारकी प्रवृत्ति सुलोचनाके अनुकूल रहती थी और सुलोचनाकी प्रवृत्ति जयकुमारके अनुकूल रहती थी । उन दोनोंका परस्पर एक दूसरेके अनुकूल रहना ही उनके रतिजन्य संतोषका कारण था जो चिन्तवनमें न आ सके ऐसा प्रेम इन्हीं दम्पतियोंमें पूर्णताको प्राप्त हुआ था, इन्हींके सातावेदनीय-का अन्तिम उदय था और यही सब इनके जन्म लेनेका फल था ।। २१७।। बुद्धिमान् कामदेव, संभोग चेष्टाओंके समय जयकुमारका शिष्य बन गया था और रति सुलोचनाकी शिष्या बन गई थी सो ठीक ही है क्योंकि मनुष्य यदि व्यर्थका अभिमानी न हो तो ऐसा कौन हो जो अपने इष्ट पदार्थकी सिद्धिके विषयभूत अधिक गुणवाले पुरुषोंके साथ अभिमान करे ? ॥२१८॥ इस प्रकार शरीरसे उत्पन्न हुए सुखोंका अनुभव कर चिरकाल तक रमण करनेपर भी वे दोनों इच्छाओंकी अन्तिम अवधिको प्राप्त नहीं हुए थे उनकी इच्छाएं पूर्ण नहीं हुई थीं । इसलिये कहना पड़ता है कि इष्ट विषयोंसे उत्पन्न हुए सुखको भी धिवकार है। हे पण्डितो, तुम उसी सुखके लिये प्रयत्न करो जो कि संसारके सब विषयोंसे अतीत है ।। २१९।। इस प्रकार भगवद्गुणभद्राचार्य प्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रहके हिन्दी भाषानुवादमें जय-कुमार और सुलोचनाके सुखभोगका वर्णन करनेवाला यह पैंतालीसवां पर्व समाप्त हुआ
हिन्दी-भाषानुवाद
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