शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 244 | श्लोक 245 से 254 | श्लोक 255 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 63- shlok 294 to 301
श्लोक ( Shlok ) 294 – 295
देव्यौ ३स्वं रूपमादाय निजागमनवृत्तकम् । निवेद्य रूपमस्याश्च धिग्विलक्षणभङ्गुरम् ॥२९४॥अत्र नाभङ्गुरं किञ्चिदिति निविंद्य चेतसा । तां सम्पूज्येयतुः स्वर्ग स्वदीप्तिव्याप्तदिक्तटे ॥२९५॥
तदनन्तर देवियोंने अपना असली रूप धारण कर अपने आनेका समाचार कहा और इसके विलक्षण किन्तु नश्वर रूपको धिक्कार हो। इस संसारमें कोई भी वस्तु अभङ्गुर नहीं है इस प्रकार हृदय से विरक्त हो रानी प्रियमित्राकी पूजा कर वे देवियाँ अपनी दीप्तिसे दिशाओंके तटको व्याप्त करती हुई स्वर्गको चली गई ।॥ २९४-२९५ ॥
“Thereafter, the goddesses assumed their true celestial forms, revealed the reason for their arrival, and exclaimed, ‘Fie upon this extraordinary yet perishable form! Nothing in this world is permanent.’ Becoming deeply detached from worldly attachment (virakta) at heart upon realizing this, the goddesses paid their reverent respects to Queen Priyamitra. Then, illuminating the horizons with their radiant splendor, they returned to heaven.”294 – 295
श्लोक ( Shlok ) 296
देवीं तद्धेतुना “खिन्नां नित्यानित्यात्मकं जगत् । सर्वमन्तः शुचं मा गा इत्याश्वास्य महीपतिः॥ २९६॥
इस कारणसे रानी प्रियमित्रा खिन्न हुई परन्तु ‘यह समस्त संसार ही नित्यानित्यात्मक है अतः हृदयमें कुछ भी शोक मत करो’ इस प्रकार राजाने उसे समझा दिया ।। २९६ ॥
“Because of this, Queen Priyamitra became filled with sorrow; however, the king consoled her, saying, ‘This entire universe is inherent with both the eternal and the transient (nitya-anitya). Therefore, do not grieve in your heart at all.'” 296
श्लोक ( Shlok ) 297 – 299
राज्यभोगैः स्वकान्ताभिर्नितान्तं निर्वृतिं व्रजन् । गत्वा मनोहरोद्यानमन्येधुः स्वगुरुं जिनम् ॥२९७॥सिंहासने समासीनं सुरासुरपरिष्कृतम् । समस्तपरिवारेण त्रिः परीत्याभिवन्द्य च ॥ २९८॥सर्वभव्यहितं वान्च्छन् पप्रच्छोपासकक्रियाम् । प्रायः कल्पद्रमस्येव परार्थं चेष्टितं सताम् ॥२९९॥
इस तरह अपनी स्त्रियोंके साथ राज्यका उपभोग करते हुए राजा मेघरथ बहुत ही आनन्दको प्राप्त हो रहे थे। किसी दूसरे दिन वे मनोहर नामक उद्यानमें गये । वहाँ उन्होंने सिंहासन पर विराजमान तथा देव और धरणेन्द्रोंसे परिवृत अपने पिता घनरथ तीर्थंकरके दर्शन किये । समस्त परिवारके साथ। उन्होंने तीन प्रदक्षिणाएँ दीं, वन्दना की और समस्त भव्य जीवोंक हितकी इच्छा करते हुए श्रावकोंकी क्रिया पूछी सो ठीक ही है क्योंकि सज्जनोंकी चेष्टा कल्पवृक्षके समान प्रायः परोपकारके लिए ही होती है ॥ २९७-२९९ ॥
“In this manner, while enjoying the pleasures of his kingdom alongside his wives, King Megharatha was experiencing immense bliss. On another day, he went to a beautiful garden named Manohara. There, he beheld his father, the Tirthankara Ghanaratha, seated upon a throne and surrounded by gods and Dharanendras (lord of the underworld deities).
Along with his entire entourage, the king circumambulated him three times, paid his reverent obeisance, and—wishing for the spiritual welfare of all liberation-seeking souls (bhavya jivas)—asked about the duties and conduct of a lay practitioner (shravaka). This is indeed fitting, for the actions of righteous beings, much like the wish-fulfilling tree (Kalpavriksha), are almost always dedicated solely to the welfare of others.”297 – 299
श्लोक ( Shlok ) 300 – 301
प्रागुक्तैकादशोपासकस्थानानि विभागतः । उपासकक्रियाबद्धोपासकाध्ययनाह्वयम् ॥३००॥’अङ्ग सप्तममाख्येयं श्रावकाणां हितैषिणाम् । इति व्यावर्णयामास तीर्थकृतप्रार्थितार्थकृत् ॥३०१॥
हे देव ! जिन श्रावकोंके ग्यारह स्थान पहले विभाग कर बतलाये हैं उन्हीं श्रावकोंकी क्रियाओंका निरूपण करनेवाला उपासकाध्ययन नामका सातवाँ अङ्ग, हितकी इच्छा करनेवाले श्रावकोंके लिए कहिए । इस प्रकार राजा मेघरथके पूछने पर मनोरथको पूर्ण करनेवाले घनरथ तीर्थकर निम्न प्रकार वर्णन करने लगे ॥ ३००-३०१ ॥
““O Lord! Please expound upon the Upasakadhyayana (also known as Upasakahadasao), the seventh limb of the sacred scriptures (Angas). It delineates the daily duties and righteous actions of those lay practitioners (shravakas) whose eleven spiritual stages (pratimas) have been previously categorized—do this for the welfare of the shravakas who desire spiritual upliftment.”
Upon King Megharatha making this request, the Tirthankara Ghanaratha, who fulfills all spiritual aspirations, began to describe it in the following manner.”300 – 301
श्लोक 302 से 311
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130
अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 |श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 371 | श्लोक 372 से 382 | श्लोक 383 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 433 | श्लोक 434 से 442 | श्लोक 443 से 451 | श्लोक 452 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 481 | श्लोक 482 से 491 | श्लोक 492 से 501 | श्लोक 502 से 513
शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 |श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 102 | श्लोक 103 से 114 | श्लोक 115 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 244 | श्लोक 245 से 254 | श्लोक 255 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293
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