अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 113 to 122
श्लोक ( Shlok ) 113
इतोऽश्वग्रीवश्चक्रेशो विनाशपिशुनः पुरे । उत्पातस्त्रिविधः प्रोक्तः सद्यः सममुदुद्ययौ ॥ ११३ ॥
इधर अश्वग्रीव प्रतिनारायणके नगरमें विनाशको सूचित करनेवाले तीन प्रकारके उत्पात बहुत शीघ्र साथ ही साथ होने लगे ॥ ११३ ॥
Meanwhile, in the capital city of Ashvagreeva the Pratinarayana, three types of ominous portents, signaling imminent destruction, began to occur simultaneously and with great suddenness. || 113 ||
श्लोक ( Shlok ) 114
अभूतपूर्व तं दृष्ट्वा सहसा भीतिमान् जनः । पल्योपमाष्टभागोवशेषे वा भोगभूभुवः ॥ ११४ ॥
जिस प्रकार तीसरे कालके अन्त में पल्यकाआठवाँ भाग बाकी रहने पर नई नई बातोंको देखकर भोगभूमिके लोग भयभीत होते हैं उसी प्रकार उन अभूतपूर्व उत्पातोंको देखकर वहांके मनुष्य सहसा भयभीत होने लगे ॥ ११४ ॥
Just as at the end of the third epoch (Kalpa), when only an eighth part of a Palya remains, the people of the land of enjoyment (Bhogabhumi) become terrified upon witnessing strange, unprecedented phenomena; in the exact same way, seeing those unheard-of, ominous portents, the people of that city suddenly became struck with terror. || 114 ||
श्लोक ( Shlok ) 115
अश्वग्रीवश्च सम्भ्रान्तः समन्त्रं पृष्टवान् पृथक् । शतबिन्दु निमित्तिज्ञं किमेतदिति तत्फलम् ॥ ११५ ॥
अश्वग्रीव भी घबड़ा गया । उसने सलाह कर एकान्तमें शतबिन्दु नामक निमित्तज्ञानीसे ‘यह क्या है ? इन शब्दों द्वारा उनका फल पूछा ।। ११५ ।।
Ashvagreeva too became deeply anxious. After consulting with his inner circle, he questioned a Nimittajnani named Shatabindu in absolute privacy, asking, “What is the meaning of all this?” and sought to know the final outcome of these portents through his words. || 115 ||
श्लोक ( Shlok ) 116 – 117
येन सिंहो हतः सिन्धुदेशे रूढपराक्रमः । अहारि प्राभृतं येन त्वां प्रति प्रहितं हठात् ॥ ११६ ॥ रथनूपुरनाथेन भवद्योग्यं प्रदायि च । यस्मै स्त्रीरत्नमेतस्मात्संक्षोभस्ते भविष्यति ॥ ११७ ॥
शतबिन्दुने कहा कि जिसने सिन्धु देशमें पराक्रमी सिंह मारा है, जिसने तुम्हारे प्रति भेजी हुई भेंट जबर्दस्ती छीन ली और रथनूपुर नगरके राजा ज्वलनजटीने जिसके लिए आपके योग्य स्त्रीरत्न दे दिया है उससे आपको क्षोभ होगा ।।११६-११७।।
Shatabindu replied, “You will face distress and ruin from the one who has slain the mighty lion in the Sindh region, who has forcibly seized the tribute sent to you, and to whom King Jvalanajati of Rathanupur City has given the precious jewel of a woman who was rightfully worthy of you.” || 116-117 ||
श्लोक ( Shlok ) 118 – 119
तत्सूचकमिदं सर्वं कुर्वेतस्य प्रतिक्रियाम् । इति नैमित्तिकेनोक्तं कृत्वा हृदि खगाधिपः ॥ ११८ ॥ अरेर्गदस्य चात्मज्ञः प्रादुर्भावनिषेधनम् । विदधाति तदस्ताभिर्विस्मृतं सस्मयैर्वृथा ॥ ११९ ॥
ये सब उत्पात उसीके सूचक हैं। तुम इसका प्रतिकार करो। इस प्रकार निमित्तज्ञानीके द्वारा कही बातको हृदयमें रखकर अश्वग्रीव अपने मन्त्रियोंसे कहने लगा कि आत्मज्ञानी मनुष्य शत्रु और रोगको उत्पन्न होते ही नष्ट कर देते हैं परन्तु हमने व्यर्थ ही अहंकारी रहकर यह बात भुला दी ११८-११९ ॥
“All these omens are indicative of him alone. You must take countermeasures against this.” Keeping these words spoken by the Nimittajnani deep within his heart, Ashvagreeva began to address his ministers, saying, “Wise men destroy an enemy and a disease the very moment they arise; but out of sheer vanity, we have needlessly ignored this truth.” || 118-119 ||
श्लोक ( Shlok ) 120
इदानीमप्यसौ दुष्टो युष्माभिरविलम्बितम् । विषाङ्करवदुच्छेद्य इत्यवादीत्स्वमन्त्रिणः ॥ १२० ॥
अब भी यह दुष्ट आप लोगोंके द्वारा विषके अंकुरके समान शीघ्र ही छेदन कर देनेके योग्य है ।॥ १२० ॥
“Even now, this wicked one is fit to be completely cut down by you all without delay, just like the sprout of a poisonous plant.” || 120 ||
श्लोक ( Shlok ) 121 – 122
तेऽपि तत्सर्वमन्विष्य स्वगूढप्रहितैश्वरैः । नैमित्तिकोक्तं निश्चित्य तस्य सिंहवधादिकम् ॥ १२१ ॥ त्रिपृष्ठो नाम दर्पिष्ठः प्रजापतिसुतः क्षितौ । विश्वक्षितीशानाक्रम्य विक्रमाद्विजिगीषते ॥ १२२ ॥
उन मन्त्रियोंने भी गुप्त रूपसे भेजे हुए दूतोंके द्वारा उन सबकी खोज लगा ली और निमित्तज्ञानीने जिन सिंहवध आदिकी बातें कही थीं उन सबका पता चला कर निश्चय कर लिया कि इस पृथिवी पर प्रजापतिका पुत्र त्रिष्पृष्ठ ही बड़ा अहंकारी है। वह अपने पराक्रमसे सब राजाओं पर आक्रमणकर उन्हें जीतना चाहता है ।। १२१-१२२ ।।
Through secretly dispatched spies, those ministers also thoroughly investigated all of them. Having tracked down and verified the details of the slaying of the lion and the other events mentioned by the Nimittajnani, they confirmed that on this earth, it is indeed Trishprishta, the son of Prajapati, who is immensely proud and arrogant. He intends to invade and conquer all kings by the power of his own might. || 121-122 ||
श्लोक 123 से 131
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अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112