अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 102 to 112
श्लोक ( Shlok ) 102 – 104
श्रीत्रिपृष्ठः कुमाराणां वरिष्ठः कन्ययाऽनया । स्वयम्प्रभाख्यया लक्ष्म्येवाद्यालक्रियतामिति ॥ १०२ ॥श्रुत्वा यथार्थमस्याविर्भूतद्विगुणसम्मदः । वाचिकं च समाकर्ण्य भुजाप्राक्रान्तमस्तकः ॥ १०३ ॥स्वयमेव खगाधीशः स्वजामातुर्महोदयम् । इमं विधातुमन्यञ्च सचिन्तस्तत्र के वयम् ॥ १०४ ॥
तदनन्तर दूतने सन्देश सुनाया कि यह श्रीमान् त्रिष्पृष्ठ समस्त कुमारोंमें श्रेष्ठ है अतः इसे लक्ष्मीके समान स्वयम्प्रभा नामकी इस कन्यासे आज सुशोभित किया जावे । इस यथार्थ सन्देशको सुनकर प्रजापति महाराजका हर्ष दुगुना हो गया। वे मस्तक पर भुजा रखते हुए बोले कि जब विद्याधरोंके राजा स्वयं ही अपने जमाईका यह तथा अन्य महोत्सव करनेके लिए चिन्तित हैं तब हमलोग क्या चीज हैं ? ।। १०२-१०४ ।।
Thereafter, the messenger delivered the message, saying, “This honorable Trishprishta is the most eminent among all princes; therefore, he should be adorned today with this maiden named Swayamprabha, who is like the goddess Lakshmi herself.”
Hearing this favorable and earnest message, King Prajapati’s joy doubled. Placing his hand upon his forehead [in a gesture of humility and gratitude], he said, “When the king of the Vidyadhars himself is taking thought to celebrate this and other grand festivals for his son-in-law, then what are we in comparison?” || 102-104 ||
श्लोक ( Shlok ) 105
इति दूर्त तदायातं कार्यसिद्धया प्रसाधयन् । प्रपूज्य प्रतिदर्श च प्रदायाशु व्यसर्जयत् ॥ १०५ ॥
इस प्रकार उस समय आये हुए दूतको महाराज प्रजापतिने कार्यकी सिद्धिसे प्रसन्न किया, उसका सम्मान किया और बदलेकी भेंट देकर शीघ्र ही विदा कर दिया ॥ १०५ ॥
In this manner, King Prajapati pleased the newly arrived messenger with the successful fulfillment of his mission, honored him greatly, and, after presenting reciprocal gifts in return, sent him on his journey back without delay. || 105 ||
श्लोक ( Shlok ) 106
स दूतः सत्वरं गत्वा रथनूपुरनायकम् । प्राप्य प्रणम्य कल्याणकार्यसिद्धिं व्यजिज्ञपत् ॥ १०६ ॥
वह दूत भी शीघ्र ही जाकर रथनूपुरनगरके राजाके पास पहुँचा और प्रणाम कर उसने कल्याणकारी कार्य सिद्ध होनेकी खबर दी ॥ १०६ ॥
That messenger also returned swiftly, arrived before the king of Rathanupur City, and after bowing down respectfully, delivered the joyous news of the successful completion of the auspicious mission. || 106 ||
श्लोक ( Shlok ) 107 – 109
तच्छ्रुत्वा खेचराधीशः प्रप्रमोदप्रचोदितः । न कालहरणं कार्यमिति कन्यासमन्वितः ॥ १०७ ॥महाविभूत्या सम्प्राप्य नगरं पोदनाह्वयम् । उद्दद्धतोरणं दत्तचन्दनच्छदमुत्सुकम् ॥ १०८ ॥केतुमालाचलद्दोभिराह्वयद्वातिसम्भ्रमात् । प्रतिपातः स्वसम्पत्त्या महीशः प्राविशन्मुदा ॥ १०९ ॥
यह सुनकर विद्याधरोंका राजा बहुत भारी हर्षसे प्रेरित हुआ और सोचने लगा कि ‘इस कार्यमें विलम्ब करना योग्य नहीं है’ यह विचार कर वह कन्या सहित बड़े ठाट-बाटसे पोदनपुर पहुँचा। उस समय उस नगर में जगह-जगह तोरण बांधे गये थे, चन्दनका छिड़काव किया था, सब जगह उत्सुकता ही उत्सुकता दिखाई दे रही थी, और पताकाओंकी पंक्ति रूप चञ्चल भुजाओंसे वह ऐसा जान पड़ता था मानो बुला ही रहा हो। महाराज प्रजापतिने अपनी सम्पत्तिके अनुसार उसकी अगवानी की। इस प्रकार उसने बड़े हर्षसे नगरमें प्रवेश किया ।। १०७- १०९ ॥
Hearing this, the king of the Vidyadhars was moved by immense joy and thought to himself, “It is not proper to delay this matter.” With this consideration, accompanied by the maiden, he reached Podanpur in grand pomp and splendor.
At that time, ceremonial archways (torans) were erected at various places throughout the city, sandalwood water was sprinkled everywhere, and an atmosphere of intense eager anticipation was visible all around. With the fluttering rows of its flags acting like restless, waving arms, the city appeared as though it were actively inviting them in. King Prajapati went forth to welcome him in a manner befitting his great wealth. Thus, with great joy, the Vidyadhar king entered the city. || 107-109 ||
श्लोक ( Shlok ) 110
प्रविश्य स्वोचितस्थाने तेनैव विनिवेशितः । प्राप्तप्राघूर्णकाचारप्रसन्नहृदयाननः ॥ ११० ॥
प्रवेश करनेके बाद महाराज प्रजापतिने उसे स्वयं ही योग्य स्थान पर ठहराया और पाहुनेके योग्य उसका सत्कार किया। इस सत्कारसे उसका हृदय तथा मुख दोनों ही प्रसन्न हो गये ।। ११० ।।
After he entered, King Prajapati personally escorted him to an appropriate, noble lodging and extended to him hospitality befitting an honored guest. By this warm reception, both his heart and his countenance beamed with joy. || 110 ||
श्लोक ( Shlok ) 111 – 112
विवाहोचितविन्यासैस्तर्पिताशेषभूतलः । स्वयम्प्रभां प्रभां वान्यां त्रिपृष्ठाय प्रदाय ताम् ॥ १११ ॥सिंहाहिविद्विट्वाहिन्यौ विद्ये साधयितुं ददौ । ते तन्त्र सर्वे सम्भूय व्यगाहन्त सुखाम्बुधिम् ॥ ११२ ॥
विवाहके योग्य सामग्रीसे उसने समस्त पृथिवी तलको सन्तुष्ट किया और दूसरी प्रभाके समान अपनी स्वयंप्रभा नामकी पुत्री त्रिपृष्ठके लिए देकर सिद्ध करनेके लिए सिंहवाहिनी और गरुड़वाहिनी नामकी दो विद्याएँ दीं। इस तरह वे सब मिलकर सुखरूपी समुद्रमें गोता लगाने लगे ।।१११-११२।।
With the wedding provisions and materials, he satisfied the entire earth, and gave his daughter, Swayamprabha—who was like a second radiance (prabha) incarnate—in marriage to Trishprishta. Along with her, he bestowed two mystical faculties (vidyas) named Simhavahini (she who rides a lion) and Garudavahini (she who rides a Garuda) to be mastered. In this manner, they all began to immerse themselves together in an ocean of pure happiness. || 111-112 ||
श्लोक 113 से 122
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