विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 –श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 232
English translation of Uttar Puran parv 59- shlok 233 to 242
श्लोक ( Shlok ) 233 – 234
कदाचिद्रश्मिवेगोऽगात्सिद्धकूटजिनालयम् । हरिचन्द्राह्वयं “तत्र दृष्ट्रा चारणसंयतम् ॥ २३३ ॥श्रुत्वा धर्म च सम्यक्त्वं संयर्म प्रतिपद्य सः । चारणत्वं च सम्प्राप्तः सद्योगगनगोचरम् ॥ २३४ ॥
किसी समय रश्मिवेग सिद्धकूट पर विद्यमान जिन मन्द्रिके दर्शनके लिए गया था, वहाँ उसने चारण-ऋद्धि धारी हरिचन्द्र नामक मुनिराज के दर्शन कर उनसे धर्मका स्वरूप सुना, उन्हींसे सम्यग्दर्शन और संयम प्राप्त कर मुनि हो गया तथा शीघ्र ही आकाशचारण ऋद्धि प्राप्त कर ली ।। २३३-२३४ ।।
At one time, Rashmivega went to Siddhakuta to visit the Jinendra temple. There, he met the great sage Harichandra, who possessed the supernatural power of Charana-riddhi. After listening to the nature of Dharma from him, he attained Samyagdarshana (right faith) and Sanyama (self-restraint), becoming a monk. Soon after, he too acquired the power of Akashacharana (the ability to travel through the sky). [233–234]
श्लोक ( Shlok ) 235
काञ्चनाख्यगुहायां तं कदाचिदवलोक्य ते। वन्दित्वा तिष्ठतां तत्र श्रीधरा च यशोधरा ॥ २३५ ॥
किसी दिन रश्मिवेग मुनि काञ्चन नामकी गुहामें विराजमान थे, उन्हें देखकर श्रीधरा और यशोधरा आर्यिकाएँ उन्हें नमस्कार कर वहीं बैठ गई ।। २३५ ।।
One day, while the sage Rashmivega was staying in a cave named Kanchan, the noble nuns Shridhara and Yashodhara saw him; they bowed to him in reverence and sat down there. [235]
श्लोक ( Shlok ) 236
प्राक्तनो तारकस्तस्मात्प्रच्युत्याघविपाकतः । चिरं भ्रमित्वा संसारे महानजगरोऽभवत् ॥ २३६ ॥
सिंहचन्द्रका जीव स्वर्गसे चय कर इसी जम्बूद्वीप के चक्रपुर नगरके स्वामी राजा अपराजित और उनकी सुन्दरी नामकी रानीके चक्रायुध नामका पुत्र हुआ । ॥२३६॥
Meanwhile, the soul of Satyaghosha, who had been a denizen of the third hell, emerged from there and—due to the fruition of his sins—wandered through the cycle of worldly existence for a long time. Eventually, he was reborn as a massive python in that very same forest. [236]
श्लोक ( Shlok ) 237 – 238
तेच तं च निरीक्ष्यैष स सूर्यप्रतिमं क्रुधा । सहागिलत् समाराध्य ते कापिष्ठे बभूवतुः ॥ २३७ ॥ रुचकाख्ये विमानेऽयं सुनिश्वार्कप्रभाह्वये । देवः पङ्कप्रभां प्रापत् पापादजगरोऽपि सः ॥ २३८ ॥
उन श्रीधरा तथा यशोधरा आर्यिकाओंको और सूर्यके समान दीप्तिवाले उन रश्मिवेग मुनिराजको देखकर उस अजगरने क्रोधसे एक ही साथ निगल लिया। समाधिमरण कर आर्यिकाएँ तो कापिष्ठ नामक स्वर्गके रुचक नामक विमानमें उत्पन्न हुईं और मुनि उसी स्वर्गके अर्कप्रभ नामक विमानमें देव उत्पन्न हुए। वह अजगरभी पापके उदयसे पङ्कप्रभा नामकचतुर्थ पृथिवीमें पहुँचा ॥२३७-२३८।।
Upon seeing the noble nuns Shridhara and Yashodhara, along with the sage Rashmivega, who possessed a sun-like radiance, the python swallowed all three of them at once in a fit of rage. Having died in a state of Samadhimaran (meditative death), the nuns were reborn in the Ruchaka celestial vehicle of the Kapishtha heaven, while the monk was reborn as a deity in the Arkaprabha celestial vehicle of that same heaven. As for the python, due to the fruition of his sins, he reached Pankaprabha, the fourth hell. [237–238]
श्लोक ( Shlok ) 239
सिंहचन्द्रो दिवोऽभ्येत्य द्वीपेऽस्मिन् चक्रपूः पतेः । अपराजितराजस्य सुन्दर्याश्च सुतोऽभवत् ॥ २३९ ॥
सिंहचन्द्रका जीव स्वर्गसे चय कर इसी जम्बूद्वीप के चक्रपुर नगरके स्वामी राजा अपराजित और उनकी सुन्दरी नामकी रानीके चक्रायुध नामका पुत्र हुआ । ॥२३९॥
The soul of Simhachandra, having descended from heaven, was reborn as a son named Chakrayudha to King Aparajita and Queen Sundari of the city of Chakrapur. [239]
श्लोक ( Shlok ) 240
चक्रायुधस्ततोऽस्यैव रश्मिवेगश्च्युतो दिवः । सञ्जातश्चित्रमालायां सुतो वज्रायुधाह्नयः ॥ २४० ॥
उसके कुछ समय बाद रश्मिवेगका जीव भी स्वर्गसे च्युत होकर इसी अपराजित राजाकी दूसरी रानी चित्रमालाके वज्रायुध नागका पुत्र हुआ ॥ २४० ॥
The soul of Rashmivega, after descending from heaven, was born as a son named Vajrayudha to Chitramala, the other queen of King Aparajita (Aparajit). [240]
श्लोक ( Shlok ) 241 – 242
श्रीधरा चागता नाकात् पृथिवीतिलके पुरे । सुताऽभूत् प्रियकारिण्यामतिवेगमहीपतेः ॥ २४१ ॥ सर्वलक्षणसम्पूर्णा रत्नमालातिविश्रुता । वज्रायुधस्य सा देवी समजायत सम्मुदे ॥ २४२ ॥
श्रीधरा आर्यिका स्वर्गसे चयकर धरणीतिलक नगरके स्वामी अतिवेग राजाकी प्रियकारिणी रानीके समस्त लक्षणोंसे सम्पूर्ण रत्नमाला नामकी अत्यन्त प्रसिद्ध पुत्री हुई। यह रत्न-माला आगे चलकर वज्रायुध के आनन्दको बढ़ानेवाली उसकी प्राणप्रिया हुई ।। २४१-२४२ ।।
The soul of Shridhara Arya, after descending from heaven, was born as the renowned daughter Ratnamala to King Ativega of Dharanitilaka and his queen Priyakarin. Possessed of all auspicious signs, Ratnamala eventually became the beloved wife of Vajrayudha, bringing him great joy. [241–242]
श्लोक 243 से 252
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