विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 125 | श्लोक 126 से 131
English translation of Uttar Puran parv 59- shlok 132 to 141
श्लोक ( Shlok ) 132
आदित्याभस्तदा देवो गुणहेतुस्तयोरभूत् । मध्ये ज्ञातानुबन्धो वा धातुप्रत्यययोः परः ॥ १३२ ॥
उसी समय वहाँ एक आदित्याभ नामका देव आया था जो कि विद्युदंष्ट्र और धरणेन्द्र दोनोंके ही गुण-लाभ-का उस प्रकार हेतु हुआ था जिस प्रकार कि किसी धातु और प्रत्ययके बीच में आया हुआ अनुबन्ध गुण- व्याकरणमें प्रसिद्ध संज्ञा विशेषका हेतु होता हो ।॥ १३२ ॥
At that moment, a celestial being named Adityabha arrived. He became the cause of benefit and merit for both Vidyudanshtra and Dharanendra, much like an Anubandha (indicatory letter) placed between a root (Dhatu) and a suffix (Pratyaya) serves as the cause for a specific grammatical operation (Samjna) in the science of grammar. [132]
श्लोक ( Shlok ) 133
कृतदोषोऽस्त्ययं नागनाथ किन्त्वनुरोधतः । ममास्य शम्यतां क्षुद्रे कः कोपस्त्वादृशां पशौ ॥ १३३ ॥
वह कहने लगा कि हे नागराज ! यद्यपि इस विद्युदंष्ट्रने अपराध किया है तथापि मेरे अनुरोधसे इसपर क्षमा कीजिये । आप जैसे महापुरुषोंका इस क्षुद्र पशु पर क्रोध कैसा ? ॥ १३३ ॥
He began to speak, saying, “O Nagaraja! Although this Vidyudanshtra has committed a grave offense, I request you to forgive him for my sake. Why should a great soul such as yourself harbor anger toward such a lowly creature?” [133]
श्लोक ( Shlok ) 134 – 135
पुरादितीर्थकृत्काले भववंशसमुद्भवैः । वंशोऽस्य निर्मितो दत्त्वा विद्या विद्याधरेशिनाम् ॥ १३४॥’संबद्धर्य विषवृक्षं च छेत्तुं स्वयमवैतु कः । इत्याबालप्रसिद्धं किं न वेत्सि विषभृत्यते ॥ १३५ ॥
बहुत पहले, आदिनाथ तीर्थंकरके समय आपके वंशमें उत्पन्न हुए धरणेन्द्रके द्वारा विद्याधरोंकी विद्याएं देकर इसके वंशकी रचना की गई थी। लोकमें यह बात बालक तक जानते हैं कि अन्य वृक्षकी बात जाने दो, विष-वृक्षको भी स्वयं बढ़ाकर स्वयं काटना उचित नहीं है, फिर हे नागराज ! आप क्या यह बात नहीं जानते ? ।।१३४-१३५।।
“Long ago, during the time of Tirthankara Adinatha, the lineage of these Vidyadharas was established by the Dharanendra born of your own race, who bestowed upon them their supernatural powers (Vidyas). It is common knowledge, known even to children, that—to say nothing of other trees—it is not proper to cut down even a poison tree after having nurtured it oneself. In that case, O Nagaraja, is this not known to you?” [134-135]
श्लोक ( Shlok ) 136 – 139
इत्युक्तस्तेन नागेन्द्रः प्रत्युवाच तपोधनम् । मदग्रजमयं दुष्टो निर्हेतुकममीमरत् ॥ १३६ ॥ तद्ध्रुवं मम हन्तव्यो न निषेध्यं त्वयार्थितम् । मयेति सहसा देवस्तमाह मतिमान् वृथा ॥ १३७ ॥वैरं वहसि ते भ्राता जातौ जातोऽयमेव किम्। विद्युद्धंष्ट्रो न किं भ्राता सञ्जातः संसृतौ भ्रमन् ॥ १३८॥बन्धुः कः को न वा बन्धुः बन्धुताबन्धुताद्वयम् । संसारे परिवर्तेत ‘विदामत्राग्रहः कुतः ॥ १३९ ॥
जब आदित्याभ यह कह चुका तब नागराज-धरणेन्द्रने उत्तर दिया कि ‘इस दुष्टने मेरे तपस्वी बढ़े भाईको अकारण ही मारा है अतः यह मेरे द्वारा अवश्य ही मारा जावेगा। इस विषयमें आप मेरी इच्छाको रोक नहीं सकते।’ यह सुनकर बुद्धिमान् देवने कहा कि- ‘आप वृथा ही वैर धारण कररहे हैं। इस संसारमें क्या यही तुम्हारा भाई है ? और संसारमें भ्रमण करता हुआ विद्युदंष्ट्र क्या आज तक तुम्हारा भाई नहीं हुआ। इस संसारमें कौन बन्धु है? और कौन बन्धु नहीं है ? बन्धुता और अबन्धुता दोनों ही परिवर्त्तनशील हैं- आज जो बन्धु हैं वह कल अबन्धु हो सकता है और आज जो अबन्धु है वह कल बन्धु हो सकता है अतः इस विषयमें विद्वानोंको आग्रह क्यों होना चाहिये ? ।। १३६-१३९ ।।
When Adityabha had finished speaking, Nagaraja Dharanendra replied, “This wicked being has killed my ascetic elder brother without cause; therefore, he shall certainly be slain by me. You cannot restrain my will in this matter.”
Upon hearing this, the wise deity said, “You are harboring enmity in vain. Is he your only brother in this entire universe? And throughout his wanderings in this cycle of transmigration, has Vidyudanshtra never been your brother before? In this world, who is truly a kinsman and who is a stranger? Both kinship and non-kinship are ever-changing—he who is a brother today may become an enemy tomorrow, and he who is an enemy today may become a brother tomorrow. Therefore, why should the wise remain so stubborn in this regard?” [136-139]
श्लोक ( Shlok ) 140
कृतापराधे भ्राता ते विद्युद्धंष्ट्मदण्डयत् । ततोऽयं स्मृततज्जन्मा मुनेरस्यापकारकः ॥ १४० ॥
पूर्व जन्ममें अपराध करने पर तुम्हारे भाई संजयन्तने विद्युदंष्ट्रके जीवको दण्ड दिया था, आज इसे पूर्वजन्मकी वह बात याद आ गई अतः इसने मुनिका अपकार किया है ।। १४० ।।
“In a previous birth, when this soul had committed a transgression, your brother Sanjayanta had punished the being who is now Vidyudanshtra. Today, the memory of that past life was triggered within him; consequently, he has committed this offense against the Muni.” [140]
श्लोक ( Shlok ) 141
अग्रजं तव पापोऽयं प्राक्तज्जन्मचतुष्टये । महावैरानुबन्धेन लोकान्तरमजीगमत् ॥ १४१ ॥
इस पापीने तुम्हारे बड़े भाईको पिछले चार जन्मोंमें भी महावैरके संस्कारसे परलोक भेजा है-मारा है ॥ १४१ ॥
“Due to the deep-seated impressions of an intense enmity, this sinful soul has sent your elder brother to the next world—killing him—in his previous four births as well.” [141]
श्लोक 142 से 151
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तीर्थंकर तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ तीर्थकर पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ तीर्थंकर पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ भगवान् पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पुराण का वर्णन पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पुराण का वर्णन पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पुराण का वर्णन पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ तीर्थकर त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 57 – श्लोक 1 से 100
श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र, द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण का वर्णन पर्व 58 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 53 | श्लोक 54 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 124
विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 125 | श्लोक 126 से 131
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |