विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 54
English translation of Uttar Puran parv 59- shlok 55 to 61
श्लोक ( Shlok ) 55 – 56
खद्वयर्वष्टसम्प्रोक्तयतिभिः प्रतिमां गतः । आषाढस्योत्तराषाढे कृष्णाष्टम्यां निशामुखे ॥ ५५ ॥सद्यः कृत्वा समुद्घातं सूक्ष्मं शुष्टुं समाश्रितः । सम्यग्योगादयोगः सन् स्वास्थ्यं रोगीव सोऽगमत् ॥५६॥
आठ हजार छह सौ मुनियोंके साथ प्रतिमा योग धारण किया तथा आषाढ़ कृष्ण अष्टमीके दिन उत्तराषाढ़ नक्षत्रमें प्रातःकालके समय शीघ्र ही समुद्घात कर सूक्ष्म-क्रियाप्रतिपाती नामका शुक्ल ध्यान धारण किया तथा तत्काल ही सयोग अवस्थासे अयोग अवस्था धारण कर उस प्रकार स्वास्थ्य (स्वरूपावस्थान) अर्थात् मोक्ष प्राप्त किया जिस प्रकार कि कोई रोगी स्वास्थ्य (नीरोग अवस्था) प्राप्त करता है ॥ ५५-५६ ॥
Along with eight thousand six hundred monks, he adopted the Pratima Yoga. On the day of Ashadha Krishna Ashtami, under the Uttarashadha Nakshatra during the early morning hours, he swiftly performed Samudghat and attained the state of Shukla Dhyana known as Sukshma-kriya-pratipat.
Immediately transitioning from the Sayoga (vibratory) state to the Ayoga (non-vibratory) state, he achieved Svasthya (abidance in the self)—that is, Moksha—just as a patient attains a state of perfect health (recovery from illness). [55-56]
श्लोक ( Shlok ) 57
तदा प्रभृति लोकेऽस्मिन् पूज्या कालाष्टमी बुधैः । तदेवालम्बनं कृत्वा मिथ्यादृग्भिश्च पूज्यते ॥ ५७ ॥
उसी समयसे ले कर लोकमें आषाढ कृष्ण अष्टमी, कालाष्टमीके नामसे विद्वानोंके द्वारा पूज्य हो गई और इसी निमित्तको पाकर मिथ्या-दृष्टि लोग भी उसकी पूजा करने लगे ॥ ५७ ॥
Since that very time, Ashadha Krishna Ashtami became revered by scholars in the world as Kalashtami. Observing this occasion, even those with false belief (Mithya-drishti) began to worship it as well. [57]
श्लोक ( Shlok ) 58
कृत्वाऽन्त्येष्टि तदाभ्येत्य सौधर्मप्रमुखाः सुराः । सिद्धस्तुतिभिरर्थ्याभिरवन्दिषत निर्वृतम् ॥ ५८ ॥
उसी समय सौधर्म आदि देवोंने आकर उनका अन्त्येष्टि संस्कार किया और मुक्त हुए उन भगवान् की अर्थपूर्ण सिद्ध स्तुतियों से वन्दना की ।। ५८ ।।
At that same time, the celestial beings—Saudharma and others—arrived to perform the last rites (funeral ceremonies). They then offered salutations to the liberated Lord through meaningful and profound Siddha-Stutis (hymns of praise to the perfected soul). [58]
श्लोक ( Shlok ) 59
सन्तत्या मलसञ्चयः परिणतो हिंसादिभिः सन्ततं संसारे सुकृतात्ततो निजगुणा नेयुर्विशुद्धिं क्वचित् । तानद्याहमवाप्य बुद्धिममलां शुद्धि नयामीत्यर्य शुक्रुध्यानमुपाश्रितोऽतिविमलस्तस्माद्यथार्थाह्वयः ॥ ५९ ॥
हिंसा आदि पापोंसे परिणत हुआ यह जीव निरन्तर मलका संचय करता रहता है और पुण्यके द्वारा भी इसी संसारमें निरन्तर विद्यमान रहता है अतः कहीं अपने गुणोंको विशुद्ध बनाना चाहिये- पाप पुण्यके विकल्पसे रहित बनाना चाहिये। आज मैं निर्मल बुद्धि-शुद्धोपयोगकी भावनाको प्राप्त कर अपने उन गुणोंको शुद्धि प्राप्त कराता हूँ- पुण्य-पापके विकल्पसे दूर हटाकर शुद्ध बनाता हूँ’ ऐसा विचार कर ही जो शुक्ल ध्यानको प्राप्त हुए थे ऐसे विमलवाहन भगवान् अपने सार्थक नामको धारण करते थे ॥ ५९ ॥
“This soul, transformed by sins such as violence, continuously accumulates impurities; even through merit (Punya), it remains perpetually within this cycle of worldly existence (Samsara). Therefore, one must purify their inner attributes—making them free from the dualities of both sin and merit. Today, by attaining the sentiment of pure intellect and pure consciousness (Shuddhopayoga), I shall bring purity to my qualities—cleansing them by moving beyond the distinctions of merit and sin.”
Thinking thus, Lord Vimalavahana attained Shukla Dhyana (pure meditation), truly living up to the profound meaning of his name. [59]
श्लोक ( Shlok ) 60
श्रद्धानबोधरदनं गुणपुण्यमूर्ति-माराधना चरणमायतधर्महस्तम् । सन्मार्गवारणमधारिमभिप्रचोद्य विध्वंसनाद्विमलवाहनमाहुरेनम् ॥ ६० ॥
सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान ही जिसके दो दाँत हैं; गुण ही जिसका पवित्र शरीर है, चार आराधनाएँ ही जिसके चरण हैं और विशाल धर्म ही जिसकी सूँड है ऐसे सन्मार्गरूपी हाथीको पाप-रूपी शत्रुके प्रति प्रेरित कर भगवान् विमलवाहनने पाप-रूपी शत्रुको नष्ट किया था इसलिए ही लोग उन्हें विमलवाहन (विमलं वाहनं यानं यस्य सः विमलवाहनः – निर्मल सवारीसे युक्त) कहते थे ॥ ६० ॥
With Right Belief (Samyag-darshana) and Right Knowledge (Samyag-jnana) as his two tusks; his Virtues (Gunas) as his sacred body; the Four Adharanas (Fourfold Altars of Worship) as his feet; and the vast Dharma as his trunk—Lord Vimalavahana directed this elephant of the Right Path against the enemy of Sin.
By destroying the adversary of sin in this manner, he was rightfully called Vimalavahana (Vimalam vahanam yanam yasya sah)—the one who possesses a pure and stainless vehicle. [60]
श्लोक ( Shlok ) 61
विनिहतपरसेनः पद्मसेनो महीशः सुरसमितिसमर्थ्यः स्पष्टसौख्योऽष्टमेन्द्रः । विपुलविमलकीर्तिविंश्वविश्वम्भरेशो विमलजिनपतिः स्तात् सुष्ठुतस्तुष्टये वः ॥ ६१ ॥
जो पहले शत्रुओंकी सेनाको नष्ट करने-वाले पद्मसेन राजा हुए, फिर देव-समूहसे पूजनीय तथा स्पष्ट सुखोंसे युक्त अष्टम स्वर्गके इन्द्र हुए, और तदनन्तर विशाल निर्मलकीर्तिके धारक एवं समस्त पृथिवीके स्वामी विमलवाहन जिनेन्द्र हुए, वे तेरहवें विमलनाथ तीर्थकर अच्छी तरह आप लोगोंके संतोषके लिए हों ।॥ ६१ ॥
He who was first the King Padmasena, the destroyer of enemy armies; who then became the Indra of the eighth heaven, possessed of manifest bliss and worshipped by hosts of celestial beings; and who thereafter became the Lord Vimalavahana Jinendra, the master of the entire earth and upholder of vast, stainless glory—may that thirteenth Tirthankara, Vimalanath, be the source of your supreme spiritual contentment. [61]
श्लोक 62 से 71
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