धर्मनाथ तीर्थकर, सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 61 – श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 90
English translation of Uttar Puran parv 61- shlok 91 to 101
श्लोक ( Shlok ) 91 – 99
सप्तविंशतिवाद्र्व्यायुर्दिव्यभोगान्मनोहरान् । अनुभूय ततश्च्युत्वा धर्मतीर्थकरान्तरे ॥ ९१ ॥कोशले विषये रम्ये साकेतनगरीपतेः । इक्ष्वाकोः स सुमित्रस्य भद्रायाश्च सुतोऽभवत् ॥ ९२ ॥मघवान्नाम पुण्यात्मा भविष्यन् भरताधिपः । पञ्चलक्षसमाजीवी कल्याणपरमायुषा ॥ ९३ ॥ सार्द्धद्विचत्वारिंशच्चापोच्छ्रितिः कनकद्युतिः । षट्खण्डमण्डितां पृथ्वीं प्रतिपाल्य प्रतापवान् ॥ ९४ ॥ चतुर्दशमहारत्नभूषणो विधिनायकः । नृखेचरसुराधीशानमयन् क्रमयोर्युगम् ॥ ९५ ॥ स्वोक्तप्रमाणदेवीभिरनुभूय यथेप्सितत् । दशाङ्गभोगान् भूयिष्ठान् सुनिष्ठितमनोरथः ॥ ९६ ॥ सुधीर्मनोहरोद्याने स कदाचिद्यहुच्छया । विलोक्याभयघोषाख्यं केवलावगमद्युतिम् ॥ ९७ ॥ त्रिःपरीत्याभिवन्द्यैनं श्रुत्वा धर्म तदन्तिके । विदित्वा तत्त्वसद्भावं विरज्य विषयेष्वलम् ॥ ९८ ॥ प्रियमित्राय पुत्राय दत्त्वा साम्राज्यसम्पदम् । स बाह्याभ्यन्तरग्रन्थाँस्त्यक्त्वा संयममाददौ ॥ ९९ ॥
सत्ताईस सागर तक मनोहर दिव्य भोगों-को भोगकर वह वहाँसे च्युत हुआ और धर्मनाथ तीर्थंकरके अन्तरालमें कोशल नामक मनोहर देशकी अयोध्यापुरीके स्वामी इक्ष्वाकुवंशी राजा सुमित्रकी भद्रारानीसे मघवान् नामका पुण्यात्मा पुत्र हुआ । यही आगे चलकर भरत क्षेत्रका स्वामी चक्रवर्ती होगा। उसने पाँच लाख वर्षकी कल्याणकारी उत्कृष्ट आयु प्राप्त की थी। साढ़े चालीस धनुष ऊँचा उसका शरीर था, सुवर्णके समान शरीरकी कान्ति थी। वह प्रतापी छह खण्डोंसे सुशोभित पृथिवीका पालनकर चौदह महा-रत्नोंसे विभूषित एवं नौ निधियोंका नायक था। वह मनुष्य, विद्याधर और इन्द्रोंको अपने चरण-युगल में झुकाता था। चक्रवर्तियोंकी विभूतिके प्रमाणमें कही हुई – छ्यानबे हजार देवियोंके साथ इच्छानुसार दश प्रकारके भोगोंको भोगता हुआ वह अपने मनोरथ पूर्ण करता था। किसी एक दिन मनोहर नामक उद्यानमें अकस्मात् अभयघोष नामक केवली पधारे। उस बुद्धिमान्ने उनके दर्शन कर तीन प्रदक्षिणाएँ दीं, वन्दना की, धर्मका स्वरूप सुना, उनके समीप तत्त्वोंके सद्भावका ज्ञान प्राप्त किया, विषयोंसे अत्यन्त विरक्त होकर प्रियमित्र नामक पुत्रके लिए साम्राज्य पदकी विभूति प्रदान की और बाह्याभ्यन्तर परिग्रहका त्यागकर संयम धारण कर लिया ॥ ९१-९९ ॥
Having enjoyed divine, captivating pleasures there for twenty-seven Sāgaras (a cosmic measure of time), that meritorious soul departed from that realm. During the interim period of Lord Dharmanātha Tīrthaṅkara, he was born as a virtuous son named Maghavān to Queen Bhadrā and King Sumitra of the Ikṣvāku dynasty—the ruler of the beautiful city of Ayodhyāpurī in the charming land of Kośala. This very soul would later become the Cakravartī (Universal Monarch), the lord of the Bharata region.
He was blessed with an auspicious and exceptional lifespan of five hundred thousand (five lakh) years. His body stood forty and a half Dhanuṣas tall, radiating a brilliance like pure gold. Ruling over the earth adorned with its six realms, this glorious king was the master of the fourteen great jewels (Mahā-ratnas) and the custodian of the nine treasures (Nidhis). He made humans, Vidyādharas (celestial beings), and Indras bow at his feet. Fully embodying the legendary grandeur of a Cakravartī, he fulfilled his desires by enjoying ten kinds of pleasures at will alongside his ninety-six thousand queens.
One day, an enlightened omniscient master (Kevalī) named Abhayaghoṣa unexpectedly arrived at the beautiful Manohar garden. Upon beholding him, the wise king performed three circumambulations (Pradakṣiṇās), bowed reverently, listened to the nature of Dharma, and attained the true knowledge of reality (Tattvas) from him. Becoming deeply detached from worldly pleasures, he bestowed the glory of the imperial throne upon his son, Priyamitra. Renouncing all external and internal attachments, he embraced the path of self-restraint and asceticism (Saṃyama). || 91-99 ||
श्लोक ( Shlok ) 100
शुद्धश्रद्धानचारित्रः श्रुतसम्पत्समन्वितः । द्वितीयशुक्रुध्यानेन घातित्रयविघातकृत् ॥ १०० ॥
वह शुद्ध सम्यग्दर्शन तथा निर्दोष चरित्रका धारक था, शास्त्रज्ञान रूपी सम्पत्तिसे सहित था, उसने द्वितीय शुक्लध्यानके द्वारा ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय इन तीन घातिया कर्मोंका विघात कर दिया था ।॥ १०० ॥
He was the bearer of pure right-faith (Samyagdarśana) and blemishless conduct (Cāritra), and was endowed with the wealth of scriptural knowledge. Through the second stage of pure meditation (Śukladhyāna), he completely destroyed the three destructive karma types (Ghātiyā Karmas), namely: the knowledge-obscuring karma (Jñānāvaraṇa), the perception-obscuring karma (Darśanāvaraṇa), and the obstructing karma (Antarāya). || 100 ||
श्लोक ( Shlok ) 101
नवकेवललब्धीशो धर्मवद्धर्मदेशनात् । विनेयनायकान्नीत्वा निर्वाणपदवीं पराम् ॥ १०१ ॥
अब वे नौ केवललब्धियोंके स्वामी हो गये तथा धर्मनाथ तीर्थ-करके समान धर्मका उपदेश देकर अनेक भव्य जीवोंको अतिशय श्रेष्ठ मोक्ष पदवी प्राप्त कराने लगे ।। १०१ ।।
He now became the master of the nine supreme attainments of omniscience (Kevala-labdhis). Delivering sermons on Dharma in the same manner as Lord Dharmanātha Tīrthaṅkara, he began guiding numerous worthy souls (Bhavya Jīvas) to the supremely exalted state of liberation (Mokṣa). || 101 ||
श्लोक 102 से 112
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धर्मनाथ तीर्थकर, सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 61 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 90
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