अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 62 to 72
श्लोक ( Shlok ) 62
इति सम्पूर्णराज्याय खगश्रेणीद्वयेशिने । अश्वग्रीवाय दातव्या कन्येत्येतद्विचारयन् ॥ ६२ ॥
इस प्रकार अश्वग्रीव सम्पूर्ण राज्यका अधिपति है और दोनों श्रेणियोंका स्वामी है अतः इसके लिए ही कन्या देनी चाहिये ।। ६२ ।।
“In this manner, Ashvagriva reigns as the sovereign of the entire kingdom and is the master of both ridges [of the Vijayardha mountain]; therefore, it is to him alone that the princess should be bestowed.” ।। 62 ।।
श्लोक ( Shlok ) 63 – 65
अस्त्येव सुश्रुताख्यातं सर्वमित्यवनीपतिम् । इदं बहुश्रुतोऽवोचदुत्तरं स्वमनोगतम् ॥ ६३ ॥स्वाभिजात्यमरोगत्वं वयः शीलं श्रुतं वपुः । लक्ष्मीः पक्षः परीवारो वरे नव गुणाः स्मृताः ॥ ६४ ॥अश्वग्रीवे त एतेऽपि सन्ति किन्तु वयोऽधिकम् । तस्मात्कोऽपि वरोऽन्योऽस्तु सवयास्तद्गुणान्वितः ॥६५॥
इसके बाद सुश्रुत मंत्रीके द्वारा कही हुई बातका विचार करता हुआ बहुश्रुत मंत्री राजासे अपने हृदयकी बात कहने लगा। वह बोला कि सुश्रुत मंत्रीने जो कुछ कहा है वह यद्यपि ठीक है तो भी निम्नाङ्कित बात विचारणीय है। कुलीनता, आरोग्य, अवस्था, शील, श्रुत, शरीर, लक्ष्मी, पक्ष और परिवार, वर के ये नौ गुण कहे गये हैं। अश्वग्रीवमें यद्यपि ये सभी गुण विद्यमान हैं किन्तु उसकी अवस्था अधिक है, अतः कोई दूसरा वर जिसकी अवस्था कन्याके समान हो और गुण अश्वग्रीवके समान हों, खोजना चाहिये ।। ६३-६५ ।।॥
“Thereupon, deliberating upon the words spoken by Minister Sushrut, the profoundly learned minister, Bahushrut, began to express the thoughts of his heart to the King. He said: ‘Although that which Minister Sushrut has stated is indeed correct, the following point still warrants careful consideration. It is said that a groom must possess nine essential virtues: noble lineage, good health, a suitable age, moral conduct, scriptural learning, physical grace, prosperity, strong alliances, and a supportive family. Although Ashvagriva possesses all these virtues, his age is advanced; therefore, we ought to seek another groom whose age matches that of the princess, and whose virtues equal those of Ashvagriva.'” ।। 63-65 ।।
श्लोक ( Shlok ) 66 – 68
राजा सिंहरथः ख्यातः पुरे गगनवल्लभे । परः पद्मरथो मेघपुरे चित्रपुराधिराट् ॥ ६६ ॥अरिञ्जयाख्यस्त्रिपुरे खगेशो ललिताङ्गदः । कनकादिरथो विद्याकुशलोऽश्वपुरेश्वरः ॥ ६७ ॥महारत्नपुरे विश्वखगाधीशो धनञ्जयः । कन्यैष्वेकतमायेयं दातव्येति विनिश्चितम् ॥ ६८ ॥
गगनवल्लभपुरका राजा चित्ररथ प्रसिद्ध है, मेघपुरमें श्रेष्ठ राजा पद्मरथ रहता है, चित्रपुरका स्वामी अरिञ्जय है। त्रिपुरनगर में विद्याधरोंका राजा ललिताङ्गद रहता है, अश्वपुरका राजा कनकरथ विद्यामें अत्यन्त कुशल है, और महारत्नपुरका राजा धनञ्जय समस्त विद्याधरोंका स्वामी है। इनमेंसे किसी एकके लिए कन्या देनी चाहिये यह निश्चय है ॥ ६६-६८ ॥
“The famous King Chitraratha rules over Gaganavallabhapura; the noble King Padmaratha resides in Meghapura; and Arinjaya is the sovereign of Chitrapura. In the city of Tripuranagara dwells Lalitangada, the king of the Vidyadharas; King Kanakaratha of Ashvapura is exceptionally skilled in the mystical arts; and King Dhananjaya of Maharatnapura is a master over all Vidyadharas. It is my firm conviction that the princess should be bestowed upon any one among these.” ।। 66-68 ।।
श्लोक ( Shlok ) 69
अवधार्य वचस्तस्य विचार्य श्रुतसागरः । स्मृतिचक्षुरिमां वाचं व्याजहार मनोहराम् ॥ ६९ ॥
बहुश्रुतकेवचन हृदय में धारण कर तथा विचार कर स्मृतिरूपी नेत्रको धारण करनेवाला श्रुत नामका तीसरा मन्त्री निम्न्नाङ्कित मनोहर वचन कहने लगा ।। ६९ ॥
“Treasuring the words of Bahushrut within his heart and deliberating upon them, the third minister, named Shrut—who possessed the metaphorical eyes of memory and scripture—spoke the following pleasing and wise words:” ।। 69 ।।
श्लोक ( Shlok ) 70
कुलारोग्यवयोरूपाद्युपेताय यदीष्यते । दातुं कन्या मया किश्चिदुच्यते श्रूयतां मनान् ॥ ७० ॥
यदि कुल, आरोग्य, वय और रूप आदिसे सहित वर के लिए कन्या देना चाहते हों तो मैं कुछ कहता हूं उसे थोड़ा सुनिये ॥ ७० ॥
“If it is your desire to bestow the princess upon a groom who is fully endowed with noble lineage, excellent health, a fitting age, and exquisite physical grace, then I pray you listen briefly to that which I have to say.” ।। 70 ।।
श्लोक ( Shlok ) 71 – 72
सुरेन्द्रकान्तारमुदश्रेण्यां तदीश्वरः । मेघवाहननामास्य प्रियाभून्मेघमालिनी ॥ ७१ ॥तयोर्विद्युत्प्रभः सूनुर्योतिर्मालामला सुता । खगाधीशो ननन्दाभ्यामिवायेन धिया च सः ॥ ७२ ॥
इसी विजयार्ध पर्वतकी उत्तर श्रेणी में सुरेन्द्रकान्तार नामका नगर है उसके राजाका नाम मेघवाहन है। उसके मेघमालिनी नामकी वल्लभा है। उन दोनोंके विद्युत्प्रभ नामका पुत्र और ज्योतिर्माला नामकी निर्मल पुत्री है। खगेन्द्र मेघवाहन इन दोनों पुत्र-पुत्रियोंसे ऐसा समृद्धिमान-सम्पन्न हो रहा था जैसा कि कोई पुण्य कर्म और सुबुद्धिसे होता है। अर्थात् पुत्र पुण्यके समान था और पुत्री बुद्धिके समान थी ॥७१-७२॥
“On the northern ridge of this very same Vijayardha mountain lies the city named Surendrakantara, ruled by King Meghavahana. His beloved queen is named Meghamalini. To them have been born a son named Vidyutprabha and a flawless daughter named Jyotirmala. The lord of birds (khagendra), King Meghavahana, was rendered as magnificent and prosperous by these two children as a person is by virtuous deeds (punya) and noble intellect (subuddhi). That is to say, his son was like the embodiment of spiritual merit, and his daughter was like the embodiment of pure wisdom.” ।। 71-72 ।।
श्लोक 73 से 82
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