श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र, द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण का वर्णन पर्व 58 – श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 53 | श्लोक 54 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91
English translation of Uttar Puran parv 58- shlok 92 to 101
श्लोक ( Shlok ) 92
बभार भास्वरां लक्ष्मीं भरताबें निवासिनीम् । स्वचक्राक्रान्तिसन्त्रासदासीभूत (ख) भूचरः ॥ ९२ ॥
अपने चक्रके आक्रमण सम्बन्धी भयसे जिसने समस्त विद्याधर तथा भूमि-गोचरियोंको अपना दास बना लिया है ऐसा वह तारक आधे भरतक्षेत्रमें रहनेवाली देदीप्यमान लक्ष्मीको धारण कर रहा था ।॥ ९२ ॥
That Tāraka, whose fearsome discus-assault had reduced all the Vidyādharas and earthly rulers to servitude, came to possess the resplendent fortune that reigned over half of Bharata-kṣetra. ॥ 92 ॥
श्लोक ( Shlok ) 93
आस्तामन्यत्र तद्भ त्या मन्दमन्दप्रभे रवौ । मन्ये ‘विकस्वरा पद्मा पभेष्वपि न जातुचित् ॥ ९३ ॥
अन्य जगहकी बात रहने दीजिए, मैं तो ऐसा मानता हूँ कि – उसके डरसे सूर्यकी प्रभा भी मन्द पड़ गई थी इसलिए लक्ष्मी कमलोंमें भी कभी प्रसन्न नहीं दिखती थी ॥ ९३ ॥
What need is there to speak of others? I deem that, through fear of him, even the radiance of the sun had grown dim; and therefore Fortune herself no longer appeared cheerful even amidst the lotuses. ॥ 93 ॥
श्लोक ( Shlok ) 94
पुराणभूपमार्गस्य सोऽभवत्पारिपन्थिकः । सिंहिकानन्दनो वोग्रः पूर्णमास्यमृतद्युतेः ॥ ९४ ॥
जिस प्रकार उग्र राहु पूर्णिमाके चन्द्रमाका विरोधी होता है उसी प्रकार उम्र प्रकृति वाला तारक भी प्राचीन राजाओंके मार्गका विरोधी था ॥ ९४ ॥
Just as the fierce Rāhu stands opposed to the full moon of the night of plenitude, so too did Tāraka, possessed of a violent nature, oppose the noble path of the ancient kings. ॥ 94 ॥
श्लोक ( Shlok ) 95
गलन्ति गर्भास्तन्नान्ना गर्भिणीनां भयोद्भवात् । घनाधनावलीनां वा क्रूरग्रहविकारतः ॥ ९५ ॥
जिस प्रकार किसी क्रूर ग्रहके विकारसे मेघमालाके गर्भ गिर जाते हैं उसी प्रकार तारकका नाम लेते ही भय उत्पन्न होनेसे गर्भिणी स्त्रियोंके गर्भ गिर जाते थे ॥ ९५ ॥
Just as, through the malignant influence of some cruel planet, the wombs of cloud-masses are shattered, so too, at the mere utterance of Tāraka’s name, such terror arose that the pregnancies of expectant women were miscarried. ॥ 95 ॥
श्लोक ( Shlok ) 96
अन्विष्य प्रतियोद्धारमलब्ध्वा क्रुद्धमानसः । स्वप्रतापाग्निधूमेन दूषितो वा मषीनिभः ॥ ९६ ॥
स्याहीके समान श्याम वर्णवाला वह तारक सदा शत्रुओंको ढूँढ़ता रहता था और जब किसी शत्रुको नहीं पाता था तब ऐसा जान पड़ता था मानो अपने प्रतापरूपी अग्निके धुएँसे ही काला पड़ गया हो ॥ ९६ ॥
Dark in complexion like black ink, that Tāraka was ever in search of enemies; and when he found none, he appeared as though blackened by the very smoke of the fire of his own valour. ॥ 96 ॥
श्लोक ( Shlok ) 97
संतप्तसर्वमूर्धन्यः घर्मधर्माशुदुस्सहः । स पाताभिमुखः किं स्युः स्थावरास्तादृशाः श्रियः ॥ ९७ ॥
जिसने समस्त क्षत्रियोंको संतप्त कर रक्खा है और जो ग्रीष्म ऋतुके सूर्यके समान दुःखसे सहन करने योग्य है ऐसा वह तारक अन्तमें पतनके सम्मुख हुआ सो ठीक ही है क्योंकि ऐसे लोगोंकी लक्ष्मी क्या स्थिर रह सकती है ? ॥ ९७ ॥
That Tāraka, who had tormented all the Kṣatriyas and who, like the summer sun, was exceedingly difficult to endure, at last stood upon the brink of downfall. Indeed, how could the fortune of such men ever remain lasting? ॥ 97 ॥
श्लोक ( Shlok ) 98 – 100
अखण्डस्य त्रिखण्डस्याधिपत्यं समुद्वहन् । जन्मान्तरागतात्युग्रविरोधाराध्यचोदितः ॥ ९८ ॥द्विपृष्टाचलयोर्वृद्धिं प्ररूढां सोढुमक्षमः । करदीकृतनिःशेषमहीपालकृषीबलः ॥ ९९ ॥ ब्रह्मवत्करदौ नैतौ दुर्मदेनापि दर्पितौ । ४दुष्टमाशीविषं गेहे वर्द्धमानं सहेत कः ॥ १०० ॥
जो अखण्ड तीन खण्डोंका स्वामित्व धारण करता था ऐसा तारक जन्मान्तरसे आये हुए तीव्र विरोधसे प्रेरित होकर द्विष्पृष्ठनारायण और अचल बलभद्रकी वृद्धिको नहीं सह सका। वह सोचने लगा कि मैंने समस्त राजाओं और किसानोंको कर देनेवाला बना लिया है परन्तु ये दोनों भाई ब्राह्मणके समान कर नहीं देते। इतना ही नहीं, दुष्ट गर्वसे युक्त भी हैं। अपने घरमें बढ़ते हुए दुष्ट साँपको कौन सहन करेगा ? ॥ ९८-१०० ॥
That Tāraka, sovereign of the undivided three divisions of the earth, could not endure the growing power of Dviṣpṛṣṭha Nārāyaṇa and Acala Balabhadra, being impelled by the fierce enmity carried over from a former birth. He reflected thus: “I have made all kings and even the cultivators tributary to me; yet these two brothers, like Brāhmaṇas, pay no tribute whatsoever. Nor is this all—they are swollen with wicked pride. And who indeed would tolerate within his own house a venomous serpent growing ever stronger?” ॥ 98–100 ॥
श्लोक ( Shlok ) 101
उच्छेद्यकोटिमारूढौ ममेमौ येन केनचित् । सन्दूष्याहं हनिष्यामि निजप्रकृतिदूषितौ ॥ १०१ ॥
ये दोनों ही मेरे द्वारा नष्ट किये जाने योग्य शत्रुओंकी श्रेणीमें स्थित हैं तथा अपने स्वभावले दूषित भी हैं अतः जिस किसी तरह दोष लगाकर इन्हें अवश्य ही नष्ट करूँगा ।॥ १०१ ॥
“Both these men stand among the enemies destined to be destroyed by me, and by their very nature they are corrupt. Therefore, by whatever pretext I may contrive, I shall assuredly bring about their destruction.” ॥ 101 ॥
श्लोक 102 से 111
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तीर्थंकर तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ तीर्थकर पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ तीर्थंकर पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ भगवान् पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पुराण का वर्णन पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पुराण का वर्णन पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पुराण का वर्णन पर्व 56 – श्लोक 1 से 96
श्रेयांसनाथ तीर्थकर त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 57 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 62 | श्लोक 63 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 100
श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र, द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण का वर्णन पर्व 58 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 53 | श्लोक 54 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 | पर्व 55 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 | पर्व 55 |